गुरुवार, 14 मार्च 2013

प्रदीप तिवारी की ग़ज़ल

 

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सच क्‍या है क्‍या झूठ है, क्‍या करना।

अपना एक उसूल है, ‘क्‍या करना‘।

 

मनमाफिक रस्‍ता हो, हमराही हो

मंजिल कितनी दूर है, क्‍या करना।

 

आग नहीं ये सोच ही बस्‍ती फूँक गई

मेरा घर महफूज है, क्‍या करना।

 

अक्‍ल ने ये फरमान दिया बेदर्दी से

दिल कितना मजबूर है, क्‍या करना ।

 

मैने तो दिल जान जिगर सब सौंप दिया

तुम को क्‍या मंजूर है, क्‍या करना ।

 

काफी है ये ही कि कोई अपना है

काँटा है या फूल है ,क्‍या करना।

 

तुम भी छोटी-छोटी बातों पे रूठ गए

मेरी भी एक भूल है, ‘क्‍या करना‘।

 

बड़े बाबू के केबिन में तो ए.सी. है

दफ्‍तर में मई-जून है, क्‍या करना।

 

हम लफ्‍जों को चुन-चुन गज़ल सजाते है

वो कहता दो टूक है ,क्‍या करना

-

 

नाम - प्रदीप तिवारी

जन्‍म - 10.08.1988

जन्‍म स्‍थान - दमोह (म.प्र.)

षिक्षा - बी.ई (सिविल), एम.टेक

भाषा - हिन्‍ही, उर्दू, अंग्रेजी, बुन्‍देलखण्‍डी

लेखन - गजल, कहानी, कविता ;स्‍वतंत्र लेखनद्ध

सम्‍पर्क -

pradeept_2007@yahoo.co.in

3 blogger-facebook:

  1. उम्दा शेर... बहुत अच्छी ग़ज़ल...बहुत बहुत बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  2. Bhaai pradeep, achchhee gazal hai, mubarak ho !

    उत्तर देंहटाएं
  3. insan ki yahi soch ho jaye to kya kahna! aapki gazal ki aatma bahut acchi hai KYA KARNA

    उत्तर देंहटाएं

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