सोमवार, 29 अप्रैल 2013

बशर नवाज की नज्म - मुझे जीना नहीं आता

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  मुझे जीना नहीं आता
                                     मूल उर्दू शायर- बशर नवाज
                                     अनुवाद- डॉ. विजय शिंदे
         
मैं जैसे दर्द का मौसम, (2)
घटा बन कर जो बस जाता है आंखों में
इंद्रधनुष के रंग, खुशबू नजर करने की तमन्ना लेकर
जिस नजारे तक जाऊं
उसे आंसुओं के कोहरे में, डूबा हुआ पाऊं। (2)

मैं अपने दिल का सोना, प्यार के मोती,
तरसते उम्मीदों के फूल, जिस दरवाजे पर सजाता हूं,
वहां जैसे रहता नहीं कोई। (2)

बना हूं कई दिनों से, आवाज ऐसी
जो दीवारों से टकराए,
हताश होकर लौट आए,
धडकते दिल के सूनेपन को सूना और कर जाए। (2)

मैं अपने आपको सुनता हूं,
अपने आपको छूता हूं,
अपने आप से मिलता हूं, सपनों के सुनहरे आईना घर में।
तब मेरी तसवीर मुझ पर मुस्कुराती है
कहती यह है
हुनर तुझे जीने का न आना था, नहीं आया। (2)

आवाजें पत्थरों की तरह मुझ पर
मेरे सपनों के बिखरते आयना घर पर बरसती है।
इधर तारा, उधर जुगनू
कहीं फूल की पत्ती, कहीं ओस का एक आंसू,
बिखर जाता है सब कुछ आत्मा की सुबह में। (2)

मैं फिर से जिंदगी जीने के अरमानों में
एक-एक रेशे को चुनता हूं, सजाता हूं, नई मूरत बनाता हूं।
इंद्रधनुष्य के रंग, खुशबू नजर करने की तमन्ना में कदम आगे बढाता हूं। (2)
तो एक बेनाम गहरी धुंध में, सब कुछ डूब जाता है,
किसी से कुछ शिकायत है, ना शिकवा है। (2)

मैं तो दर्द का मौसम हूं,
अपने आप में पलता हूं, अपने आप में जीता हूं, (2)
अपने आंसुओं में डूबता हूं, मुस्कुराता हूं। (2)
मगर सारे लोग कहते हैं
तुझे जीना नहीं आता। (2)
मुझे जीना नहीं आता।

(बशर नवाज महाराष्ट्र- औरंगाबाद के प्रसिद्ध उर्दू शायर है। ‘मुझे जीना नहीं आता’ इस अनुवादित नज्म का 2010 के गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित सर्व भाषा कवि सम्मेलन में आकाशवाणी औरंगाबाद से प्रसारण हो गया है। हिंदी पाठकों के लिए यहां प्रकाशित किया है।)

डॉ.विजय शिंदे
देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद
drvtshinde.blogspot.com

22 blogger-facebook:

  1. bahut sundar NAZM ........ANUWAADAK KO BADHAI ...ACHCHHI RACHNAA KE LIYE .............!!

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    उत्तर
    1. भावना जी अनुवादित नज्म पसंद आई, आभार। बशर नवाज जी की एक अच्छी रचना आप तक पहुंचाने का आनंद मिल रहा है।

      हटाएं
  2. उत्तर
    1. शायद आप लेखक परिचय के साथ जोडे कुछ वाक्यों के संदर्भ में कह रहे हैं बजरंग यादव जी। आपको परिचय स्वरूप लिखना अच्छा लगा इसका अर्थ है हमारे देश का भविष्य अच्छा है जो विविध धर्मों को बडे प्यार से एक-दूसरे के साथ जोड रखा है।

