साताप्पा लहू चव्हाण का आलेख - विष्णु प्रभाकर और वर्तमान रचनाधर्मिता

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साक्षात्कार द्वारा अभिव्यंजित साहित्यकार विष्णु प्रभाकर और वर्तमान रचनाधर्मिता - डॉ. साताप्पा लहू चव्हाण Email : drsatappachavan@gmail.com ...

साक्षात्कार द्वारा अभिव्यंजित साहित्यकार विष्णु प्रभाकर और वर्तमान रचनाधर्मिता
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- डॉ. साताप्पा लहू चव्हाण
Email : drsatappachavan@gmail.com 

 


‘‘ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोय।
तन-मन को शीतल करे औरन को सुख होय।।’’ १
                    - महात्मा कबीर

‘‘वाक्-संयम विश्व मैत्री की पहली सीढी है।’’२
                    - जयशंकर प्रसाद

    ‘‘आज की स्थितियाँ भले ही उद्भ्रांत करती हों, पर मैं हार नहीं मानूँगा। मुझे वर्तमान परिवेश से कतई अफसोस नहीं है। मेरी आस्था अभी जीवित है। स्नेह मेरी पूँजी है और यही मेरे लेखन का आधार है’’३
                    - विष्णु प्रभाकर

    उपर्युक्त विचार वर्तमानकालीन परिस्थितियों में उपयुक्त नजर आते है। ‘साक्षात्कार’ विधा पत्रकारिता के साथ - साथ साहित्य के क्षेत्र में भी अपना विशेष स्थान पा चुकी है। इसे मानना होगा। साहित्यिक साक्षात्कार का अपना अलग मंच है।
वर्तमानकालीन साहित्यकारों को प्रेरणा देने का महत्त्वपूर्ण कार्य  ‘साक्षात्कार’ विधा ने किया है। मूर्धन्य साहित्यकारों के व्यक्तित्व एवं् कृतित्व का अनुसंधान करते समय अनेक अनुसंधाताओं ने ‘साक्षात्कार’ विधा का आधार लिया है। इसमें दो राय नहीं। डॉ. रणवीर रांग्राजी का मत दृष्टव्य है, ‘‘इंटरव्यू में उत्तर का महत्त्व तो होता ही है, पर प्रश्न का महत्त्व भी कम नहीं  होता, क्योंकि वही तो उस उत्तर-विशेष का प्रेरक - उद्दीपक बनता है। अपने उत्तर के माध्यम से इंटरव्यू देने वाला साहित्यकार और उसका अंतरंग तो खुलता ही है, अपने प्रश्नों में प्रश्नकर्ता और उसकी अपनी समझ, पक़ड सामथर्य भी झलक जाती है। वास्तव में, न तो प्रश्न अपने - आप में पूर्ण होता है और न उत्तर ही। दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हैं, दोनों मिलकर ही इंटरव्यू देनेवाले के व्यक्तित्व और विषय को खोलते हुए अभीष्ट लक्ष्य की ओर ब़ढते हैं।’’४ कहना आवश्यक नहीं कि लोकचेतना के चितेरे

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मूर्धन्य साहित्यकार विष्णु प्रभाकरजी अपने साक्षात्कार के दौरान अभीष्ट लक्ष्य की ओर ब़ढते हुए वर्तमान परिस्थिती पर तिखा प्रहार करते हैं। साक्षात्कार के समय विष्णु प्रभाकर सिर्फ भाव-भावनाओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत नहीं करते बल्कि वर्तमान परिवेश का सच सामने रखते हुए परिलक्षित होते है। कहना ठिक होगा कि साहित्यकार विष्णु प्रभाकर सकारात्मक सोच के पक्षधर थे।

    आत्मतत्त्व, धीर और स्नेह को अपनाकर वर्तमानकालीन उद्भ्रांत परिस्थिती पर भी विजय पाने का उनका आशावाद वर्तमान साहित्यकारों को प्रेरणाप्रद रहेगा। इसे नकारा नहीं जा सकता। विष्णु प्रभाकरजी के अनेक साक्षात्कार प्रकाशित हो चुके है। से.रा. यात्री, रामदरश मिश्र, डॉ. रणवीर रांग्रा, मुलतान (पाकिस्तान) में जन्मे बलदेव वंशी, डोगरी की मूर्धन्य रचनाकार पद्मा सचदेव आदि साहित्यकारों द्वारा लिए गए साहित्यकार विष्णु प्रभाकर के साक्षात्कार वर्तमान कालीन भारतीय साहित्यकारों के लिए निश्चित रुप में पथदर्शक सिद्ध होंगे।

