शनिवार, 13 अप्रैल 2013

राम वृक्ष सिंह का आलेख - काम करेगा अगला, मौज करेगा पगला

काम करेगा अगला, मौज करेगा पगला

राजभाषा हिन्दी में काम करने के लिए सरकारी कर्मचारियों को प्रेरित-प्रोत्साहित करने के क्रम में प्रायः मैं इस स्थिति से गुजरा हूँ, जब लोग मुँह फाड़कर कह देते हैं- सॉरी, मुझे तो यह आता ही नहीं  किसी से कहिए कि आपने जो पत्र या टिप्पण अंग्रेजी में लिखा है, उसी को हिन्दी में लिख दीजिए, चट से उसका जवाब हाजिर होता है- क्या करूँ मुझे हिन्दी में लिखना आता ही नहीं। कंप्यूटर पर हिन्दी में काम करना हो तो भी उनका वही जवाब रहता है- क्या करें हिन्दी में टाइप करना आता ही नहीं। ऐसा नहीं कि यह महा-व्याधि केवल हिन्दी के मामले में सतह पर आती है, दरअसल जीवन के हर क्षेत्र में ऐसा देखने को मिल जाएगा।

सीखना मनुष्य ही नहीं, मस्तिष्क-धारी प्राणि-मात्र की सहजात वृत्ति है। इसी कारण हम हाथियों, कुत्तों, तोतों, गायों, बैलों, जड़-बुद्धि भैंसों, गधों, घोड़ों, बंदरों आदि को भी ऐसी-ऐसी कलाएं और करतब सिखा पाते हैं कि अच्छे-अच्छे बुद्धिमान मनुष्य भी दाँतों तले उँगली दबा लें। जो जितनी तीव्रता से सीखता है, उसे उतना कुशाग्रबुद्धि समझा जाता है। इसीलिए विभिन्न भर्ती-परीक्षाओं में बौद्धिक क्षमता की जाँच की जाती है कि भर्ती उपरान्त यह अभ्यर्थी अपनी कार्यापेक्षा के अनुरूप कौशल सीख पाएगा अथवा नहीं।

तो क्यों लोग यह कहने में नहीं लजाते कि हमें नहीं आता? इसका आशय तो यही हुआ न कि वे प्रकारान्तर से यह घोषणा कर रहे होते हैं कि हम मूर्ख हैं, जड़-बुद्धि हैं, हमसे यह कला-कौशल सीखते नहीं बना, कि हमारे पास इतनी भी बुनियादी योग्यता नहीं है कि यह काम सीख पाते। लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसा होता नहीं है। सच्चाई यह है कि जो लोग कोई काम न जानने की बात इतने गर्व के साथ स्वीकार करते हैं, वे दरअसल बहुत पहुँचे हुए संत होते हैं। वे अपनी अज्ञानता का प्रचार और प्रकटन करके आगे के लिए, यानी अपने पूरे सेवा-काल के लिए अपने आराम और अमन-ओ-चैन की व्यवस्था कर रहे होते हैं। एक बार आपने अपने मन में यह बिठा लिया कि अमुक व्यक्ति अमुक कार्य नहीं कर पाएगा, तो ज़ाहिर है, अगली बार आप उसके पास वह काम लेकर नहीं जाएंगे।

नतीज़ा यह है कि सरकारी ही नहीं, प्राइवेट फर्मों में भी बहुत से लोग बस इसी तरह पूरी ज़िन्दगी काट लेते हैं। मजे की बात यह है कि हमारे प्रबंधन-गुरुओं ने भी इसे सहज मान लिया है और एक सिद्धान्त प्रतिपादित करके इसे सर्वथा स्वाभाविक भी सिद्ध कर दिया है। उनका मानना है कि किसी भी व्यवस्था में केवल 20 प्रतिशत लोग काम करते हैं और शेष 80 प्रतिशत लोग बस मौज करते हैं। इसे गुरु लोग 20-80 का सिद्धान्त कहते हैं।

