मंगलवार, 26 मार्च 2013

शिवेन्द्र प्रताप त्रिपाठी का आलेख - तबला के अनन्य साधक - स्व. पं. अनोखेलाल मिश्र


डॉ. शिवेन्द्र प्रताप त्रिपाठी

तबला के अनन्य साधक - स्व. पं. अनोखेलाल मिश्र

    महान संगीत साधक एवं संगीत जगत में 'ना धिं धिं ना' के जादूगर के नाम से प्रसिद्ध बनारस घराने के मूर्धन्य तबला वादक पं. अनोखेलाल जी का जन्म सन् 1914 ई. में ग्राम-ताजपुर, तहसील-सकलडीहा, जिला-चन्दौली में हुआ था। इनके पिता पं. बुद्धू प्रसाद मिश्र जी एक प्रसिद्ध सारंगी वादक थे। जब पं. अनोखेलाल जी मात्र ढाई वर्ष के थे तभी इनके पिताजी तथा मात्र 6 वर्ष की अवस्था में इनकी माताजी का स्वर्गवास गया था। इनका पालन-पोषण इनकी दादी श्रीमती जानकी देवी ने किया। श्रीमती जानकी देवी जी इनको लेकर बनारस आ गई तथा इनको बनारस घराने के तबले के प्रकाण्ड विद्वान पं. भैरव प्रसाद मिश्र जी से तबला वादन की शिक्षा दिलवाने लगी।

इनका बचपन अत्यन्त कष्ट में बीता था। गुरू पं. भैरव प्रसाद मिश्र जी के सानिध्य में इन्होंने कठोर परिश्रम किया तथा सोते-जोगते हर समय केवल तबले के प्रति ही समर्पित हो गये। पं. भैरव प्रसाद मिश्र जी से इन्होंने 15 वर्षों तक बनारस घराने के तबले की विधिवत शिक्षा प्राप्त की। सच्ची लगन व अथक परिश्रम द्वारा 8-10 घण्टे प्रतिदिन के अभ्यास को आपने धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाते हुए 18 घण्टे तक कर दिया। इस कठिन अभ्यास के कारण इनको शारीरिक कष्ट भी उठाना पड़ा, परन्तु ये अपनी साधना में निरन्तर निमग्न रहे। इनके समान अभ्यास करना, किसी भी कलाकार के लिये अत्यन्त कठिन व असाध्य है। इन्होंने पं. दाउजी मिश्र के साथ गायन तथा पं. मोहन लाल जी व प्रसिद्ध नृत्यांगना शिवकुँवर बाई के कथक के साथ प्रतिदिन घण्टों अभ्यास करते थे। मात्र सोलह वर्ष की अवस्था में ही स्वतंत्र वादन तथा संगति दोनों में ही आप प्रवीण हो गये थे।

गुरू-भक्ति, गुरू-कृपा एवं साधना के कारण इनकी प्रसिद्धि बढ़ने लगी और ये देश के प्रसिद्ध संगीत समारोहों में आमंत्रित किये जाने लगे तथा उस समय के मूर्धन्य कलाकारों के साथ तबला संगति करके, कलाकारों एवं संगीत रसिकों के हृदय में लोकप्रिय कलाकार के रूप में प्रतिष्ठित हो गये। इनके वादन की सबसे प्रमुख विशेषता थी - पटाक्षरों की शुद्धता-स्पष्टता एवं तैयारी। सन् 1932 ई. में इलाहाबाद में आयोजित अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन में मात्र 18 वर्ष की अवस्था में इन्होंने उस समय के वरिष्ठ एवं महान गायक उस्ताद फैयाज़ खाँ के साथ निर्भय होकर सफल तबला संगति की तथा वहाँ उपस्थित संगीत मर्मज्ञों को चकितकर अपार यश एवं ख्याति अर्जित की। स्वतंत्र तबला वादन तथा तबला संगति, दोनों पक्ष के ये अद्वितीय कलाकार थे।

इनके जैसा 'ना धिं धिं ना' आज तक किसी भी तबला वादक ने नहीं बजाया, इनको 'ना धिं धिं ना' का जादूगर कहा जाता है। इनके जैसा 'ना धिं धिं ना' केवल इनके पुत्र स्व. पं. रामजी मिश्र जी के द्वारा ही सुना जा सकता था। पहले बनारस घराने तथा अन्य सभी घरानों में 'धिरधिरकिटतक' बोल का सीमित वादन होता था, परन्तु इन्होंने 'धिरधिरकिटतक' बोल को सिद्ध कर अनोखा बना दिया जो तबला जगत में हमेशा याद किया जायेगा। वर्तमान में 'धिरधिरकिटतक' बोल को स्वतंत्र वादन में प्रमुखता से बजाया जाता है जिसका सारा श्रेय इनको ही है। आप बनारस का शुद्ध बाज तो बजाते ही थे, साथ ही अन्य घरानों की बंदिशें भी उसी घराने की वादन शैली के अनुरूप ही प्रस्तुत किया करते थे। इनके द्वारा बजाये जाने वाला एक कायदा उदाहरणस्वरूप प्रस्तुत हैं -
क़ायदा - तीनताल