      हटाएं
  3. रविशंकर जी बशर नवाज की अनुदित नज्म हिंदी पाठकों के लिए उपलब्ध करवाई, आभार। मैं यहां बशर नावाज के बारे में संक्षिप्त परिचय दे रहां हूं। बशर नवाज औरंगाबाद महाराष्ट्र में रहते हैं। प्रसिद्ध उर्दू शायरों में इनका नामोल्लेख होता है। औरगाबाद की भूमि मराठी साहित्य लेखन के लिए उर्वर है पर यहां सालों मुघलों का शासन रहा तबसे उर्दू का भी प्रचलन रहा। दख्खिनी हिंदी का केंद्र भी रहा। इतिहास में जो था वह था पर इस शहर में हिंदू-मुसलमान दोनों संप्रदाय प्रेम और सम्मान के साथ रहते हैं। बशर नवाज जी अब उम्र के ढलान पर है पर इस शहर का साहित्य प्रेमी इनके नज्मों को सर-आंखों पर रखता है। फिल्मों के भीतर भी इनकी नज्मों को गाया गया है। औरंगाबाद वासियों का इन पर असिम प्रेम है, उसी के फलस्वरूप इनके जीवन पर केंद्रित 'बशर नवाजः ख्वाब जिंदगी और मैं' जैसा लघुपट बनाया गया। आशा है हिंदी पाठकों के लिए 'मुझे जीना नहीं आता' नज्म पसंद आएगी।

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  4. रेशे-रेशे में बुनी नज़्म तो कहती है कि जीना नहीं आता ..हाँ! वे ही कहते होंगे जिन्हें सही में जीना आता होगा . बहुत पसंद आई..आर्दिक आभार..

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    1. सफल जिंदगी जीने वालों की यहीं तो खासियत होती है कि उनके पैर जमीन पर रहते हैं। सफलता की डिंग हांकने की जरूरत होती नहीं है। अमरिता जी आपने सही पहचाना ऐसे वहीं लिख सकता है जो सफलता के साथ जी चुका होता है। बशर नवाज जी के प्रति औरंगाबाद वासियों का प्यार उनकी सफल जिंदगी का द्योतक है।

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  5. bahut accha laga ...bshar sahab ke njm ko padhkar ........dhanyvad vijay jee ...

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    1. डॉ.निशा जी आपको बशर नवाज जी की नज्म पसंद आई,धन्यवाद।

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  6. bahut bahut dhanyavad itne sundar post ke liye
    saadar
    aparna
    http://boseaparna.blogspot.in/

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    उत्तर
    1. अपर्ना जी नज्म पसंद आई, धन्यवाद। आपके पास आगे और साहित्य पहुंचाते खुशी होगी।

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  7. मैं फिर से गिन्दगी जीने के अरमानों में
    एक एक रेसे को चुनता हूँ, सजाता हूँ, नई मूरत बनाता हूँ. बहुत अच्छी कविता.... धन्यवाद विजय जी .

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    उत्तर
    1. रंजना जी नज्म के मूल अर्थ तक आप पुंचकर उसका आनंद उठा रही हैं, आभार।

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  8. संवेदना की तंतुपरक पड़ताल करती है ये पंक्तियां।

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    उत्तर
    1. बिल्कुल विकास जी आपने सही लिखा है मानवी संवेदना के बारिक रेशों की पडताल बशर नवाज जी ने की है।

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  9. लोग कहते हैं तो कहते रहें ... जीवन का असल आनद तो जी लिया बशर साहब ...
    बहुत ही संवेदनशील नज़्म है ...

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    उत्तर
    1. दिंगबर नासवा जी नज्म आपको पसंद आई,आभार। आपके कहेनुसर बशरसाहब ने असल जिंदगी का आनंद उठाया है।

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  10. behad bhaavpoorn nazm ..sajha karne ka shukriya...

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    उत्तर
    1. कविता जी बशर नवाज की नज्म आपको भावपूर्ण बनाने की क्षमता है इसी में उसकी सफलता साबित होती है। मूल्यवान टिप्पणी के लिए आभार।

      हटाएं
    2. कविता जी बशर नवाज की नज्म आपको भावपूर्ण बनाने की क्षमता है इसी में उसकी सफलता साबित होती है। मूल्यवान टिप्पणी के लिए आभार।

      हटाएं
  11. कविता जी बशर नवाज की नज्म आपको भावपूर्ण लगी पढ कर अच्छा लगा। अनुवाद करना सार्थक होने का एहसास भी हो गया।।

    उत्तर देंहटाएं

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