सोमवार, 15 जुलाई 2013

सौरभ कश्‍यप की कविताएँ

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माँ तुम

माँ तुम महकती हो
घर में जलती धूप
और मसालों की सौंध से ज्‍यादा
प्रत्‍येक कोना घर का
तृप्‍त है तुम्‍हारी पावन अनूभूति से।
माँ तुम मीठी हो
गुझिया की मिठास
और मेवामिश्र केसर खीर से ज्‍यादा
प्रत्‍येक स्‍वादरहित तत्त्‍व
अनुप्राणित है तुम्‍हारी मधुरता से।
माँ तुम विराट्‌ छत हो
कुटुम्‍ब की सार संभाल और․․
पत्‍थर गारे की शरण से
ऊँची ज्‍यादा कहीं
हर प्रसन्‍नता घर की
सराबोर है तुम्‍हारे आश्रय से।
माँ तुम जगमगाती हो
खिड़की से आती किरणों की चमक
और दीयों की जगमगाहट से ज्‍यादा
हर अंधेरा घर का
प्रकाशित है तुम्‍हारी दीप्‍ति से।
माँ तुम आंनद हो
गर्मियों में छत की ठंडी नींद
और परीक्षा मे अव्‍व्‍ल आने से ज्‍यादा
हर उत्‍सव आयोजन घर का
खिलखिलाता है तुम्‍हारे ही
आंनद प्रतिबिम्‍ब से।

माँ तुम सरल हो
आंगन में चलती चीटियों की कतारों
और लुकाछिपाई के खेल से ज्‍यादा
हर आड़ी टेढ़ी जटिलताएं घर की
सुलझी हुई है तुम्‍हारे तिलिस्‍म से,
तुम्‍हारे चमत्‍कार से माँ।

 

व्‍यथाबोध

कभी विचारा
मेरे जीवनदाताओं तुमने
वंचित करते मुझे
अपनी शीतल छांह से
और धकियाते हर बार
स्‍नेह की कतार से
उसे तो दी गई
सजीले पृष्‍ठों वाली किताबें
रंग बिरंगे आधुनिक बस्‍ते
और मेरे हिस्‍से
कतरनों के पैबंद रफ्‍फू किए टुकड़े
धूल सनी झूठन के पिटारे
और तो समर्थ होकर भी
मेरी उड़ान को
खुला आकाश न देकर
सौंपी गई बित्ता भर छतें
कि मेरा चहकना भी
अखरता रिवाजों को
और उसकी कमजोरियाँ भी
लुभाती तुम्‍हें
सुमधुर राग भैरवी सी निनादित।
है उस मेरी पीड़ा का आभास
जो घोली गई बचपन से
मेरे कानों से अधिक चेतना में
अंतस्‍तल भेदी विस्‍फोट सी
कि परायी हूं मैं
मात्र औपचारिकता भर
मानवी होकर भी
पल्‍लवित की गई
मेरी देह․․․ केवल देह
और कभी न पूरा गया
प्रेम की तूलिका से
भावों के कोरे केनवास को
और पांख लगे मन में
सहेजे स्‍वप्‍नों को।
मेरी चंचल कल्‍लोलें
स्‍वछंद मुस्‍कानें
कभी खुली खिड़की से
धूप या कि
चेहरे पर प्रकाश समेटना भी
कितनी बार रोका गया है
मेरे वयजन्‍य उल्‍लास को।
सोचा कभी
सारी समझदारियों की
लचर थपकियां मुझे ही क्‍यूं
क्‍यूं वंचित और उपेक्षित
रही है सदा से
केवल बेटियाँ ही।
                 -

कोरे कागज

नीले अथाह अम्‍बर के
इस मुट्‌ठी भर टुकड़े पर
अतिक्रमण कर लिया है
इन खानाबदोश प्रवासित
गिरगिटिया बादलों ने
जो अभी दिख रहे मटियाले से
हामी भरते धरा से समत्त्‍व की
पर पहन लेंगे
काजल से काले लबादे
और करेंगे बरखा बौछार
पहले भेजकर
अपने बांके पूरवाई दूतों को।
ताजा समाचार है कि
कुछ शीशम और सफेदों को
ठिठोली करवाकर
पैठ रहे हैं वे दूत
मेरी अधखुली खिड़की से
चलो उठकर त्‍वरित
बटोर लूं
तार पर सूखते कपड़े
और लग जाऊं तब
भरने कोरे कागज ।


