सौरभ कश्‍यप की कविताएँ

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माँ तुम माँ तुम महकती हो घर में जलती धूप और मसालों की सौंध से ज्‍यादा प्रत्‍येक कोना घर का तृप्‍त है तुम्‍हारी पावन अनूभूति से। माँ तुम मी...

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माँ तुम

माँ तुम महकती हो
घर में जलती धूप
और मसालों की सौंध से ज्‍यादा
प्रत्‍येक कोना घर का
तृप्‍त है तुम्‍हारी पावन अनूभूति से।
माँ तुम मीठी हो
गुझिया की मिठास
और मेवामिश्र केसर खीर से ज्‍यादा
प्रत्‍येक स्‍वादरहित तत्त्‍व
अनुप्राणित है तुम्‍हारी मधुरता से।
माँ तुम विराट्‌ छत हो
कुटुम्‍ब की सार संभाल और․․
पत्‍थर गारे की शरण से
ऊँची ज्‍यादा कहीं
हर प्रसन्‍नता घर की
सराबोर है तुम्‍हारे आश्रय से।
माँ तुम जगमगाती हो
खिड़की से आती किरणों की चमक
और दीयों की जगमगाहट से ज्‍यादा
हर अंधेरा घर का
प्रकाशित है तुम्‍हारी दीप्‍ति से।
माँ तुम आंनद हो
गर्मियों में छत की ठंडी नींद
और परीक्षा मे अव्‍व्‍ल आने से ज्‍यादा
हर उत्‍सव आयोजन घर का
खिलखिलाता है तुम्‍हारे ही
आंनद प्रतिबिम्‍ब से।

माँ तुम सरल हो
आंगन में चलती चीटियों की कतारों
और लुकाछिपाई के खेल से ज्‍यादा
हर आड़ी टेढ़ी जटिलताएं घर की
सुलझी हुई है तुम्‍हारे तिलिस्‍म से,
तुम्‍हारे चमत्‍कार से माँ।

 

व्‍यथाबोध

कभी विचारा
मेरे जीवनदाताओं तुमने
वंचित करते मुझे
अपनी शीतल छांह से
और धकियाते हर बार
स्‍नेह की कतार से
उसे तो दी गई
सजीले पृष्‍ठों वाली किताबें
रंग बिरंगे आधुनिक बस्‍ते
और मेरे हिस्‍से
कतरनों के पैबंद रफ्‍फू किए टुकड़े
धूल सनी झूठन के पिटारे
और तो समर्थ होकर भी
मेरी उड़ान को
खुला आकाश न देकर
सौंपी गई बित्ता भर छतें
कि मेरा चहकना भी
अखरता रिवाजों को
और उसकी कमजोरियाँ भी
लुभाती तुम्‍हें
सुमधुर राग भैरवी सी निनादित।
है उस मेरी पीड़ा का आभास
जो घोली गई बचपन से
मेरे कानों से अधिक चेतना में
अंतस्‍तल भेदी विस्‍फोट सी
कि परायी हूं मैं
मात्र औपचारिकता भर
मानवी होकर भी
पल्‍लवित की गई
मेरी देह․․․ केवल देह
और कभी न पूरा गया
प्रेम की तूलिका से
भावों के कोरे केनवास को
और पांख लगे मन में
सहेजे स्‍वप्‍नों को।
मेरी चंचल कल्‍लोलें
स्‍वछंद मुस्‍कानें
कभी खुली खिड़की से
धूप या कि
चेहरे पर प्रकाश समेटना भी
कितनी बार रोका गया है
मेरे वयजन्‍य उल्‍लास को।
सोचा कभी
सारी समझदारियों की
लचर थपकियां मुझे ही क्‍यूं
क्‍यूं वंचित और उपेक्षित
रही है सदा से
केवल बेटियाँ ही।
                 -

