नूतन प्रसाद शर्मा का व्यंग्य - गांव के भगवान

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  दुनिया में भाई भतीजावाद की बीमारी को नष्ट करने की कोशिश की जा रही है मगर मैं ऐसा हूं कि पारिवारिक संबंध को सुदृढ़ बनाने पर तुला हुआ हूं. ...

 

दुनिया में भाई भतीजावाद की बीमारी को नष्ट करने की कोशिश की जा रही है मगर मैं ऐसा हूं कि पारिवारिक संबंध को सुदृढ़ बनाने पर तुला हुआ हूं. कई महानुभावों क ी कड़ी आपत्ति के बावजूद प्रतिष्ठित व्यक्तियों से दादा, चाचा के रिश्ते जोड़ लिए हैं. जब लोग धर्मबहन बनाकर बाद में धर्मपत्नी बनाने से नहीं चूकते तो मेरे भी इस पुनीत कार्य में गहरा राज होगा ही.

जिनका यश - वर्णन करने अभी बैठा हूं. वे पिता के साले याने मेरे मामा हैं. उनसे मामा का सम्बन्ध उसी दिन जुड़ा जिस दिन उन्होंने सरपंच पद संभाला. इससे पहले पोता भी मानना अस्वीकार था. उनके संबंध में फिलहाल एक लेख ही तैयार कर रहा हूं बाद में पाठकों की टिप्पणी देखकर महाकाव्य या उपन्यास लिखूंगा. जब बाल्मीकि ने अपने मित्र दशरथ के पुत्र को लोकनायक सिद्ध करने के लिए एक बड़ी पोथी ही लिख डाली,अपने राज्य को ही स्वराज कहने वाले तथा दूसरों राज्यों को लूटने वाले शिवाजी को इतिहास कारों ने राष्ट्रीय महापुरुष के पद पर विभूषित कर दिया तो अपने प्यारे मामा को राष्ट्रीय स्तर का नहीं तो प्रांतीय स्तर के श्रेष्ठ नेता प्रमाणित करने के लिए उनकी प्रसंशा में चार चांद लगाऊंगा ही.

मंगलाचरण के पश्चात उनके दयालु स्वभाव की चर्चा करना चाहता हूं -वे दीन दुखियों के अनन्य सेवक हैं. एक बार उन्हें सूचना मिली कि शासन निराश्रितों को सहायता बतौर रुपये देने वाला है. उन्होंने अपने ग्राम पंचायत क्षेत्र में असहाय व्यक्ति ढूंढे लेकिन मिले ही नहीं. अंत में सोचा कि मैं पंचों की राय के बिना कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं कर सकता. शिक्षक,  पंचायत सचिव, तथा कोटवार तक वेतन भोगी हैं लेकिन शासन मुझे एक पैसा भी नहीं देता. मुझसे बढ़कर गरीब और दुखी कौन है. फिर क्या था, वे निराश्रितों को बांटने के लिए आये रुपयों से अपनी गरीबी हटाने लगे.

मुख्यमंत्री विधानसभा में दहाड़ते हैं तो मामा जी ग्राम पंचायत भवन में. किसी पंच में इतनी हिम्मत नहीं कि उनके खिलाफ आवाज उठा सके. एक बार कुछ पंचों ने उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव रखने का दुस्साहस किया. मामा जी ने तत्काल केन्द्रीय नेताओं  के कदमों का अनुशरण किया. जो पंच पैसों के बल पर बिक सकते थे उन्हें उचित मूल्य में खरीदा और जो ऐंठबाज थे उन्हें लठैतों के द्वारा पिटाई दिलाई लेकिन अंत में दो तिहाई मत अर्जित करके ही रहे. जिन पंचों ने उनकी पवित्र आत्मा को ठेस पहुचाई थी उन्हें ऐन - केन प्रकारेण पंच पद से निकलवा दिया. तभी उनकी टेढ़ी हुई भृकुटि सीधी हुई. साम दाम दण्ड भेद के सच्चा पालनकर्त्ता होने के कारण मार्कण्डेय की तरह सरपंच पद पर अमर रहने की प्रबल संभावना है.

