सोमवार, 3 जून 2013

महावीर सरन जैन का आलेख - मध्य भारतीय आर्य-भाषाओं का प्रथम विकास-कालः अभिधान एवं काल-सीमा

मध्य भारतीय आर्य-भाषाओं का प्रथम विकास-कालः अभिधान एवं काल-सीमा

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

[भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों द्वारा भारतीय आर्य भाषाओं के जो ऐतिहासिक अथवा विकासात्मक अध्ययन-कार्य सम्पन्न हुए हैं, उनमें मध्य भारतीय आर्य भाषा के प्रथम विकास-काल को केवल पालि के नाम से पुकारा गया है तथा इसकी काल-सीमा 500 ईस्वी पूर्व से ईस्वी सन् के आरम्भ तक मानी गई है। लेखक ने प्रस्तुत लेख में इन दोनों मान्यताओं पर प्रश्न चिह्न लगाया है तथा इसका अभिधान केवल पालि न कर, गौतम बुद्ध के उपदेशों की भाषा पालि, जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर के उपदेशों की भाषा एवं अशोक के अभिलेखों की भाषाएँ करने का प्रस्ताव किया है और इसकी काल-सीमा 500 ईस्वी पूर्व से न मानकर 600 ईस्वी पूर्व से मानने का प्रस्ताव किया है। ]

विद्वानों ने मध्य भारतीय आर्य भाषाओं के तीन विकास-काल माने हैं :

(अ)प्रथम काल ( 500 ई0 पूर्व से ई0 सन् के आरम्भ तक)-

पालि

(आ) द्वितीय काल (ई0 सन् के आरम्भ से 500 ई0 तक)-

साहित्यिक प्राकृत

(इ) तृतीय काल ( 500 ई0 से 1000 ई0 तक )-

अपभ्रंश

लेखक की मान्यता है कि संस्कृत से भेद दिखाने के लिए हम मध्य भारतीय आर्य भाषाओं के काल को सामान्य नाम भी दे सकते हैं और इसे प्राकृत कह सकते हैं। उस स्थिति में प्रथम विकास काल का विवरण निम्न प्रकार से कर सकते हैं :

प्रथम प्राकृत (500 ई0 पूर्व से ई0 सन् के आरम्भ तक)-

गौतम बुद्ध के उपदेशों की भाषा पालि, जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर

महावीर के उपदेशों की भाषा एवं अशोक के अभिलेखों की भाषाएँ :

कुछ विद्वान संस्कृत से पालि-प्राकृत की उत्पत्ति मानते हैं।

(प्रकृतिः संस्कृतम्। तत्र भवं तत् आगतं वा प्राकृतम् – सिद्धहेमशब्दानुशासन, 8/1/1)

यह प्रतिपादित किया जा चुका है कि प्रा0भा0आ0भा0 काल में संस्कृत संस्कारित भाषा थी। समाज के शिक्षित वर्ग की भाषा थी। उसी के समानान्तर विविध जनभाषाओं/ लोकभाषाओं की भी स्थिति थी। प्राकृत का अर्थ ही है – प्रकृत।

(प्रकृत्या स्वभावेन सिद्धं प्राकृतम्)। ( - - - प्रकृतीनां साधारणजनानामिदं प्राकृतं)। इनके परिप्रेक्ष्य में अधिक तर्कसंगत यह मानना है कि संस्कृत के समानान्तर जो जन-भाषाएँ थीं, उन्हीं के विकसित रूप प्राकृत हैं।

(क) गौतम बुद्ध के उपदेशों की भाषा पालि-

पालि भाषा की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। पालि शब्द का अर्थ क्या है और वह कहाँ की भाषा थी। इन दोनेां प्रश्नों को लेकर भी विद्वानों में मतभेद हैं। पालि शब्द की निरुक्ति को लेकर अनेक कल्पनाएँ की गई हैं।

(1)पंक्ति शब्द से निम्नलिखित विकास क्रम में पालि की निष्पत्ति बतायी जाती है-

पंक्ति > पंति > पत्ति > पट्ठि > पल्लि > पालि ।

इस विकास क्रम में ध्वनि-नियम से अधिक अपनी बात प्रमाणित करने का आग्रह है। दंत्य से मूर्द्धन्य तथा फिर मूर्द्धन्य से पार्श्विक के विकास क्रम की प्रवृत्ति संगत नहीं है।