कोरे कागज

नीले अथाह अम्‍बर के
इस मुट्‌ठी भर टुकड़े पर
अतिक्रमण कर लिया है
इन खानाबदोश प्रवासित
गिरगिटिया बादलों ने
जो अभी दिख रहे मटियाले से
हामी भरते धरा से समत्त्‍व की
पर पहन लेंगे
काजल से काले लबादे
और करेंगे बरखा बौछार
पहले भेजकर
अपने बांके पूरवाई दूतों को।
ताजा समाचार है कि
कुछ शीशम और सफेदों को
ठिठोली करवाकर
पैठ रहे हैं वे दूत
मेरी अधखुली खिड़की से
चलो उठकर त्‍वरित
बटोर लूं
तार पर सूखते कपड़े
और लग जाऊं तब
भरने कोरे कागज ।


       
       

        युद्धविराम

मैं युगों से झेलती आई
तुलसी का शील हरण
सीता का निर्वासन
मंदोदरी की उपेक्षा, चिंताएं
निवर्सना की जाती पांचाली के अश्रु
है अनुभूति कैसे बीते होंगे
मांडवी के नीरस बंसत
शबरी की बूढी प्रतीक्षा
यशोधरा का एकाकीपन
कौशल्‍या के चौदह युग
बहुत हुआ अब नहीं करुंगी
प्रतीक्षा, विश्‍वास तुम्‍हारा
भाग्‍य अपना सौंप तुम्‍हारे चरणों को
नहीं करुंगी त्राहिमाम त्राहिमाम
शीघ्र ही देखोगे तुम
नरमुंड सजाए, सुर्ख नेत्र
कटि पर कटे नरहाथों का घेर
शोणित से भरा खप्‍पर लिए
मेरा अपराजित काली रुप
इस एकपक्षीय अघोषित युद्ध के
एकपक्षीय युद्धविराम के पश्‍चात्‌।

 


         

स्‍नेहिल परस

कैसे ना पहचानूं
तुम्‍हारा स्‍नेहिल परस
जगाता रहा जो जिजीविषा
दुर्दम्‍य सागर में खड़े
प्रकाश स्‍तंभ की भाँति
प्रेरणा लिए, नवप्रारंभ लिए
प्‍यार लिए, पूर्णता लिए।
हरता रहा जो
मेरा पराश्रयी अधूरापन
उदासियों में, व्‍याकुलता में
या कि मधुर क्षणों में।
पीछे से आकर मींचते हो
मेरी आँखें
कैसे ना पहचानूं
तुम्‍हारा स्‍नेहिल परस
मीठी सिहरन दृढ़ विश्‍वास
मेरी संतृप्‍तता मेरी अंनतता
मुझमे मेरी खुशबू है
तुम्‍हारा स्‍नेहिल परस।                                                                                                                          

 

 

थोथा रेगिस्‍तान

ओ निर्जन शुष्‍क रेगिस्‍तान
तू तो बनता था ना
बड़ा निस्‍पृही निष्‍काम
कहता रहता था कि
मैं नहीं औरों जैसा
सदैव झूठे अहम्‌ से भरा
तू दिखाता रहा स्‍वयं को कठोर
गुंजाईश ही नहीं जहाँ अंकुरण की
विरोध करता आया तू
कोमल कलियों का
अब कहाँ गया तेरा रौद्र ताप
रेतीले घनघोर अंधड़
अंतहीन मौन, नमी शून्‍यता
लीलता रहा जिनके सहारे तू
कितने ही प्रीत प्रयास
अब क्‍यूं ठगा सा ढूंढता मुझे
जिसने अनायास ही निहारा तुझे
नहीं जानते हुए विराट विशेष
निमेष में ही तेरा थोथापन भाँपकर
नहीं देखा․․․․․․․ नहीं देखा
फिर कभी तुझे दोबारा।

 

 