दफ्तरों ही नहीं, हमारे घरों में भी यही सिद्धान्त लागू होता है। मसलन हम अपने ही परिवार की बात करें। हमारे परिवार का सारा काम महज़ एक महिला करती है- हमारी पत्नी। बाकी सब बस अपनी-अपनी जगह से आदेश देते हैं। घर की सफाई करनी-करानी हो तो पत्नी, कपड़े धोने-सुखाने-प्रेस कराने हों तो पत्नी, भोजन की व्यवस्था करनी हो, भोजन पकाना –खिलाना हो तो पत्नी, बर्तन माँजना-मँजवाना हो तो पत्नी। और पत्नी घर की आबादी का कितने प्रतिशत है, वही लगभग 20 प्रतिशत। सभी परिवारों में कमोबेश यही हाल होता है। गृहिणी बेचारी गृहस्थी की चक्की में पिसती रहती है और बाकी लोग बस मौज करते हैं।

यही हाल विभिन्न आयोजनों का है। अकसर हम देखते हैं कि आयोजक बेचारे काम के बोझ से मरे जाते हैं और बाकी के लोग आते हैं, गप्पें मारते हैं, खाते-पीते और मुँह पोंछते हुए चले जाते हैं। आयोजक कबसे काम कर रहे हैं, कब तक काम करते हैं, उनको भी खाना-पीना मयस्सर हुआ या नहीं, यह देखने या पूछने की जहमत कोई नहीं उठाता। बल्कि सच कहें तो हमारे लोक-जीवन में कोई-कोई आयोजन तो होते ही निठल्लागिरी के लिए हैं। इनमें से एक है शादी-ब्याह और बारात का आयोजन। कोई आदमी बिलकुल हाथ-पैर न हिलाए और बस हर समय हरामखोरी के ही मूड में रहे तो लोग पूछ भी लेते हैं- क्यों बारात में आए हो क्या? .. तो सच्ची बात तो बस ये है कि हमारे दफ्तरों में, घरों में कुछ लोग हमेशा इसी नीयत से आते हैं। अगर आप उन्हें कोई काम सौंपना चाहें तो चट कहेंगे- हमें आता ही नहीं।

इनके बरअक्स ज़रा उन थोड़े से लोगों को देखें जो काम करने के लिए ही पैदा हुए हैं। उन्हें जैसे काम करने की बीमारी होती है। काम न करें तो उनसे रहा न जाए। वे नई-नई तकनीकें सीखते और अपनाते चले जाते हैं। अपनी ही नहीं दूसरों की डेस्क का काम करने में भी उनको आनन्द आता है। वे शायद ही कभी कहते हों की हमें यह काम नहीं आता। नहीं आता तो भी, उनके तईं कोई माँ के पेट से तो सीखकर आता नहीं है। इसलिए जैसी ज़रूरत होती है, वे सीखते जाते हैं और संस्था तथा समाज के हित में अपना योगदान किए जाते हैं। सच कहें तो कर्मठता ही उनके आनन्द की विषयवस्तु है।

तो फिर एक सवाल उठता है, ऊपर वाले लोग जो यह सब देख-सुनकर भी अनदेखा किए रहते हैं, वे निकम्मे लोगों को बर्दाश्त क्यों किए जाते हैं? क्यों नहीं वे केवल कर्मठ लोगों को रखते?

आर.वी.सिंह/R.V. Singh

2 blogger-facebook:

  1. बिलकुल ठीक | यथार्थ परक लेख बधाई

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  2. malvi me ek kahavat hai "yeda bankar peda khana" ..ye log isi anusaar kaam karte hai aur aanad se rahte hai ....hamare yaha kaam ke adhar par salary ya pramoshan dene ki reet nahi hai isliye in nithallon ki mouj hai ...badiya aalekh..

    उत्तर देंहटाएं

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