सोमवार, 17 जून 2013

रवि प्रकाश की कविताएँ

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चतुर्दशपदी

धूप के चौगान जब ख़ामोशियाँ गाने लगें,

चाँद का संदेस लेकर चाँदनी छाने लगे।

झींगुरों की गीत गाती टोलियाँ भी थक चलें,

और आले में पड़े दीपक कहीं डगमग जलें।

 

गाँव भर की रहगुज़र में दूर तक हलचल हो,

मैकदा भी अनमना हो जाम हो छलछल हो।

पेड़ हों लिपटे खड़े जब मौन अपनी छाँव से,

कल्पना का काँच भंगुर गिर गया हो पाँव से।

 

क्या तुझे भी श्वास कोई स्पन्दनों से भर गया,

या नयन के भार से सुकुमार सपना मर गया।

नींद की निस्सीमता में रंग परिचित उड़ गया,

भावना की भूल में या और कोई जुड़ गया।

छीन ले राग तेरा वाद्य कोई चुरा ले,

प्रियतमे,तू प्रीत रहते गीत सारे आज गा ले॥

 

ग़ज़ल

मैं अँधेरे ओढ़ कर बेख़ौफ यूँ चलता रहा,

प्रात उजला बाँह खोले हाथ ही मलता रहा।

 

थपकियाँ दे कर हवा को रात ने बहला दिया,

दीप निश्चल नैन में विश्वास का जलता रहा।

 

रेख कोई राहतों की करतलों में मिली,

और धागा वक़्त का निर्बाध गति गलता रहा।

 

दूर हाहाकार से,करुणा,दया के भार से,

स्वप्न सा तकिए तले चुपचाप मैं पलता रहा।

 

कामना के हाथ से बचपन सुहाना छीन कर,

जग सदा तारुण्य के लावण्य से छलता रहा।

 

 

गुम्बदों की नोक-पलकें जो सँवारें शौक़ से,

धूप का दालान उनको बेसबब खलता रहा।

 

है असम्भव मुक्त होना मान के निष्ठुर उसे,

गीत बन के जो 'रवि' हर साँस मैं ढलता रहा।

 

ग़ज़ल

नज़र भर देख लूँ तुझको नजारों में छुपाऊँ क्या,

किसी उड़ते परिन्दे को किताबे-दिल सुनाऊँ क्या।

 

उसे अपनी इबादत से ख़ुदा ही मैं बना डालूँ,

मगर ऐसी ख़ुदाई को दुआओं में बसाऊँ क्या।

 

अभी कुछ रोज़ रुक जाओ मुझे आकाश होने दो,

ढलानों के मकानों में घटाओं को सुलाऊँ क्या।

 

धुँआ जिसमें नहीं बाक़ी चिंगारी दिखाई दे,

बुझे हालात के शोले जले मन से जलाऊँ क्या।

 

कभी करवट ले पाए कभी ख़ुद को छू पाए,

बुते-ख़ामोश को ऐसे रगे-जां में छुपाऊँ क्या।

 

सुहानी शाम का मौसम बड़ा नाकाम गुज़रा है,

सदाएँ जो नहीं देता उसे मैं भी बुलाऊँ क्या।

 

कभी जुगनू,कभी तारे,कभी रहजन,कभी क़ातिल,

सफ़र में क्या मिला मुझको घड़ी भर में बताऊँ क्या।

 

किसी बेनाम जज़्बे को मुहब्बत नाम दूँ कैसे,

हवाओं की गुज़रगाहें घरौंदों से बसाऊँ क्या।

 

 

रक़ीबों,बात कोई तो हमारी आदतों में है,

'रवि'अपनी ज़ुबानी मैं सिफ़त ख़ुद की बताऊँ क्या।

 

वो कुछ रातें

कितनी बार बूँद-बूँद चाँदनी पी हमने

हजारों तरह से एक ही बात की हमने-

"मेरी हस्ती पर तू जैसे चाहे बरस लेना

हम आँगन बने रहेंगे उम्र भर परख लेना।"

दिन कितने अँधेरे थे

और रात को

फर्श और बिस्तर सरगोशियाँ करते थे-

"यार,इस बार गर्मियाँ कुछ ज़्यादा गर्म हैं,

रातें सचमुच छोटी हैं

और पूरा जिस्म धड़क रहा है।"

रात की स्याही ने ये शब्द चुराए

और कुछ कानों पर दे मारे;

पहचाने से कुछ बादल

तेरे गले पर बरस गए

और रोज़ मुर्गे की बाँग पर मैं उठने लगा।

तेरी हँसी की रंगत आज भी गुलाबी है

मगर मुँह में ये जीभ किसकी है?