पारिवारिक झगड़े हो या जमीन संबंधी झगड़े, उन्हें वे विद्वान न्यायाधीश की तरह सुलझा कर रहते हैं. दो भाई थे. उनके पास १ हेक्टेयर जमीन थी. वे जमीन को आपस में बांटना चाहते थे लेकिन बराबर बंट नहीं पाती थी. वे न्याय कराने मामा जी के पास आये. मामाजी न्यायी तो है ही. उन्होंने तीन तीन हेक्टेयर दोनों भाईयों को दे दी. बाकी जमीन अपने पास रख लिया. भाईयों ने आपत्ति की तो मामा जी ने एक कहानी बतायी- दो बिल्लियां थी. उनके पास कुछ रोटियां थीं. वे भी तुम्हारी तरह बंटवारा चाहती थीं. लेकिन वे ठीक से नहीं बांट सके तो वे एक बंदर के पास पहुंचे. बंदर ने त्रेतायुग का तराजू निकाला और रोटियां तौलने लगा. जिस पलड़े की ओर भार अधिक होता उधर की रोटी वह खा जाता. कभी एक पलड़ा भारी होता तो कभी दूसरा. इसी तरह उसने सभी रोटियां खा ली. बिल्लियां रोती हुई वापस हुई.

कहानी समाप्त कर मामा ने लाल आंखें दिखाते हुए कहा - जब बंदर ने न्याय के नाम पर पूरी रोटियां हजम कर ली फिर मैं मनुष्य हूं . फिर भी दयावश तुम्हें जमीन दे दी. बोलो और कुछ कहना हैं.
मामाजी की जुबान ही कानून है. भागते भूत की लंगोटी ही सही , ऐसा सोचा दोनों भाईयों ने अपनी राह पकड़ ली.

मामाजी श्रमिकों के पक्षपाती हैं. वे उनके हितों का ध्यान बगुलों की तरह रखते हैं. वे मजदूरों के स्वास्थ्य सुधार के लिए उनसे ब्रह्म मुहूर्त से लेकर सूर्यास्त के बहुत बाद तक काम लेते हैं पर मजदूरी आधी देते हैं. एक दिन मजदूरों ने इसी बात पर हड़ताल कर दी. मामाजी बिगड़े - अगर तुम लोग मेरे खेत में जाना बंद करोगे तो गांव में रहना मुश्किल पड़ जायेगा. दूसरे शहर जाओगे तो किसी न किसी अपराध मे फंसवाकर जिला से निष्कासित करा दूंगा. दूसरे प्रांत जाओगे तो देश निकाला का दण्ड दिलवा दूंगा. दिल्ली तक मेरी पहुंच है. फिर वे समझाने लगे - हमारे जैसे लोगों के घर कमाने के लिए तुम्हारा जन्म हुआ है. विश्वास न हो तो शास्त्र उठा कर पढ़ लो. पैसे वाले कितने दुखी होते हैं,बताने की आवश्यकता नहीं. तुम्हारे आध्यात्मिक विकास के लिए ही कम मजदूरी देता हूं. यदि उचित पारिश्रमिक दूंगा तो तुम लोग आलसी हो जाओगे. बीमारियां जकड़ लेगी इसलिए उपवास रह कर शरीर स्वस्थ रखो.
मजदूरों ने कान पकड़कर गलती के लिए क्षमा मांगी. मामा ने एवमस्तु कर अभयदान दिया.

मामाजी बड़े स्वच्छता प्रेमी हैं. वे अपने घर के कचड़े को पड़ोसी के घर के सामने फिेंकवा देते हैं. एक बार वे तालाब में फैली गंदगी को देखकर चिंता में डूब गये. उन्होंने मछली मारने के लिए तत्काल जाल डलवाया. ग्रामीणों ने विरोध किया तो मामाजी के त्रिनेत्र खुल गये. बोले - जब एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है तो यहां बहुत मछलियां हैं. मछलियों के कारण ही पानी रोगीला हो गया है. लोग उपयोग करेंगे तो बीमार पड़ेंगें इसलिए मछलियों को निकलवा कर तालाब को स्वच्छ रखना मेरा कर्तव्य है.

