रविवार, 2 जून 2013

संवेदना दुग्‍गल का आलेख - किराए के घर में जिंदगी का एक चित्र!

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दूसरी दुनियाः

किराए के घर में जिंदगी का एक चित्र!

पति को साथ लेकर जिस शहर में नौकरी पर पहुंची वहां मकान किराए पर ढूंढ़ना एक मुसीबत थी। मकान मालिक को जब पता चलता कि मैं यहां प्रायमरी स्‍कूल में अध्‍यापिका की नौकरी करूंगी, पति दूसरे शहर में रहेंगे, यहां मैं अकेली रहूंगी, सुन कर बिदक जाते। अध्‍यापक को मकान नहीं देंगे जी। क्‍यों? पूछती तो कहते, अध्‍यापक कई साल एक ही शहर में रहते हैं। अक्‍सर उनका ट्रांसफर नहीं होता। हमें तो कोई ऐसा किराएदार चाहिए जो साल दो साल में मकान खाली कर दे, जिससे बढ़ती मंहगाईं में हर बार किराया बढ़ा सकें।

उनकी नकचढ़ी मुटकिलों औरत बोली--वैसे भी हम अकेली जवान औरत को, भले वह अध्‍यापिका हो, भले वह शादी-सुदा हो, फिर भी हम उसे अपने मकान में नहीं रखना चाहेंगे। अकेली रहने वाली औरत हो या मर्द, उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। यह हमारे चरित्र पर संदेह होता पर मकान उनका। मालिक वे। देना न देना उनके हाथ में। लड़ने से अपना काम तो बन नहीं सकता।

जैसे-तैसे एक गंदे मुहल्‍ले में दूसरी मंजिल पर दो कमरों का छोटा-सा पोर्शन इस आश्‍वासन पर मिला कि साल भर बाद हम उसे खाली कर देंगे। लिख कर देना पड़ा। और भी कई शर्तें रखी गईं। जीना उनके चैनल लगे बरामदे से हो कर जाता था। देर रात घर आने की मनाही है। ऐरा-गैरा आदमी घर में नहीं आने दिया जाएगा। रात दस बजे के बाद बत्‍ती नहीं जलेगी। पानी के लिए सिर्फ सुबह ही जेट चलेगा। नीचे आ कर जरूरत का पानी भरना होगा। ऊपर टंकी नहीं है। टीवी सिर्फ रात दस बजे तक ही चला सकेंगी। वह भी बहुत जोर से नहीं। घर में पढ़ने वाले बच्‍चे हैं। उनकी पढ़ाई में बाधा पड़ेगी। पांव टिकाने के लिए उस अजनबी शहर में एक ठिकाना शुरू में जरूरी लगा, इसलिए ये सारी शर्तें मान लीं और वही मकान ले लिया।

लेकर पछताई। पतिदेव को फोन किया--फंस गई इस मकान में आ कर। कोई दूसरा तलाशो। यहां नहीं रहा जा सकता। मकान की बगल में बूचड़ खाना है। रोज सुबह जब स्‍कूल के लिए निकलती हूं, उसमेें बकरे-बकरियां कटने के लिए ले जाई जाती हैं। जानवर जाने कैसे जान लेते हैं कि उन्‍हें जहां ले जाया जा रहा है, वहां उनकी गर्दन रेती जाएगी। डर के मारे बेचारों का पेशाब निकल जाता है। मिमियाते हुए वे पीछे घिसटते हैं। अपने पांव जमीन में गड़ा लेते हैं। किसी तरह आगे नहीं बढ़ते। तब उन्‍हें मार-पीट कर जबरन पीछे से धकेल कर ले जाया जाता है। वह दृश्‍य बेहद करुण, दारुण और दिल दहलाने वाला होता है। ऐसे निर्दयी माहौल में मैं नहीं रह सकती। नाली में खून बहता दिखाई देता है। उबकाई आ जाती है। उस मकान के आंगन से बकरों-बकरियों के मिमियाने की दिल दहलाने वाली आवाजें आ कर कानों में गूंजती रहती हैं। रात को सो नहीं पाती। वही दृश्‍य आंखों के आगे नाचता रहता है। नाली में बहता खून खाने के वक्‍त याद आ जाए तो फिर खाना नहीं खाया जाता। ऐसे कैसे रह सकूंगी यहां?

--अब किसी तरह कुछ वक्‍त उसी मकान में रहो। अॉफिस में काम का भार जब कम हो जाएगा, दो-तीन दिन की छुट्‌टी लेकर आऊंगा और दूसरा मकान तलाशूंगा। इस बीच तुम्‍हारी कोई सहेली या संगी-साथी परिचित हुआ होगा, उसे अपनी समस्‍या बताओ। शायद हमारी कोई मदद कर दे।

जनबूझ कर असली बात टाल गई। स्‍कूल में एक बहुत सुंदर नौजवान अध्‍यापक आया है। इसी शहर का रहने वाला है। उसका अपना निजी पैत्रिक मकान है। उसे अपनी समस्‍या बताई तो उसने मुस्‍कुरा कर तुरंत कह दिया--तुम्‍हें मना किसने किया? आज ही अपना सामान ले कर हमारे यहां आ जाओ। बस एक ही समस्‍या है, घर में मां-बाप के अलावा सिर्फ अकेला मैं हूं! और वो गाना तो तुमने सुना ही होगा--जब घर में रहे तुम-सा हंसीन मेहमान तो कैसे नींद आए! निर्णय तुम पर है। बहुत देर तक हंसता रहा वह। और उसकी हंसी मेरे भीतर लगातार सितार के तारों की तरह झनकती रही! तन और मन में लगातार रह-रह कर कुछ झनझनाता रहा! सोचती रही, पति को इस बारे में कुछ नहीं बताऊंगी। बताना अपने पांवों में कुल्‍हाड़ी मारना है! बहुत-सी बातें हम स्‍त्रियों को अपने सनकी, झक्‍की, खडूस और शक्‍की पतियों से छिपानी पड़ती हैं। छिपानी भी चाहिए, बैठे-ठाले बैल को कौन हुलकारे कि आ बैल मुझे मार!

--डॉ संवेदना दुग्‍गल

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