इस बस्ती पर तारे देर से आते हैं

देर तक राख में शोले टिमटिमाते हैं॥

 

तेरा दर

मेरी प्यास को दरिया नहीं बस एक लहर ही काफी है,

धुन है तो हज़ार राहें क्या बस एक डगर ही काफी है।

किसी को आह,किसी को धुँआ,किसी को जाम,किसी को गिला,

पर मुझे डूबने को तेरी मदभरी नज़र ही काफी है।

कागज़ों के क़ब्रिस्तान में लफ़्ज़ों का क़फ़न ओढ़ें लोग,

पर मेरे मन के पगले को ढाई आखर ही काफी है।

जब धूप के तूफान होंगे या बारिशों का शोर होगा

तिनका भर भी छत मिले तो तुझ सा दिलबर ही काफी है।

कैसी पूजा,कैसा सजदा,क्या गिरजा है क्या बुतख़ाना,

उल्फ़त के फूल चढ़ाने को ये तेरा दर ही काफी है॥

 

ग़ज़ल

लड़खड़ाती चाँदनी है,कँपकँपाती रोशनी है।

रात भर कोई जला है,तब सुबह दिलकश बनी है।

पतझरों का नाम लेके,अब बहारें खोजनी हैं।

मंज़िलों से क्या गिला जब,रास्तों से दुश्मनी है।

चोट पर मिट्टी चढ़ा दो,ये अदा भी सीखनी है।

जुगनुओं से जी भरेगा,तितलियाँ फिर देखनी हैं।

राह कोई और देखो,भाग्य से मेरी ठनी है।

दायरा मत पूछ इसका,छाँव देखो क्या घनी है।

धूप के टुकड़े उठा दो,मुन्तज़िर अब चाँदनी है।

भूल जा ज़ेरो-ज़बर को,जब निगाहें बाँचनी हैं।

खुशबुओं में कैद हो कर,क्या बहारें देखनी हैं।

सिसकियों की आँच हमको,रात भर ख़ुद सेंकनी है।

आप कुंदन हो चले हम,साँस कोई धौंकनी है।

जोश आमादा हुआ है,ये हवाएँ रोकनी हैं।

पायमाली और क्या है,रोटियाँ बस बेलनी हैं।

दीवटों पर है उदासी,बस तुम्हारी रोशनी है।

जो हमारा नाम लेगा,बाँह उसकी थामनी है।

हम ग़ज़ल की छाँव में हैं,धूप तुमको तापनी है।

शेर लिखती सो गई है,ये 'रवि' की लेखनी है॥

 

मुक्तक

1. कसम जीवन बिताने की सफ़र में टूट जाती है,

कभी दिन जो सँवरते हैं तो रातें छूट जाती हैं।

कहानी में हमारी क्या अजब ये मोड़ आया है,

कभी मैं मान जाता हूँ कभी तू रूठ जाती है॥

 

2. समन्दर की पनाहों में घटाएँ आज प्यासी हैं,

बहारों की पुकारों में कहीं चुभती ख़ला सी है,

कोई तो बात है दिलबर तुम्हारी शोख बातों में,

मुहब्बत तू नहीं मेरी मगर तुझ बिन उदासी है॥

 

3. जिसे छू ले तू आँखों से गुलो-गुलज़ार हो जाए,

नज़र वालों की दुनिया पे तेरा अधिकार हो जाए।

मेरी ख़ुद्दार फ़ितरत को कपट भर मानने वाले,

कहीं ऐसा हो तुझको मुझी से प्यार हो जाए॥

 

4. झलक भर प्यार मिल जाए वहीं मंदिर बना लेना,

किसी की आह को अपनी निगाहों में छुपा लेना।

खुशी की खोज में कितना,कहाँ तक दौड़ पाओगी,

प्रिये,जो सामने है बस उसे मन में सजा लेना॥

 

5. कभी ख़ामोशियों में भी बड़ा व्यापार होता है,

कहीं गाती निगाहों में व्यथा का भार होता है।

मुहब्बत नाम जिसका है बड़ी बहरूपिया शय है,

तमाशा हम दिवानों का सरे-बाज़ार होता है

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रवि प्रकाश

(प्रवक्ता हिन्दी)

ग्राम डाकघर-झड़ग

तैहसील-जुब्बल ज़िला-शिमला

हिमाचल प्रदेश-171206

दूरभाष-9318748000

7 blogger-facebook:

  1. गाँव भर क रहगुज़र म दूर तक हलचल न हो, मैकदा भी अनमना हो जाम हो छलछल न हो bhai wah

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  5. akhilesh chandra srivastava1:51 pm

    ravi ji ki rachnaye sir ke uper se gujar gayeen vo exactly kya kahna chahten hain samazh nahi paya shayad aur logonko aya hoga kavita ke bhav spasht hone chahiye

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  6. Theek kaha.Lekin kavita ke bhav yadi aap spasht karne ki neeyat se dekhenge to zarur spasht ho jayenge. aur gazal ka to har sher apne aap me mukt hota hai. mere mitra shayad hain.kisi filmi geet ki talash mein hain. by the way thanks.

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