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सुरेश सर्वेद की कहानी - जागृति

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खेत की मेढ़ पर कदम रखते ही मनहरण की द्य्ष्टि खेत के भीतरी हिस्से में दौड़ी. खेतों में बोई फसल को देखकर उसका पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया. उसे ...

खेत की मेढ़ पर कदम रखते ही मनहरण की द्य्ष्टि खेत के भीतरी हिस्से में दौड़ी. खेतों में बोई फसल को देखकर उसका पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया. उसे फसलें दुश्मनों की तरह लगी. वह बौखला गया- सबको जला दूंगा. स्साले मुंह चिढ़ाने उतारु है. . . ।

यह तो वह क्रोधावेश में कह गया था. वह एक किसान था. खेती किसानी उसका मुख्य कार्य था. जीविकोपार्जन का साधन. कहीं किसान अपनी बोई फसलों से चिढ़ेगा? मगर मनहरण को चिढ़ हुई थी. क्षण भर नहीं सरका था कि उसे अपने बौखलाए पन का ध्यान आया. विचार मे बदलाव आया और उसने स्वतः को कोसने से परहेज नहीं किया-मैं कितना मूर्ख हूं. खेत के इन पौधों की क्या गलती ? पानी ही न हो तो फिर कहाँ से इनमें हरियाली आयेगी. . . . । मनहरण ने मन की कड़ुवाहट को निकालने के लिए पंच सरपंच से लेकर विधायक और मंत्री तक को बड़बड़ा कर गालियां दे डाली-भिखमंग्गों की तरह आ जाते है ंस्साले वोट मांगने. प्रलोभन पर प्रलोभन देते हैं स्वार्थ सधा नहीं कि भूल जाते हैं कहाँ सड़क बनवानी है. कहाँ नहर बांध बनवाना है. कहाँ स्कूल खोलनी है और कहाँ अन्य व्यवस्था देनी है. प्रपंच ही प्रपंच रचते हैं. मिट्टी से भी सस्ती हो चुकी है स्सालों की जुबान. . . ।

मनहरण के विचार में परिवर्तन आ गया था. उसे जिन फसलो पर क्रोध आ रहा था उन फसलों पर अब दया आने लगी . वह करुणा से ओतप्रोत हो गया. उसकी आँखें छलछला आयी. दो -तीन बूंद आँसू आंखों से छलक कर धरती पर भी गिरे. शेष आँसुओं को गले में पड़े गमछे ने सोख लिया.

उसने एक बार पुनः फसलों पर नजर दौड़ाई. खेत की जमीन को ताका. जमीन में दरारे पड़ गयी थी. फसल अब फसल नहीं रह गयी थी. वह पीली पड़ अब सूखने लगी थी . फसलों की दुर्दशा देखकर उसकी आत्मा कराह उठी. उसका क्रोध भी फनफना उठा. पैर कांप गये. भुजाएं फड़क गयी. भौहें तनी अब उससे फसलो की दुर्दशा देखी नही जा रही थी. वह घर की ओर लौट गया.

बरसात के दिन थे. वातावरण एकदम विपरीत था. वह जल्दी जल्दी घर आया. क्रोध से वह तप रहा था. घर में प्रवेश करते ही पहले पत्नी पर भड़का फिर बच्चों पर चीखा और अंत में स्वयं पर झुंझलाया. मनहरण की गतिविधियाँ परिवार वालों को समझ आ गयी थी. वे समझ चुके थे कि मनहरण क्रोध से तप रहा है. खैर इसी मे है कि सब अपनेअपने काम में लग जाये. मुन्ना -मुन्नी पुस्तक पढ़ने लगे. पत्नी चांवल साफ करने लगी. मनहरण दीवाल से लगी खाट को धम्म से बिछाया और उसमे चित्त पड़ गया. वातावरण खामोश होना चाहता था पर बार - बार उस शान्त वातावरण में सूपे की थप खलल पैदा कर देती थी.

धरती पुत्र मनहरण शांतप्रिय व्यक्ति था. वह कभी कभी ही अशांत होता था. जिस दिन वह अशांत होता तो उससे बात करने की तो दूर उससे आंख मिलाने का भी कोई साहस कर ले तो उससे बहादुर और कोई नहीं. शांतिप्रिय व्यक्ति इसलिए क्योंकि वह काफी हद तक अन्याय और अत्याचार को सहने की ताकत रखता था. उसकी इंसानियत तब गड्मड् हो जाती जब अन्याय चरम सीमा को भी लाँघ जाता था. उसके नथुने तब फूलने लगते जब अन्याय ही अन्याय होता चला जाता था. उसकी प्रवृत्ति ठीक उस बाँध के समान थी जो सहनशक्ति तक पानी थामता है और अति हो जाने पर फूट कर तबाही मचा देता है. . . . ।