    ‘‘हिंदी में इंटरव्यू की शुरुवात हिंदी - मासिक ‘समालोचक’ के सितंबर १९०५ के अंक में ‘संगीत की धुन’ शीर्षक के अंतर्गत प्रकाशित महान संगीतज्ञ विष्णु दिगंबर पलुस्कर से चंद्रधर शर्मा गुलेरी की भेटवार्ता से मानी जाती है। पर पहला साहित्यिक इंटरव्यू  ‘विशाल भारत’  के जनवरी, १९३२ के अंक में ‘प्रेमचंद के साथ दोन दिन’ शीर्षक से प्रकाशित बनारसीदास चतुर्वेदी द्वारा लिया गया प्रेमचंद का इंटरव्यू माना जाता है।’’५

    निराला, डॉ. पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’, गुलाबराय, रामनरेश त्रिपाठी, अज्ञेय, महादेवी वर्मा, देवेंद्र सत्यार्थी, रणवीर रांग्रा, डॉ. माजदा अझद, डॉ. रामविलास शर्मा, अक्षय कुमार जैन, मनोहर श्याम जोशी, विष्णुचंद्र शर्मा, हिमांशु जोशी, सुरेंद्र तिवारी, लक्ष्मीचंद्र जैन, शरद देव़डा आदि साहित्यकारोंने लिए अनेक विद्वजनों के साक्षात्कार पुस्तक रुप में और पत्र-पत्रिकाओं में प्राप्त होते हैं। ‘‘विष्णु प्रभाकर की पुस्तक ‘कुछ शब्द : कुछ रेखाएँ’ में थाई साहित्यकार फायां का इंटरव्यू भी सम्मिलित है। इसके अलावा शरत् के संपर्क में आए अनेक व्यक्तियों से भी उन्होंने दूर-दूर तक घूम-फिर कर इंटरव्यू लिए जिनका उपयोग उन्होंने अपनी पुस्तक ‘आवारा मसीहा’ में यथास्थान किया है।’’६  कहना आवश्यक नहीं कि स्वतंत्रता-पूर्व और स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद वर्तमान

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इक्कीसवीं सदी तक के साहित्यकारों ने साक्षात्कार’ विधा को अपनाया है। साहित्यकार विष्णु प्रभाकर का साक्षात्कार द्वारा आभिव्यंजित व्यक्तित्व वर्तमान रचनाधर्मिता के लिए मार्गदर्शक तत्त्व बन चुका है। इसे मानना होगा। विष्णु प्रभाकर अंतःप्रज्ञा को अपनाने वाले साहित्यकार थे। जनसाधारण को लढने की प्रेरणा देना उनका उद्देश्य था। विष्णु प्रभाकरने अपने जीवन में खुद को अपूर्ण माना और पूर्णत्व की खोज में सफल जीवन जीते रहें। बिल्कुल अभिव्यंजना की तरह। ‘‘अभिव्यंयजना एक आत्मिक क्रिया है, जिसे उपादान प्रकृति के माध्यम से पूर्णतः व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह अभिव्यक्ति हमेशा ही अपूर्ण रहेगी’’७  कहना सही होगा कि विष्णु प्रभाकर के अपूर्ण जीवन को ‘साक्षात्कार’ विधाने पूर्णरूप दिया हुआ पर्याप्त मात्रा में दृष्टिगोचर होता है।

    विष्णु प्रभाकरजी के साक्षात्कार एक अनुसंधाता के रुप में प़ढने के अपरांत साहित्यिक विष्णु प्रभाकरजी का बहुआयामी व्यक्तित्व सामने आया -

