रविवार, 28 अप्रैल 2013

सुरेश सर्वेद की कहानी - हलकू इक्कीसवीं सदी का

हलकू शहर से वापस अपने गाँव आ गया.उसके पास अब लबालब सम्पति थी.धन दौलत के कारण ग्रामीण उसे अब हलक ू कहने से परहेज करने लगे.अब वह सेठ के नाम से पुकारा जाने लगा.उसे भरपूर मान सम्मान मिलने लगा.जो लोग हलकू को देखकर कन्नी काटते थे वे ही लोग उसके करीबी हो गये थे.

आज से कुछ वर्ष पूर्व हलकू इसी गाँव का एक छोटा किसान था.यहां थोड़ी सी खेती थी. उसमें फसल उगा कर जीवन यापन करता था.एक समय नील गाय उनकी खेतो ं की फसलों को चर गयी.उसकी पत्नी मुन्नी ने कहा-यहां हर साल यही हाल होता है.फसल बर्बाद होती है.साहूकारों का कर्ज अदा नहीं होता.ऊपर से और कर्ज चढ़ते जाता है.इससे अच्छा तो शहर जाकर काम करते.वहां दो वक्त की रोटी तो चैन से मिलती. कुछ बचा भी लेते....।

मुन्नी की सलाह हलकू को पसंद आयी .उसने कहा- तुम्हारा कहना गलत नहीं.शहर में कैसी भी स्थित में दो वक्त की रोटी तो मिलेगी ही साथ ही मैं पूस की रात में ठण्ड सहने से भी बच जाऊंगा.यहां तो ठण्ड सहते प्राण ही निकल जायेगे.

दूसरे दिन वे शहर जाने निकल गये.सही समय पर वे रेल्वे स्टेशन पहुंचे.वहां उनके साथ जबरा भी आया था.रेल छूटने के बाद जबरा वापस लौट गया था- उदास..निराश...।

हलकू ने शहर की चकाचौंध को देखा तो देखते ही रह गया.उसने तो आज तक गांव में झोपड़ियां,टूटी-फूटी खपरैल का मकान ही देखा था.वहां गाड़ी के फिसलते चक्के को देख कर हलकू ने सोचा- मैंने ठीक ही किया जो कि जबरा क ो अपने साथ यहां नहीं लाया.यहां के फिसलते चक्के में आकर पीस जाता तो....?

हलकू ,मुन्नी को काम मिलने में देर नहीं लगी.उन्हें मकान बनाने का काम मिला.उनकी कमाई दिन दुनी रात चौगुनी होने लगी.जीवन में सुख आता गया.हलकू की इज्जत बढ़ती गई.एक अवसर ऐसा आया कि वह मजदूरी छोड़ कर स्वयं ठेकेदार बन गया.हलकू के ठेकेदार बनते ही मुन्नी घर पर रहने लगी.उनकी आमदनी बढ़ी साथ ही उनके रहन सहन में भी बदलाव आ गया.जहां हलकू सफारी पहनता था वहीं मुन्नी ऊंची से ऊंची साड़ी पहनने लगी.हलकू के पास अत्याधुनिक समान हो गये.टी.वी.,सोफा,कूलर,फ्रीज़,मोटर साइकिल के अतिरिक्त उसका बैंक बैलेन्स भी बढ़ गयी और मुन्नी जवाहरो से लद गई.अब उन्हें झोपड़पट्टी में रहना रास नहीं आ रहा था वे एक कालोनी मे रहने आ गये.कालोनी ऐसी थी जहां समाज के तथा कथित सभ्य और उच्चवर्गीय लोग रहते थे.वहां की महिलाओं से मुन्नी की जान पहचान बढ़ गयी.

