पद्मा मिश्रा का आलेख - गांधी और कबीर

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-- कबीर जयंती पर आलेख --पद्मा मिश्रा गाँधी और कबीर [एक तुलनात्मक विवेचन ] पूजित था जीवन में ,मानव का प्रेम जहाँ , भक्ति ,प्रेम ,सेवा के व...

-- कबीर जयंती पर आलेख --पद्मा मिश्रा
गाँधी और कबीर
[एक तुलनात्मक विवेचन ]


पूजित था जीवन में ,मानव का प्रेम जहाँ ,
भक्ति ,प्रेम ,सेवा के वाहक कबीर थे .
गाँधी की मानवता सत्य और अहिंसा थी ,
सहज पथ प्रदर्शक थे ,लाखों की भीड़ में ,
दोनों ही संत पुरुष ,युग द्रष्टा कहलाये ,
जीवन उत्सर्ग किया जन जन की पीर में।.[स्व रचित ]

सचमुच संत कवि उस पीयूष वर्षी मेघ के सामान हैं जो अपनी अमृतमयी रसधार से सम्पूर्ण समाज को आप्लावित कर निरंतर उसकी कल्याण कामना में निरत रहते हैं ,पर बात जब युग द्रष्टा कबीर की हो तो एक संत व् समाज सुधारक के रूप में उन्होंने जो कुछ भी समाज को दिया ..दिशाहीन भ्रमित जन मानस को एक नई राह दिखलाई उसके लिए हम उनके सदैव ऋणी रहेंगे .पर जहाँ मानवता और दीन सेवा पर सर्वस्व न्योछावर कर त्याग ,सेवा सत्य और कर्तव्य निष्ठांपर निस्वार्थभाव से आत्म समर्पण की बात हो ,वहां कबीर के साथ गाँधी भी स्वयम
प्रासंगिक हो उठते हैं ,और मानवीय प्रेम तथा संवेदना के धरातल पर साथ खड़े दिखाई देते हैं ,तब उनकी तुलना अवश्यम्भावी हो जाती है .
कबीर ईश्वर को परम ब्रह्म के रूप में मानते थे ,क्योंकि उनका विश्वास अवतार वाद में नहीं था ,बल्कि वे
मानते थे कि मनुष्य भी ईश्वर का ही एक अंश है ---

''पाणी ही ते हिम भया ,हिम ही गया बिलाई ''

''जो कुछ था सोई भया ,अब कुछ कहा न जाई ''


यहाँ पर गाँधी जी भी कबीर से सहमत दिखाई देते हैं दोनों का यह मानना था की ईश्वर एक है ,चाहे उसे राम कहो या रहीम ,नानक या ईशा ,किसी नाम से पुकारो सब प्रेम व् भक्ति की पराकाष्ठ है ,,जहाँ वर्ग ,जाति व् सम्प्रदाय के नाम पर कोई विभाजन नहीं होता --''ईश्वर अल्ला तेरो नाम ,सबको सन्मति दे भगवान ''दोनों का विश्वास केवल सत्य व् मानव प्रेम में था ,कबीर की भांति गाँधी जी भी युग पुरुष के रूप में समाज में सम्मानित थे ..कबीर जहाँ युग द्रष्टाके रूप में समाज की सम्पूर्ण गतिविधियों पर अपनी नजर रखते थे  ..अपने आस पास घटती घटनाओं ,दलितों पर अत्याचार, पाखंड का बढ़ता प्रभाव ,मुल्ला ,मौलवियों ,पंडितों का समाज पर कायम वर्चस्व ..इन सबसे वह अछूते नहीं रह सके थे ----

''जप माला छापा तिलक ,सरै न एको काम ''
मन कांचे नाचै वृथा ,सांचे रांचे राम ''


अथवा ''कर का मनका डार दै मन का मनका फेर ''..मुस्लिम समाज की कट्टरता उन्हें पसंद नहीं थी ---

''बकरी पाती खात है ,ताकी काढी खाल ''
जो नर बकरी खात है ,ताको कौन हवाल ?''