संध्या का समय था. चिड़ियां दाना चुगकर अपने बसेरों को लौट रही थीं. दुधारु गायें रंभाने लगी थी. बछड़े मां से मिलने आतुर थे. संध्या ने रात का रुप लेना शुरु कर दिया था. अब मंदिर में घंटा-घंटी बजने लगे . आरती की आवाज उभरने लगी. भोजन बन चुका था. मनहरण भोजन करने बैठ गया. वह पहला निवाला मुंह में डालने ही वाला था कि कोटवार की हाँक उसके कान से टकरायी. मुंह तक पहुंचे निवाले को रोककर वह कोटवार की हाँक को सुनने लगा. कोटवार ने रात में पंचायत जुड़ने की मुनादी दी थी.

रात में लोग पंचायत स्थल पर एकत्रित हुए.

गांव से दूर श्मशान था. वहाँ आवारा कुत्ते भौकने लगे थे. कुत्ते एक दूसरे क ो अपनी आवाज द्वारा परास्त करने के प्रयास में थे. कुत्तों की स्वर लहरी गाँव तक पहुंच रही थी.

इस गाँव का रिवाज ही अजीब था. जब - जब यहाँ पंचायत जुड़ती, मुद्दे की बातों पर बहस न होकर विषयांतर हो जाया करता था. बहस छिड़ती और ग्रामीण आपस में टकराने लगते. बैठक में अनेक ग्रामीण उपस्थित होते और खासकर तब जब मजेदार विषयों पर पंचायत जुड़ती थी. गड़े मुर्दे तो उखाड़े ही जाते साथ ही जिसके विरुद्ध पंचायत जुड़ती उसकी भी हंसी उड़ा दी जाती थी.

पंचायत लगभग जुड़ चुकी थी. पंचायत किस विषय को लेकर जुड़ी थी यह उत्सुकता का विषय था. सरपंच के कहने पर ही यह पंचायत बुलायी गयी थी. उसने कहना शुरु किया-आज पंचायत कुछ ऐसे मुद्दों को लेकर बुलायी गयी है जो गंभीर समस्या है. नहर बनवाने को लेकर पंचायत जोड़ी गयी है. प्रश्न यह है कि यदि नहर निकालते समय किसी की जमीन आयी तो वह जमीन देगा या नहीं. जब सबकी सहमति मिलेगी तभी नहर बनाने आगे की प्रक्रिया की जायेगी.

- हमें भला क्या आपत्ति होगी यदि हाथ दो हाथ जमीन देना पड़े तो इसमे आपत्ति कैसी ? कम से कम नहर बनने के बाद हमें अवर्षा के समय पानी तो भरपूर मिलेगा । लगभग सभी ग्रामीणों का यही विचार था.

- अगर आप सब सहमत हैं तो समझो प्रस्ताव तो भेज ही दिया गया साथ ही नहर भी यथा संभव शीघ्र बन जायेगी.

पंचायत में ही कार्यवाही की गई. नहर कहाँ से निकलनी है यह तो विभागीय कार्य था बावजूद ग्रामीणों ने एक रुपरेखा तैयार की जिससे सभी को बराबर का पानी मिल सके. इसके बाद ग्रामीण अपने-अपने घर लौट गये.

उस बैठक के बाद ग्रामीण आगे क्या कार्यवाही होने वाली है को जानने उत्सुक थे. एक दिन गांव भर खबर फैल गयी कि जिस स्थान से नहर बनाने का प्रस्ताव तैयार किया गया था उस दिशा को विभाग ने सही नहीं माना और ऐसी दिशा तय की गई जिधर से नहर निकलने के बाद मुश्किल से बीस प्रतिशत कृषि भूमि को पानी मिल सकता था. इससे गाँव का हित तो होता अपितु गांव के कई किसानों की जमीन दब अवश्य जायेगी. इस खबर से गाँव में कानाफूंसी होने लगी और चर्चा तो यहाँ तक चल पड़ी कि जिस दिशा से नहर निकालने विभागीय कार्यवाही की जा रही है. उधर सरपंच की ही सबसे ज्यादा खेती है. खबर मनहरण के कानों तक पहुंची. वह सीधा सरपंच के घर गया. सरपंच घर पर ही था उसने मनहरण को देखकर कहा- आओ मनहरण,बोलो ,कैसे आना हुआ. . . . ?

- सुना है- विभाग ने दिशा बदल कर नहर बनाने की प्रक्रिया शुरु कर दी है. . . ।

- तुमने ठीक ही सुना है. . . . ।

- मगर ऐसा क्यों हुआ . . . . . ?

