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राजीव आनंद की लघुकथा - वो अकेली औरत

वो अकेली औरत

क्षोभ की प्रतिमा बनी एक औरत कब्रिस्‍तान के एक कोने में एक कब्र के पास चुपचाप बैठी थी, इरफान कब्रिस्‍तान का देख-रेख करने वाला मुलाजिम कुछ दूर पर खड़ा उसे देख रहा था. धीरे-धीरे इरफान उसके समीप पहुंच गया परंतु फिर भी वह नहीं हिली. उसने सिर्फ अपनी बुझी हुई आंखों से इरफान की तरफ देखा और फिर उसी कब्र को एक टक देखने लगी.

एक अजनबी को अपने निकट आते देख कर भी वो औरत में न तो कोई उत्‍सुकता थी और न ही परेशानी का भाव था. उसके मुंह पर उदास रेखाएं खींच गयी थी, उसने काली चादर से अपना पूरा शरीर ढ़ंक रखा था और शायद रात भर जाग कर रोने से उसके आंखों की पलकें बोझिल से लग रहे थे. इरफान सहानुभूति दिखाते हुए उस औरत से पूछा कि यहां कौन लेटा है ?

उसने भावशून्‍य उदासीनता से कहा कि मेरा शौहर समरू.

इसका इंतकाल कब हुआ इरफान ने पूछा ?

दो वर्ष पहले, उसने एक गहरी सांस लेते हुए अपने चादर को ठीक किया मानो उसमें छुप जाना चाहती हो.

दिन काफी चढ़ गया था, सूरज जैसे आग बरसा रहा था. कब्रों के आसपास धूल-धूसरित रूखे-सूखे पेड़-पौधे गमगीन से खड़े ऐसे प्रतीत हो रहे थे, मानो वे भी लाशें हो.

इरफान ने उसके शौहर की कब्र की ओर सहानुभूति से गर्दन हिलाते हुए पूछा, कैसे हुई आपके शौहर की अकाल मौत ?

रोलिंग मिल में दुर्घटनाग्रस्‍त होने के बाद, मेरे शौहर का एक पांव लोहे के राड से जख्‍मी हुआ था, इतना कह कर वो औरत अपने पति के कब्र को ऐसे सहलाने लगी मानो अपने पति को आराम देना चाहती हो.

दुर्घटना के बाद रोलिंग मिल के मालिक ने क्‍या समरू का इलाज नहीं करवाया, इरफान ने पूछा ? इरफान को यद्यपि इस प्रकार दुखी औरत की भावनाओं को कुरेदना शालीनता के खिलाफ प्रतीत हो रहा था परंतु क्षोभ की प्रतिमा बनी इस औरत की आंसुओं से डबडबायी आंखें इरफान में गहरा कौतुक और झुंझलाहट पैदा कर दी थी. उस औरत की आंखों में कुछ ऐसा गम था जो इरफान को मजबूर कर रहा था उसकी भावना को कुरेदने के लिए.

इरफान के सवाल को सुनकर पहले तो वो औरत इरफान को बड़ी बारीकी से उपर से नीचे तक देखा और एक गहरी सांस खींचती हुई गमगीन आवाज में कहा कि हम गरीब जब तक काम के लायक होते हैं तब तक ही इंसान समझे जाते है, बेकाम हुए नहीं कि बस जानवरों में शुमार कर दिए जाते हैं. मेरे शौहर के दांयें पांव में राड ने ऐसा जख्‍म दिया कि उनका पूरा दांया अंग ही लकवाग्रस्‍त हो गया. रोलिंग मिल का मालिक शुरू में तो कुछ इलाज करवाया फिर अस्‍पताल से छोड़ दिए जाने के बाद मैं अपने शौहर को घर ले आयी, रोलिंग मिल का मालिक उसके बाद इलाज के पैसे देना बंद कर दिया. मेरे शौहर के बीमार पड़ जाने के बाद आमदनी का एकमात्र जरिया भी बंद हो गया. मैंने जो थोड़ी बहुत पैसे बचाए थे वो सब खा डाली. घर के आंगन में कुछ साग-सब्‍जी लगायी थी, उससे कुछ दिन गुजारा होता था. बीमार शौहर को बेस्‍वाद खाना देने में भी मुझे बहुत खराब लगता था, दवाईयां, मल्‍हम, तेल वगैरह अपने शौहर को नहीं दे सकने का अलग दर्द था मुझे. धीरे-धीरे मेरे शौहर बीमारी से सूखते से गए पर उन्‍होंने कभी भी किसी चीज की शिकायत तक नहीं की.

