मंगलवार, 11 जून 2013

शैलेन्‍द्र नाथ कौल का व्यंग्य - मोबाइल

मोबाइल

लेखक - शैलेन्‍द्र नाथ कौल

जिन तीन चीज़ों ने मुझे बहुत परेशान किया है, उनके ज़्‍यादा से कम के क्रम में नाम हैं मोबाइल , टी0वी0 और बीबी आखिरी दो का उद्‌‌भव हुए काफ़ी समय हो चुका है और बड़े-बड़े मनीषी उनके विषय में बहुत कुछ कह चुके हैं , इसलिए मैं कुछ नहीं कहूंगा।

यह जो मोबाइल जी हैं , क्‍या कहें इनको? जब से हमारे देश में आये हैं अच्‍छे अच्‍छों को इममोबाइल बना दिया हैं , भले वह कहते रहें - वॉक व्‍हेन यू टॉक। इंग्‍लैंड के एलेक्‍जेन्‍डर गा्रहम बेल ने 1878 में टेलीफोन से बातें करके दूरियों को मिटा दिया था। लगभग सौ साल बाद उनके अमरीकी साथी वैज्ञानिक डॉ मार्टिन कूपर मोबाइल फोन का अविष्‍कार करके दूरियां को इतना पास कर देगा कि हम अपनों से दूर हो जायेंगे , यह कभी सोचा न था। मोबाइल राजा को रंक बना देता है। कैसे ? ज़रा राजा से पूछो। न मोबाइल होता न कुर्सी जाती। मोबाइल में वह सब है जो टी0वी0 में है और उससे कुछ ज्‍यादा ही है जो हमें अभारतीय होने ही ओर बढ़ा रहा है। जब यह नहीं था , हम सुबह सबेरे घर से निकल कर पड़ोसियों का हालचाल पूंछ लेते थे। जब से यह आया है हाल चाल पूछने के लिये इन्‍तज़ार करना पड़ता है। क्‍योंकि दरवाज़ा खोलते समय यह उनके कान पर लगा होता है और जब तक उनकी वार्ता समाप्‍त नहीं हो जाती हम गली के कुत्‍ते की तरह खड़े गरदन उ�पर नीची करते इन्‍तज़ार करते रहते हैं। पहले दूध लेने जाते थे तो पड़ोसी के साथ बतियाते चले जाते थे , अब वह मोबाइल पर सैंकड़ों से हज़ारों किलोमीटर तक दूर के लोगों से बतियाते चलते हैं पर अपने पड़ोसी से बात करने की फ़ुरसत नहीं होती। एक मनोरंजक दृश्‍य जब मैंने पहली बार देखा तो समझ में ही नहीं आया कि यह क्‍या हो रहा है। सामने सड़क पर एक लड़का चला आ रहा है और लगातार बड़बड़ा रहा हैं , मुझे लगा पागल हो गया है। पास आया तो देखा कि कानों से एक ईअर फ़ोन का तार लटक रहा है जो जेब में रखे मोबाइल से जुड़ा है और वह मोबाइल पर बातें कर रहा है। एक और मिला जो कान में काला काकरोच चिपकाये बातें कर रहा था। यह नज़ारे अब बिल्‍कुल सामान्‍य हो गये हैं इसलिए हैरानी नहीं होती बस कूपर साहब को लाखों को पागल बनाने पर बधाई देने का मन करता है। बेल साहब का फ़ोन घर पर या आफिस में एक जगह होता है सो जो भी बात होती, खुल्‍लमखुल्‍ला ही होती। पर यह कूपर साहब का झुनझुना बजे तो लेकर अकेले में खिसक लीजिए और फिर जी भर कर प्रतिबन्‍घित बातें कीजिए।

इन सबसे ज्‍यादा ख़तरनाक सीन है मोटर साईकिल सवार की टेढ़ी गरदन में फंसा मोबाइल जो सामने वाले को एलर्ट होने पर मजबूर कर देता है। मोटर गाड़ी वालों का भी यही हाल है एक हाथ में मोबाइल और दूसरे में स्‍टीयरिंग। राम भला करें इन लोगों की लीला का जो अपनी इहलीला को जल्‍दी से समाप्‍त कर ख़ुद इम्‍मोबाइल हो जाना चाहते हैं। मोबाइल पर अर्जेन्‍ट वार्ता करते हुए - वॉक व्‍हेन यू टॉक , के निर्देशानुसार कितने पटरी पार करते या ट्रेन पर चढ़ते , इस दुनिया में वॉक करते हुए वॉक आउ�ट हो गये मगर मोबाइल नहीं छोड़ा। ऐसे दिल दहलाने वाले हादसों के आंकड़ों को पढ़ कर और सुनकर भी हमारे मोबाइल वीरों की अक्‍कल में कुछ नहीं आता। क्‍यों कि कान पर मोबाइल लगा है और अक़ल की बात तो दिमाग़ में कान या आंख से होकर ही जाती है। गरदन , कमर और उंगलियां सब टेढ़ी होने और सावधानी हटी दुर्घटना घटी का डर और मां-बाप से जुदा होने का भय भी , मेरे देश के सपूतों और सपूतनियों को मोबाइल से थोड़ा सा भी दूर नहीं कर पा रहा है। लादेन ने मोबाइल का प्रयोग कभी नहीं किया और इतने साल चाचा सैम को छकाता रहा। छोटे मोटे लादेनों को यह अक़्‍ल नहीं आती और पकड़े जाते है।

पहले जब किसी काम से बड़े साहब का फोन आता था तो छोटा अफ़सर अपनी बीबी से कहता था कि कह दो वो तो आफ़िस के लिए निकल चुके हैं , परन्‍तु अब तो सीधा आपकी जेब में रखा हुआ ही बजेगा और जान बचाने कि लिए आपको ख़ुद ही झूठ बोलना पड़ेगा। इसी प्रकार के झूठ अनेकों स्‍थितियों में बोले जा रहे हैं।

निष्‍कर्ष - मोबाइल के प्रयोग से झूठ बोलने और इममोबाइल होने वालों का प्रतिशत बहुत बढ़ गया है, चरित्र के स्‍तर में भी निरन्‍तर गिरावट आ रही है। इसलिए मेरी सलाह है कि अपने मोबाइल को अपना बैरी होने से रोकें। वैसे ज़िन्‍दगी आपकी है सो मर्ज़ी आपकी ही चलेगी।

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(सरिता मई-द्वितीय 2013 में प्रकाशित)

2 blogger-facebook:

  1. akhileshchandra srivastava4:31 pm

    Kaul saheb ka mobile vivran padha sub burai hi batayeen ab main achchaiyon ka vivran deta hoon pahile baat karna ho to CTO jao line lagao der bad litne mill gayee to theek khoob jor jor se baat karo ab jab chahe tab baat karo ab yeh saadhan sas
    ''--ta bhi aur sabhi ko uplabdh bhi haan agar misuse karoge to parinam bhi bhugatan hoga kaul saheb ko iski buraiyon par likhne ke liye badhai

    उत्तर देंहटाएं
  2. vyang ka arth hi miuse ki bat karna hai. kisi bhi chiz ka use bura nahin misuse hota hai. rachna par tippari ke liye dhanyavad.

    उत्तर देंहटाएं

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