वहीँ गाँधी जी भी आधुनिक युग के संत व् भविष्य द्रष्टा थे .गाँधी जी की माँ कबीरपंथी थीं ,अतः उनकी शिक्षा व् संस्कारों का भी उनके मन और जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा था .गाँधी जी की सबसे बड़ी विशेषता जो उन्हें कबीर के समकक्ष ला खड़ा करती है ,वह है उनकी आध्यात्मिक प्रेरणा ''..कबीर की तरह गाँधी जी भी सत्य को परमात्मा का ही एक रूप मानते हैं ,और उनके सभी कार्यों का एक ही मानदंड था --''सत्य और प्रेम ''कबीर भी सत्य के ही अनन्य उपासक थे अतः वे स्वयम को सत्यनाम का उपासक और गाँधी अपने जीवन को सत्य का प्रयोग कहा करते थे .कबीर ने कहा ---

''सांच बराबर तप नहीं ,झूठ बराबर पाप ''
                           ''जेक हिरदय सांच है ,टेक हिरदय आप ''


गाँधी जी ने सत्य का पहला पाठ अपने जीवन से ही सीखा था जब पहली बार पिता से छिपा कर मांस भक्षण किया और परीक्षा के समय अध्यापक के चोरी छुपे नकल कर लेने पर आत्मग्लानि वश क्षमा मांगी ,पश्चात्ताप किया था क्योंकि वे असत्य भाषण नहीं कर सके थे ,..उन्होंने सिद्ध किया कि सत्य व्रत का पालन ही उनके जीवन का ध्येय है .सचमुच सत्य व्रत का पालन किसी तप से कम नहीं होता ,कबीर ने भी कहा है ----

''सत्य नाम कडुवा लगे ,मीठो लागे दाम ''


गाँधी व् कबीर दोनों ने अपने आराध्य के रूप में राम को अपनाया गाँधी जी के अभिन्न मित्र और सहयोगी महादेव देसाई कहते हैं --''प्रार्थना में गाँधी जी का ध्यान निराकार सर्वव्यापी प्रभु की ओर रहता था ,राम जिनको वे पूजते हैं ,उनकी कल्पना का है न कि तुलसी रामायण या वाल्मीकि रामायण का ''


कबीर भी दशरथ पुत्र राम को न मान कर परम ब्रह्म को ही राम मानते हैं ,दोनों ने ही अपने जीवन में ''राम'' नाम की महिमा का खूब बखान किया है .दोनों ही सेवा ,त्याग व् मानव प्रेम के लिए संकल्पित थे .


कबीर के अनुसार ''कबिरा संगत साधु की ,हरै और की व्याधि ''...वहीँ गाँधी जी ने भी उद्घोष किया --''पाप से घृणा करो ,पापी से नहीं ''सदैव सत्य का आचरण करो ''आदि आदि .कबीर जहाँ सज्जन पुरुष या साधू की नई परिभाषा गढ़ते हैं ---''साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय ''सार सार को गहि रहै थोथा देई उडाय ''.वहीँ पर गाँधी का वैष्णव या साधू पुरुष भी समाज कल्याण के लिए समर्पित है ---वैष्णव जन तो तेने कहिये जे ,पीर पराई जाने रे ''पर कबीर जहाँ किसी से मत विरोध होने पर अक्खड़ हो उठते हैं वहीँ गाँधी जी विरोध के सम्मुख भी संसार को कंपा देने वाली धमकी के सामने भी घुटने टेक देते हैं ..उनकी सत्य और अहिंसा ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी,  यह बात आप  ,हम सब जानते हैं ..  .यदि धर्म की बात करें तो दोनों को ही धर्म का सरल रूप प्रिय था ,और वे धर्म के मूल सत्य ,प्रेम, व् कर्म को ग्रहण करने सदैव तत्पर रहे हैं क्योंकि कथनी और करनी में पूर्ण साम्यता के पक्षधर होने के कारन दोनों ने ही समाज के पद दलित ,दीन हीनो के लिए संघर्ष किया .कबीर ने तत्कालीन सवर्णों ,व् ब्राह्मणों से जम कर लोहा लिया --''जो बामन बमनी जाया ,आन राह ते क्यों नहीं आया ?''


वहीँ पर गाँधी जी ने छुआछूत ,पाखंड और बाहरी आडम्बरों का विरोध करते हुए दलितों को ''हरिजन'' कह कर गले लगाया .दलितों का मन्दिर प्रवेश कराना ,तत्कालीन समाज में एक बड़ी क्रांति थी, पर गाँधी मत से पूर्णतः प्रभावित थे .---

''जाति पांत पूछहिं नहीं कोई ''
हरि को भजे सो हरि को होई ''


कबीर भी जन जन में ही ईश्व्र्र का वास मानते थे --
'' ज्यों बाती में तेल है ,ज्यों चकमकमें आग ,तेरा साईं तुज्झ में जाग सके तो जाग '' महादेव देसाई ने भी गाँधी जी की जीवनी के आधार पर कहा है कि --वह कबीर का एक पद अक्सर गुनगुनाया करते थे और उसे अपनी दैनिक प्रार्थना में भी शामिल कर लिया था --