       
       

        युद्धविराम

मैं युगों से झेलती आई
तुलसी का शील हरण
सीता का निर्वासन
मंदोदरी की उपेक्षा, चिंताएं
निवर्सना की जाती पांचाली के अश्रु
है अनुभूति कैसे बीते होंगे
मांडवी के नीरस बंसत
शबरी की बूढी प्रतीक्षा
यशोधरा का एकाकीपन
कौशल्‍या के चौदह युग
बहुत हुआ अब नहीं करुंगी
प्रतीक्षा, विश्‍वास तुम्‍हारा
भाग्‍य अपना सौंप तुम्‍हारे चरणों को
नहीं करुंगी त्राहिमाम त्राहिमाम
शीघ्र ही देखोगे तुम
नरमुंड सजाए, सुर्ख नेत्र
कटि पर कटे नरहाथों का घेर
शोणित से भरा खप्‍पर लिए
मेरा अपराजित काली रुप
इस एकपक्षीय अघोषित युद्ध के
एकपक्षीय युद्धविराम के पश्‍चात्‌।

 


         

स्‍नेहिल परस

कैसे ना पहचानूं
तुम्‍हारा स्‍नेहिल परस
जगाता रहा जो जिजीविषा
दुर्दम्‍य सागर में खड़े
प्रकाश स्‍तंभ की भाँति
प्रेरणा लिए, नवप्रारंभ लिए
प्‍यार लिए, पूर्णता लिए।
हरता रहा जो
मेरा पराश्रयी अधूरापन
उदासियों में, व्‍याकुलता में
या कि मधुर क्षणों में।
पीछे से आकर मींचते हो
मेरी आँखें
कैसे ना पहचानूं
तुम्‍हारा स्‍नेहिल परस
मीठी सिहरन दृढ़ विश्‍वास
मेरी संतृप्‍तता मेरी अंनतता
मुझमे मेरी खुशबू है
तुम्‍हारा स्‍नेहिल परस।                                                                                                                          

 

 

थोथा रेगिस्‍तान

ओ निर्जन शुष्‍क रेगिस्‍तान
तू तो बनता था ना
बड़ा निस्‍पृही निष्‍काम
कहता रहता था कि
मैं नहीं औरों जैसा
सदैव झूठे अहम्‌ से भरा
तू दिखाता रहा स्‍वयं को कठोर
गुंजाईश ही नहीं जहाँ अंकुरण की
विरोध करता आया तू
कोमल कलियों का
अब कहाँ गया तेरा रौद्र ताप
रेतीले घनघोर अंधड़
अंतहीन मौन, नमी शून्‍यता
लीलता रहा जिनके सहारे तू
कितने ही प्रीत प्रयास
अब क्‍यूं ठगा सा ढूंढता मुझे
जिसने अनायास ही निहारा तुझे
नहीं जानते हुए विराट विशेष
निमेष में ही तेरा थोथापन भाँपकर
नहीं देखा․․․․․․․ नहीं देखा
फिर कभी तुझे दोबारा।

 

 

आकलन

कब तक सहूं
मैं तेरा आकलन
जो तेरी सड़ांध भरी
आँखों के गलियारों से
बेशर्म विचरकर भेदता है
झरने से झरते मेरे
कोमल हृदय की अनुगूंज को।
बींधती है तेरी मूक आहें
मेरे नयनों को
दुस्‍वप्‍न की तरह
और मेरे गुलाबीपन को
कचोटना चाहती तेरी हथेलियाँ
दिला रही मुझे भरोसा
कि तेरी उनींदी आँखों में
अभी भी सोयी है मानवता
सदियों से जागरण का
झुनझना बजाने पर भी।
मेरे मन और देह की वक्रता को
तेरे पौरूष से चाहे तू मापना
जैसा कि तू
करता आया है युगों से
अपने नयनों से दग्‍ध
मेरे मन की स्‍निग्‍धता
और स्‍वाभाविकता को ।
घबराती रही हूं मैं
तेरी चमकती आँखों को देखकर
कि कहीं लीन तो नहीं तू
रचने में पुनः कोई
योजना घेराव की।
संभव नहीं कि
लिपट जाऊं समूची
आवरण के घेरों में
क्‍योंकि पा ही लेगा तू
तब भी गंध देह की
और टटोलेगा
लेखाजोखा मेरे शरीर का
करेगा अकारण छलनी
अनप्रदत्त्‍ा अधिकार से
जो अंतवेर्शित सा
तेरे पशुत्त्‍व में
कि सच तू कहीं
जंगली भेड़िया तो नहीं।