धाऽतिरकिटतक      धिरधिरकिटतक      धिरधिरधिरधिर      धिरधिरकिटतक
x
धिरधिरधिरधिर          धिरधिरकिटतक      धिरधिरधिरधिर      धिरधिरकिटतक
2
धाऽतिरकिटतक      धिरधिरकिटतक      धिरधिरधिरधिर      धिरधिरकिटतक
0
धाऽतिरकिटतक      धिरधिरकिटतक      धाऽतिरकिटतक      तूंऽनाऽकिटतक
3
ताऽतिरकिटतक      तिरतिरकिटतक      तिरतिरतिरतिर      तिरतिरकिटतक
x
तिरतिरतिरतिर          तिरतिरकिटतक      तिरतिरतिरतिर      तिरतिरकिटतक
2
धाऽतिरकिटतक      धिरधिरकिटतक      धिरधिरधिरधिर      धिरधिरकिटतक
0
धाऽतिरकिटतक      धिरधिरकिटतक      धाऽतिरकिटतक      धिंऽनाऽकिटतक
3

इन्होंने अनेक प्रसिद्ध कलाकारों के साथ संगति की तथा तबला जुगलबंदी भी बजाया। जिनमें संगति के लिए प्रमुख हैं - उस्ताद फैयाज़ खाँ, पं. ओंकारनाथ ठाकुर, पं. वामन नारायण ठकार, उस्ताद अलाउद्दीन खाँ, पं. विनायक राव पटवर्धन, उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खाँ, उस्ताद विलायत खाँ, पं. शम्भू महाराज, पं. कृष्णराव शंकर पंडित, केशरबाई केरकर, पं. भीमसेन जोशी, पं. हरिशंकर मिश्र, पं. डी. वी. पलुस्कर, पं. श्रीधर पार्सेकर, उस्ताद अब्दुल हलीम ज़ाफ़र खाँ, सुश्री अलकनन्दा जी, सुश्री शरणरानी माथुर, पं. नारायण राव व्यास, पं. वी. जी. जोग, उस्ताद नज़ाक़त-सलामत, पं. पन्नालाल घोष, उस्ताद हाफ़िज़ अली खाँ, सुश्री तारा देवी, श्रीमती सिद्धेश्वरी देवी, श्रीमती गिरिजा देवी, पं. रविशंकर, उताद इलियास खाँ, उस्ताद इस्तियाक़ अहमद, उस्ताद असद अली खाँ, उस्ताद अली अक़बर खाँ, उस्ताद नासिर मोइनुद्दीन-अमीनुद्दीन डागर, उस्ताद रईश खाँ, उस्ताद इमरत खाँ, उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ, रसूलन बाई, पं. शिवकुमार शर्मा, पं. श्रीकांत ठकार, पं. यशवंत राव पुरोहित, पं. बलवंत राय भट्ट, श्रीयुत् नागर दास चावड़ा, सुश्री हीराबाई बड़ोदेकर, पं. बलराम पाठक इत्यादि। इनको उस्ताद अहमद जान थिरकवा, उस्ताद क़ादिर बख्श, पं. ज्ञान प्रकाश घोष, पं. गोपाल मिश्र, उस्ताद हबीबुद्दीन खाँ, उस्ताद करामतुल्ला खाँ, पं. सामता प्रसाद मिश्र 'गुदई महाराज', पं. निखिल घोष, पं. कृष्ण नारायण रतनजनकर, उस्ताद मुन्ने खाँ, उस्ताद अल्लारक्खा खाँ, पं. पालघाट मणि अय्यर आदि कलाकार भी सम्मान देते थे।


आप एक अद्वितीय कलाकार होने के साथ ही अनोखे व्यक्तित्व के भी स्वामी थे। वे दयालु एवं नम्रतापूर्ण स्वभाव के थे। ये अपने शिष्यों के प्रति वात्सल्य भाव रखते थे तथा उन्हें मुक्त हृदय से तबले की शिक्षा प्रदान करते थे। इन्होंने दिल्ली से प्रसारित होने वाले राष्ट्रीय कार्यक्रम में भी कई बार बजाया था। सन् 1952 में भारतीय सांस्कृतिक प्रतिनिधि मंडल के साथ अफ़गानिस्तान गये थे, वहाँ अफ़गानिस्तान के शाह ज़हीरशाह ने इनको 'मौसीक़ी तबला नवाज़' से सम्मानित किया। सन् 1955 में भारत सरकार के संस्कृति दूत के रूप में नेपाल गये थे।