(2) पल्लि (गांव) से पालि को निष्पन्न बताया जाता है। पल्लि-भाषा अर्थात गांव की भाषा । इस व्युत्पत्ति में भी कठिनाइयाँ हैं। एक तो यह कि द्वित्व व्यंजन में एक व्यंजन -ल् का लोप और पूर्व स्वर का दीर्घत्व प्रथम प्राकृत काल की प्रवृत्ति के अनुकूल नहीं है दूसरी यह कि सामान्यतः इस स्थिति में शब्द के दूसरे अक्षर के ह्रस्व स्वर का दीर्घीकरण होना चाहिए था। पालि में ह्रस्व स्वर ही है।

(3) प्राकृत > पाकट > पाअड़ > पाअल > पाल > पालि

यह स्वन परिवर्तन भी विकास क्रम की प्रवृत्ति के अनुरूप नहीं है।

(4) एक विद्वान ने पाटलिपुत्र शब्द से पालि को व्युत्पन्न करने का प्रयास किया है । उनका कथन है कि ग्रीक में पाटलिपुत्र को पालिबोथ्र कहते हैं। विदेशियों द्वारा किसी शब्द के उच्चारण को भारतीय भाषा का अभिधान मानना भी संगत नहीं है। इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण भी उपलब्ध नहीं है ।

(5) एक विद्धान ने पालि का सम्बन्ध पर्याय शब्द से जोड़ा है -

पर्याय > परियाय > पलियाय > पालि

प्राचीन बौद्ध साहित्य में बुद्ध के उपदेश के लिए पर्याय शब्द का प्रयोग होता था इसलिए पर्याय से पालि को निष्पन्न बताया गया है । एक मत यह भी है कि पाल्

धातु से पालि शब्द बना है जिसका अर्थ पालन करना या रक्षा करना है। जिस भाषा के द्वारा बुद्ध के वचनों की रक्षा हुई, वह पालि है। वास्तव में पालि का सम्बन्ध बुद्ध वचनों/ बौद्ध साहित्य से ही है, इस कारण अन्तिम दो मत अपेक्षाकृत अधिक संगत हैं।

पालि किस स्थान की भाषा थी - इस सम्बंध में भी मत भिन्नता है। श्रीलंका के बौद्ध भिक्षुओं ने इसे मगध क्षेत्र की भाषा माना है किन्तु पालि का मागधी प्राकृत से भाषिक संरचनागत सम्बन्ध नहीं है। इस कारण यह मगध क्षेत्र की भाषा नहीं हो सकती। इसी संदर्भ में यह भी दोहराना उपयुक्त होगा कि पाटलिपुत्र शब्द के ग्रीक उच्चारण से पालि की व्युत्पत्ति के मत का भी हमने समर्थन नहीं किया है।

संस्कृत के अघोष संघर्षी व्यंजन ( ऊष्म ) स् , ष् , श् में से मागधी में श् का तथा अर्द्धमागधी एवं शौरसेनी में स् का प्रयोग होता है। पालि में केवल स् का ही प्रयोग होता है। इस कारण पालि का आधार मागधी तो हो ही नहीं सकता। इसका मूल आधार अर्द्धमागधी एवं/अथवा शौरसेनी ही हो सकती है। इस सम्बंध में आगे विचार किया जाएगा।

सम्प्रति, संस्कृत से पालि के भेदक अन्तरों को जानना आवश्यक है। ये निम्न हैं :

(1) संस्कृत तक ए , ओ , ऐ ,औ सन्ध्यक्षर थे अर्थात् अ $ इ > ए / अ $उ > ओ / आ $ इ > ऐ / आ $ उ > औ। ( सन्ध्यक्षर = दो स्वर मिलकर जब एक अक्षर का निर्माण करें )

( दे० डॉ. महावीर सरन जैन: परिनिष्ठित हिन्दी का ध्वनिग्रामिक अध्ययन, पृष्ठ 175-182)

