रविवार, 28 जुलाई 2013

राजीव आनंद का आलेख - मुंशी प्रेमचंद की प्रासंगिकता 29 जुलाई जन्‍म दिवस पर विशेष

मुंशी प्रेमचंद की प्रासंगिकता 29 जुलाई जन्‍म दिवस पर विशेष

29 जुलाई 1880 को बनारस के निकट लमही ग्राम में अजायब राय के घर जन्‍में धनपत राय आठ वर्ष के उम्र में ही अपनी माँ को खो दिया․ पिता ने दूसरा ब्‍याह कर लिया, सौतेली माँ क्‍या होती है इसका कटु अनुभव उन्‍हें बचपन से ही था․ अपनी माँ के याद में धनपत राय तड़प-तड़प कर बड़े हुए․

समाजिक कुरीतियों के प्रति धनपत राय का विद्रोही स्‍वभाव की एक बानगी थी उनका शिवरानी नामक एक विधवा से दूसरा विवाह तब करना जब समाज में विधवा विवाह का विरोध चंहुओर होता था․ विधवा से विवाह कर उन्‍होंने समाज में होने वाली उस क्रांति का संकेत दिया जिसमें सधवा-विधवा का ध्‍यान न रखकर युवक-युवती एक-दूसरे से विवाह के बंधन में बंध जायेंगे․

नबाब राय के नाम से पहले प्रेमचंद कई रचनाएं की जिसमें 1907 में पांच कहानियों का संग्रह ‘सोजे वतन' के नाम से प्रकाशित हुआ जिसमें देशप्रेम की रचनाएं होने के कारण अंग्रेज सरकार ने इसे जब्‍त कर लिया․ 1918 में प्रेमचंद ने ‘असरारे मआविदा' नामक उपन्‍यास लिखा․ प्रेमचंद की पहली हिन्‍दी कहानी ‘पंच परमेश्‍वर' सन्‌ 1916 में प्रकाशित हुई और अंतिम कहानी ‘कफन' सन्‌ 1936 में प्रकाशित हुई․ इस काल को प्रेमचंद युग कहा जाता है यद्यपि सन्‌ 1930 से 1936 ई․ तक का कालखंड़ प्रेमचंद की कहानी कला का उत्‍कर्ष काल है․ किसी अन्‍य कथाकार ने जीवन के इतने व्‍यापक फलक को अपनी कहानियों में नहीं समेटा जितना प्रेमचंद ने․ अपने जीवन काल में प्रेमचंद लगभग 300 कहानियों की रचना की जो ‘मानसरोवर' के आठ खंड़ों में प्रकाशित हुई․ प्रेमचंद की कहानियों में जीवन के यथार्थ का चित्रण एवं मनोवैज्ञानिक विशलेषण किया किया गया है․ प्रेमचंद की कहानियों में सच्‍चाई का नग्‍न रूप देखने को मिलता है․ इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रेमचंद लिखित तीन सौ कहानियों को हदय से पढ़ जाने के बाद कोई भी उच्‍च कोटि का कथाकार बन सकता है․ कथाकार बनने के लिए प्रेमचंद की तीन सौ कहानियों का पाठ्‌यक्रम काफी है․ इस मायने में प्रेमचंद को ‘कहानियों का विश्‍वविद्यालय' कहने में कोई अतिशियोक्‍ति नहीं होगी․ प्रेमचंद की कहानियों में पंच परमेश्‍वर, आत्‍माराम, बूढ़ी काकी, गृहदाह, परीक्षा, नशा, बड़े भाई साहब, ठाकुर का कुंआ, सवा सेर गेंहू, ईदगाह, शतरंज के खिलाड़ी, कजाकी, माता का हदय, लाटरी, सुजान भगत, पूस की रात और कफन आदि है․ प्रेमचंद के उपन्‍यासों में प्रमुख सेवा सदन, प्रेमाश्रय, निर्मला, प्रतिज्ञा, रंगभूमि, कायाकल्‍प, गबन, कर्मभूमि तथा उनके जीवन का सर्वश्रेष्‍ठ कृति गोदान आदि है․ प्रेमचंद का अंतिम उपन्‍यास ‘मंगलसूत्र' है जो अधूरा रहा जिसके सत्‍तर पृष्‍ठों से ऐसा प्रतीत होता है कि अगर यह उपन्‍यास पूरा किया गया होता तो प्रेमचंद की आत्‍मकथा होता․ 18 जून 1936 को रूस के महान साहित्‍यिकार मैक्‍सिम गोर्की के निधनपर अपने श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद 18 अक्‍टूबर 1936 को प्रेमचंद स्‍वयं इस संसार से विदा हो गए․

