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अजय गोयल की कहानी - वेलेंटाइन डे

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वेलेंटाइन डे - अजय गोयल अनीता ने फोन पर विक्रम से पूछा, 'पलाश, अशोक या रजनीगंधा को पहचानते हो'' वह समझ गया कि-क्या कहना चाहती थी...

वेलेंटाइन डे

- अजय गोयल

अनीता ने फोन पर विक्रम से पूछा, 'पलाश, अशोक या रजनीगंधा को पहचानते हो''

वह समझ गया कि-क्या कहना चाहती थी अनीता। बोला, 'गाँव में अभी भी वसंत आकर हर द्वार पर थाप देता है। हर खिड़की खटखटाता है। अपने कमरे की खिड़की से मुझे आज भी दिन फूटता और सांझ उतरती दिखायी देती है। लो मैं कविता कहने लगा। तुम्हारा साथ ही ऐसा है। तुम्हारा एस०एम०एस० पढा। अच्छा लगा। पलाश का दहकता वसंत नव का आख्यान वसंत, जीवन का गान वसंत, रंग का वरदान वसंत।'

विक्रम जानता है कि अनीता अपनी अध्यापिका माँ की डायरी से पढ़कर उसे एस०एम०एस0 करती थी।

यह उसे अनीता ने ही बताया कि मम्मी को कविताएँ लिखने का शौक है।

यह बात अलग है कि क़स्बे में जन्मीं पली अनीता के पास कहने के लिए कोई श्लोक तो क्या कोई चौपाई तक नहीं होती थी। जबकि चौंध मारता जमाना चारो ओर था। वह सोचती कि हरपल चारों ओर होने वाली दुर्घटनाओं से उसे कौन आकर बचाएगा? नर्सिग-होम की रिसेप्सिनिस्ट बनकर उसका भविष्य क्या है?''

विक्रम सोचता. 'मेरे पास भी कितना आसमान है? और ... पैरों के नीचे कितनी धरती है? ग्रेजुऐशन तो पानी सा बह गया। तीन साल होम करने के बाद इस नर्सिंग होम का एक बैल ही तो हूँ। माँ कहती है कि चक्कर-घिन्नी बनाकर रख दिया है इन मियाँ-बीवी डाँक्टरों ने। पूंछ पकड़ रखी है ना। कभी भी हाँक ले जाते हैं। अड़ता भी तो नहीं। घंटी बजती नहीं कि तुरत-फुरत जुए में गर्दन फंसा देता है।

विक्रम जानता था कि माँ उसकी जेब में अटके रहने वाले मोबाइल फोन से खासी चिढ़ती है। उनके लिए वह एक खिलौना था 1 जो जब चाहे, जहाँ चाहे सोते बच्चे-सा हड़बडा कर ऑखें खोलता। जुगनू-सा चमकते हुए प्यासे डंगर-सा डकराने लगता था। लेकिन उस क्षण विक्रम के लिए वक्त थम जाता। वह जल्दी-जल्दी जींस चढाता, शर्ट पहनता. जूते कसता और. हवा हो जाता। यदि रात होती तो घर के बाहर नर्सिग होम की वेन उसे लेने के लिए पहुँच चुकी होती। वैन का हॉर्न बजने से पहले वह घर से बाहर निकल आता। फिर पीछे रह जाता कच्चा घर-आँगन और .... ईंटों वाला गाँव का रास्ता।

पिछले तीन साल विक्रम के लिए चढते जेठ की दोपहरी से बीते। इस बीच जींस व शर्ट में कसे विक्रम को दादी छैला बाबू पुकारने लगी और कच्चे ऑगन में गृहस्थी की जुगाड़ लगाती अनपढ माँ उसके आने-जाने की धमक सुन पाती।

नर्सिंग होम पहुँचने से पहले विक्रम को फोन पर बता दिया जाता कि किस ऑपरेशन के लिए तैयारी करनी है। हिस्ट्रेक्टमी होनी है या सीजर या लेपरोस्कोपिक ' एक बार ऑपरेशन थियेटर में प्रवेश के बाद उसे नहीं पता होता कि कितने घंटे बाद वह बाहर निकलेगा। ऑपरेशन के बाद उपयोग किए औजारों को स्टरलाइज करने के उपरान्त वह बाहर निकलता।