सन् 1950 ई. में कोलकाता में आयोजित अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन में इनका चमत्कृत तबला वादन सुनकर वहाँ के संगीत प्रेमियों ने आपको 'संगीत रत्न' उपाधि से सम्मानित किया था। इनके ज्येष्ठ पुत्र पं. रामजी मिश्र एक प्रसिद्ध तबला वादक हैं तथा कनिष्ठ पुत्र पं. काशीनाथ मिश्र भी तबला वादन कर रहे हैं। इनके शिष्यों में पं. नागेश्वर प्रसाद मिश्र 'पाँचू महाराज', पं. रामसुमेर मिश्र, पं. महापुरूष मिश्र, पं. छोटेलाल मिश्र, पं. ईश्वरलाल मिश्र, पं. काशीनाथ मिश्र (मुम्बई) आदि मुख्य हैं। जीवन के अंतिम समय में आप गैंगरिन रोग से पीड़ित रहे।

10 मार्च 1958 को प्रातः 8 बजे, 44 वर्ष की आयु में ही काशी में ब्रह्मलीन हो गये

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डॉ. शिवेन्द्र प्रताप त्रिपाठी

डॉ. शिवेन्द्र प्रताप त्रिपाठी का जन्म वाराणसी में हुआ। तबले की प्रारम्भिक शिक्षा अपने पिता स्व. राजेन्द्र तिवारी से प्राप्त करने के पश्चात् डॉ. शिवेन्द्र गुरू-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत बनारस घराने के तबला विद्वान पं. छोटेलाल मिश्रजी से विधिवत् एवं दीर्घकालीन तबला वादन की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। संगीत एवं मंच कला संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (वाराणसी) से स्नातकोत्तर परीक्षा में स्वर्ण पदक तथा पं. ओंकारनाथ ठाकुर स्मृति सम्मान प्राप्त कर चुके शिवेन्द्र को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से जूनियर रिसर्च फैलोशिप भी मिला है। इन्होंने यू.जी.सी. की प्रवक्ता पात्रता परीक्षा भी उत्तीर्ण की है। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय (खैरागढ़) से प्रो. (डॉ.) प्रकाश महाडिक तथा पं. छोटेलाल मिश्र के मार्गदर्शन में तबले के बनारस बाज पर शोध कार्य कर चुके शिवेन्द्र की कई रचनायें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। एक अन्य शोध कार्य हेतु संस्कृति मत्रालय से जूनियर फैलोशिप प्राप्त डॉ. शिवेन्द्र का बनारस बाज पर एक शोधपूर्ण लेख भी 'भारतीय संगीत के नये आयाम' पुस्तक में प्रकाशित हो चुका है। इसके अतिरिक्त 'भारतीय संगीतज्ञ' पुस्तक में भी इनके लेख प्रकाशित हुए हैं। इनकी एक पुस्तक भी कनिष्क पब्लिशर्स, नईदिल्ली से प्रकाशित हुई है - तबला विशारद। डॉ. शिवेन्द्र आई.सी.सी.आर. के आर्टिस्ट पैनल से भी तबला वादक के रूप में जुड़े हैं। गाँधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा, राजघाट, नईदिल्ली द्वारा संचालित नवोदित कलाकार समिति द्वारा 'संगीत साधक' सम्मान एवं 'सा रे गा मा' संस्था, लखनऊ द्वारा 'भरत कला विभूषण' सम्मान से सम्मानित डॉ. शिवेन्द्र प्रताप त्रिपाठी देश के विभिन्न मंचों पर तबला वादन कर चुके हैं। सम्प्रति संगीत विभाग, दयालबाग एजूकेशनल इंस्टीट्यूट (डीम्ड विश्वविद्यालय), दयालबाग, आगरा में सहायक प्राध्यापक-तबला पद पर कार्यरत हैं।


डॉ. शिवेन्द्र प्रताप त्रिपाठी
सहायक प्राध्यापक - तबला,
संगीत विभाग, दयालबाग एजूकेशनल इंस्टीट्यूट
(डीम्ड विश्वविद्यालय),
दयालबाग, आगरा - 282005.
मोबाइल - 08171786853
ई-मेल : shivendra.tripathi@hotmail.com

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