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पुस्तक समीक्षा - मुझे कुछ कहना है

(पुस्तक समीक्षा )

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कविता की  प्रतीक : मुझे कुछ कहना है 

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                            --- मनोज 'आजिज़'

कोई भी शहर विभिन्न प्रान्तों से आए एवं भाषा-संस्कृति से पुष्ट लोगों से ही बसता है । जमशेदपुर भी एक ऐसा ही शहर है । हिन्दी, भोजपुरी, मैथिली, बांग्ला , ओड़िया, संताली, हो, आदि कई भाषाओँ का प्रचलन यहाँ है और इन भाषाओँ का साहित्य भी कमोबेश फल-फूल रहा है । बांग्ला भाषा-साहित्य का विस्तार एवं विकास उल्लेखनीय है एवं कवि, लेखक, कथाकार, संपादक सुभाष चन्द्र पाल का योगदान सर्वाधिक है, इसमें संशय नहीं । इनकी करीब ३० बांग्ला किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं । हिन्दी  में भी ये सुभाष चन्द्र पाल 'निर्मल' नाम से लिखते आ रहे हैं, गति कुछ कम ही सही । सद्यः इन्होने अपना पहला स्वतंत्र काव्य-संग्रह प्रकाशित किया है जिसका नाम है '' मुझे कुछ कहना है '' और इस संग्रह के माध्यम से इन्होने काफी  कुछ कह गया है । यह संग्रह प्रभा प्रकाशनी, जमशेदपुर से प्रकाशित किया गया है और इसमें कूल ४२ कवितायेँ संग्रहित हुईं हैं । कवि सुभाष चन्द्र पाल 'निर्मल' अपनी ४० वर्ष की साहित्य-साधना में कई पुखता विचारों एवं दर्शन से मुख्यतः बांग्ला साहित्य प्रेमियों को समृद्ध किया है और अब हिंदी-प्रेमी भी उनसे वाकिफ़ होंगे । अपने दीर्घ-कालीन अनुभव का फल ही है कि इस संग्रह में भी हम विषय- वैचित्र देख सकते हैं । भ्रष्टाचार, गरीबी, श्रमिकों की दुर्दशा, लोगों की पेशागत व्यस्तता, रवीन्द्र अनुराग, झारखण्ड की दशा आदि कई विषयों पर इनकी कलम चली है एवं पूरी काव्यात्मक- कौशल व शिल्प लिए चली है । संग्रह की पहली कविता 'इन्सान' शीर्षक से है जिसमे कवि ने यह स्थापित करने की कोशिश की है कि अगर इन्सान सही मायने में इन्सान बना रहना चाहता है तो कोई भी परिस्थिति उसे डिगा नहीं सकती पर शर्त है उसे ' ज्ञान-ज्योति' और 'नीति-बोध' के 'शुद्ध सुवास' प्राप्त हो । देश के नौजवानों की ओर से वे संकल्प -सन्देश  हैं कि भारत की आन, बान और शान कभी मिटने नहीं देंगे : 

'' कभी न सहेंगे माँ का अपमान 

  हम हैं भारत के नौजवान 

  दूर में गूंजता किसका आह्वान 

  हम हैं भारत के नौजवान । '' (२)

देश के शासक एवं शोषक वर्ग को चेतावनी भरी पंक्तियों से कवि कहता है --

''... तुम्हारे महलों की 

एक एक ईंट पर लिखा है इतिहास 

उनलोगों के खून से 

लेकिन तुमलोग राज कर रहे हो 

उनलोगों के सिर पर पैर रख कर । 

बिना एक बार भी सोचे कि --

तुमलोगों के दिन अब समाप्त होने को हैं ।'' (६)

उत्तर-आधुनिक युग में लोगों की सबसे बड़ी समस्या है अस्तित्व का संकट ; चाहे वह स्थान, परिवेश, स्थिरता, अधिकार, भाषा, संस्कृति आदि किसी भी विषयों से सम्बन्धित हों । इस दृष्टिकोण को बयाँ करती ये पंक्तियाँ --

''जीने का भी कोई अधिकार नहीं इस धरती पर 

जहाँ शब्द- शब्द का हाहाकार मच गया है 

इस घड़ी पृथ्वी पर । '' (७)

इस संग्रह में झारखण्ड से सम्बन्धित ८ कवितायेँ हैं । इन कविताओं के माध्यम से राज्य की जनता के साथ विभाजन के बाद से ही जो धोखे हुए हैं उन्हें साफ़ शब्दों में प्रस्तुत किया गया है । उन्होंने झारखण्ड राज्य के लिए देखे गए सपनों को अब किंवदन्ती कहा है -- 

'' महोदय ! 

  जरा सुनें तो 

  'झारखण्ड' एक किंवदन्ती है 

  उसके लिए हम सब 

  लड़ रहे थे ।'' (१५ )

'मुझे कुछ कहना है ' शीर्षक की एक कविता भी है जिसमे कवि ने कुछ न कह पाने की विवशता की दर्ज किया है । भारतीय जेलों में कई साधारण अपराधी आगे चलकर बड़े अपराधी बन जाते हैं । इस दुर्दशा की ओर इंगित करती हुई ये पंक्तियाँ --

''...मुझे जो सजा दो 

मंजूर है परन्तु उस अंधेरे 

कारागृह में न रखो । 

मुझे इन्सान से 

हैवान न बनाओ ।'' (३९ )

कवि सुभाष चन्द्र पाल 'निर्मल' अपनी इस कृति से यह दृढ़ सन्देश देने में सक्षम हुए हैं कि अभिव्यक्ति के लिए भाषा आड़े नहीं आती । वे मूलतः बांग्ला भाषी हैं और बांग्ला कवि-लेखक के रूप में स्थापित हैं पर उनकी हिन्दी की समझ भी प्रशंसनीय है । सुस्पष्ट छपाई, आकर्षक व प्रासंगिक प्रच्छद एवं भाव-गंभीर कविताओं से यह संकलन संग्रहनीय है । उनकी कवितायेँ एक प्रतीक स्थापित करने में एक महती भूमिका निभाएंगी ।  कवि 'निर्मल' को ढेरों शुभकामनाएं !  

समीक्ष्य पुस्तक-- मुझे कुछ कहना है

कवि - सुभाष चन्द्र पाल 'निर्मल'

समीक्षक--  मनोज 'आजिज़'

विधा-    कविता

प्रकाशक -- प्रभा प्रकाशनी , जमशेदपुर, झारखण्ड

मूल्य-- ५० रुपये

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