पालि में ऐ एवं औ के स्थान पर ए एवं ओ का प्रयोग होने लगा। अय् एवं अव् के स्थान पर भी ए एवं ओ का प्रयोग होने लगा। व्यंजन गुच्छ के पूर्व ए एवं ओ का ह्रस्व उच्चारण होने लगा। इस प्रकार पालि में ए एवं ओ के ह्रस्व एवं दीर्घ दोनों प्रकार के उच्चारण विकसित हो गए।

(2) प्राचीन भारतीय आर्य भाषाओं में प्रयुक्त ऋ एवं लृ का लोप हो गया।

(3) व्यंजन गुच्छ में एक व्यंजन का लोप तथा अन्य व्यंजन का समीकरण पालि एवं प्राकृत भाषाओं का महत्वपूर्ण भेदक लक्षण है। वैदिक संस्कृत एवं लौकिक संस्कृत के शब्दों में प्रयुक्त पहले व्यंजन का लोप होकर बाद के व्यंजन का समीकरण हो जाता है अथवा बाद के व्यंजन का लोप होकर पूर्व व्यंजन का समीकरण हो जाता है। उदाहरण:

(अ) पहले व्यंजन का लोप तथा बाद के व्यंजन का समीकरणः

सप्त > सत्त / शब्द > सद्द / कर्क > कक्क / सर्व > सब्ब / निम्न > निन्न

(आ) बाद के व्यंजन का लोप तथा पहले व्यंजन का समीकरणः

लग्न > लग्ग / तक्र > तक्क / शुक्ल > सुक्क / शक्य > सक्क / अश्व > अस्स

(4) शब्द-रूपों में व्यंजनान्त रूपों का अभाव हो गया । शब्द सस्वर बन गए।

(5) द्विवचन का लोप हो गया। आगे भी इस वचन का प्रयोग होना बन्द हो गया।

(6) यह प्रतिपादित किया जा चुका है कि वैदिक भाषा में रूप-रचना में अधिक विविधता और जटिलता है। उदाहरणार्थ, प्रथम विभक्ति के बहुवचन में देव शब्द के देवाः और देवासः दोनों रूप मिलते हैं। इसी तरह तृतीया के एकवचन मे देवैः और देवभिः दोनों रूप मिलते हैं। संस्कृत में आकर रूप अधिक व्यवस्थित हो गए और अपवादों तथा भेदों की कमी हो गयी। उदाहरणार्थ, पूर्वोक्त दोनों वैकल्पिक रूप छँट गए और एक-एक रूप (देवाः तथा देवैः) रह गए। पालि में वैदिक भाषा के रूपों का भी प्रयोग मिलता है।

(7) आत्मनेपद लुप्तप्राय है।

पालि का महत्व बौद्धमत की हीनयान शाखा के साहित्य के माध्यम के रूप मे बहुत अधिक है।

 
http://www.rachanakar.org/2013/05/blog-post_8285.html


(ख) जैन धर्म के चैबीसवें तीर्थंकर महावीर के उपदेशों की भाषाः

यह ऐतिहासिक तथ्य है कि 600 ईस्वी पूर्व से लेकर 500 ईस्वी पूर्व की काल अवधि में जैन धर्म के चैबीसवें तीर्थंकर महावीर एवं बौद्ध धर्म के संस्थापक बुद्ध ने मगध, विदेह, वत्सदेश, कुणाल, अंगदेश, काशी, पांचाल, कोशल, शूरसेन, दशार्ण आदि राज्यों एवं जनपदों में चतुर्दिक घूम घूमकर उपदेश/प्रवचन दिए। उपर्युक्त वर्णित राज्यों एवं जनपदों की भौगोलिक स्थिति वर्तमान में नेपाल देश का भूभाग तथा भारत के बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ आदि राज्यों का भूभाग है। राजनैतिक दृष्टि से इस काल में दो प्रकार की शासन व्यवस्थायें थीं। मगध में राजतंत्रात्मक शासन व्यवस्था थी। मल्ल, लिच्छिवी, काशी, कोशल आदि 18 गणराज्यों ने मिलकर महासंघ बनाया था जो अपेक्षाकृत अधिक शक्तिशाली था तथा इस महासंघ का मुख्यालय वैशाली में स्थित था। इस महासंघ की सम्पर्क भाषा का अंतरराज्यीय व्यवहार के लिए प्रयोग होता होगा तथा भारत के बड़े भूभाग के निवासियों के नागरिक इसे समझते होंगे।