- तुम तो यह जानते ही हो कि पूर्व से पश्चिम हमने नहर निकालने प्रस्ताव तैयार किया था. उत्तर -दक्षिण गाँव होने के कारण हम गाँव के समीप से नहर नहीं चाहते थे. मगर विभाग का कहना है कि उत्तर से दक्षिण नहर नहीं बनाई जा सकती क्योंकि इससे जंगल की करोड़ों रुपयों की लकड़ियाँ काटनी पड़ेंगी. वन भूमि नहर के चपेट में आयेगी जबकि यह सुरक्षित वन क्षेत्र है. सुरक्षित वनक्षेत्र से लकड़ियाँ भी तो नहीं काटी जा सकती. इससे दो विभागों मे टकराव की स्थिति निर्मित होगी और इस विवाद के मध्य हम कई वर्षों तक नहर पाने से वंचित रह जायेंगे.

- अब क्या होगा सरपंचजी . . . ?  मनहरण की आवाज में उदासी थी.

- यही तो मैं भी सोच रहा हूं मनहरण. आज रात फिर बैठक रखा हूं.

मनहरण ने सरपंच से विदा ली और लौट आया.

रात को फिर पंचायत जुड़ी.

सरपंच ने कहा- तुम सबको यह पता चल ही चुका होगा कि विभाग द्वारा नहर की दिशा बदल दी गई है. मैं आप लोगों से सलाह लेना चाहता हूँ कि अब क्या करना चाहिए. क्या हमें विभाग द्वारा निर्धारित दिशा से नहर बनने देना चाहिए ? आप अपनी बात रख सकते हैं. . . . ।

सरपंच के सामने मुंह खोलने का साहस गाँव वाले तो क्या वे लोग भी नहीं कर पाते थे जिन पंचों के भरोसे उनकी कुर्सी टिकी हुई थी.  इसी का परिणाम था कि सरपंच को जो उचित लगता वही होता था. मगर आज तो किसी को कुछ बोलना ही था यदि नहीं बोला गया तो सरपंच मनमानी करके नहर निकलवा देगा और उसका पानी स्वयं के खेतों तक पहुंचवा देगा यह गांव वाले जान चुके थे. मगर बोले तो बोले कौन ? अभी ग्रामीण उधेड़ बुन में थे कि मनहरण ने ग्रामीणों से कहा-यदि आप सबकी सहमति हो तो मैं अपनी बात रखूं ?

ग्रामीणों ने मौन स्वीेकृति दी. मनहरण ने कहा- आज से दस वर्ष पूर्व की घटना आप सबक ो याद ही होगी. अकाल की मार झेले थे हम सब. त्राहि-त्राहि मची थी. पानी के अभाव में फसल तो हुई नहीं हम अपने जानवरो को भी नहीं बचा सके. कईयों की जमीनें पानी के मोल बिक गयी. गाँव के कई परिवारों ने रोजी रोटी के लिए परदेश पलायन कर लिया. तब भी हम गंभीर हुए थे और नहर की मांग की थी. हम वर्तमान में जिन स्थानों से नहर निकालने का प्रस्ताव पारित किए हैं पहले भी उसी दिशा से नहर निकालने की माँग की गई थी तब उसे स्वीकृति भी मिल गयी थी मगर अब सरपंच का कहना है कि सुरक्षित वन के कारण विभाग उधर से नहर निकालने की अनुमति नहीं दे रहा है. . . . . ।

बैठक में पूरी तरह सन्नाटा छा गया . पूरा गाँव मनहरण की बात को गंभीर होकर सुन रहा था . मनहरण ने आगे कहा- आप सब यह भी जान रहे हैं कि जिस दिशा से हमने नहर निकालने की मांग की थी उस दिशा से नहर बनाना भी शुरु हो गया था. कुछ दिन काम भी चला फिर अचानक बंद कर दिया गया और फिर चूँकि बरसात लग गयी. अतः बीच में काम रोक दिया गया, क्या तुममे से कोई जानता हैं ?

ग्रामीणों क ो तो कुछ समझ नहीं आ रहा था मगर सरपंच सब कुछ समझ गया था. मनहरण ने कहा- सरपंच साहब से मैं कुछ प्रश्न क रना चाहूंगा यदि उन्हें कोई आपत्ति न हो तो ?

- मुझे भला क्यों आपत्ति होने लगी. तुम निश्चिंत होकर प्रश्न करो मैं उत्तर दूंगा.

- जिन दिनों हम अकाल की मार सह रहे थे ,उन दिनों भी आप ही सरपंच थे न ?