एक दिन मुन्नी हरजीत कौर के घर गयी.वहां उसने बंटी नाम का एक विदेशी नस्ल का कुत्ता देखा.उसे जबरा की याद हो आयी. उसने जबरा का जिक्र हरजीत कौर के सामने नहीं किया.आखिर जबरा देशी नस्ल का कुत्ता था. उसक ा जिक्र करती तो उसकी इज्जत पर आंच आ सकती थी.शाम को जब हलकू घर आया तो मुन्नी ने बंटी की तारीफ में ऐसा पुल बांधा कि हलकू भी विदेशी नस्ल के कुत्ते से प्रभावित हो गया.उसने दूसरे ही दिन एक कुत्ता खरीद कर ले लाया वह भी विदेशी नस्ल का.उन लोगों ने उसका नाम टीपू रख दिया.

टीपू बहुत ही नखरे बाज था.वह दिन भर घर में उधम मचाता.मुन्नी को उसके साथ खेलने में खूब मजा आता था.टीपू जिधर दौड़ता मुन्नी उसके पीछे दौड़ती और उसे उठाकर चुम लेती.हलकू भी काम से आते ही उसके साथ खेलने लग जाता था.उसे कभी कंधे पर बिठता तो कभी सीने से चिपका लेता.उसे दुलारता-पुचकारता.

सुख सुविधा बढ़ने के साथ ही मुन्नी के शरीर में आलस्य घर करता गया.एक अवसर ऐसा आया कि उसने एक काम वाली रख ली,उसके हिस्से में भोजन बनाना छोड़ सभी काम आ गये.अब मुन्नी के पास बहुत समय खाली रहता था .समय का उपयोग करने उसने एक क्लब में सदस्यता ग्रहण कर ली.

जिस दिन मुन्नी ने सदस्यता ग्रहण की.वह बहुत ही खुश थी.उसे उस रात ढंग से नींद भी नहीं आयी.वह देर रात तक क्लब के बारे में ही सोचती रही.उसने क्लब की खूिबयां पड़ोसियो से सुन रखी थी.वह जब भी क्लब के संबंध में पड़ोसियों से सुनती उसके भीतर भी क्लब में सदस्यता लेने की चाहत होती और आज उसकी चाहत पूरी हो गयी थी.

पहले दिन मुन्नी सहमी-सहमी थी.वहां की एक एक गतिविधियों को वह जांचती परखती रही.पहले तो वहां की चकाचौंध ने मुन्नी को आश्चर्य में डाल दिया था.वह झिझक भी रही थी.आखिर वह गाँव की महिला थी.ऐसा वातावरण उसने कभी नहीं देखा था.पहला अनुभव था अतः उसमें झिझक होना स्वाभाविक था.धीरे से वह समय आया कि उसके भीतर का झिझक पूरी तरह खत्म हो गया और वह पूरी तरह खुल गयी.

समय अपनी धुरी पर चलायमान था.

एक रात हलकू ने मुन्नी के समक्ष गाँव जाने का प्रस्ताव रखा.मुन्नी ने सहजता पूर्वक उस प्रस्ताव का समर्थन कर दिया.जब से बहू बन कर आयी थी,मुन्नी उस गाँव की होकर रह गयी थी.उसे वह धरती अपनी धरती जैसी लगने लगी.और किसे अपनी धरती को देखने की चाहत नहीं होती होगी.उसे उन महिलाओं का स्मरण हो आया जो उसके खपते शरीर को देख कर उस पर दया किया करती थी.उनकी गरीबी पर तरस खाया करती थी.उन्हें सांत्वना दिया करती थी.

एक दिन वे शहर छोड़ गाँव आ गये.