विक्रम को एक ऑपरेशन थियेटर दुनिया का सबसे पवित्र स्थान लगता। जहाँ सर्जन जाग्रत देवता होता। हर कदम अपने आप में एक चमत्कार होता। सबसे पहले मरीज को अचेत किया जाता। उसके बाद विकारग्रस्त अंग की मरम्मत कर दी जाती। और ..... मरीज को पुन: सचेत कर दिया जाता। इन सब चमत्कारों का वह साक्षी बनता।

शुरू-शुरू में ऑपरेशन थियेटर की ड्यूटी से घबरा ही गया विक्रम। उस समय अनीता ने उसे समझाया। बताया कि नर्सिंग होम स्टाफ में ओ०टी० टेक्नीशियन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण व्यक्ति होता है। इसका विक्रम को एक दिन अहसास भी हुआ। जब डा० दिनेश ने उसे एक सेलफोन देते हुए कहा कि विक्रम तुम्हें अब कभी भी बुलाया जा सकता है। रात-बेरात, तैयार हो?

विक्रम ने स्वीकृति में सिर हिला दिया। उसे लगता भी कि उसका निर्णय सही था। ग्रेजुएशन ने उसे खाने कमाने के लिए क्या दिया' पिता ने खेत की मेढ के पास फटकने तक से मना कर दिया। वक्त को बॉचते हुए बोले कि नये जुमाने में मिट्टी के काम में आदमी मिट्टी हो जाता है। उन्होंने अपना गेहूँ एक कम्पनी को बेचा। क्योंकि सरकार से ज्यादा पैसा कम्पनी दे रही थी। यह जानते हुए भी कि एक दिन कोई कम्पनी गाँव भर के खेत ठेकेदारी पर ले लेगी, और गाँव-शहर की गंदगी बढाने के लिए उजड़ जाएगा।

पिताजी के दो टूक जवाब देने के बाद विक्रम ने शहर की तरफ देखा। डा० दिनेश को उसमें एक ईमानदार व्यक्ति बैठा नजर आया और थोडे दिन वार्ड ड्यूटी लगाने के बाद उसे ऑपरेशन थियेटर भेज दिया गया।

अनिता इसे भाग्य कहती है।

- 'भाग्य ही है। तभी तुम्हारे नजदीक आने का मौका मिला। विक्रम सोचता।

ऑपरेशन सम्बन्धी सूचनाऐं विक्रम को रिसेप्शन से अनीता ही देती और. .... विक्रम भी किसी न किसी बहाने से फोन पर अनीता से बात करना चाहता।

एक दिन अनीता ने साफ कह दिया, 'ऐसी बात नहीं है, कि वह समझती नहीं है कि तुम मुझसे बात करने के बहाने ढूँढते हो।

- 'ही। मैं तुम्हारे नजदीक आना चाहता हूँ। विक्रम बोला।

उस दिन के बाद घर लौटने की जल्दी को विराम लग गया। फुर्सत के लम्हों की विक्रम को तलाश रहती। कभी-कभी व्यस्तता सताती तो अनीता उसे एस०एम०एस० करना नहीं भूलती। जैसे कि वक्त तुम्हें छू कर जाता कमी होली-सा झूमता कभी दीपों में सज जाता, कभी बधंक-सा थक जाता, वक्त तुमसे जीवन पाता।

विक्रम कहने भी लगा था कि उसके एस०एम०एस० की ट्रिन-ट्रिन कानों से पहले दिल तक जा पहुँचती हैं और फोन आँखें खोलकर चिट्ठी पकडा देता है। उन क्षणों को वह अपने लिए वक्त की सौगात समझता। उसे महसूस होता कि जिन्दगी कुछ और भी है।

परिवर्तन विक्रम में था भी। माँ भी कहने लगी, 'अकड़ में तनक नरमी है अब, पैरों में पहिए लग गये हैं, हवा मैं उडता-सा लगे है मोय।

