रविवार, 12 मई 2013

मातृ-दिवस विशेष - सुरेश कुमार 'सौरभ' की रचनाएँ

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दोहे

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(1)

जग में जितने जीव हैं, सबकी तुम आधार।

माँ तुम यदि होती नहीं, होता ना संसार।।

(2)

ढोती है नौ माह तक, गर्भ तले संतान।

प्रसव पीड़ हँसकर सहे, देती जीवनदान।।

(3)
माँ अपनी संतान का, पल-पल रखती ध्यान।

उसकी नींदों के लिए, नींद करे बलिदान।।

(4)
हे निर्धन माँ तुझे कब, अपना रहा ख़याल।

भूखी रहकर तू रही, संतानों को पाल।।

(5)
विद्यालय तो मैं गया, बहुत दिनों के बाद।

पहली शिक्षक माँ बनी, भली-भाँति है याद।।

(6)
माता तुम सद्गुणों की, हो अक्षय भंडार।

संस्कार तुमसे मिला, सीखा शिष्टाचार।।

(7)
तीर्थ करूँ तो भी नहीं, शायद हो उद्धार।

माँ तुमको पूजूँ अगर, होगा बेड़ा पार।।

(8)
मक्का काबा काशि का, केवल बस है नाम।

माता के आँचल तले, मिलते चारो धाम।।

(9)
जग में हर इक वस्तु का, हो सकता है मोल।

लेकिन माँ का स्नेह औ', ममता है अनमोल।।

(10)
सभी ऋणों से मुक्त हूँ, उतरा सारा भार।

माँ तेरा ऋण मैं कभी, सकता नहीं उतार।।

(11)
सबसे छोटा शब्द 'माँ', पर इतना विस्तार।

इस छोटे से शब्द में, है सारा संसार।।

(12)
सच है माँ संसार में, होती सर्वमहान।

आँसू जब इसके गिरे, रोते हैं भगवान।।

(13)
माँ तुझको कटु वचन का, मारूँ मैं ना बाण।

तोड़ू जिस क्षण दिल तेरा, जाये मेरा प्राण।।

(14)
बड़े अभागे लोग वो, जग से नाता तोड़।

बचपन में ही माँ जिन्हें, चली गई हो छोड़।।

(15)
माँ के आँचल का करो, श्रद्धा से सम्मान।

इस आँचल में खेलने, को तरसें भगवान।

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ग़ज़ल

मुझे गुज़रा हुआ ऐ माँ ज़माना याद आता है।
अपने बचपन का बीता हर फ़साना याद आता है।

मेरे ख़ातिर तू कितने प्यार से रोटी बनाती थी,
मुझे खाना तेरी हाथों से खाना याद आता है।

मेरे रोने की तू आवाज़ सुनकर दौड़ आती थी,
छोड़ हर काम गोदी में उठाना याद आता है।

नींद आती न थी जब तो मेरे माथे को सहलाकर,
तेरी मीठी वो लोरी गुनगुनाना याद आता है।

बहुत छोटा था जब रातों को अक्सर जाग जाता था,
तेरी वो थपकियाँ देकर सुलाना याद आता है।

अकेले में अँधेरों से डरा करता था मैं जब भी,
मुझे आँचल तले तेरा छुपाना याद आता है।

पिता जी जब भी मेरी गलतियों पे पीटने आते,
उनके गुस्से से माँ तेरा बचाना याद आता है।

जब भी मैं गालियाँ देता, ग़लत कुछ काम करता था,
सलीके से मुझे समझाने आना याद आता है।


जब भी बीमार पड़ता था तुझे तक़लीफ़ होती थी,
दुआ वो माँगना आँसू बहाना याद आता है।

तेरे ममता का साया छोड़ जाएगा कहाँ 'सौरभ'
नहीं अब दूसरा कोई ठिकाना याद आता है।

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© सुरेश कुमार 'सौरभ'
 
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- सुरेश कुमार 'सौरभ'
पता- ज़मानियॉ क़स्बा, ज़िला-ग़ाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश
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