शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

महावीर सरन जैन का आलेख - भारत में प्राचीन काल में नारी की स्थितिः कुछ सवाल

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भारत में प्राचीन काल में नारी की स्थितिः कुछ सवाल

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

एक विचारधारा यह प्रतिपादित करती है कि भारत में प्राचीन काल में नारी की गौरवपूर्ण स्थिति थी। 12 वीं शताब्दी के बाद से स्थिति में परिवर्तन हो गया। सम्प्रति, मैं यह सवाल खड़ा करना चाहता हूँ कि क्या वास्तव में प्राचीन काल में भारत में नारी की गौरवपूर्ण स्थिति थी। क्या यह कह देने भर से कि हमारे ग्रंथों में यह कहा गया है कि “जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं“, हम मान लें कि हमारे समाज में व्यवहार में नारी की गौरवपूर्ण स्थिति थी। ग्रंथों में तो दर्शन के धरातल पर कहा गया है कि यह सम्पूर्ण स्थावर जंगम संसार ओम परब्रह्म द्वारा आच्छादित है। मगर क्या यह सत्य नहीं है कि समाज के धरातल पर हमारा समाज समतामूलक नहीं रहा। इसके विपरीत समाज को वर्णों, जातियों एवं उपजातियों आदि के आधार विषमतामूलक खंडों में बँटा हुआ पाते हैं।

यहाँ मैं रामायण (रामचरितमानस नहीं) एवं महाभारत के काल में नारी की स्थिति के बारे में अपने मित्रों के विचारार्थ कुछ निवेदन करना चाहता हूँ। उनके चिंतन एवं मनन के लिए यह प्रश्न उपस्थित करना चाहता हूँ कि क्या वास्तव में व्यवहार में रामायण एवं महाभारत काल में नारी की गौरवपूर्ण स्थिति थी।

वाल्मीकि ने रामायण में भूमिजा सीता की किन स्थितियों का निरूपण किया है, उनके किस स्वरूप का निदर्शन किया है। हम जब रामायण का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि वाल्मीकि की रामायण की अभागी सीता आजीवन दुख सहन करती है। वाल्मीकि अपनी रामायण में अनुसूया से सीता को ही पतिव्रत धर्म का क्यों उपदेश दिलवाते है। उनकी रामायण में किसी पुरुष पात्र को पत्नीव्रत का उपदेश क्यों नहीं दिलवाया जाता। सीता जैसी नारी को पतिव्रत उपदेश दिलाना क्या प्रमाणित करता है। क्या यही प्राचीन भारत में नारी की गौरवपूर्ण स्थिति का प्रतिमान है। एक ओर राम को त्रिकालज्ञ निरूपित करना और दूसरी ओर उन्हीं राम के द्वारा सीता जैसी पवित्र एवं पावन नारी को वनवास में छुड़वा देना और वह भी दो छोटे छोटे बच्चों के साथ। यह कौन सा आदर्श है। यह क्या समाज में नारी की गौरवपूर्ण स्थिति का उदाहरण है। यह गर्व करने का प्रकरण है या शर्म के मारे डूब मरने का प्रकरण है। जब सीता जैसी नारी के साथ ऐसा निर्दयी एवं क्रूर व्यवहार किया गया है तो उस युग में सामान्य नारी के साथ कैसा बर्ताव होता होगा, इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। क्या वाल्मीकि समाज में यह आदर्श एवं प्रतिमान प्रस्थापित करना चाहते हैं कि पुरुष पति अपनी नारी पत्नी को जब चाहे अपने घर एवं समाज से बाहर जंगल में रहने के लिए विवश कर सकता है और जब चाहे अपनी मर्जी से उसे अपने साथ रहने का आदेश दे सकता है। क्या वाल्मीकि यह आदर्श प्रस्थापित करना चाहते हैं कि समाज में नारी की अपनी कोर्इ अस्मिता नहीं होती। नारी की प्रताड़ना का इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है कि सीता जैसी आदर्श नारी को इतना मजबूर कर दिया जाता है कि अंततः उस निरुपाय को अपनी जीवन लीला समाप्त करने के लिए कदम उठाना पड़ता है। अपनी जीवन लीला समाप्त करने के लिए भूमिजा को अंतत: पृथ्वी माँ से अपने लिए एक विवर माँगकर उसी में समा जाने के लिए विवश होना पड़ता है। क्या यही प्राचीन भारत की नारी की गौरवपूर्ण स्थिति है।

लगे हाथ, महाभारत के युग में नारी की स्थिति की भी जाँच-पड़ताल कर लें। मैं उन नेताओं से, जिनको अपने लटकों झटकों से जनता जनार्दन को भ्रमित करने की महारत हासिल है, यह सवाल पूछना चाहता हूँ कि क्या व्यास जैसे महाकवि ने महाभारत में नारी को भोग्या नहीं बना दिया है। क्या किसी सभ्य समाज में यह स्वीकार किया जा सकता है कि एक नारी को पाँच पाँच पुरुष अपनी पत्नी बनने के लिए विवश करें और उसे इस बात के लिए मज़बूर किया जाए कि वह दूसरी नारी सुभद्रा को सहपत्नी के रूप में खुशी खुशी स्वीकार करे। व्यास महाराज अपनी महाभारत में युधिष्ठिर धर्मराज निरूपित करते हैं। भरी सभा में अपनी पत्नी को जुए में दाव पर लगाना क्या धर्म है। भरी सभा में द्रौपदी का चीर हरण होता है। उसके महापराक्रमी पाँच पाँच पति सब चुपचाप देखते रहते हैं। उन पाँच पतियों में तथाकथित धर्मराज युधिष्ठिर भी मौन मूक चुपचाप बैठे रहते हैं और अपनी ऐसी पत्नी का चीरहरण होते हुए देखते रहते हैं। और वह भी ऐसी पत्नी का चीरहरण, जो प्रत्येक परिस्थिति में अपने इन नालायक पाँच पतियों को श्रेष्ठ पांडवों के रूप में मानती और स्वीकार करती आई है।

मेरा सवाल है कि क्या ऐसी स्थितियों, उदाहरणों एवं प्रतिमानों पर गौरव किया जा सकता है। ये गौरव के कारक हैं या धिक्कारने के। आप खुद फैसला करें

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन, सेवा निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान

Professor Mahavir Saran Jain                                 
( Retired Director, Central Institute Of Hindi )
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India:  Address:   Sushila Kunj, 123, Hari Enclave, Chandpur Road, Buland Shahr-203001, India.         
                       Mobile: 09456440756
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