रविवार, 30 जून 2013

राजीव आनंद का आलेख - 30 जून-झारखंड़ में संथाल हूल की 158वीं वर्षगांठ पर विशेष

30 जून-झारखंड़ में संथाल हूल की 158वीं वर्षगांठ पर विशेष

झारखंड़ में बिरसा मुंड़ा के जन्‍म से कई वर्षों पहले संथाल परगना के भगनाडीह गांव में चुनका मुर्मू के घर चार भाईयों यथा, सिद्धू, कान्‍हू, चांद एवं भैरव तथा दो बहनें फूलो एवं झानो ने जन्‍म लिया. सिद्धू अपने चार भाईयों में सबसे बड़े थे तथा कान्‍हू के साथ मिलकर सन्‌ 1853 से 1856 ई. तक संथाल हूल अर्थात संथाल विपल्‍व, जो अंग्रेजी साम्राज्‍य के खिलाफ लड़ा गया, का

नेतृत्‍व किया. भगनाडीह ग्राम में 30 जून 1855 को सिद्धू एवं कान्‍हू के नेतृत्‍व में एक आमसभा बुलाई गयी जिसमें भगनाडीह ग्राम के जंगल तराई के लोग तो शामिल हुए ही थे, दुमका, देवघर, गोड्‌डा, पाकुड़ जामताड़ा, महेषपूर, कहलगांव, हजारीबाग, मानभू, वर्धमान, भागलपूर, पूर्णिया, सागरभांगा, उपरबांध आदि के करीब दस हजार सभी समुदायों के लोगों ने भाग लिया और सभी ने एकमत से जमींदारों, ठीकेदारों, महाजनों एवं अत्‍याचारी अंग्रेजों एवं भारतीय प्रशासकों के खिलाफ लड़ने तथा उनके सभी अत्‍याचारों से छुटकारा पाने के लिए दृढ़ संकल्‍प हुए तथा सर्वसम्‍मति से सिद्धू एवं कान्‍हू का अपना सर्वमान्‍य नेता चुना. अपने दोनों भाईयों को सहयोग देने के लिए सिद्धू एवं कान्‍हू के दो अन्‍य भाई चांद और भैरव भी इस जनसंघर्ष में कन्‍धे से कंधा मिलाकर लड़ा एवं अपना सर्वस्‍व न्‍योछावर किया 30 जून 1855 को सभी एकमत थे कि अब और नहीं सहेंगे और उन्‍होंने तय किया कि इस साल धान नहीं अत्‍याचारी अंग्रेजों और उनके समर्थकों के गर्दनों की फसल काटेंगे.

हूल अर्थात विप्ल‍व शुरू हुआ. संथाल परगना की धरती लाशों से बिछ गयी, खून की नदियां बहने लगी. तोपों और बंदूक की गूंज से संथाल परगना और उसके आसपास के इलाके कांप उठे. संथाल विप्लव की भयानकता और सफलता इस बात से लगायी जा सकती है कि अंग्रेजों के करीबन दो सौ साल के शासनकाल में केवल इसी आंदोलन को दबाने के लिए मार्शल लॉ लागू किया गया था जिसके तहत अंग्रेजों ने आंदोलनकारियों एवं उनके समस्‍त सहयोगियों को कुचलने के लिए अमानुषिक अत्‍याचार किए जिसका जिक्र इतिहास के पन्‍नों में पूर्ण रूप से नहीं मिलता है परंतु अमानुषिक अत्‍याचारों की झलक संथाली परम्‍पराओं, गीतों, कहानियों में आज भी झारखंड़ में जीवित है.

संथाल विप्लव विष्‍व का पहला आंदोलन था जिसमें औरतों ने भी अपनी समान भागीदारी निभाई थी. भारत का यह दूसरा महान विप्लव था. सन्‌ 1831 ई. का कोल विप्लव भारत का प्रथम महान विप्लव था तथा सन्‌ 1857 का सैनिक विद्रोह भारत का तीसरा महान विप्लव था. सन्‌ 1855 ई. के संथाल विप्लव में अंतर्निहित शक्‍ति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अंग्रेजों ने विप्लव की शक्‍ति कम करने के लिए बिना मांगें भारत का सबसे पहला आदिवासी नाम का प्रमंडल ‘संथाल परगना' का निर्माण किया तथा संथाल परगना काष्‍तकारी अधिनियम बनाया. इसमें कोई दो मत नहीं कि भारत का प्रथम राष्‍द्रीय आंदोलन कहा जाने वाला सन्‌ 1857 का सैनिक विद्रोह बहुत कुछ संथाल विप्लव के चरण चिन्‍हों पर चला और आगे इसी तरह भारत के स्‍वतंत्रता आंदोलन की अग्‍नि प्रज्‍वलित करता रहा.

संथाल हूल का महत्‍व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जर्मनी के समकालिन चिंतक कार्ल मार्क्‍स ने अपनी पुस्‍तक ‘नोटस अॉफ इंडियन हिस्‍द्री' में जून 1855 के संथाल हूल को जनक्रांति की संज्ञा दी है. परंतु भारतीय इतिहासकारों ने आदिवासियों की उपेक्षा करते हुए इतिहास में इनको हाशिये में डाल दिया परिणामस्‍वरूप्‍ आज सिद्धू, कान्‍हू, चांद, भैरव व इनकी दो सगी बहनें फूलो एवं झानो के योगदान को इतिहास के पन्‍नों में नहीं पढ़ा जा सकता है. झारखंड़ के बच्‍चों को उपरोक्‍त महानायकों एवं नायिकाओं के संबंध में पढ़ाया ही नहीं जाता है हूल विप्लव आज भी प्रसांगिक है क्‍योंकि जिस उद्‌देश्‍य से सिद्धू और कान्‍हू ने विप्लव की शुरूआत की थी वह आज 158 वर्षों के बाद भी झारखंड़ के आदिवासियों को हासिल नहीं हो पाया है. झारखंड़ राज्‍य के गठन के बाद आज तक मुख्‍यमंत्री व कई मंत्री आदिवासी रहे परंतु आदिवासियों का शोषण निरंतर जारी है. राज्‍य में जहां अबुआ दिशोम का नारा भी हाशिये में चला गया वहीं दूसरी ओर राजनीतिक व वैचारिक शून्‍यता के कारण जल, जंगल, जमीन को लेकर आज भी राज्‍य के आदिवासी संघर्षरत है.

राजीव आनंद

संपर्क-9471765417

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