जीवन-मूल्यों से लगाव -
    चिंतन और कर्म में समानता रखना मानों विष्णु प्रभाकरजीने अपने जीवन का मूलमंत्र बनाया था। प्रभाकरजी के ‘साक्षात्कार’ प़ढने के बाद यह बात पहले सामने आती है। वर्तमान समय के अनेक साहित्यकार प्रभाकरजी की इसी परंपरा को आगे ब़ढाना चाहते हैं। साहित्य क्षेत्र में अनेक दिशाएँ हैं, फिर भी प्रभाकरजी ने जीवन - मूल्यों से लगाव रखा। पद्मा सचदेव कहती हैं, ‘‘मेरे सवाल के जवाब में उन्होंने कहा पुरुष ने स्त्री को जितना दबाया उससे ज्यादा और नहीं दबा सकता. मगर स्त्री को जो आजादी मिल रही है उसके मायने उच्छृंखलता नहीं है, आजादी मर्यादा में होनी चाहिए’’८ कहना सही होगा कि साहित्यकार विष्णु प्रभाकरजी अपनी जमीन की समस्याओं का अध्ययन कर उन समस्याओं को मिटाने के लिए सतत प्रयासरत रहें।

गांधीवादी चिंतक -
    ‘‘टी हाउस - कॉफी हाउस मेरे विश्वविद्यालय है’’९ कहनेवाले विष्णु प्रभाकरजी प्रखर गांधीवादी चिंतक थे। गांधीविचारधारा को अपने जीवन के साथ-साथ नवसाहित्यकारों, पाठकों तक पहुँचाना प्रभाकरजी अपना कर्तव्य मानते थे। ‘‘जहाँ तक साहित्यिक आंदोलनों की बात है, गांधी और आजादी के लिए संघर्ष की भावना का साहित्य पर प्रत्यक्ष प्रभाव था।... प्रायः सभी लेखकों के पात्र गांधी की प्रेरणा से

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आप्लावित थे। वे देश के आजादी के लिए क्या कुछ नही कर जाना चाहते थे।’’१० विष्णुप्रभाकरजी के उपर्युक्त विचारों से ज्ञात होता है कि वे अंत तक गांधीवादी विचारधारा से जुडे रहें।

बहुआयामी और निडर व्यक्तित्व -
    विष्णु प्रभाकरजी के साक्षात्कार पाठकों को विचारशीला और कृतिशील बनने की प्रेरणा देते हैं। प्रभाकरजी का व्यक्तित्व बहुआयामी  और निडर होने के कारण साक्षात्कार के दौरान वे सहज अभिव्यक्त होते हुए परिलक्षित होते है। पत्रकार और पत्रकारिता पर अनेक वर्तमान साहित्यकार अपने विचार रखते वक्त मन में का-किंतु रखते है लेकिन वर्तमान रचनाधर्मिता को अपने विचारों से संघर्षरत रखने वाले प्रभाकरजी कहते हैं, ‘‘हमारे जमाने में पत्रकारिता एक मिशन थी और आज यह व्यवसाय बनकर रह गई है। व्यवसाय में लाभपूर्ण स्थितियों पर नजर रखी जाती है। पुराने पत्रकारों ने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। पं. बाबूराव विष्णु पराडकर, गणेशशंकर विद्यार्थी, इंद्र विद्या वाचस्पति जैसे पत्रकारों ने पत्रकारिता के मर्म को समझा था आज उस भावना का लोप हो गया है। अब पत्रकारिता में चटपटापन और प्रचार घुस गया है। अवसरवाद ने अपनी जडें जमा ली हैं।’’११ हमेशा ही विष्णु प्रभाकरजी ने अवसरवादी मानसिकता का विरोध किया है। अपने साक्षात्कार में वे वर्तमान अवसरवादी परिदृश्य को मिटाने का आवाहन करते है। कहना आवश्यक नहीं कि विष्णु प्रभाकरजी निडर व्यक्तित्व के कारण ही यह सबकुछ कर सके। आमंत्रित होने के बावजूद राष्ट्रपति भवन मे प्रवेश न मिलने के कारण उन्हें मिला ‘पद्मभूषण’ लौटा देने की बात भी निडरता का उदाहरण है।

अक्षर पुरुष -
    विष्णु प्रभाकरजी को ‘अक्षर पुरुष’ मानना उचित होगा। भारतीय वाड्मय का उनका अध्ययन साक्षात्कार पढते वक्त स्पष्ट होता है। उपन्यास, कहानी, लघुकथा, नाटक, रुपांतर, एकांकी, जीवनी - संस्मरण, आत्मकथा, कविता, यात्रा -वृत्तांत, निबंध, संपादन, बाल साहित्य, जीवनी साहित्य, पत्र - पत्रिकाओं के लिए लेखन के साथ साहित्य की हर विधा में विष्णु प्रभाकरजी ने अपना योगदान किया है। ‘‘मैं खुद ही आवारा मसीहा हूँ। घुमना बहुत अच्छा लगता है। पत्नी थी तो वो भी साथ जाती थी। हिमालय से गोमुख तक हो आये। अब वो नहीं है तो बिल्कुल ही आवारा मसीहा हो गया