- तुम्हारा कहना गलत नहीं. वास्तव में उन दिनों मैं ही सरपंच था.

- तब भी नहर निकालने की योजना बनी थी,योजना ही नहीं बनी थी अपितु काम भी शुरु हो गया था और कुछ दूर तक उसी ओर से नहर बनने का कार्य सम्पादित हो रहा था जिधर से वर्तमान मे मांग की गई है. प्रथम प्रश्न यह है कि नहर बनते बनते आखिर क्यों रोक दिया गया ? दूसरा यह कि जिस ओर से नहर पूर्व में बनाने स्वीकृति दे दी गई थी उसमें फिर अड़ंगा क्यों ?

- तुम्हारा प्रश्न ठीक है. पूर्व में जो रुपये मिले थे वह खर्च हो गए अतः काम अधूरा रह गया. पता नहीं शासन अब उस दिशा से नहर निकालने क्यों सहमत नहीं है. . . ।

- आप और कितना झूठ बोलेगे सरपंच साहब. . . . ?  मनहरण की आवाज तेज हो गयी.  उसने कहा- आखिर आप कब तक हम ग्रामीणों को बेवकूफ बनाते रहेंगे. . . । वह ग्रामीणों की ओर मुखातिब हुआ- गाँव वालो शायद आप लोगों को सच्चाई का ज्ञान नहीं इसलिए इनकी बातों पर आंखें मूंद कर हम सहमत हो जाते है. पूर्व में नहर बनते-बनते इसलिए रोक दी गई क्योंकि शासन से राशि तो पर्याप्त मिली थी मगर उसमें अधिकारियों से मिल कर भारी मात्रा में भ्रष्टाचार किया गया. राहत राशि का दुरुपयोग किया गया. इसलिए शासन ने जांच का आदेश देकर काम रुकवा दिया जाँच भी शुरु हुई मगर खा पी कर मामला रफा - दफा कर दिया गया. जिस नहर नाली की माँग हम कर रहे हैं. कागजों में बन चुकी है क्या एक काम के लिए दो दो बार राशि दी जा सकती है ? दूसरी बात यह कि जिधर से सरपंच नहर निकलवाने की योजना बना रहे है -मुझे बताएँ कि इससे क्या सरपंच के सिवा हम किसी को लाभ मिल सकता है . . . ?

ग्रामीणों में कानाफूसी शुरु हो गयी. उन्हें एक एक प्रकरण याद आने लगा. मनहरण ने आगे कहा-क्या अब भी हम ऐसे भ्रष्ट और स्वार्थी सरपंच को बर्दाश्त करते रहेंगे. . . क्या हम छले जाते ही रहेगे. . . क्या हमने सोचने-समझने की शक्ति खो दी है. क्या हमें अब ऐसे नाकाबपोश सामजसेवियों की असलियत समाज के समक्ष नहीं रख देनी चाहिए. . . ।

मनहरण हाँफ गया था. सरपंच हड़बड़ा गया था और ग्रामीण उत्तेजित हो गए . किसी एक ने आवाज दी- सरपंच मुर्दाबाद. . . .  इसी के साथ पूरी जनता जनार्दन - मुर्दाबाद -मुर्दाबाद के नारे लगाने लगे. सरपंच वहां से खिसकने की सोच रहा था पर भीड़ से वह बचता तो बचता कैसे ? लोहा गरम था. मनहरण ने कहा- ऐसे सरपंच को हम पद से हटा कर ही दम लेंगें. . . । वहां सभी वार्डो के पंच भी उपस्थित थे. आनन-फानन में सचिव को बुलाया गया. सरपंच को अपदस्थ करने का प्रस्ताव तैयार किया गया. सरपंच के विपक्ष मे पूरे आठों पंच उतर आये. एकतरफा कार्यवाही हुई और सरपंच को हटाने की कार्यवाही कर शासन को भेज दिया गया. कुछ दिनों बाद गाँव में एक और नारा गूंजायमान हुआ- मनहरण भइया. . .

- जिन्दाबाद. . . . .

- मनहरण भइया. . .

- जिन्दाबाद. . .

-गांव का नेता कैसा हो

- मनहरण भइया जैसा हो. . . . ।

और इसी के साथ गांव जाग गया.

---

साईं मंदिर के पीछे,

वार्ड नं. 16,

तुलसीपुर, राजनांदगांव - छग

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 1
  1. वाह! लाजवाब लेखन | आनंदमय और बहुत ही सुन्दर, सुखद अभिव्यक्ति विचारों की | पढ़कर प्रसन्नता हुई | आभार

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रचनाकार: सुरेश सर्वेद की कहानी - जागृति
सुरेश सर्वेद की कहानी - जागृति
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