ग्रामवासियों की बोलती बंद हो गयी. मामाजी ने मछलियों की बिक्री करा दी. आये दिन बैंकों में डकैतियाँ पड़ती है अतः आय के रुपयों को अलीगढ़ी पेटी में सुरक्षित कर दिया.

मामाजी इलाके के शेर हैं तो जनता बकरी. मजाल कि उनसे कोई मुंह लड़ा सके. शासकीय कर्मचारियों को डांटना उनके अधिकार क्षेत्र के अंर्तगत आता है. शिक्षकों के वेतन देयक प्रपत्र पर दस्तखत करना न करना उनकी इच्छा पर निर्भर करता है. जिस प्रकार लेखकों की रचनाएं फेंक देते हैं उसी प्रकार वे वेतन देयक प्रपत्र की दुर्गति कर देते हैं. शिक्षकों का वेतन कटा देना उनके बांयें हाथ का खेल है. एक शिक्षक मामाजी को नमस्कार नहीं करता था. मामाजी ने अपमान का बदला लेने के लिए शिक्षक के पूरे माह का वेतन ही कटवा दिया. शिक्षक अपने पापकर्म का फल भोग चुका तो अब दिन में तीन बार दण्डवत करता है.

मामूजान बच्चों के प्रति नेहरु जी से भी अधिक स्नेह रखते हैं. उनके भविष्य के प्रति चिंतित हुए तो उन्हें अपने खेतों में काम दे दिया. शिक्षक उनके पास गये. बोले - सभी बच्चों को शिक्षित होना अनिवार्य है अतः आप उन्हें शाला भेजिये.

मामाजी शिक्षकों की बुद्धिहीनता पर हंसे. बोले - जब सभी पढ़ लेंगें तो हल कौन चलायेगा !अन्न कौन पैदा करेगा !मैं बच्चों को अपढ़ रखकर राष्ट्र की उन्नति में योगदान दे रहा हूं. यदि सभी शिक्षित हो गये तो नौकरी दोगे ! जवाब दो !

मामाजी के सुतर्क की बल्लेबाजी से शिक्षक विकेट आउट हो गये. एक बार उन्हें किसी ने बताया कि मंत्री घूंस लेते हैं,फिर क्या था उन्हें घूस लेने की धुन सवार हो गई. बांस का प्रमाण पत्र बनवाने वाले से घूस तो साधारण बैठक बुलाने वाले से घूस लेने लगे. मैंने पुलिस - सरकार और अधिकारियों के भ्रष्टाचारण पर कितने ही कागज खराब किये. लेकिन मामा के काला चिठ्ठा कभी नहीं खोला. उनका विरोध कर रिश्तेदारी थोड़ी ही खत्म कर लूं.

गांव के पास एक नाला बहता है. उनमें बांध बंध जाये तो खेतों की सिंचाई हो सकती है. अकाल में भी धान पक सकता है. बांध निर्माण के लिए शासन से स्वीकृति मिल चुकी थी लेकिन मामा ने यह कह कर काम बंद करा दिया कि बांध फूट गया तो फसल चौपट होगी ही उसके साथ गांव भी बह  जायेगा. सड़क इसलिए नहीं बनने देते कि दुर्घटना होने की खतरा रहता है. इसी प्रकार उनके अथक प्रयासों से क्षेत्र के गांव निरंतर विकास कर रहे हैं. मामाजी के जनहितैषी कार्यों का गुणगान कहां तक करुं. यदि सम्पूर्ण पर्वतों को स्याही बना कर समुद्ररुपी पात्र में घोला जाये. कल्पवृक्ष की विशाल  शाखा लेखनी बने और भूमि रुपी कागज पर सरस्वती निरंतर लिखे तो भी मामाजी के गुणों का वर्णन होना असम्भव है.

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जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: नूतन प्रसाद शर्मा का व्यंग्य - गांव के भगवान
नूतन प्रसाद शर्मा का व्यंग्य - गांव के भगवान
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https://www.rachanakar.org/2013/07/blog-post_3474.html
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