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हूँ। घुम कर ही मैंने आवारा मसीहा लिखा है। जहाँ जहाँ शरत् के पात्र थे, स्थान थे, सब जगह गया। वो सभी स्थान देखने में मुझे चौदह वर्ष लगे। बर्मा, थाईलैंड, रंगून सब जगह घुमा।... चीजों की उम्र बहुत लंबी है मनुष्य की उम्र जैसी नहीं।’’१२ कहना उचित होगा कि सचमुच ही साहित्यकार विष्णु प्रभाकरजी ‘अक्षर पुरुष’ बनकर हमारे बीच आज भी उपस्थित हैं।

भाषिक चातुर्य -
    विष्णु प्रभाकरजी के पास भाषिक चातुर्य था जो साक्षात्कार लेने वाले विद्वान की सोच को आवाह्न देता परिलक्षित होता है। भाषा का सही प्रयोग, अंतर्षिषयक ज्ञान, अनुसंधानात्मक दृष्टिकोण के कारण प्रभाकरजी की भाषा पाठकों को अपनी लगती थी। ‘‘आवारगी में हमने जमाने की सैर की....’’१३ कहने वाले विष्णु प्रभाकरजी के संदर्भ में ओम निश्चल कहते हैं, ‘‘आजादी के दौर में बजते राजनीतिक बिगुल में विष्णु प्रभाकरजी की लेखनी का भी अपना एक मिशन बन गया था जो आजादी के लिए प्रतिश्रुत और संघर्षरत थी। अपने लेखन के दौर में वे प्रेमचंद, यशपाल, जैनेन्द्र, अज्ञेय, जैसे महारथियों के सहयात्री रहे, किन्तु रचना के क्षेत्र में उनकी अपनी एक अलग पहचान बनी।’’१४ कहना आवश्यक नहीं कि भाषिक चातुर्य के कारण विष्णु प्रभाकरजी के साक्षात्कार आदर्श साक्षात्कार बने।

भारतीय जनमानस का चितेरा -
    वर्तमान रचनाधर्मिता में दलनीति, गुटनीति का प्रभाव परिलक्षित होता है। विष्णु प्रभाकरजी को इसका दुख था। वे भारतीय जनमानस के साथ, अच्छे नवलेखकों के साथ, पाठकों के साथ अपने - आपको जुडे रखते थे। उनके साक्षात्कार भी आम भारतीय जनमानस का चित्रण करते हुए परिलक्षित होते है। ‘‘एक पूरी शताब्दी की हलचल को अपने भीतर समेटे विष्णुजी के निकट बैठें तो उनके चेहरे पर एक निष्काम आभा तैरती नजर आती थी। यश, धन, लोभ तथा मानवीय दुर्बलताओं से बहुत हद तक अछूते विष्णु जी पाठकों के पत्रों का मनोयोग से जवाब लिखते हुए देखे जा सकते थे।’’१५ साहित्यकार विष्णु प्रभाकरजी ने भारतीय जनमानस को केंद्र में रखकर ही अपना साहित्यविश्व समृद्ध किया। इसमें दो राय नहीं।