सुबह उठता विक्रम। अक्सर पाता कि अनीता के एस०एम०एस० उसकी प्रतीक्षा कर रहे होते। जिन्हें पढ़ कर वह अनुभूतियों के संसार में डूब जाता। जहाँ उसे जगत रंगमंच दिखता, पक्षियों का कलरव। ऋचाओं सा ओजपूर्ण लगता और जीवन सम्पूर्णता में एक महोत्सव की अनुभूति देता।

० ० ०

उन दिनों अनिता छुट्टी पर थी। लगभग पूरे सप्ताह के अवकाश पर। एक दिन ऑपरेशन थियेटर में रात-भर व्यस्त रहा विक्रम। लगातार तीन ऑपरेशन हुए। एक सीजर व दो ऑपरेशन डी० दिनेश ने किए। सुबह तक थक कर चूर था वह। बाहर निकलते हुए उसकी नजर सेलफोन पर पडी, तो एस०एम०एस० को उसने मुस्कराते हुए पाया। तुम्हारी याद शीर्षक से अनीता ने भेजा था। जैसे स्वर का अनुवाद जैसे ज्योत का प्रकाश, जैसे देव का आभास, जैसे मन्दिर का प्रसाद।

लगभग तीन घंटे यात्रा के बाद विक्रम दिल्ली में रामकथा आयोजन स्थल के बाहर था। दस बजे तक पंडाल के निकट मन्दिर परिसर में अनीता भी आ गयी। कथा प्रारम्भ लगभग दो बजे होनी - तुमने एस०एम०एस० रात में पढ़ लिया होता तो क्या रात में ही चल देते। अनीता ने पूछा।

- 'यदि फ्री होता, तो।

- 'तुम खतरनाक हो।

कुछ क्षण चुप रहा विक्रम। फिर बोला, 'जल्दी वापस आ रही हो ना?'

- 'तीन दिन कम-से-कम रूकना ही है। वादा किया है मम्मी से। कथा सुननी है। वे तो कथा सुनने के लिए सात दिन रूकेगी। महान संत हैं सुनाने वाले। '

दोनों आयोजन स्थल के आस-पास घूमते रहे।

-''ईश्वर भी हमें मिलाना चाहता है 1' ' यह बात विक्रम ने देवदर्शन के समय कही। उस समय अनीता का हाथ उसके हाथ में था। विक्रम को स्पर्श से एक-दूसरे की नसों में उतर जाने जैसी अनुभूति हुई।

मंदिर से बाहर आकर दोनों ने जलेबियाँ लीं। ''मम्मी भी पिता जी को जलेबियाँ खिलाती थी। जब विवाह से पहले पिताजी उनसे मिलने स्कूल में आते। ' अनीता ने उसे बताया।

तभी एस०एम०एस० की एक बार फिर ट्रिन-ट्रिन थी। अनीता के सामने बैठे विक्रम के लिए एक बार फिर उसकी चिट्ठी। 'तुम मेरा आसमान बुन दो। सावन आए, बिजली चमके, इंद्रधनुष पतवार बनाए, चिडिया संसार जमाए, चाहती हूँ प्यार में छत चू जाए और .... भरे आंगन में सपने खिल जाएं।''

- 'तुमने देवता से क्या कहा'' एस०एम०एस० पढ़ने के बाद विक्रम ने पूछा।

थोड़ी देर चुप रही अनीता। बोली. ''देवता यदि देखता होगा तो समझ नहीं रहा होगा। फिर कहने का क्या फायदा ? तुमने देवता से क्या कहा ?''