महावीर के जीवनवृत्त में देशना के संदर्भ में यह जानकारी मिलती है कि उनके युग में कितनी भाषाएँ एवं उनकी क्षेत्रीय उपभाषाएँ/बोलियाँ बोली जाती थीं तथा किस प्रकार उन्होंने ऐसी भाषा में उपदेश दिया जो सबके लिए बोधगम्य थी। भाषाओं के लिए महाभाषाओं एवं क्षेत्रीय प्रभेदों के लिए भाषाओं/बोलियों अभिधान का प्रयोग हुआ है तथा यह विवरण भी मिलता है कि जब उनकी देशना हुई तो उसका परिणमन अठारह महाभाषाओं एवं सात सौ भाषाओं में होने लगा जिसकी व्याख्या मैंने इस प्रकार की हैः

देशना का विभिन्न भाषाओं में परिणमनः ग्रन्थों में वर्णित है कि भगवान महावीर का उपदेश अर्ध मागधी प्राकृत में हुआ। अर्ध मागधी का श्रवण के समय अठारह भाषाओं में तथा सात सौ भाषाओं में परिणमन होने लगा। इसकी एक व्याख्या इस प्रकार सम्भव है कि भगवान महावीर एवं गौतमबुद्ध के समय मगध और शूरसेन प्रदेश के मध्यवर्ती भूभाग में व्यवहृत जनभाषा (अर्ध मागधी का महावीर युगीन भाषा रूप) का व्यवहार अठारह महाभाषाओं के क्षेत्र में सम्पर्क भाषा के रूप में होता होगा। अर्ध-मागधी सम्पर्क भाषा थी जबकि अन्य भाषाएँ प्रदेशों की भाषाएँ थीं। कुछ ग्रन्थों में मगध, मालव, महाराष्ट्र, लाट, कर्णाटक, गौड़, विदर्भ आदि देशों की भाषाओं को देशी भाषा कहा गया है। कुछ ग्रन्थों में कोल्ल, मगध, कर्णाटक, अन्तर्वेदी, कीर, ढक्क,सिन्धु, मरु, गुर्जर, लाट, मालवा, ताजिक, कोशल, मरहट्ठ (महाराष्ट्र) और आन्ध्र प्रदेश की भाषाओं का देसी भाषा के रूप में उल्लेख मिलता है। अर्धमागधी का जो रूप सम्पूर्ण प्रदेशों में सम्पर्क भाषा के रूप में व्यवहृत था उसमें उन देशी भाषाओं के शब्द आदि का मिश्रण हो गया था। सम्पर्क-भाषा होने के कारण यह सर्वभाषात्मक थी। इसका प्रयोग होने पर सभी प्रदेशों के निवासियों के लिए बोधगम्य थी।

( दे० डॉ० महावीर सरन जैन: भगवान महावीर एवं जैन दर्शन, पृ० 69)

इस कारण विद्वानों एवं शोधकों को इस काल की भाषा का काल 500 ई० पू० से न मानकर 600 ई० पू० से मानना चाहिए। भाषा का अभिधान पालि की अपेक्षा महावीर एवं बुद्ध के उपदेशों की भाषा करना चाहिए। दोनों ने एक ही काल में तथा समान भूभागों में उपदेश/प्रवचन दिए थे। दोनों के उपदेशों की भाषा का गहन अध्ययन करने पर इसी कारण उनकी भाषिक समानता स्पष्ट हो जाती है। दोनों ने एक भाषा का व्यवहार किया था। यहाँ दोनों के उपदेशों की भाषिक समानता को विवेचित एवं विश्लेषित करने का अवकाश नहीं है। अभी तो हम केवल दोनों के उपदेशों के एक-एक वाक्य देकर अपनी बात को स्पष्ट करना चाहेंगे :

