गुरुवार, 13 जून 2013

उमेश मौर्य का व्यंग्य - मरना भी मुश्किल इस महंगाई में

मरना भी मुश्किल इस महंगाई में - व्‍यंग्‍य

बिजली की तरह एक विचार दिमाग में आ चमका। कि 2-3 साल हो गये। न मेरे गॉव में कोई मरा, न रिश्‍तेदारी में, और न ही किसी जानने वालों में। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। कि कारण क्‍या था। मॅहगाई का तो असर नहीं। जो मृत्‍युदर में कमी आ गई। लेकिन उससे तो गरीब लोगों में दवाओं का अभाव होगा, कुपोषण बढेगा, आत्‍महत्‍या बढेगी। विचारों ने मन में अपना विस्‍तार शुरू कर दिया। अब तो बिल्‍कुल कुहरे की तरह दिलो-दिमाग पे छाने लगा। सोते जागते केवल यही सवाल आ रहा था कि लोग क्‍यों नहीं मर रहे हैं। फिर मुझे याद आया।

जब व्‍यक्‍ति अपने किसी भी समस्‍या से हल का निवारण अन्‍तरमन की गहराई में जाकर चिन्‍तन करता है तो समस्‍या का हल अन्‍दर से ही किसी न किसी रूप में प्राप्‍त हो जाता है। हमें अपना सूक्ष्‍म परीक्षण करते रहना चाहिए कि हमारे सवाल का जवाब किस कड़ी से जुड़ा है। यही मेरे साथ भी हुआ। जवाब आ गया। लेकिन अचेतन अवस्‍था में, सुसुप्‍ता अवस्‍था में, सपने के रूप में।

यमराज जी प्रकट हुए बोलो- तू इतने दिनों से किस समस्‍या से जूझ रहा है।

मेरे मुंह से अचानक निकल गया- महंगाई। क्‍योंकि हाल ही में अभी तेल का भाव बढा था। हर जगह आग लगी थी। हर चीज पे जिसका प्रभाव था। सब्‍जी से लेकर शिक्षा तक। यमराज जी अन्‍तरयामी बोले तू झूठ बोल रहा है। तू किसी अन्‍य सवाल से परेशान था। मैंने सोचा भगवान से क्‍या छुपाना। बता ही देते हैं।

मैंने सकुचाते हुए संक्षिप्‍त प्रश्‍न किया- भगवन आज कल पृथ्‍वी लोक में खासकर भारत में मृत्‍युदर की कमी क्‍यों हो गई है ?

यमराज जी को झटका लगा बोले- तू मीडिया का आदमी तो नहीं। तू तो मेरे व्‍यक्‍तिगत विषय पर सवाल कर रहा है। लेकिन वचन दे चुके थे।

यमराज जी गरजकर बोले-ठीक है दुष्‍ट बालक लेकिन ये सवाल अपने पास तक ही सीमित रखना। टेलीकास्‍ट मत करना। और फिर उदासी से स्‍वर में उत्‍तर देने लगे।

-''भारत हमेशा से देवताओं, और ऋषि मुनियों, और परम पिता परमात्‍मा का निवास स्‍थान रहा है। और है भी। लेकिन अभी की समय और परिस्‍थितियाँ बदल गई। परमात्‍मा की शक्‍ति, पद, और प्रतिष्‍ठा मानवों ने अपने हाथ में ले ली। और पूरे महान भारत देश को अपने क्षुद्र विचारों से ग्रसित होकर, स्‍वार्थ, नाम, यश, और लोभ के मद में चलाया जा रहा है। जिसका असर पृथ्‍वी समेत, देवलोक, यमलोक, और पाताल लोक पर भी शत्‌प्रतिशत्‌ पड़ रहा है। चूंकि भारत ही हम सभी देवताओं का मूल स्‍थान रहा है। और जीवन यापन के अधिकांश साधन भी यहीं से उपलब्‍ध होते हैं। राजनीतिक मॅहगाई के चलते लोगों ने पूजा पाठ, हवन यज्ञ, एवं दक्षिणा स्‍वरूप में भी अपने आपको मॅहगाई के अनुरूप ढालने का प्रयत्‍न किया है। जिससे हमारी भी आय और अर्थव्‍यवस्‍था डगमगा गई। सारे देवताओं ने मिलकर एक गुप्‍त मीटिंग बैठाई और ये निणर्य लिया कि -

''देवलोक के सारे देवतागण अपने-अपने सरकारी वाहनों का प्रयोग न करके पैदल ही कार्य भार सम्‍भालेंगे। अपने निजी घर में, वेतन के पैसे से अपनी रोजमर्रा की आवश्‍यकता की पूर्ति करेंगे। जिस तरह एक साधारण आदमी अपना जीवन निर्वाह करता है करना होगा। प्राईवेट या सरकारी वाहनों में अपने निजी वैतानिक पैसों से यात्रा करके अपनी ड्‌यूटी निभानी होगी। सारी अतिरिक्‍त सुविधाएं समाप्‍त की जाती है। जब तक की एक सामान्‍य स्‍तर के आदमी का जीवन यापन हम नहीं करेंगे। तब तक हमें उस स्‍तर का आभास नहीं हो पायेगा। मॅहगाई का असर हम भी तो जानें।''

यमराज ने मुझसे एक सवाल भी पूछा- ''क्‍या भारत के उच्‍चाधिकारी और नेतागण भी अपने देश की स्‍थिति सुधारने के लिए अपनी सारी सरकारी सुविधाओं का त्‍याग कर देते हैं ? जिससे हर सामान्‍य आदमी का जीवन उन्‍नत हो सके।''

जिससे यमलोक से पृथ्‍वी लोक में आने जाने का समय बढ़ गया। और मृत्‍युदर में कमी आ गई। यदि ये महंगाई ऐसे ही बढ़ती रही तो लोग मरने का नाम भी भूल जायेंगे। जीते जी मरते रहेंगे, आपस में लड़ते रहेंगे, मौत भी न आयेगी, जी भी न पायेंगे। इतना कहकर यमराज जी अन्‍तरध्‍यान हो गये।

अब मेरे मन का भ्रम दूर हो गया था। मेरे पहले सवाल का जवाब भी मिल गया। तभी बाहर किसी ने डोरबेल बजायी देखा तो बिजली वाला था। बिल थमा कर बोला- साहब दो हजार जमा करने है। एक महीने का बिजली का बिल है।

ukumarindia@gmail.com

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