सोमवार, 3 जून 2013

प्रभुदयाल श्रीवास्तव के बुंदेली बालगीत

 

सूरज ऊंगत से उठबो  
      सूरज निकर परो पूरब सें,
      परे परे तुम अब लौ सो र‌ये।
      कुनर मुनर अब काये करत हो,  
      काये नें उठकें ठाँड़ॆ हो रये।

      ढोर ढील दये हैं दद्दा ने,
      और चराबे तुमखों जाने।
      चना चबेना गुड़ के संगे,
      बांध दओ है बौ अम्मा ने।
      अब तो उठ जा मोरे पुतरा,   
     कक्का बेजा गुस्सा हो रये।
     कुनर मुनर अब काये करत हो,  
      काये नें उठकें ठाँड़ॆ हो रये।

     कलुआ को मोड़ा तो कबको,
    बखर हांक कें हारे ले गओ।
    बड़े साव की गैया ब्या गई,  
    उनको मोड़ा तेली दे गओ।
    मझले कक्का कबके उठ गये,
    कुल्ला करकें गोड़े धो रये।
   कुनर मुनर अब काये करत हो,  
  काये नें उठकें ठाँड़ॆ हो रये।

    कल्लो मल्लो मटका लेकें,
     नदिया, पानी भरबे जा रईं।
     कतकारीं तो सपर सपर कें,
    मिलजुर कें पीपर पुजवा रईं।
   फूल धरे हैं टोर टोर कें,
   मझले भैया माला गो रये।
कुनर मुनर अब काये करत हो,  
  काये नें उठकें ठाँड़ॆ हो रये।

 
   तेलन फुआ तेल दे गईं हैं
     
और बरोनी काकी भेड़ा।
पंडितजी ने पूजा कर लई,
दे गये चार भोग के पेड़ा।
      दोई गधा पुन्नी मम्मा के,
      बड़े भोर सें ईंटें ढो रये।
     कुनर मुनर अब काये करत हो,  
     काये नें उठकें ठाँड़ॆ हो रये।

     जल्दी उठबो भौत जरूरी,
     कहत रेत हैं जेठे स्याने।
     सूरज ऊंगत से उठबो तो,
    अच्छो होत स्वास्थ्य के लाने।
    आलस करकें काये लल्ला,
    तुम अपनी तंदुरुस्ती खो रये।
     कुनर मुनर अब काये करत हो,  
   काये नें उठकें ठाँड़ॆ हो रये।


पाकिट खर्च‌
    पाकिट खर्च बढ़ा दो दद्दा,
    पाकिट बढ़ाओ मतारी।
    एक रुपैया में का हो रओ,
    नईं जानत का दुनिया दारी।
   
     एक रुपैया में तो दद्दा,
     चाकलेट तक ने मिल पाउत।
     इत्ते से थोड़े पैसन में,
    चना चबेना, कैसें आउत।

   पंदरा की तो मिलत ब्रेड है, 
   और कुरकुरे दस में आ रये।
   एक रुपैया दे रये दद्दा,
   तुम तो बिल्कुल सरम ने खा रये।

पिज्जा है इत्तो मंहगो,
के लगत तीस लेबे ऊखों
  एक रुपैया धर खींसा में,
      अब तो लाज लगे मोखों।

     आलू चिप्स पांच में आउत,
     उर बिस्कुट पेकिट दस में।
     एक रुपैया को का लेबें,
     हम तो हैं असमंजस में।

     ने तो बिही मिले इत्ते में,
     ने तो जामुन मिल पायें।
    एक रुपैया में मोरी बऊ ,
    तेंई बतादे का ल्यायें।

    मोखों खाने आज जलेबी,
    मोखों खाने रसगुल्ला।
     मारो मारो फिर रओ है बऊ,
      इते उते तोरो लल्ला।

   तेरा में तो मिलत पेप्सी,
     पंद्रा में कोकाकोला।
    आठ रुपैया में मिल रये हैं,
    हाफ प्लेट आलू छोला।

  तेंई बतादे बऊ ऐसे में ,
  कैंसे खीसा खर्च चले।  
   समझा थोड़ो दद्दा खों,
  उते ने मोरी दाल गले।

     कम सें कम दस करवा दे,
    इत्ते में काम चला लेंहें।
   एक साल तक बऊ मोरी,
    ने कभउँ कछू तोसें केहें।


   बेसन‌ की मिठाई
  बेसन की मिठाई है आई रे,
  मोरे मम्मा ने भेजी।
  मम्मा ने भेजी और माईं ने भेजी।
  बेसन की मिठाई है आई रे,
  मोरे मम्मा ने भेजी।

देखो मिठाई है कितनी गुरीरी।
घी की बनी है और रंग की है पीरी।
माईं ने ममता मिलाई रे,
मोरे मम्मा ने भेजी।

      काजू डरे हैं और किसमिस डरी है।
      पिस्ता की रंगत तो कैसी हरी है।
     सिंदूरी केसर मिलाई रे।
     मोरे मम्मा ने भेजी।

    नाना ने मीठे के डिब्बा बनाये।
    नानी ने रेशम के धागे बंधाये।
    जी भरकें आशीष भिजवाई रे
     मोरे मम्मा ने भेजी।

  डिब्बा में निकरीं हैं सतरंगी चिठियां।
  चिठियों में लिक्खी कैसी मीठी बतियां।
चांदी सी चमके लिखाई रे। 
मोरे मम्मा ने भेजी।
बेसन की मिठाई है आई रे,
मोरे मम्मा ने भेजी।
     
--
बस्ता
      बस्ता कित्तो भारी दद्दा,
बस्ता कित्तो भारी।
लाद लाद कें कंधा थके,
भई बस्ता की बीमारी।
ब‌स्ता कित्तो भारी दद्दा,
बस्ता कित्तो भारी।   

  इत्ती सारीं ढेर किताबें,
  लाद लाद ले जायें।
  अपनो दु:ख हमईं जानत हैं,
  का तुमखों समझायें।
  पे पढ़बो मज़बूरी अपनी,
  बस्ता है लाचारी।
  ब‌स्ता कित्तो भारी दद्दा,
  बस्ता कित्तो भारी।

बब्बा के रये बड्डे होकें ,
तुमे कलेक्टर बनने।
सबरे काम छोड़कें अब,
      जी जान लगाकें पढ़ने।
तभई सफलता मिल पेहे,
  जब झोंको ताकत सारी।
  ब‌स्ता कित्तो भारी दद्दा,
बस्ता कित्तो भारी।

  जे सबरे स्कूल मास्टर,
   बने जान के दुस्मन,
  हम जैसे बच्चन खों सम‌झत,
    हैं बैसाखी नंदन।
  ढो ढो कें जो बोझा इत्तो,
  अकल गई है मारी।
  ब‌स्ता कित्तो भारी दद्दा,
बस्ता कित्तो भारी।

  हम बच्चन की इच्छा है,
के चार किताबें पढ़हें।
  सत्य अहिंसा दया प्रेम, 
     पढ़कें सब जग सें लड़ हें।
   इनईं चार पाठों सें तो,
     हम सब पे परहें भारी।
     ब‌स्ता कित्तो भारी दद्दा,
बस्ता कित्तो भारी।

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  1. हेमेन्द्र कुमार राय6:06 pm

    लोकगीतों में लोकभाषा की मिठास भी है और आज के कटु यथार्थ की कड़वाहट भी। बहुत सुंदर लोकगीत हैं, बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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