मोको कहाँ ढूंढे रे बंदे ,मै तो तेरे पास में
न मै मन्दिर ना मै मस्जिद ना काबे कैलाश में ''


इस प्रकार गाँधी और कबीर की समानता ,जो सर्वश्रेष्ठ है ..वह उनके जीवन दर्शन में दिखाई पड़ती है .जहाँ सम्प्रदायवाद ,वर्ग भेद ,जाति प्रथा और पाखंड का विरोध भी शामिल है,कबीर ऐसे ही विरोधाभासों के बीच पुकार बन कर सामने आये जहाँ वे यदि हिन्दुओं का विरोध करते तो मुसलमान उन्हें अपने पैगम्बर की तरह सम्मान देते और मुसलमानों की निंदा पर हिन्दू खुश हो जाते .पर कबीर ने निस्पृह भाव से हिन्दू मुसलमान दोनों को समझाया .कबीर मुसलमान होते हुए भी आजीवन उनकी बुराइयों का विरोध करते  .उनकी कट्टरता ,नमाज आदि पर एक व्यंग्य दृष्टव्य है --

कंकर पत्थर जोरी कै ,मस्जिद लई .बनाय ,
ता चढ़ मुल्ला बांग दे ,क्या बहरा हुआ खुदाय ?''


वहीँ हिन्दुओं को भी फटकारा --;;हिन्दू अपनी करें बड़ाई ,गागर छुअन न देइ ,वेश्या के पाँयन त्र सोवें यह कैसी हिन्दुआइ ?''..फिर दोनों धर्मावलम्बियों को समझाते भी हैं -हिन्दू कहैं मोहिं राम पियारा ,
तुरुक कहैं रहिमाना ,
आपस में दोउ लरी लरि मुएँ ,
मरम न कोउ जाना ''


गाँधी जी ने भी बंगाल के दंगों के समय मुसलमानों के प्रति अन्याय का विरोध करते हुए अनशन किया था .एक सच्चे वैष्णव के समान हीअपने प्रण पर टिके रह कर सत्य की राह नहीं छोड़ी थी . उनकी दृष्टि में जाति महत्त्व नहीं रखती थी ,बल्कि मानव सेवा व् अहंकार का त्याग करने वाला ही सच्चा मानव है ----''पर दुखे उपकार करे सोई मन अभिमान न आणे रे ''यहाँ पर गाँधी व् कबीर दोनों अहंकार विरोधी थे .कबीर ने कहा --''जब मै था तब हरि नहीं ,अब हरि हैं मै नाहि ,..सब अँधियारा मिट गया ,दीपक रेखा माहिं ''गुरु की महत्ता दोनों ने ही स्वीकार की ,कबीर के अनुसार --

''गुरु गोविन्द दोउ खड़े ,काके लगूँ पांय ,

बलिहारी गुरु आपणों गोविन्द दियो बताय ''


अपने व्यक्तिगत जीवन में भी गाँधी जी व् कबीर दोनों ने ही सादगी ,मितव्ययिता ,व् गरीबी को अपनाया .कबीर जुलाहे थे -अतः सूत कात कर अपना जीवन यापन करते थे ,वहीँ गाँधी जी ने भी चरखे पर सूत कात कर वही वस्त्र पहने और स्वदेशी प्रेम को अपनाया .क्योंकि देश की जनता भूखी नंगी थी . स्व.पितम्बर दत्त बडथ्वाल लिखते हैं ---

''भारत का सूर्य जाज्वल्यमान पन्द्रहवीं शताब्दी में कबीर कहलाया तो आधुनिक युग में गाँधी बना .दोनों ही युग द्रष्टा , समाज उन्नायक ,हर रूप में प्रासंगिक रहे हैं .हमें आज भी उनकी आवश्यकता है ----


  ''विचलित है न्याय ,सत्य आज भी पराजित है ,
पीड़ित मानवता के शूल चुभे पांवों को ,
आज भी एक गाँधी कबीर की जरूरत है ,
भक्ति और नीति में प्रेम का समन्वय कर ,
कौन पन्थ दिखलाए ?
जन जन का दर्द फिर पुकारता है बार बार ,
आओ फिर एक बार ,आओ फिर एक बार ''

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रचनाकार: पद्मा मिश्रा का आलेख - गांधी और कबीर
पद्मा मिश्रा का आलेख - गांधी और कबीर
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