शनिवार, 29 जून 2013

डाक्टर चंद जैन "अंकुर " की कविता - माँ और मैं

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शरीर और आत्मा के योग से जीवन का निर्माण हुआ है । माता ,पिता माध्यम है किसी भी जीव के अवतरण का, पर जन्म देने वाला माँ है और जन्म लेने वाला "मैं" है । माँ और मैं के उभय से ही चेतना का प्रसार हुआ है, माँ ने ही जीवन को संभव बनाया है इसलिए माँ परम है और उसे व्यक्त करने वाला मैं है। " मैं " आदि है और माँ अनंत है अतः अनंत के गोद में आदि पलता है ,फलता और फैलता है । जब शिशु जन्म लेता है तो रोता है क्योकि माँ के नौ महीनों के योग का आनंद से ,अचानक रिश्ता टूट जाता है । अनंत के वात्सल्य से ही आदि का उदभव हुआ है । अनंत और आदि के सम्बन्ध कण कण में समाया है ,जड़ चेतन में समाया है । इसी , उभयता से सारे जीव जगत ,सारा विश्व समृद्ध हुआ है । "मैं "अनेकता में एकता का प्रतीक है, इसलिए शाश्वत है । मेरी कविता माँ और मैं, स्व उभय के निर्माण का गीत है, स्वयं में डूबने का गीत है । सबमें अपने मैं का दर्शन करने की आकांक्षा से ओतप्रोत है,और यही जीवन का उद्देश्य है । कैसा है , हम सब का पूर्वज याने ओ प्रथम "मैं "जो अनंत के गर्भ से जन्म लिया था , ओ प्रथम चेतना जिसका प्रसार सारा विश्व है ,मैं "अंकुर "उसका केवल अंश मात्र हूँ । अनुभूति की आकृति नहीं होती ,लेकिन जो द्वेष मुक्त प्रेम है यही "मैं " की सत्य अनुभूति है ,और यही हर मैं को कर्त्तव्य के लिये प्रेरित करता है । उस "मैं "के प्रेरणा से ही ये कविता लिख पा रहा हूँ , मैं आप सब रचनाकार के पाठकों के आशीर्वाद की आकांक्षा लिये प्रस्तुत है ।

 

माँ और मैं

स्व उभय निर्माण का गीत लिखता मैं कवि

मैं हि मेरे साथ जीता और मरता मैं कवि

दूर से आया मुसाफिर अनजान है मंजिल अभी

आँख का ऐनक लगाये “मैं“ ही देखे जग हंसी

जग हँसा था, मैं था रोया,न जानें मैंने क्या ? था खोया

फिर से पाना है ,उसीको जो था खोया , मैं कवि

स्व उभय निर्माण का गीत लिखता मैं कवि

मैं हि मेरे साथ जीता और मरता मैं कवि

क्या है बचपन क्या जवानी क्या बुढापा आयेगी

आने वाला है मुसाफिर ,क्या? जिन्दगी रुख पायेगी

जब तक न बदले माने "अँकुर "तब तक" तू "केवल भीड़ है

रुक न कुछ पल रुक न अपने साथ जी ले ये कवि

स्व उभय निर्माण का गीत लिखता मैं कवि

मैं हि मेरे साथ जीता और मरता मैं कवि

दर्द का रिश्ता है “अंकुर “गम ,ख़ुशी संग कौन जीता

जिस्म है केवल बहाना, जिन्दगी एहसास है

मैं ही मैं से युद्ध करता चाहे लड़ता हो कोई

“माँ “ के आँचल में छिप कर सत्य लिखता मैं कवि

स्व उभय निर्माण का गीत लिखता मैं कवि

मैं हि मेरे साथ जीता और मरता मैं कवि

“मैं “उभय है “मैं “अभय है “मैं” ही पहला तत्व है

“मैं “ से सारा जग है फैला कौन कहता ” मैं ” नहीं

तू भी “मैं” है ,मैं भी “मैं” है ,वो भी “मैं” है, वे सब भी “मैं” की भीड़ है

“मैं “ से मिल कर “हम” है बनता “माँ “जगत जंजीर है

स्व उभय निर्माण का गीत लिखता मैं कवि

मैं हि मेरे साथ जीता और मरता मैं कवि

माँ से पहले “मैं “ही उपजा ,माँ जगत की मूल है

“मैं “ही नारी “मैं”ही पौरुष “मैं “से सारा लिंग है

“मैं “ही मौला “मैं “ही मुरशिद “मैं “अली अल ब्रम्ह है

“मैं “ही पहला बीज “अंकुर “ ”मैं” से फैला सर जमीं

स्व उभय निर्माण का गीत लिखता मैं कवि

मैं हि मेरे साथ जीता और मरता मैं कवि

“मैं” हि उर्जा “मैं “ हि कुदरत “मैं “हि अल्ला नूर है

माँ भुवन में “मैं “ ही रहता “मैं “ही रचता रूह है

“मैं “ से पहले “माँ” है “अंकुर “तभी तो “मैं “उदभूत है

माँ भंवर के बीच रक्षित विश्व में रहते सभी

स्व उभय निर्माण का गीत लिखता मैं कवि

मैं हि मेरे साथ जीता और मरता मैं कवि

“मैं” ही स्व का स्वर है अंकुर ,”मैं “ही स्व का सत्य है

“मैं” ही रहता साथ मेरे “तू “बदलता हर वक्त है

“वह “तो दूरी है बनाये “वे “ तो ’’’’’’’’’’’’’’’’बहुत दूर है

पर “मैं “ही सब में सत्य बन कर हर वक्त रहता है नबी

स्व उभय निर्माण का गीत लिखता मैं कवि

मैं हि मेरे साथ जीता और मरता मैं कवि

“मैं” ही बदले देह “अंकुर” हर मैं भी माँ का अंश है

नव रूप में माँ रस भरा है शुन्य में माँ राज़ है

माँ के रस में विश्व फैला माँ जगत का सार है

हर नाम के अंदर है बैठा एक "मैं " ओंकार है

 

डाक्टर चंद जैन "अंकुर "

रायपुर छ. ग. mob.98261-16946

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