(अ)भगवान महावीर की वाणी- अप्पा कत्ता विकत्ता य।

(आ) गौतम बुद्ध की वाणी - अत्ता ही अत्तनो नाथो।

अभी तक इस काल की भाषा का अध्ययन केवल बुद्ध वचनों के आधार पर हुआ है। पालि के आधार पर हुआ है। विद्वानों को दोनों के उपदेशों की भाषा के गहन अध्ययन करते हुए तदनन्तर अशोक के शिलालेखों (260 ई० पू० से 232 ई० पू० ) में प्राप्त भाषिक भिन्नताओं का गहन अध्ययन सम्पन्न करना चाहिए तथा यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि प्राप्त भाषिक भिन्नताएँ हिन्दी, बंगला, मराठी आदि भिन्न भिन्न-भिन्न भाषाओं की भाँति हैं अथवा हिन्दी के ही कोलकोतिया हिन्दी एवं मुंबइया हिन्दी की भाँति एक ही तद्युगीन सम्पर्क भाषा के प्रादेशिक अथवा क्षेत्रीय भाषाओं से रंजित रूप हैं। मेरा अपना विचार है कि ये अलग अलग भाषाएँ नहीं हैं। एक भाषा के तत्कालीन बोले जाने वाले विभिन्न भाषाओं से रंजित रूप हैं।

(ग) अशोक के अभिलेखः

अशोक के अभिलेख पश्चिमोत्तर भारत (अब पाकिस्तान) से लेकर दक्षिण भारत के कर्नाटक तक मिलें हैं। इनका काल 256 ईस्वी पूर्व से लेकर 240 ईस्वी पूर्व माना जाता है। दो अभिलेख (शहबाजगढ़ी और मानसेहरा) खरोष्ठी लिपि में, एक अभिलेख (कंदहार के पास शार-ए-कुना) आरमेई एवं यूनानी में तथा शेष सभी ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण हैं। ब्राह्मी लिपि के अभिलेखों में अ , आ , इ , उ , ए एवं ओ इन 6 मूल स्वरों के लिए वर्ण मिले हैं। ब्राह्मी लिपि के अभिलेखों में अ स्वरांत निम्नलिखित व्यंजनों के लिए वर्ण मिले हैं :

(क) स्पर्श व्यंजनः क,ख,ग,घ,च,छ,ज,झ,ट,ठ,ड,ढ,त,थ,द,ध,प,फ,ब,भ

(ख) नासिक्य व्यंजनः ञ,ण,न,म

(ग) संघर्षी व्यंजनः श,ष,स,ह

(घ) पार्श्विक व्यंजनः ल,ळ

(च) लोड़ित व्यंजनः र

(छ) अर्ध स्वर : य,व

इन अभिलेखों की ब्राह्मी लिपि में मिलने वाले वर्णों एवं कुछ व्यंजनों को स्वर मात्राओं सहित तालिका में इस प्रकार प्रदर्शित किया जा सकता हैः

(विकिपीडिया से साभार)



अशोक के अभिलेखों के अतिरिक्त कुछ अन्य अभिलेख भी मिले हैं जिनमें कलिंगराज खारवेल का हाथी गुम्फा का अभिलेख एवं यवन राजदूत हिलियोदोरस का बेसनगर का अभिलेख अधिक महत्वपूर्ण हैं। इन अभिलेखों के अध्ययन से स्पष्ट है कि तद् युगीन प्राकृत में स्थान भेद से भेद हो गए थे। ये भेद मुख्य रूप से चार प्रकार के हैं - उत्तर-पश्चिमी, दक्षिण-पश्चिमी, मध्यदेशीय, पूर्वी। विद्वानों द्वारा इनका विस्तृत अध्ययन सुलभ है।

( दे० 1. डॉ० सुकुमार सेन: तुलनात्मक पालि-प्राकृत-अपभ्रंश व्याकरण, पृ० 16-21, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, (1969)

2. डॉ० नेमीचन्द्र शास्त्री: अशोक-कालीन भाषाओं का भाषाशास्त्रीय सर्वेक्षण, परिषद्-पत्रिका, वर्ष 8, अंक 3-4)

कुछ विद्वानों ने इस काल के अन्तर्गत मध्य एशिया के निय स्थान से सर औरेल स्टीन द्वारा प्राप्त खरोष्ठी पाण्डुलिपियों की निय प्राकृत का भी अध्ययन किया है किन्तु ये प्रथम प्राकृत की कालसीमा के बाद की हैं। इस कारण निय प्राकृत का प्रथम प्राकृत काल सीमा अर्थात् 500 ईस्वी पूर्व से ईस्वी सन् के आरम्भ तक के अन्तर्गत अध्ययन करना संगत नहीं है।

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