आज से लगभग एक सौ वर्ष पूर्व अपने जीवन का सर्वश्रेष्‍ठ कृति ‘गोदान' की रचना प्रेचंद ने किया जो अपने युग का प्रतिबिम्‍ब ही नहीं अपितू आने वाले युग में होने वाली कांति की भी रूपरेखा प्रस्‍तुत करता है․ प्रेमचंद अपने युग के प्रतिनिधि साहित्‍यकार थे और गोदान उनकी प्रतिनिधि रचना है․ गोदान भारतीय किसानों की सशक्‍त गाथा है․ जहां तक गोदान की प्रांसगिकता का प्रश्‍न है तो भारत आज भी कृषि प्रधान देश है जहां की अधिकांश जनता गांवों में रहती है तथा किसान भारत की रीढ़ है और गोदान किसानों अर्थात ग्रामीण जागृति की कहानी है․ कृषि प्रधान देश भारत की जनता का प्रतिनिधित्‍व होरी करता है और होरी की समस्‍याएं भारत की समस्‍याएं है․ गोदान सम्‍मिलित रूप में भारतीय जन-जीवन को समग्र रूप में प्रस्‍तुत करता है․ प्रेमचंद अपने उपन्‍यास गोदान के माध्‍यम से भारतीय किसान के प्रति न सिर्फ करूणा उत्‍पन्‍न करने में सफल हुए है अपितु किसानों की वर्तमान दशा पर सोचने-विचारने को बाध्‍य भी करते है․ इस दृष्‍टिकोण से गोदान को भारतीय ग्रामीण जीवन का ही नहीं अपितु भारतीय राष्‍द्रीय जीवन की प्रतिनिधि रचना मानी जानी चाहिए जिसकी प्रांसागिकता आज भी उतनी ही है जितनी प्रेमचंद युग में थी․

गोदान में प्रेमचंद ने अपने युग को प्रतिबिम्‍बित करने के साथ-साथ आने वाल युग में होने वाली क्रांति को भी पहचाना है․ प्रेमचंद की दूरदर्शिता एवं संवेदनशीलता ने अगामी युग की आहट को पहचानकर उपन्‍यास में नयी पीढ़ी की विचारधारा और परम्‍परा-विरोधी कार्यों का चित्रण भी प्रस्‍तुत किया है․ गोदान में दो पीढि़यों का संघर्ष पूरी शक्‍ति और सजीवता के साथ अंकित किया गया है․ इस संघर्ष के माध्यम से प्रेमचंद ने उस क्रांति की सुगबुगाहट का संकेत दिया है जिसकी पहचान उनके संवेदनशील कानों को सुनायी देने लगी थी और सजग मस्‍तिष्‍क ने रूपरेखा तैयार कर दिया था․ गोदान भारतीय जीवन के सम्‍पूर्ण स्‍वरूप को अंकित करता है तथा हिन्‍दी की औपन्‍यासिक रचना को प्रतिनिधि महाकाव्‍योपन्‍यास की संज्ञा से विभूषित किया जाए तो निसंदेह वह गोदान' ही है

राजीव आनंद

सेल फोन - 9471765417

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  1. राजीव आनंद जी,
    प्रेमचंद की जन्मतिथि 29 जुलाई नहीं 31 जुलाई 1880 है. उनकी कहानियों का फलक 1930 से 1936 तक का नहीं 1916 से 1936 तक का समय विस्तार है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. राजीव आनंद जी,
    प्रेमचंद की जन्मतिथि 29 जुलाई नहीं 31 जुलाई 1880 है. उनकी कहानियों का फलक 1930 से 1936 तक का नहीं 1916 से 1936 तक का समय विस्तार है.

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