इरफान उस औरत के दुखभरे बयान को सुनते-सुनते नीम-बेहोशी में चला गया था. वह सोच रहा था कि उपरवाले इस औरत को बेइंताह गम क्‍यों दिया है ? इरफान फिर उस औरत का आगे का बयान सुनने लगा.

वो औरत गमगीन तो थी ही उसने जैसे अपना दिल इरफान के सामने खोल कर रख दिया था. वो कुछ भी झूठ नहीं बोल रही थी. उसने आगे कहना शुरू किया, शौहर की बीमारी और उनका बिस्तर पर पड़े रहने के कारण मैं बहुत परेशान रहने लगी थी. शौहर की बीमारी का गम तिसपर भूख की आग जैसे मुझे भीतर ही भीतर फूंक रही थी. मोहल्‍ला-टोला वाले हमलोगों को जैसे भूल चुके थे, पड़ोसी देख कर भी हमारे घर की तरफ देखते नहीं थे. किसी को कुछ अगर मैं बोलती भी थी तो बस सुन भर लेता था और बात को टालते हुए चल देता था.

एक दिन मेरे शौहर ने मुझसे कुछ खाने को मांगा, मैं तो इस मनहूस जीवन से तंग आ ही चुकी थी इसलिए मैंने अपने शौहर को कह दिया कि ऐसे जीवन से तो अच्‍छा होता कि मैं मर जांउ या फिर आप ही मर जांए. मेरा शौहर सिर्फ गर्दन हिलाकर रह गए मानो कह रहे हों, गुस्‍सा क्‍यों करती हो, मैं तो वैसे भी एक-दो दिन का मेहमान हॅूं, कब्र में पैर लटकाए बैठा हॅूं. इतना सुनकर मैं घर से बाहर निकल गयी, खाना ही खोजने निकली थी. मुझे बाद में अफसोस भी हो रहा था कि मुझे अपने बीमार शौहर से ऐसा नहीं कहना चाहिए था पर अब पछताने से क्‍या होना था ?

मैं थक-हार कर कुछ घंटे बाद लौटी तो देखा कि मेरे शौहर की आंखों से आंसू गिर कर सूख से गए थे, मुझे देखकर उन्‍होंने सिर्फ मुझसे ‘पानी' मांगा था और इससे पहले मैं उन्‍हें पानी पिलाती कि वो इस बेरहम दुनिया से मुझे अकेला छोड़कर चल दिए थे.

मैं अभागिन उन्‍हें आखरी समय में पानी भी न पिला सकी. मुझे ऐसा आज तक लगता है कि मैं ही उनकी मौत की जिम्‍मेवार हॅूं अगर मैं उस दिन ‘मरने की बात' नहीं कही होती तो शायद मेरे शौहर नहीं मरते, वो बीमारी के कारण नहीं मरे, मेरे कारण मरे.

यह कहकर वो चुप हो गयी और उसके चुप होते ही कब्रिस्‍तान की निस्‍तब्‍धा जैसे और बढ़ गयी थी. ऐसा प्रतीत हो रहा था कि कब्रों पर लगे सलीब, चुपचाप खड़े पेड़-पौधे, आसपास पड़े मिट्‌टी के ढेर सब उस गमगीन औरत के दुख-दर्द में शामिल हों.

इरफान अनायास ही गम, गमों से छुटकारा और मौत का इन सब के साथ संबंध के बारे में सोचने लगा. आसमान बिल्‍कुल नीला था, बादल का एक धब्‍बा भी नजर नहीं आ रहा था और सूरज था कि अपनी बेरहम तपिश से जैसे गमों को दुगना कर रहा था.

इरफान उस औरत को कुछ मदद के तौर पर रूपए देना चाहता था, उसने कुछ रूपए उस औरत की ओर बढ़ा दिए.

वो औरत इरफान से रूपए लेने से इंकार करती हुई बोली कि तुमने मेरी दुखभरी दास्‍तां सुन लिया यही बहुत है, मन का बोझ हल्‍का हो गया, मुझे रूपए की अब जरूरत नहीं है, मैं अकेली हॅूं, इस दुनिया में एकदम अकेली.

फिर वो चुप हो गयी और पूर्व की भांति अपने शौहर की कब्र को गमगीन डबडबायी निगाहों से एकटक देखा, मानो कब्र की तस्‍वीर अपने आंखों में कैद कर लेना चाहती हो और धीरे-धीरे कब्रिस्‍तान से बाहर जाने लगी.

राजीव आनंद

सेल फोन - 9471765417

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Akhilesh Chandra Srivastava

ek hakeekat ka bayaan karti udas si kahani hai satya ka bahut nazdeeki se bayaan kiya gaya hai badhaiee

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