जिस दिन वे गांव आये ,उनके साथ वे सामान थे जिसे ग्रामीणों ने कभी देखा ही नहीं था.ट्रक से उतरने वाले हर सामान पर ग्रामीणों की नजर जा टिकती.हलकू सीना ताने खड़ा समान उतरवाता रहा.मुन्नी भी वहीं पर खड़ी थी,वह स्वर्णाभूषण से लदी थी. गांव की महिलाएं उसके स्वर्णाभूषण को देखती रही.सामान उतर ही रहा था कि जबरा कहीं से लहसता हुआ आया.वह हलकू के पास पहुंच कर उसे सूंघने लगा.हलकू के फूलपेंट मे जरा सा दाग लग गया.हलकू को गुस्सा आ गया.उसने उसे दुत्कार दिया.जबरा ने एकटक हलकू को देखा.उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि यह वही हलकू है जो उसके साथ चौबीसों घण्टे रहा करता था.पूस की रात में एक साथ खेत में रात काटा करते थे.आव से पार करते थे.वह मुन्नी की ओर लपका.मुन्नी एक कुत्ते को सीने से चिपका रखी थी.जबरा को देख कर वह कुत्ता कुई कुई करने लगा.जबरा वहां भी दुत्कारा गया.जबरा वहां से छटक कर दूर जा खड़ा हुआ.

हलकू के पास न सोने चांदी की कमी थी न आधुनिक सामानो का. रुपयों से वह भरा पूरा था.कुछ ही दिनों बाद उसके घर बिजली भी लग गयी. बिजली लगते ही उसके घर रंगीन टी.वी. शुरु हो गयी.अब तो हलकू के घर में वे लोग भी आने लगे जो पूर्व में हलकू से कोई मतलब रखने से भी कतराते थे.हलकू और मुन्नी का व्यवहार जबरा को चुभ गया था.वह समझ नहीं पा रहा था कि ये दोंनों इतना बदल कैसे गये.जबरा ने खाना पीना त्याग दिया.वह दिन भर हलकू के घर के सामने बैठे हलकू के घर की ओर निहारा करता था.कभी -कभार मुन्नी एक दो रोटी उसे फेंककर दे देती उसे वह सूंघता तो था पर खाता नहीं था.जबरा का शरीर जर्जर होता गया.एक दिन गॉँव में खबर फैली कि जबरा मर गया.खबर हलकू के क ान तक पहुंची.खबर सुनते ही हलकू अपनी उस खेत की ओर दौड़ा जहां जबरा मरा पड़ा था.यह वही जगह थी जहां वह पूस की रात में आव जला कर फसल की रखवाली किया करता था. आव से पार करने का प्रयास किया करता था .बीते दिनों की याद से हलकू की आँखें छलछला आयीं.तीन चार दिनो तक हलकू को जबरा की याद सताती रही फिर भूल गया धीरे धीरे जबरा को हलकू और मुन्नी दोनों.

हलकू ने किराना की दुकान डाल लिया था.उसकी दुकान चल पड़ी.सहना की दुकानदारी मार खाने लगी.सहना कर्ज में डूबता गया.एक अवसर ऐसा आया कि उसे हलकू से भी उधारी मांगनी पड़ी.खेती खार तो उसके बिक ही चुके थे .जब सहना ने हलकू से उधारी की मांग की तो हलकू को उस दिन का स्मरण हो आया, जब हलकू छोटा किसान था और सहना क ा उधारी अदा नहीं कर पाया था.कर्ज नहीं लौटा पाने के कारण सहना ने उसे भला बुरा कहा था. हलकू के मन में तो एक बार आया कि सहना को दुत्कार कर भगा दें पर उसने ऐसा नहीं किया.उसने सहना से कहा-सहना,उधारी लोगे तो लौटाओगे कहां से ? तुम्हारी खेती-किसानी तो बिक चुकी है और फिर तुम्हारे पास गिरवी रखने का भी कुछ नहीं है,तुम एक काम करो,तुम्हे व्यवसाय का ज्ञान है,तुम मेरे यहां काम करो मैं तुम्हें मेहनताना दूंगा.उससे अपना घर परिवार चलाना....।

सहना के पास हलकू की बात मानने के अलावा और कोई चारा नहीं था.

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साईं मंदिर के पीछे,

वार्ड नं. 16,

तुलसीपुर, राजनांदगांव - छग

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