- यही कि हम अपने समय के लायक नहीं बन सके। समय के लायक होते तो मैं भी किसी को सेलफोन पकडा उसकी पूंछ अपने काबू में रखता। किसी से ऑपरेशन के पच्चीस हजार लेता तो किसी से उसी ऑपरेशन के पचास हजार वसूलता। फिर इंडिया को बेकार कहता। कुछ खरीदने के लिए सिंगापुर या दुबई की उडान भरता। वहाँ से कम-से-कम तुम्हारे लिए लाख रूपये की इटालियन मार्का चप्पल लाकर कुछ सुकून महसूस करता। पर अपने आश्रितों को चवन्नी भी मुश्किल से देता। मैंने डा० दिनेश से कुछ पैसे देने के लिए कहा। वह भी एडवांस। डाँक्टर साहब हैं कि सुन ही नहीं रहे हैं। तीन साल की कडी मेहनत का यह फल। जब भी कहता हूँ तो कहते हैं कि सोचूँगा। सोचूँगा। सोचूँगा। पर कब? बाल दिवस आ जाएगा तब। परसों घर पहुँच गया तो मुझे देख आग-बबूला हो गए। बोले कि डिस्टर्ब करने चला आया। जा। जाके नर्सिंग होम में टी०वी० देख। बेटा इंडिया शाइन कर रहा है, वर्ड इकनोमिक फोरम में चिकन खिला रहा है, शराब परोस रहा है, सितार की जगह कूल्हे मटका रहा है। इतना कह डाँक्टर दिनेश अन्दर चले गये। इंडिया शाइन कर रहा था, मैं भीख माँग रहा था। गहरे अवसाद में डूबकर विक्रम बोला।

गम्भीर माहौल को हल्का करना अनीता को आता था। बोली, मुझे वापस मामा के यहाँ जाना है। मम्मी के साथ फिर आना है कथा-श्रवण के लिए। पुण्य का भागी बनने के लिए। लगता नहीं है कि तुम मुझे कथा सुनने की इजाजत दोगे।

- 'चाहता तो यह ही हूँ मैं। विक्रम बोला।

- 'ठीक है। मैं मम्मी के साथ वापस आती हूँ। फिर भीड़ में पाँच बजे तक के लिए गुम होकर तुम्हारे पास वापस आ जाती हूँ। तब तक इंतजार का सुख प्राप्त करें। ' कहकर अनीता चली गयी।

० ० ०

पंडाल में भक्तगण स्थान ग्रहण करने आने लगे थे। मंच से बार-बार प्रसारित हो रहा था कि यह विशेष कथा आयोजन है। इस महान आयोजन का सीधा प्रसारण समस्त विश्व में होगा। समस्त विश्व के भक्तगण सीधे हमारे साथ पुण्य के भागी हो सकेंगे।

अनीता आयी तो विक्रम ने व्यंग किया, 'तो आप इस महान आयोजन में भीड़ बढाने आयी हैं जो पापी अमरीका को पुण्यवान करने के लिए किया जा रहा है।

एकाएक ठिठक गयी अनीता। समझी तो मुस्कराने लगी।

- मेरे लिए ऑपरेशन थियेटर एक क्लास रूम है। कम-से-कम अपने वक्त में झाँकने की तमीज इन डाँक्टरों की संगत में थोडी बहुत मुझमें आयी है। इन आयोजकों से पूछो, इनका यह ताम-झाम महान है या विदेशी तकनीक जिसके माध्यम से सीधा प्रसारण संभव होगा। तुम्हें मालूम है, पिछले दिनों अपने शहर में एक हठयोगी पधारे। जिन्होंने बारह साल से एक हाथ उठाये रखने की जादूगरी की हुई थी। इन साधु महात्माओं के प्रताप से हम बसंत में अशोक के फूल चुनने के स्थान पर चॉकलेट पसंद करते हैं।

पाँच बजे कथा सम्पन्न होनी थी। अनीता बोली, 'गुमशुदा की तलाश शुरू हो इससे पहले ही मुझे वापस पहुँच जाना चाहिए।

विक्रम मुस्कराया। साथ ही वादा भी ले लिया कि चौदह फरवरी को पूरे दिन वह साथ रहेगी।

उस शाम दिल्ली से विक्रम वेलेंटाइन वीक मनाने की योजना के साथ लौटा। वह सोचता कि जलेबियाँ, चिट्ठी के इंतजार और साधारण सिनेमा हॉलों में फिल्म देखने का समय अब बीती बातें हैं। अब साधारण से सात गुनी बडी सिल्वर स्कीन आइमेक्स का जुमाना है। जब ये डाँक्टर हवाखोरी करने के लिए सिंगापुर तक उड़ सकते हैं. तो हम क्या दिन भर के लिए भी सांस नहीं ले सकते? आदमी हूँ कोई जानवर नहीं कि सिर झुकाकर पिलता रहूँ।

