शनिवार, 1 जून 2013

रमा शंकर शुक्ल का संस्मरण : एक मासूम पर्वत का ढहना

स्मृति शेष

एक मासूम पर्वत का ढहना

डा० रमा शंकर शुक्ल

राजकीय इंटर कालेज पिपरी में हिंडाल्को जनसेवा ट्रस्ट ने दो अल्पकालिक/अंशकालिक प्रवक्ता डोनेट किया था। हिंदी पढ़ाने के लिए मै नियुक्त किया गया था। वेतन तो पूरा मिलता पर सेवा की गारंटी न थी। हम और हमारे साथी अक्सर सटे गृह जनपद मिर्ज़ापुर आ जाते। १८० किलोमीटर की बस की यात्रा काटने के लिए हमने कुछ निश्चित विषय तैयार कर लिए थे


जनवरी १९९५ का महीना था। मिर्ज़ापुर से बस में सवार हुए तो हमने उस दिन के निर्धारित विषय "नाथ संप्रदाय" पर चर्चा शुरू कर दी। आदिनाथ शिव, गोरखनाथ, हठयोग, सहज योग, देह स्थित नाड़ियों की प्रतीकात्मक स्थिति, कुंडली जागरण, मूलाधार से सहस्रार तक की सहज यात्रा, पिंड-ब्रह्म की निरति आदि में हम ऐसे डूबे कि जंगल-पहाड़ छूटते चले गए और हमें भनक तक न लगी। चोपन आ गया। चाय की तलब मिटाने को हम उतर ही रहे थे कि पीछे से एक भद्र आवाज ने कदम रोक दी, "सुनिए, मै शुकदेव हूँ। कोटर में बैठ आपका बीज मन्त्र सुन लिया।"


पीछे की सिट पर पहाड़ जैसा आदमी और चेहरे पर मंद और शिशु मुस्कान। आप?
जी, मै कैलाश नाथ त्रिपाठी। अनपरा जीआईसी में प्रिंसिपल हूँ।


कौन नहीं जानेगा भला कैलाश नाथ त्रिपाठी को। पहले संस्कृत परिषद् में निरीक्षक रह चुके थे, पर कभी किसी का नुकसान नहीं किये। सांझ ढले दरवाजे पर कितने ही चन्दन-चोटी वाले संस्कृत के शिक्षक झोला और फ़ाइल लटकाए पधारे रहते। कोई इस चारपाई तो कोई उस चारपाई पर पसरा पड़ा है। त्रिपाठी जी आये तो एक साथ पाँव छूने को दौड़ पड़े। पहले के चक्कर में कभी किसी का सर टकरा जाता तो कभी कोई लडखडा जाता। पर, कैलाश जी कभी इन चापलूसियों पर ध्यान न देते। किसी का वेतन रुका है तो किसी को प्रबंधक ने नोटिस दे दी है। किसी की नौकरी में कोई खोंच है तो कोई अभी तक वेतन ही नहीं पा सका है। फ़ाइल सामने इस तरह फैली रहती मानो कोई भिक्षा का पात्र हो। कैलाश जी हर फ़ाइल पर कुछ न कुछ हस्ताक्षर और टीप रखते जाते। बदले में अनंत सराहना और साधुवाद। भूखा बंगाली भात-भात।
मैंने लपक कर पाँव छूए और कुशल-क्षेम पूछा। कैलाश जी निरीक्षक से प्रिंसिपल पद पर स्थानांतरण का इतिहास बताते रहे। फिर मेरा विस्तार से परिचय भी। हमारे बीच वार्ता के अनेक महाजाल थे और हम उसी में डूबते-उतराते पिपरी पहुँच गए। वे अनपरा चले गए।


तीन माह बाद मेरा विद्यालय से पत्ता कट गया। अप्रैल में पता चला की कैलाश जी सोनभद्र के जिला विद्यालय निरीक्षक हो गए। एक मित्र से मालूम हुआ कि कैलाश जी जब पिपरी गए तो वहां के प्रिंसिपल को मुझे लेकर जमकर फटकारे। उनकी इच्छा थी कि मै फिर से ज्वाइन कर लूं। पर मन न माना। मुफलिसी तो बहुत थी पर मैंने अखबार में ही बने रहना ज्यादा उचित समझा।


