बुधवार, 5 जून 2013

उमेश गुप्ता का आलेख - भारत का संविधान और पर्यावरण संरक्षण

भारत का संविधान और पर्यावरण संरक्षण
आर्थिक विकास के साथ पर्यावरण प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हुई है।
चौड़ी सड़कों के जिये पेड़ काटे जा रहे हैं। औद्योगिकरण विकास के लिये नये
कारखाने स्थापित हो रहे हैं। शहर कांकरीट के जंगल बनते जा रहे हैं। जिसके
कारण प्रदूषण बढ़ रहा है, प्रदूषण जल, वायु, धरती तीनों में बढ़ने के कारण
लोगों का जीवन जीना दूभर हो गया है और बहरापन, विकलांगता, अंधापन,
केंसर, अस्थमा आदि बीमारियॉं प्रदूषण का परिणाम हैं।
संविधान के आर्टिकल-48-अ में कहा गया कि ष् राज्य देश के पर्यावरण
संरक्षण तथा संवर्धन का और वनों तथा वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास
करेगा


इसी प्रकार आर्टिकल-51-अ में पर्यावरण संरक्षण को नागरिकों का मूल
कर्त्तव्य मानते हुये यह प्रावधान किया गया है कि- भारत के प्रत्येक नागरिक का
यह कर्त्तव्य होगा कि वह प्राकृतिक पर्यावरण की जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी
और वन्य जीव हैं, रक्षा करंे और उनका संवर्धन करें तथा प्राणी मात्र के प्रति दया
भाव रखें। इन्हीं प्रावधानों को देखते हुए पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986
जलवायु प्रदूषण अधिनियम 1974 और 1981 राष्ट्रीय पर्यावरण अधिनियम 1995, घ्
वनि प्रदूषण् नियम 2000, रसायन दुघटना आपात योजना तैयारी और अनुक्रिया
नियम 1996 जैसे अलग-अलग नियमों की रचना की गई है।


जीवन जीने के अधिकार में मानव स्वास्थ्य क्षेम के लिए
पर्यावरण को आवश्यक बताया गया है। पर्यावरण संरक्षण सरकार एवं न्यायालय
का दायित्व बताया गया है। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत सफाई एवं पर्यावरण शुद्धाता
को शामिल किया गया है। यह भी निर्धारित किया गया है कि पर्यावरण प्रदूषण
से पीड़ित एवं प्रभावित व्यक्ति प्रतिकार पाने का हकदार है।
इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुये 19 नवम्बर 1986 में
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 की रचना की गई। इसके अनुसार पर्यावरण
प्रदूषण से तात्पर्य पर्यावरण में किसी भी पर्यावरणीय प्रदूषण का विद्यमान होना
शमिल है, तथा पर्यावरण से अभिप्राय जल, हवा और भूमि तथा जल, भूमि और
हवा तथा मानवीय प्राणी अन्य जीवित प्राणी, पौधे, सुक्ष्म जीवाणु तथा संपत्ति में
और उनके बीच विद्यमान अंतर्संबंध शामिल है।


इस अधिनियम की धारा-3 में कंन्द्र सरकार को शक्ति दी गई है
कि अधिनियम के उपबंधों के अंतर्गत पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार लाने तथा
संरक्षण के लिए और पर्यावरणीय प्रदूषण के निवारण, नियंत्रण, अपशमन के लिये
उपाय करें। जिसमें पर्यावरण के ानक निर्धारित करना और प्रदूषण को दूर करने
के उपाय शामिल हैं। इस संबंध में न्यायालय द्वारा भी समय-समय पर नोटिस
जारी किए गए हैं। जिसके उल्लंघन पर धारा 15, 16 में दण्ड के प्रावधान दिये
गये हैं।