वेलेंटाइन वीक रोज डे से आरम्भ हुआ। साधारण से चार गुने रूपयों में रेड रोज खरीद कर विक्रम ने वेलेंटाइन वीक की शुरूआत की। चॉकलेट डे पर दोनों ने मिलकर विदेशी चॉकलेट का स्वाद लिया।

- अब तक बाजार में वेलेंटाइन डे की धमक सुनाई पडने लगी। विक्रम को आलम बदला-बदला लगने लगा था।

किस डे पर अनिता ठिठक गयी। विक्रम कुछ कहता इससे पहले वह ही बोल पड़ी. 'ड्यू रहा। उसकी आँखो में उमड़ता विनय देखकर वह मुस्करा कर चला गया।

14 फरवरी के कार्यक्रम की निश्चित रूपरेखा विक्रम अनिता को बता चुका था। सबसे पहले शॉपिंग-मील पहुँचकर अनीता को अपने लिए एक परिधान खरीदना था। दोपहर को साथ-साथ लंच लेने के बाद शाम को आइमेक्स में पिक्चर देखनी थी। देर रात लौटना था। कार का प्रबन्ध वह कर चुका था।

12 फरवरी की शाम को विक्रम का सेलफोन एक् बार फिर घनघनाने लगा। डॉ दिनेश ने उसे तुरन्त नर्सिंग होम पहुँचने का आदेश दिया। उनका स्वर कुछ बदला-सा था। पहली बार उसे अनजाना डर-सा लगा। नर्सिंग होम में पहुँचा तो विक्रम ने महसूस किया कि नये मरीज की कोई हलचल वहीं नहीं थी। अनीता ने ही इशारे से सीधे डा० दिनेश के चैम्बर में जाने के लिए कह दिया। अपने चैम्बर में डा० दिनेश थे। माफी माँगने के लिए गिडगिड़ाता मैडिकल स्टोर वाला राहुल उनके पैरों में बैठा था। दोनों को देखकर विक्रम के आगे धरती-आसमान घूम गया।

विक्रम को देख राहुल फुर्ती से उठा। स्तब्ध विक्रम की जेब में रखे हजार-हजार के नोट निकालकर डाँक्टर साहब को दे दिए। जो उसने दोपहर को उसे को दिए थे।

अनीता भी चैम्बर के दरवाजे के पास खड़ी हो गयी।

'मेरी ओ०टी० से मैडिसन चोरी हो रही हों, तुमने यह कैसे मान लिया कि मुझे इसका अहसास नहीं होगा। तुम जैसे कई पिल्लों को मैं लात मार -चुका हूँ। औकात में रहना नहीं जाना। चोर बन गया। एडवांस नहीं दूंगा तो चोरी करेगा। तू क्यों माँग रहा था यह मुझे मालूम था। तेरी इतनी बेइज्जती काफी है। राहुल से मैं निपटता रहूंगा। जा दफा हो जा। डाँ० दिनेश ने बिना किसी उत्तेजना दिखाए यह सब कहा।

नर्सिंग होम से बाहर निकलते समय विक्रम को महसूस हुआ कि एक छलांग में पार की जा सकने वाली तीनों सीढियाँ उसके लिए तीन सदियों के बराबर हो चुकी हैं। बाहर बाजार वेलेंटाइन वीक की आंधी में उड़ रहा था। डिस्कों धुनें भांगडा कर रही थीं। दुकानें दिल की आकृति की बंदनवारों से सजी थीं। उसी समय विक्रम को डा० दिनेश की बात याद आयी। नब्बे प्रतिशत भारत यदि 1० प्रतिशत इंडिया की होड़ करेगा तो बेइज्जत होगा ही।

- अजय गोयल

निदान नर्सिंग होम, फ्रीगंज रोड, हापुड़-245101

मो० - ०9837259731

a.ajaygoyal@rediffmail.com

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 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. 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गुणशेखर,1,ग़ज़लें,482,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,82,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,309,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,213,लघुकथा,793,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,16,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,302,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1865,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,618,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,668,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,49,साहित्यिक गतिविधियाँ,179,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,51,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: अजय गोयल की कहानी - वेलेंटाइन डे
अजय गोयल की कहानी - वेलेंटाइन डे
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