शुक्रवार, 7 जून 2013

सुशील यादव का व्यंग्य - लागा चुनरी में दाग ....

लागा चुनरी में दाग ....

हमारे उस्ताद जी को दाग –धब्बों से बहुत चिढ़ सी थी। वे कतई बर्दाश्त नहीं करते थे कि उनका शागिर्द किसी किस्म के उलट –फेर में पड़ा रहे। उनमें खुद कोई बुरी आदत, सिवाय एक भांग खाने के नहीं थी। इसे भी वो शिव –भोले के प्रसाद के निमित्त मानते थे। आयुर्वेद में हाजमा दुरुस्त रखने के अनेकानेक उपायों में से एक जानकर अपना बैठे थे।

उस्ताद जी को अखाड़े से बाहर ,हमेशा साफ –सफेद वस्त्रों में लिपटे हुए देखा। कई साबुन-डिटर्जेंट वाले विज्ञापन देने-दिलाने के नाम पे चक्कर काट गए पर उस्ताद जी को ‘झागदार’ बनाने में सफल नहीं हुए।

उस्ताद जी का कहना था कि, लोग आपको ‘झागदार’ बनाते –बनाते कब ‘दागदार’ बना देंगे कह नहीं सकते ,यानी लालच से बचो।

कम खाओ ,’बनारस’ में रहो, इस सिद्धांत को पालते –पोसते वे कब ‘बनारसी’ हो गए पता नहीं ?

उस्ताद जी को गुजरे अरसा हो गए ,तब से आज तक हमने किसी हार-जीत पर दांव नहीं लगाया।

फुटबाल ,हाकी ,कैरम ,क्रिकेट हमने भी कई खेल खेले पर हमें खरीदने वाला कोई माई का लाल तब पैदा नहीं हुआ। हमें फख्र इस बात का भी है हमारी बोली नहीं लगी।

हम तक, झांकने को नीम-बबूल दातूनों का स्टाकिस्ट तक नहीं फटका कि आओ हमारे प्रोडक्ट के ब्रांड एम्बेसडर बन जाओ।

मजे की लाइफ थी ,खेलो और भूल जाओ। कोई रिकार्ड-विकार्ड का चक्कर नहीं।

करीब-करीब ,कबीरी जिंदगी जीने वालो का एक ज़माना गुजर गया।

’जस की तस धर दीन्ही चदरिया’ वाले लोग अपनी-अपनी ,चादर को समेट के बेदाग़ बढ़ लिए|

जिसने ज्यादा यूज किया, वे ‘तार-तार’ होने तक भी चादर नहीं बदले।

कभी स्याही –चाय गिर गई तो बड़े-बूढों के डर से थोड़ी बहुत धो लिए|

एक परंपरा थी कि ज्यादा ‘दाग’ लगने नहीं देना है। ’चरित्र’ के नाम पर राम-चरित मानस की तरह जगह –जगह प्रवचन चलता था।

मास्टर जी की क्लास में कूट-कूट कर बतलाया जाता था ,ये गया तो कुछ गया ,वो गया तो कुछ और गया मगर ‘चरित्र’ गया समझो सब चला गया।

मास्टर जी की पकड़ से छूटते ही दादा-बाबूजी की पकड़ में फिर वही सीख ,’चरित्र’ गया तो सब गया। इन सीखो की वजह से गृहस्थाश्रम से आज तक किसी बलात्कार के कभी न्यूज ही नहीं बने।

हमारी खानदानी ‘चादर’ बेदाग़ रह गई। हमारी खुद की भी बेदाग़ रह गई।

हमने ‘दाग अच्छे हैं’ जब से सुना, हमारे होश गुम हो गए| माना कि तुम्हारे पास अच्छे डिटर्जेंट हैं इसका ये मतलब नहीं कि तुम‘दाग’ में सूअरों की तरह लोट जाओ

|धोने वालो का तो ख्याल रखो उन्के पास और भी तो काम हैं तुम्हारे दाग छुडाने के।

ड्राई -क्लीन के जमाने में मिस्टर क्लीन कहलाना या हो जाना अलग मायने रखता है। हमारे जमाने में किसी गलती से, चरित्र पर शंका उत्पन्न हो जाती थी तो अग्नि परीक्षा ,सामाजिक बहिस्कार,तिरस्कार ,गंगा स्नान और न जाने क्या –क्या उपाए किए-सुझाए जाते थे|

लोग स्वस्फूर्त साधू बन के गायब हो जाया करते थे ,वे तब बाहर आते थे जब ज्ञान का अकूत भंडार उनके पास हो जाता था। प्रवचन वे तब भी ‘चरित्र’ के मुद्दे पर ही किया करते थे।

ढीले-करेक्टर वालों के आंकड़े सुनते–सुनते अब तो मानो कान पक जाते हैं। दो-चार साल के बच्चों पर रेप, मनमाना घूस ,पुलसिया इन्काउंटर ,नेताओं के बहके –बहके बयान, खेल के भीतर खेल।

इमान्दारी से देखा जाए तो आज जितने जेल हैं ,उतने की ही और जरूरत है। इन ढीले-करेक्टर वालों को हम लोगों ने बहुत सहा है। मूक दर्शक बन के करोडो लोग अपना धन और समय की बर्बादी कर रहे हैं। बहिष्कार –तिरस्कार की भाषा में निपटने की बजाय चेनल वाले अपनी रोटी सेक रहे हैं ?अखबार वाले जगह दे रहे हैं ?

यों नहीं होना चाहिए कि इनकी ‘चादर’ इनसे छिन ली जाए ?बिना दाग- धब्बे की इनकी नंगी पहचान बनी रह जाए।

--

सुशील यादव

श्रीम-सृष्टि ,२०२ शालिग्राम सनफार्मा रोड

अटलादरा वड़ोदरा ३९००१२

मोबाइल ०९४२६७६४५५२

4 blogger-facebook:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(8-6-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  2. Akhileshchandra srivastava9:35 am

    Wah susheel ji kya likha hai aaj ke dagdar chadar hi nahin pehante poori tarah se nange hain nange se khuda dare. Kar lo jo karna hai
    Ek achche lekhan ke liye aap ko badhai

    उत्तर देंहटाएं

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