आकलन

कब तक सहूं
मैं तेरा आकलन
जो तेरी सड़ांध भरी
आँखों के गलियारों से
बेशर्म विचरकर भेदता है
झरने से झरते मेरे
कोमल हृदय की अनुगूंज को।
बींधती है तेरी मूक आहें
मेरे नयनों को
दुस्‍वप्‍न की तरह
और मेरे गुलाबीपन को
कचोटना चाहती तेरी हथेलियाँ
दिला रही मुझे भरोसा
कि तेरी उनींदी आँखों में
अभी भी सोयी है मानवता
सदियों से जागरण का
झुनझना बजाने पर भी।
मेरे मन और देह की वक्रता को
तेरे पौरूष से चाहे तू मापना
जैसा कि तू
करता आया है युगों से
अपने नयनों से दग्‍ध
मेरे मन की स्‍निग्‍धता
और स्‍वाभाविकता को ।
घबराती रही हूं मैं
तेरी चमकती आँखों को देखकर
कि कहीं लीन तो नहीं तू
रचने में पुनः कोई
योजना घेराव की।
संभव नहीं कि
लिपट जाऊं समूची
आवरण के घेरों में
क्‍योंकि पा ही लेगा तू
तब भी गंध देह की
और टटोलेगा
लेखाजोखा मेरे शरीर का
करेगा अकारण छलनी
अनप्रदत्त्‍ा अधिकार से
जो अंतवेर्शित सा
तेरे पशुत्त्‍व में
कि सच तू कहीं
जंगली भेड़िया तो नहीं।

 

 

पुनर्जन्‍म

गुजरती हूं
पुरानी वीथिकाओं से
संभालकर व सहेजकर अपने
देवसृजित उन्‍मुक्‍त सौंदर्य को
पर कई बार
लाख बचते हुए भी
झुलसा ही देती है
प्रचंड मानुषी आभाएं।
मुझे तो दीख पड़ते
खुले पिंजरों में
भूखे हजारों दुशासन
संजय से
मेरे मादक सौष्‍ठव
का सजीव प्रसारण सुनते
बेसुध धृतराष्‍ट्र
और मैं
पुनर्जन्‍म द्रौपदी का
पर अचरज तो यह
अवतरित हुआ किधर
मेरा चिरसखा
कान्‍हा․․․․

 

 

लक्ष्‍मण रेखा

आंशकित खुद को रोके हुए
यूं ही नहीं सिमटी रहती हूं मैं
क्‍योंकि बचपन से खाकर ठोकरें
ही तो बड़ी हुई हूं मैं
घिन आती उन चेहरों से
काला किया जिन्‍होनें रिश्‍तों को ही
मुझसे खेलकर हर मौके
समझ चुकी हूं उनके हथकंडे
लाड दुलार के षडयन्‍त्र
लक्ष्‍य था जिनका केवल
मेरे धीरे - धीरे खिल रहे
माखन से ‘मन' को सहलाकर
न जाने कौनसा यश पाना।
मेरा खुलकर हंसना और चंचलता
या कि लड़की होना दोषी है
जे इस पीड़ा को अकेली झेलकर
आने नहीं देती किसी को
अब मैं लक्ष्‍मण रेखा के पास भी
यहाँ तो छलते आए हैं
बचपन से रिश्‍ते भी रावण जैसे
किन किन नामों से मुझे पुकारकर।

 

मैं पा ही लेती हूं

दिनभर के कठोर तप से मिले
पसीने को पोंछकर
पल्‍लू से बार बार
और कमरदर्द से कराहते भी
गढ ही लेती हूं मैं
आनन्‍द के तराने
किसी ना किसी बहाने।
सारे नातों के बंधनों पर
घूमती रहती हूं
कैसे भी संतुलन बनाकर
मैं लट्‌टू की धुरी सी
टीस उठाते हुए भी
एडि़यों की भद्‌दी खरास की
रच ही देती हूं मैं
स्‍त्रोता आस का
सुखद एहसास का।
रातदिन बच्‍चों की
चिल्‍लपों - धमाचौकड़ी देख सुन
चाकू से कभी उंगली लाल होने
तवे या कभी कभार
उफनते इनसे जलकर भी
बुन ही देती हूं मैं
बर्फ सा शीतल गीत
मेरे एकांत का मन मीत।
स्‍वयं को बाँट बाँटकर
घर और पास पड़ौस में
कई दिन व्रत की कठोरता
और उनमें भी पहाड़ उठाकर
ढूंढ ही लेती हूं मैं
खुशियों के दुर्लभ सदन
तुम सबके खिले प्रसन्‍न चेहरों में
मैं पा ही लेती हूं
मेरे मुस्‍कुराने का कारण
मेरी सांसों के चलने का कारण।