 

 

पुनर्जन्‍म

गुजरती हूं
पुरानी वीथिकाओं से
संभालकर व सहेजकर अपने
देवसृजित उन्‍मुक्‍त सौंदर्य को
पर कई बार
लाख बचते हुए भी
झुलसा ही देती है
प्रचंड मानुषी आभाएं।
मुझे तो दीख पड़ते
खुले पिंजरों में
भूखे हजारों दुशासन
संजय से
मेरे मादक सौष्‍ठव
का सजीव प्रसारण सुनते
बेसुध धृतराष्‍ट्र
और मैं
पुनर्जन्‍म द्रौपदी का
पर अचरज तो यह
अवतरित हुआ किधर
मेरा चिरसखा
कान्‍हा․․․․

 

 

लक्ष्‍मण रेखा

आंशकित खुद को रोके हुए
यूं ही नहीं सिमटी रहती हूं मैं
क्‍योंकि बचपन से खाकर ठोकरें
ही तो बड़ी हुई हूं मैं
घिन आती उन चेहरों से
काला किया जिन्‍होनें रिश्‍तों को ही
मुझसे खेलकर हर मौके
समझ चुकी हूं उनके हथकंडे
लाड दुलार के षडयन्‍त्र
लक्ष्‍य था जिनका केवल
मेरे धीरे - धीरे खिल रहे
माखन से ‘मन' को सहलाकर
न जाने कौनसा यश पाना।
मेरा खुलकर हंसना और चंचलता
या कि लड़की होना दोषी है
जे इस पीड़ा को अकेली झेलकर
आने नहीं देती किसी को
अब मैं लक्ष्‍मण रेखा के पास भी
यहाँ तो छलते आए हैं
बचपन से रिश्‍ते भी रावण जैसे
किन किन नामों से मुझे पुकारकर।

 

मैं पा ही लेती हूं

दिनभर के कठोर तप से मिले
पसीने को पोंछकर
पल्‍लू से बार बार
और कमरदर्द से कराहते भी
गढ ही लेती हूं मैं
आनन्‍द के तराने
किसी ना किसी बहाने।
सारे नातों के बंधनों पर
घूमती रहती हूं
कैसे भी संतुलन बनाकर
मैं लट्‌टू की धुरी सी
टीस उठाते हुए भी
एडि़यों की भद्‌दी खरास की
रच ही देती हूं मैं
स्‍त्रोता आस का
सुखद एहसास का।
रातदिन बच्‍चों की
चिल्‍लपों - धमाचौकड़ी देख सुन
चाकू से कभी उंगली लाल होने
तवे या कभी कभार
उफनते इनसे जलकर भी
बुन ही देती हूं मैं
बर्फ सा शीतल गीत
मेरे एकांत का मन मीत।
स्‍वयं को बाँट बाँटकर
घर और पास पड़ौस में
कई दिन व्रत की कठोरता
और उनमें भी पहाड़ उठाकर
ढूंढ ही लेती हूं मैं
खुशियों के दुर्लभ सदन
तुम सबके खिले प्रसन्‍न चेहरों में
मैं पा ही लेती हूं
मेरे मुस्‍कुराने का कारण
मेरी सांसों के चलने का कारण।