न्यायालय द्वारा----------
पर्यावण प्रदूषण से हुई नुकसानी के लिए राहत और प्रतिकर देने, दुघटना
से प्रभावी रूप से शीघ्र निवटने के लिए राष्ट्रीय पर्यावरण अधिकरण अधिनियम
1955 राष्पति केे द्वारा 17.06.1995 को स्वीकृति प्रदान की गई है। जिसके अंतर्गत
पर्यावरण दुर्घटना से हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति संबंधी विधि की व्यवस्था की गई
है। इसके अंतर्गत अधिकरण की ंस्थापना की जायेगी जो दावों की सुनवाई
करेगी।
पर्यावरण संरक्षण के लिए अनेक मामलों में न्यायालय द्वारा समय-समय
पर दिशा निर्देश जारी किए गए हैं यथा-
1.
एम. सी. मेहता विरूद्ध यूनियन ऑफ इण्डिया का मामला 7-
इस मामले में दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ईंटों के
कारखानों से कारित प्रदूषण को रोकने के लिये ऐसे कारखानों को बंद करने
अथवा अन्यत्र ले जाने का आदेश दिया गया।
2.
सूओ मोटो बनाम इण्डस्ट्रीज ऐसोसिएशन, अहमदाबाद का मामला
8-
इस मामले में गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा यह धिमिनिर्धारित
किया गया है कि प्रदूषण का पता लगाने तथा रोकने के उपाय करने का कार्य
बोर्ड का है।
3. न्यूज आयटम, हिन्दुस्तान टाइम्स, ए. क्यू. एफ. एम. यमुग बनाम
सेंट्रल पोल्युशन कंट्रोल बोर्ड का मामला 9-
इस मामले में यमुना के जल को प्रदूषित होने से रोकने के लिए
दिल्ली एवं हरियाणा के कई उद्योगों पर प्रतिबंध लगाये गये हैं।
4.
एल. सी. मेहता विरूद्ध मास संघ ए.आई.आर 2001 एस.सी. 32
62 में न्यायालय ने अधिनिर्धारित किया कि आर्टिकल 51 क छ के अंतर्गत केंद्र
सरकार का यह कर्त्तव्य है कि वह
देश की शिक्षण संस्थाओं
में एक घंटे पर्यावरण संरक्षण की शिक्षा देने का निर्देश दे।
5.
एम.सी मेहता विरूद्ध यूनियन ऑफ इण्डिया का मामला 10-
इस मामले में ताजमहल को प्रदूषण से बचाने के लिए वहां से
अतिक्रमण को हटाने तथा उस क्षेत्र को हल्का औद्योगिक क्षेत्र घोषित नहीं करने
का आदेश दिया गया।
प्रदूषण रहित जल और वायु के उपभोग को अनुच्छद 21 में मूल अधिकार
माना गया।
पेट्रोल और डीजल से चलित वाहनों के कारण प्रदूषण को रोकने विशेष
उपाय किए जावें।


ध्वनि प्रदूषण पर रोक - इन री ध्वनि प्रदूषण ए.आई.आर 2005 एस.सी
30 36 के महत्वपूर्ण और एतिहासिक निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने सरकार को
निर्देश दिया है कि देश भर में व्याप्त ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए उससे
संबंधित कानूनों का कड़ाई से लागू करें।
आर्टिकल 21 के अंतर्गत सभी व्यक्ति को मानव गरिमा से जीने का मूल
अधिकार प्राप्त है। मानव जीवन का आकर्षण सुख पूर्ण जीवन जीना है। प्रत्येक
व्यक्ति को आर्टिकल 21 के अंतर्गत ध्वनि प्रदूषण रहित वातावरण में जीवन
बिताने का अधिकार है। जिसको अनुच्छेद 19-1-अ में प्रदत्त अधिकार का प्रयोग
करने में विफल नहीं किया जा सकता है।
आर्टिकल 19-1-अ में प्रदत्त अधिकार आन्यत्रिक नहीं है। उस पर आर्टिकल
19-2 के अंतर्गत युक्तियुक्त निर्बन्धन लागू किए जा सकते हैं। कोई भी व्यक्ति
लाउडस्पीकर और आधुनिक ध्वनि विस्तारकों द्वारा किसी को उसकी आवाज
सुनने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है।


संक्षेप में न्यायालय ने इसके लिए निम्न निर्देश दिए -
1.
पटाखों की ध्वनि स्तर वर्तमान मूल्यांकन प्रणाली
के अनुसार
करना चाहिए। जब तक कि इससे अच्छी प्रणाली न खोज ली जाए।
2.
ध्वनि करने वाले पटाखोें के प्रयोग पर 10 बजे रात से 6 बजे
सुबह तक पूर्ण रोक होगी।
3.
पटाखों को दो भागों में बांटना चाहिए। एक घरेलू प्रयोग के लिए
और दूसरा निर्यात के लिए। दोनों के रंग अलग होना चाहिए। घरेलू पटाखों पर
रासायनिक तत्वों की जानकारी प्रकाशित होनी चाहिए।
4.
लाउडस्पीकर आदि यंत्रों का ध्वनि विस्तार 10 डेसिबल-ए से
अधिक नहीं होगा।
5.
आवासीय क्षेत्रों मंे कारों के हॉर्न का प्रयोग वर्जित होगा।
न्यायालय ने कहा कि जब तक सरकार समुचित कानून नहीं बनाती तब तक
उपर्युक्त निर्देश कानून की तरह माने जायेंगे।


एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ ए.आई.आर 1991-2- सी के मामले में
उच्चतम न्यायालय ने एक लोकहित वाद में केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश
दिया कि वे सभी सिनेमाघरों भ्रमणकारी सिनेमाघरों में प्रत्येक शो के पूर्व प्रदूषण
संबंधी कम से कम 2 स्लाइड अवश्य दिखाये। यह उन्हें लाइसेंस की एक शर्त
होनी चाहिये। फरवरी 1992 से प्रत्येक दिन सिनेमाघरांे में थोड़ी अवधि की प्रदूषण
संबंधी फिल्म दिखाई जानी चाहिए। रेडियो और दूरदर्शन से प्रत्येक दिन 5 से 7
मिनिट का प्रोग्राम प्रसारित किया जाना चाहिए तथा सप्ताह में एक बार इस
पर एक लंबा प्रोग्राम दिखाया जाना चाहिए। स्कूल, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में
प्रदूषण एक अनिवार्य विंषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए ताकि छात्रों को
इसकी जानकारी हो सके और वे इसे अपना लें।


कांउसिल फॉर इन विरो लीगल एक्शन विरूद्ध यूनियन ऑफ इण्डिया
ए.आई.आर 1996-5-एस.सी. 281 में उच्चतम न्यायालय ने भारत के समुद्री तट
क्षेत्रों में स्थित कारखानों द्वारा पारिस्थितिकी और पर्यावरण को होने वाली क्षति से
संरक्षण प्रदान करने के लिए आवश्यक निर्देश दिया जिससे संबंधित अधिनियमों
के प्रावधानों को प्रभावी रूप से लागू किया जा सके।


न्यायमूर्ति ने संबंधित उच्च न्यायालयों में हरी पीठ ग्रीन बेंच की स्थापना
का सुझाव दिया जो इस प्रकार के मामलोें की सुनवाई करे और निपटावे।
राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण अधिनियम 2010- ग्रीन ट्रिब्यूनल
भारतीय संविधान के आर्टिकल 21 के अंतर्गत स्वास्थ्य पर्यावरण भारत के
नागरिकों का मूल अधिकार होने के कारण पर्यावरण की सुरक्षा राहत और
व्यक्तियों और संपत्ति के नुकसान के लिए मुआवजा देने संबंधी मामलों को शीघ्र
और प्रभावी ढ़ण्ग से निपटाने के लिए 2 जून 2010 के राष्ट्रीय हरित दिवस की
स्थापना की गई।

इसके अंतर्गत अधिनियम की धारा 14 में दी गई अनुसूची के
अनुसार:-
जल प्रदूषण का निवारण अधिनियम 1976।
जल प्रदूषण का निवारण और नियंत्रण उपकर अधिनियम 1977।
वन संरक्षण अधिनियम 1980।
वायु प्रदूषण का निवारण और नियंत्रण अधिनियम 1981।
पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986।
सार्वजनिक देयता बीमा अधिनियम 1991 और जैव विविधता अधिनियम
2002।
इस प्रकार 6 अधिनियम को शामिल किया गया है।


ग्रीन ट्रिव्यूनल में एक अध्यक्ष होगा, 10 राज्यों में और केंद्र स्तर पर 20
विशेषज्ञ सदस्यों की नियुक्ति की जायेगी। आवश्यकता पड़ने पर विशेष ज्ञान और
विशेषज्ञता वाले व्यक्तियों को निमंत्रित किया जाएगा। सर्वप्रथम पॉंच राज्यों में
कलकत्ता, नई दिल्ली, भोपाल, पूने, चेन्नई में स्थापना की गई।
पूणे सर्किट बेंच का क्षेत्राधिकार महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा, दमन दीव में
होगा।


विशेषतः
6 माह में निर्णय देगी फास्टट्रेक के रूप में कार्य करेगी।
90 दिन में सुप्रीम कोर्ट में अपील हो सकती है।
30 दिन के अंदर न्यायधिकरण में अपील होगी।
सिविल कोर्ट की डिग्री की तरह निष्पादन होगा। सिविल कोर्ट अधिकर होंगे।
अधिनियम की धारा-15 के अंतर्गत वाद कारण दिनॉक से 5 वर्ष के अंदर
आवेदन किया जायेगा। विशेष कारण से 60 दिन और आवेदन की अवधि बढ़ाई
जा सकती।


पर्यावरण संबंधी 6 अधिनियमों की अपीलीय अधिकारिता का प्रयोग करेगा
मान0 न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार का विशेष योगदान है।
दुनियॉ का भारत तीसरा देश आस्ट्र्ेलिया, न्यूजीलैण्ड के बाद है जिसने इस
न्यायाधिकरण की रचना की।
यह न्यायाधिकरण प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर कार्य करेगा।
यह एक फास्ट ट्रे्क अर्द्ध न्यायिक न्यायालय है
इससे उच्च न्यायालयों में मुकद्मों का बोझ कम होगा।

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