फिर उनसे ९९ में भेट हुई। वे मिर्ज़ापुर के उप निदेशक बनाये गए थे। शहर के अधिकांश समारोहों में वे मुख्य या विशिष्ट अतिथि होते और मै बतौर वक्ता शामिल होता। दोनों के विचारों में जबरदस्त टकराव। त्रिपाठी जी संस्कृत साहित्य और शास्त्रीय पद्धति के पुरोधा और मै प्रगति और युगानुरूप जीवन शैली का हिमायती। चूकि मुख्य अतिथि होते इसलिए वे मेरे बाद के वक्ता होते और मेरे विचारों को अनेकानेक उद्धरणों से जमकर चिथते, लेकिन हर तर्क के साथ मेरे प्रति वात्सल्य का भाव बना रहता। कई बार तो ऐसा भी हुआ जब वक्ता की सूची में मेरा नाम न पाकर आनन्-फानन बुलवाया। एक बार उनके घर गया तो छोटे पुत्र ने पहचाना नहीं। त्रिपाठी जी हेमंत से नाराज हो गए। बुलाकर परिचय कराये और पाँव छूने का निर्देश दिया।
संस्कार का हनन त्रिपाठी जी कभी बर्दास्त नहीं कर पाते थे। यही कारण है कि उनके सभी पुत्र बेहद विनम्र और शालीन हैं।


एक बार जिले में विषय विशेषग्य की नियुक्ति हो रही थी। त्रिपाठी जी ही नियोक्ता थे। मित्रों ने सुझाया कि आप मिल लीजिये, नियुक्ति अवश्य हो जाएगी। पर उस विपन्नावस्था में भी मेरी हिम्मत न पड़ी। जो व्यक्ति कभी खुद के बेटे-बेटियों के लिए किसी से सिफारिस न किया हो, उसे संकोच के दायरे में कैसे बाँध देता।
त्रिपाठी जी विन्ध्याचल मंडल के संयुक्त शिक्षा निदेशक हो गए और फिर मिर्ज़ापुर से ही सेवानिवृत्त भी। अब पूरा समय घर पर ही बीतने लगा। खाली समय में वही धर्म और दर्शन के ग्रंथों का परायण करते और कोई गाहे-बगाहे पहुँच गया तो शास्त्रज्ञान का उपदेश देते। सेवानिवृत्ति के बाद जैसे वह यह भी भूल गए कि कभी कोई अधिकारी भी थे। पौत्रों के साथ बतियाते। पूजा-पाठ में समय बिताते। पर, जाने कौन सा अपराध था उनका कि कैंसर ने घर कर लिया। दवा चलती रही और हालत बिगडती रही। पहाड़ गलने लगा, गलने लगा। शरीर कंकाल मात्र रह गया। पता तो था ही, पर व्यस्तताओं के कारण मुलाकात न कर पाया। यही कोई छह माह पहले दरवाजे पर पहुंचा तो त्रिपाठी जी चारपाई पर धंसे पड़े थे। पहचान में नहीं आ रहे थे। मै हतप्रभ था। विधना का लेख। संत की दुर्दशा! ईश्वर यह कौन सा न्याय है?
मै उनके पैरों पर प्रणिपात हो गया। एक महीन सी आवाज निकली, उठिए शुक्ल जी। उठिए। मै शुकदेव। बीजमंत्र सुन रहा हूँ।


उठकर सिरहाने के पास लगी कुर्सी पर बैठ गया। पहाड़ आसमान की ओर ताक रहा था और एक बुदबुदाहट झीनी सी कानो में टकराई, मैंने तो आपको अपना धर्म पुत्र समझा था, पर आप भी मेरे अन्य बेटों की तरह नालायक निकल गए। फिर एक प्यारी सी मुस्कान होठों पर फ़ैल गयी। पहाड़ मुस्कुरा रहा था। एक शिशु की शरारत साफ़ झलक रही थी। मन उस मुस्कान में भींग गया। बहुत देर तक वह मुस्कान यू ही फैली रही और कुछ देर के बाद नीद में तब्दील हो गयी।


कल सुबह पता चला की पहाड़ दुनिया से विदा हो गया। उसी शिशु मुस्कान के साथ।
उस बीतरागी पर्वत शिशु को अंजुरी भर अनंत श्रद्धांजलि।


तुम कभी न मरोगे पर्वत
तुमने गुस्से का बाना भर धारण किया
पर हमेशा ही बहाते रहे करुना का निर्झर।
मरेंगे तो वे जो
शीतल जल पीकर गए फिर कभी लौट कर न आये।

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पुलिस अस्पताल के पीछे
तरकापुर रोड, मिर्ज़ापुर
उत्तर प्रदेश
मो- ९ ४ ५ २ ६ ३ ८ ६ ४ ९

2 blogger-facebook:

  1. इस तरह के लोग बहुत ही कम होते हैं. और बीमारी तो किसी को भी घेर लेती है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत देर तक वह मुस्कान यू ही फैली रही और कुछ देर के बाद नीद में तब्दील हो गयी।

    ......Aadarniya RAMASHANKAR JI...KI KALAM MAIN NA JAANE KYAA HAI ..UNKO PADHNAA SUKHAD HI HOTAA HAI ...ANTIM PANKTIYON NE NAYANON MAIN AADRATAA BHAR HI DEE .....!!

    उत्तर देंहटाएं

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