रविवार, 10 मार्च 2013

मुरसलीन साकी की ग़ज़ल -मेरे लबों पे अब भी वही फसाना था, क्‍या हुआ है कि नजरें चुरा रहा है कोई.

 

मेरे लबों पे अब भी वही फसाना था

क्‍या हुआ है कि नजरें चुरा रहा है कोई

 

थी खबर कि वो शायद इधर से गुजरेंगें

इसी खयाल में पलकें बिछा रहा है कोई।

 

अभी तो किस्‍सये दर्दे निहां सुनाना था

क्‍या खबर है कि महफिल से जा रहा है कोई।

 

इधर हयात पर वीरानियों के साये हैं।

उधर बहार के नगमे सुना रहा कोई॥

 

कभी गुजरना तो पैगाम यही कह देना।

तेरे फिराक में आंसू बहा रहा कोई ॥

 

मुरसलीन साकी

लखीमपुर-खीरी (उ0प्र0)

पिन0 262701

11 blogger-facebook:

  1. मुरसलीन साकी जी,

    मजा आ गया । बहुत अच्छी गजल।
    धन्यवाद,

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत अच्छे शे' र हैं, पूरी गज़ल अच्छी लगी , मुबारक़ हो ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुंदरररररररररररररररररररर गजल

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेनामी1:09 pm

    thik to h . . . .thodha or soche jaldi nakare

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी इस गजल की तारीफ करना सूरज को दीपक दिखाने के बराबर है.
    आपको बहुत बहुत बधाई साथ ही हमारे पिता समान माननीय रविशँकर और सभी रचनाकार पाठको को भी!

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी इस गजल की तारीफ करना सूरज को दीपक दिखाने के बराबर है.
    आपको बहुत बहुत बधाई साथ ही हमारे पिता समान माननीय रविशँकर और सभी रचनाकार पाठको को भी!

    उत्तर देंहटाएं
  7. आपकी इस गजल की तारीफ करना सूरज को दीपक दिखाने के बराबर है.
    आपको बहुत बहुत बधाई साथ ही हमारे पिता समान माननीय रविशँकर और सभी रचनाकार पाठको को भी!

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