रविवार, 2 जून 2013

‘सानी’ करतारपुरी की ग़ज़लें

 

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अमरीक सिंह बल,  तख़ल्लुस – ‘सानी’ करतारपुरी।             
करतारपुर, जालंधर, पंजाब।
प्रकाशित किताब -   शॉर्ट-कट वाया लोंग रूट  २०१३
स्पेन में कार्यरत                        
मैं प्रमाणित करता हूँ कि ये रचनायें मैंने खुद लिखी हैं और नितांत मौलिक हैं


                      ग़ज़ल
बचपन की खुशमिज़ाजियाँ ढूँढते हो, पागल हो!
बारिश में कागज़ी कश्तियाँ ढूँढते हो, पागल हो!


ज़िन्दगी के रास्ते तो ख़ुद ही बनाने पड़ते हैं,
तुम सहरा1 में पगडण्डियाँ ढूँढते हो, पागल हो!    

 
झूठ के हमज़ुबां तलाशोगे तो बहुत मिल जायेंगे,
सच के हक में गवाहियाँ ढूँढते हो, पागल हो!


रौशनी के जले हो या जिस्मों से है चोट खाई,
ख़्वाबों में भी जो परछाईयाँ ढूँढते हो, पागल हो!


वो तो पत्थरों से टकरा के कब के पथरा चुके,
शहरों में जुगनू , तितलियाँ ढूँढते हो, पागल हो!


गनीमत है, होंठों को इक-आध मुस्कां मिल जाये,
इस दौर में तुम खुशियाँ ढूँढते हो, पागल हो!


नफ़रतों के खंजर गुज़रे थे सनसनाते ‘सानी’,
सर बच गये, पगड़ियाँ ढूँढते हो, पागल हो!

1. रेगिस्तान 

                         ग़ज़ल        

चेहरे पे धूप पड़े, करवट बदलते हैं, लोग जागते नहीं,
ख़्वाब टूटे तो बस आँख़ मलते हैं, लोग जागते नहीं


ये अजब शहर है,  जैसे हर कोई नींद में चलता है,
ठोकर लगे, लड़खड़ाके सम्भलते हैं, लोग जागते नहीं।


वो दरीचे1 बन्द रखते हैं, जो दिन के मुँह पे खुलते हैं,
कमरों में बोझिल अन्धेरे टहलते हैं, लोग जागते नहीं।


आँख़ें बन्द करके चीखते हैं कि, ‘ये अन्धेरा क्यों है’,
सूरज को पीठ दिखाकर चलते हैं, लोग जागते नहीं।


बस्ती भर की आँख़ में रड़कते हैं, मुद्दत के रतजगे2,
हवेली में दिन-रात ख़्वाब टहलते हैं, लोग जागते नहीं।


अन्धेरे से एैसे मानूस3 कि उजाले को ख़ारिज4 कर दें,
बस नींद की ख़ुमारी से बहलते हैं, लोग जागते नहीं।


धूप बन्द दरवाज़ों पे सर पटकती लौट जाती है ‘सानी’,
कितने ही सूरज चढ़ते हैं, ढलते हैं, लोग जागते नहीं।

1खिड़कियां  2 रात्रि-जागरण  3 घुला-मिला  4 रद्व करना

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