  स्‍वार्थ

    
पीछे कहाँ यह काली परछाई भीतर हमारे बसती है,
हो अनुभूत नहीं तो क्‍या, नित पुण्‍य तो डसती है।
है कौन अदृष्‍ट तल में राघव के पौरूष कृत्‍य शिखर
याकि हम ‘मैं' खोर में, जहाँ नयनपथ गए बिखर।

मेरा पुर सुबास बसे भले औरों की बस्‍ती उजाङ बने
है बहुमान आत्‍मसुख चाहे कैसे परहित से बिगाङ ठने।
मैं मेरा तू तेरा ये पंक शिक्षा किस इतिहास से पाई है
यह धरा तो अनादि से ‘वसुधैव' के गीत गाती आई है।

होता पल्‍लवित वह विटप कभी, संज्ञाहीन जिसका मूल है
प्रलय सर्वस्‍व भखे एक मुझे तज, यह विचार निर्मूल है।
सो कब तक सुदीर्घ रहेगा जीवन औरों का करके हनन
कि रचे बसे तो समाज में और दग्‍ध न हो मेरा उपवन।

कैसी क्षुधा अंधी जगी, परमार्थ को हम कुचलकर बढें
मृत सिद्धान्‍त हमारे हुए, परअश्रुओं से निज साधन गढें।
यह शोणित में संकरता कैसी, पत्‍थर बिंधे जो माणकहार
कवि मानद नहीं जो अनसुनी करूं क्षतदेश की चीत्‍कार।

कि स्‍वार्थ से आवृत वो काल था जो विदेशी बने विधाता,
यों किसी समय दिग्‍विजयी थे, वैभव न था ठौड़ समाता।
आज वही क्षुद्र विचार दृष्‍टि, अपराध यह नहीं क्षम्‍य है
निकटनाश से बेसुध जो मानव, हमारे लिए कहीं नम्‍य है!

मोदश्रृंखला के परिपूत आदशोंर् से श्रुति पुरान हैं लदे पड़े,
ज्ञान की अट्‌टालिकाएँ वे भूल, हम पतन को तैयार खडे़।
क्‍या लिप्‍सा थी जटायु की जो निजहित भूल रावण से लडे़,
प्रताप क्‍या न पाते थे औरों सा, तो भी अग्‍निपथ पर अडे़।

कि आज तो सम्‍बन्‍ध भी स्‍वार्थमय, हैं सिरमौर कलंक के
तुम मेरा भावी साधते तो हम एक, हों दो भले अंक के।
तब कहो कैसे अचल आशा हो, हर कोई यहाँ पराया है,
कौन गर्त कितना गहरा, ये गिरने पर पता चल पाया है।

क्‍या नही उचित, कि हम सहयोग प्रेम से हों आछन्‍न
हम भी जीएं और छंट जाए दुर्योग के विषाद आसन्‍न।
सब की सिद्धि में भी तो मैं, हो जाए ऐसा चित आश्रित
चहुंओर द्युति व्‍याप्‍त, तो मेरा सदन भी होगा प्रकाशित।

परमार्थ को जीते जो, वे कितने तेज से दैदीप्‍यमान हैं!
स्‍वात्‍मा में रमने वाले उपकारी निश्‍चय ही देव समान हैं।
कि धराभार सहते वे जन, हिय जिनके जग को स्‍थान हैं
कहते संत भी ऐसों के क्‍लेश हरने बैठा स्‍वयं भगवान हैं।

                             -सौरभ कश्‍यप

  
          7/198  MUKTA  PRASAD COLONY
                       BIKANER(RAJASTHAN)
                       PIN – 334004
                       PHONE NO़ 9649374454
 

NAME                ---  SAURABH KASHYAP                
DOB                   ---  5 OCT 1986
FATHER            ---  LATE SHRI AJAY PAL SINGH
EDUCATION    ---  M़Sc़(PHYSICS),B़Ed़
PROFESSION   ---  GOVT़ IInd GRADE TEACHER IN
                                 GOVT़ SEC़  SCHOOL KOTARI ,BIKANER

1 blogger-facebook:

  1. Akhilesh Chandra Srivastava9:15 am

    Bahut. Badhiya saurbh ji nari jeevan ki bhavnaon aur peedaon ka uttam chitran hai badhaiee

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