बुधवार, 5 जून 2013

ललिता भाटिया की लघुकथाएँ

  लालीपॉप 

१५ अगस्त बीत गया . दो दिन बाद स्कूल खुला .सभी खुश थे इस बार १५ अगस्त की परेड में उन के स्कूल को ट्राफी मिली थी .आज सभी को अपने स्कूल पर गर्व हो रहा था .कुछ देर बाद प्रिंसिपल के मेज़ पर १५ अगस्त के खर्च का हिसाब था --- बच्चों को ५ ५ लड्डू दिए गए  .गर्मी होने के कारण उन्हें एक एक कोल्ड ड्रिंक दी गई .जब कि बच्चों को २ २ लालीपॉप ओर १ गिलास पानी से टरका दिया गया .क्लर्क को बुलाया गया -शर्मा जी ये क्या खर्च इतना कम ओर बिल इतना मोटा .   सर आप खुद समझिये क्या हमारे स्कूल को जो ट्राफी मिली हे वो फ्री में आई थी .उस के लिए मंत्री जी के घर उपहार पहुंचा दिए गए थे .ओर हा मंत्री जी के उपहारों के साथ साथ मैंने आप के लिए ओर सारे स्टाफ के लिए भी उपहार खरीदे .अब ये सब में अपनी जेब से तो नहीं कर सकता था .सो बच्चों के ..........बस बस लाओ मैं  बिल पास कर दूं.

  दोनों के होठों पर कुटिल मुस्कान तैर गई . 

                                                                                    ललिता भाटिया २११   

                                                                                   सुभाष नगर  रोहतक 124001

 

एक प्रेरक कथा :
एक थका माँदा शिल्पकार लंबी यात्रा के बाद किसी छायादार वृक्ष के नीचे विश्राम के लिये बैठ गया। अचानक उसे सामने एक पत्थर का टुकड़ा पड़ा दिखाई दिया। उसने उस सुंदर पत्थर के टुकड़े को उठा लिया, सामने रखा और औजारों के थैले से छेनी-हथौड़ी निकालकर उसे तराशने के लिए जैसे ही पहली चोट की, पत्थर जोर से चिल्ला पड़ा, "उफ मुझे मत मारो।" दूसरी बार वह रोने लगा, "मत मारो मुझे, मत मारो... मत मारो।


शिल्पकार ने उस पत्थर को छोड़ दिया, अपनी पसंद का एक अन्य टुकड़ा उठाया और उसे हथौड़ी से तराशने लगा। वह टुकड़ा चुपचाप वार सहता गया और देखते ही देखते उसमे से एक एक देवी की मूर्ति उभर आई। मूर्ति वहीं पेड़ के नीचे रख वह अपनी राह पकड़ आगे चला गया


कुछ वर्षों बाद उस शिल्पकार को फिर से उसी पुराने रास्ते से गुजरना पड़ा, जहाँ पिछली बार विश्राम किया था। उस स्थान पर पहुँचा तो देखा कि वहाँ उस मूर्ति की पूजा अर्चना हो रही है, जो उसने बनाई थी। भीड़ है, भजन आरती हो रही है, भक्तों की पंक्तियाँ लगीं हैं, जब उसके दर्शन का समय आया, तो पास आकर देखा कि उसकी बनाई मूर्ति का कितना सत्कार हो रहा है! जो पत्थर का पहला टुकड़ा उसने,उसके रोने चिल्लाने पर फेंक दिया था वह भी एक ओर में पड़ा है और लोग उसके सिर पर नारियल फोड़ फोड़ कर मूर्ति पर चढ़ा रहे हैं।


शिल्पकार ने मन ही मन सोचा कि जीवन में कुछ बनने के लिए शुरू में अपने शिल्पकार को पहचानकर, उनका सत्कार कर कुछ कष्ट झेल लेने से जीवन बन जाता है। बाद में सारा विश्व उनका सत्कार करता है। जो डर जाते हैं और बचकर भागना चाहते हैं वे बाद में जीवन भर कष्ट झेलते हैं, उनका सत्कार कोई नहीं l

lalita bhatia 

211 sa ubhash nagar 

rohtak haryana 124001

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