  स्‍वार्थ

    
पीछे कहाँ यह काली परछाई भीतर हमारे बसती है,
हो अनुभूत नहीं तो क्‍या, नित पुण्‍य तो डसती है।
है कौन अदृष्‍ट तल में राघव के पौरूष कृत्‍य शिखर
याकि हम ‘मैं' खोर में, जहाँ नयनपथ गए बिखर।

मेरा पुर सुबास बसे भले औरों की बस्‍ती उजाङ बने
है बहुमान आत्‍मसुख चाहे कैसे परहित से बिगाङ ठने।
मैं मेरा तू तेरा ये पंक शिक्षा किस इतिहास से पाई है
यह धरा तो अनादि से ‘वसुधैव' के गीत गाती आई है।

होता पल्‍लवित वह विटप कभी, संज्ञाहीन जिसका मूल है
प्रलय सर्वस्‍व भखे एक मुझे तज, यह विचार निर्मूल है।
सो कब तक सुदीर्घ रहेगा जीवन औरों का करके हनन
कि रचे बसे तो समाज में और दग्‍ध न हो मेरा उपवन।

कैसी क्षुधा अंधी जगी, परमार्थ को हम कुचलकर बढें
मृत सिद्धान्‍त हमारे हुए, परअश्रुओं से निज साधन गढें।
यह शोणित में संकरता कैसी, पत्‍थर बिंधे जो माणकहार
कवि मानद नहीं जो अनसुनी करूं क्षतदेश की चीत्‍कार।

कि स्‍वार्थ से आवृत वो काल था जो विदेशी बने विधाता,
यों किसी समय दिग्‍विजयी थे, वैभव न था ठौड़ समाता।
आज वही क्षुद्र विचार दृष्‍टि, अपराध यह नहीं क्षम्‍य है
निकटनाश से बेसुध जो मानव, हमारे लिए कहीं नम्‍य है!

मोदश्रृंखला के परिपूत आदशोंर् से श्रुति पुरान हैं लदे पड़े,
ज्ञान की अट्‌टालिकाएँ वे भूल, हम पतन को तैयार खडे़।
क्‍या लिप्‍सा थी जटायु की जो निजहित भूल रावण से लडे़,
प्रताप क्‍या न पाते थे औरों सा, तो भी अग्‍निपथ पर अडे़।

कि आज तो सम्‍बन्‍ध भी स्‍वार्थमय, हैं सिरमौर कलंक के
तुम मेरा भावी साधते तो हम एक, हों दो भले अंक के।
तब कहो कैसे अचल आशा हो, हर कोई यहाँ पराया है,
कौन गर्त कितना गहरा, ये गिरने पर पता चल पाया है।

क्‍या नही उचित, कि हम सहयोग प्रेम से हों आछन्‍न
हम भी जीएं और छंट जाए दुर्योग के विषाद आसन्‍न।
सब की सिद्धि में भी तो मैं, हो जाए ऐसा चित आश्रित
चहुंओर द्युति व्‍याप्‍त, तो मेरा सदन भी होगा प्रकाशित।

परमार्थ को जीते जो, वे कितने तेज से दैदीप्‍यमान हैं!
स्‍वात्‍मा में रमने वाले उपकारी निश्‍चय ही देव समान हैं।
कि धराभार सहते वे जन, हिय जिनके जग को स्‍थान हैं
कहते संत भी ऐसों के क्‍लेश हरने बैठा स्‍वयं भगवान हैं।

                             -सौरभ कश्‍यप

  
          7/198  MUKTA  PRASAD COLONY
                       BIKANER(RAJASTHAN)
                       PIN – 334004
                       PHONE NO़ 9649374454
 

NAME                ---  SAURABH KASHYAP                
DOB                   ---  5 OCT 1986
FATHER            ---  LATE SHRI AJAY PAL SINGH
EDUCATION    ---  M़Sc़(PHYSICS),B़Ed़
PROFESSION   ---  GOVT़ IInd GRADE TEACHER IN
                                 GOVT़ SEC़  SCHOOL KOTARI ,BIKANER

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया 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रचनाकार: सौरभ कश्‍यप की कविताएँ
सौरभ कश्‍यप की कविताएँ
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