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निष्कर्ष -
    साक्षात्कार द्वारा अभिव्यंजित साहित्यकार विष्णु प्रभाकर और वर्तमान रचनाधर्मिता का सिंहावलोकन करने से पता चलता है कि विष्णू प्रभाकर जी ‘वाणी’ और ‘लेखनी’ का नम्रतापूर्वक प्रयोग करने वाले सफल साहित्यकार के रुप में परिलक्षित होते हैं। साहित्यिक साक्षात्कार शृंखला में साहित्यकार विष्णु प्रभाकर जी के साक्षात्कार जीवंतता की अनुभूति देते हैं। सहज अभिव्यंजना के कारण प्रभाकरजी के साक्षात्कार प्रश्नकर्ता और पाठक दोनों के मन में अपना विशिष्ट स्थान पाते नजर आते हैं। वर्तमान रचनाधर्मिता का विचार किया जाय तो किसी हेतु को केंद्र में रखकर साक्षात्कार लिए और दिए जाते है लेकिन लोकचेतना के चितेरे मूर्धन्य साहित्यकार विष्णु प्रभाकरजी अपने साक्षात्कार के दौरान अभीष्ट लक्ष्य की ओर बढते हुए वर्तमान परिस्थिती पर तिखा प्रहार करते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। प्रश्नकर्ता को आनंद देनेवाले विष्णु प्रभाकरजी के साक्षात्कार वर्तमान परिवेश का सच भी सामने रखते हुए परिलक्षित होते हैं। आत्मतत्त्व, धीर और स्नेह को अपनाकर वर्तमान उद्भ्रांत परिस्थिती पर भी विजय पाने का उनका आशावाद वर्तमान कालीन साहित्यकारों को प्रेरणाप्रद रहेगा। इस नसकारा नही जा सकता। साहित्यकार विष्णु प्रभाकरजी का साक्षात्कार द्वारा अभिव्यंजित व्यक्तित्व वर्तमान रचनाधर्मिता के लिए मार्गदर्शक तत्त्व बन चुका है। इसे मानना होगा।

    विष्णु प्रभाकरजी के साक्षात्कार एक अनुसंधाता के रुप में पढने के उपरांत साहित्यिक विष्णु प्रभाकरजी का बहुआयामी व्यक्तित्व सामने आया। चिंतन और कर्म में समानता, जीवनमूल्यों से लगाव, गांधीवादी विचारधारा का स्रोत, बहुआयामी और निडर व्यक्तित्व, साक्षात अक्षर पुरुष का रुप, भाषिक चातुर्य और भारतीय जनमानस के सफल चितेरे के रुप में अपने साक्षात्कार के दौरान विष्णु प्रभाकरजी दृष्टिगोचर होते है।  वर्तमान परिस्थिती एवं रचनाधर्मिता के संदर्भ में विचार करने पर ज्ञात होता है कि प्रभाकरजी के साक्षात्कार अत्यधिक प्रासंगिक लगते है। इस में दो राय नहीं।

संदर्भ - संकेत -
१.    जमनालाल बायती - साक्षात्कार कैसे दें, पृष्ठ,२०
२.    वही, पृष्ठ २०
३.    संपा. त्रिलोकनाथ चतुर्वेदी - साहित्य अमृत (मासिक), जून, २००९, पृष्ठे,४५
४.    संपा.वीरेंद्र सक्सेना - भाषा (द्वैमासिक) नंवबर-दिसंबर,१९९४, पृष्ठ,४३
५.    वही, पृष्ठ, ४५
६.    वही, पृष्ठ, ४९
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७.    डॉ. अमरनाथ - हिंदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, पृष्ठ ४३
८.    संपा. राजेंद्र यादव - हंस (कथा मासिक) अक्टूबर, १९८६, पृष्ठ,१४
९.    संपा. त्रिलोकनाथ चतुर्वेदी - साहित्य अमृत (मासिक), जून, २००९, पृष्ठ,७४
१०.    वही, पृष्ठ,३०
११.    वही, पृष्ठ,३२
१२.    संपा. राजेंद्र यादव - हंस (कथा मासिक) अक्टूबर, १९८६, पृष्ठ, १४
१३.    वही, पृष्ठ,१२
१४.    ु.ीहरलवीीळक्षरप.लश्रेसीेिीं.ळप ऊरींशव १२ चरू, २००९.
१५.    वही, ऊरींश १२ चरू, २००९.

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डॉ. साताप्पा लहू चव्हाण
सहायक प्राध्यापक
स्नातकोत्तर हिंदी विभाग,
अहमदनगर महाविद्यालय,
अहमदनगर ४१४००१.(महाराष्ट्र)
चेल - ०९८५०६१९०७४
ए-ारळश्र - वीीरींर`िरिहर्रींरपऽसारळश्र.लेा.

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रचनाकार: साताप्पा लहू चव्हाण का आलेख - विष्णु प्रभाकर और वर्तमान रचनाधर्मिता
साताप्पा लहू चव्हाण का आलेख - विष्णु प्रभाकर और वर्तमान रचनाधर्मिता
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