महावीर सरन जैन का आलेख - प्रेमचन्द का कथा-साहित्यः भावगत और भाषिक प्रदेय

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प्रेमचन्द का कथा-साहित्यः भावगत और भाषिक प्रदेय

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

31 जुलाई को प्रेमचन्द की जन्मतिथि है। प्रेमचन्द के रचना संसार की कालावधि लगभग 30 वर्षों की है। लगभग सन् 1906 से लेकर सन् 1936 तक की कालावधि में उन्होंने हिन्दी-उर्दू में जो कुछ रचा, जिसका सृजन किया, उस रचित एवं सृजित साहित्य का महत्व अप्रतिम है। उस साहित्य में भारतीय समाज की जिन परिस्थितियों एवं विसंगतियों को उजागर किया गया है उनमें से बहुत सी परिस्थितियों एवं विसंगतियों में बदलाव आ गया है। इस दृष्टि से प्रेमचन्द साहित्य की प्रासंगिकता पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाए जा सकते हैं। मैं सम्प्रति इस विवाद के सम्बंध में विचार व्यक्त नहीं कर रहा हूँ। मैं आज के दिन उनके प्रति अपनी श्रद्धा स्वरूप दो तथ्य रेखांकित करना चाहता हूँ –

(1) आज कुछ साहित्यकार अपने साहित्य में आम आदमी के चित्रण के नाम पर उसकी निराशा, हताशा, अवसाद एवं टूटन को महिमांडित कर रहे हैं। जिस साहित्य को खुदा न खास्ता आम आदमी किसी प्रकार पढ़ले अथवा किसी से सुनले तो पहले उसके मन में आत्महत्या करने का कोई विचार न भी हो तो उस साहित्य को पढ़ने अथवा सुनने के बाद आत्महत्या करने का भाव अवश्य पैदा हो जाए। प्रेमचन्द आम आदमी के दुख दर्द को आम आदमी की जुबान में उजागर करते तो हैं मगर उसे आत्महत्या करने के लिए उकसाते नहीं; इसके ठीक विपरीत वे अपने साहित्य में उसकी बेहतरी के उपाय सोचते हैं, परिस्थितियों से जूझने की, अपने जीवन के विकास के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देते हैं। संघर्ष का अर्थ मार्क्सवादी संघर्ष नहीं, खूनी क्रांति में सहभागिता नहीं अपितु अदम्य साहस, कर्म एवं पुरुषार्थ के भावों की जागृति है। उनका साहित्य मन में विश्वास जगाता है कि भले ही साधनों की कमी हो, पैसे का अभाव हो मगर यदि किसी के मन में आगे बढ़ने की लालसा हो तो उसे आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता। अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए पाठकों की सुविधा के लिए उनके उपन्यास “रंगभूमि” से एक संवाद उद्धृत करना चाहूँगा –

अपनी झोपड़ी जल जाने पर भतीजा मिठुआ सूरदास से पूछता है –

“दादा । अब हम रहेंगे कहाँ ?

सूरदास – “दूसरा घर बनायेंगे”

मिठुआ – “और कोई फिर आग लगादे”

सूरदास – “तो फिर बनायेंगे”

मिठुआ – “और कोई हजार बार लगादे”

सूरदास – “तो हम हज़ार बार बनायेंगे”

हिन्दी या उर्दू का कौन कथाकार है जो यह दावा करे कि उसने प्रेमचन्द से रोशनी हासिल नहीं की है। प्रेमचन्द के कथा-साहित्य से हज़ारों चिराग जले हैं। कामना है, उस चिराग से आनेवाले लाखों चिराग जलें। हमारे सबके जीवन से अँधियारा मिटे। हमारे सबके जीवन में नई रोशनी आए। हमारे समाज का विकास-पथ आलोकित हो।

(2) जब प्रेमचंद ने उर्दू से आकर हिन्दी में लिखना शुरु किया था तो उनकी भाषा को देखकर छायावादी संस्कारों में रँगे हुए आलोचकों ने बहुत नाक भौंह सिकौड़ी थी तथा प्रेमचंद को उनकी भाषा के लिए पानी पी पीकर कोसा था। मगर प्रेमचंद की भाषा खूब चली। खूब इसलिए चली क्योंकि उन्होंने प्रसंगानुरूप किसी भी शब्द का प्रयोग करने से परहेज़ नहीं किया। प्रेमचन्द के कथा-साहित्य की भाषा में देश की मिट्टी की खुशबू है।सन् 1934 में अप्रैल के “जागरण” के अंक में प्रेमचन्द ने लिखा –

“अगर उर्दू को भी हिन्दी में मिला लिया जाए – क्योंकि जहाँ तक बोली का सम्बंध है, इन दोनों भाषाओं में कोई अंतर नहीं – तो हिन्दी बोलने वालों संख्या 15 करोड़ से कम नहीं है और समझने वालों की संख्या तो इससे भी ज्यादा है। आश्चर्य है कि अभी तक वह क्यों कौमी जबान नहीं बन गई”।

प्रेमचन्द ने यह बात सन् 1934 में कही थी। उस समय पूरे मुल्क की आबादी 33 करोड़ थी। आज हिन्दी-उर्दू बोलने वालों की संख्या बदल गई है।

(सन् 1991 की जनगणना के अनुसार भारत की पूरी आबादी 83,85,83,988 है। मातृभाषा के रूप में हिन्दी को स्वीकार करने वालों की संख्या 33,72,72,114 है तथा उर्दू को मातृभाषा के रूप में स्वीकार करनेवालों की संख्या 04,34,06,932 है। हिन्दी एवं उर्दू को मातृभाषा के रूप में स्वीकार करनेवालों की संख्या का योग 38,06,79,046 है जो भारत की पूरी आबादी का 44.98 प्रतिशत है।)

प्रेमचन्द की मान्यता थी कि हिन्दी एवं उर्दू एक ही भाषा के दो रूप हैं। “कुछ विचार” के पृष्ठ 641 पर उनके ही जुमले पर गौर कीजिए –

“आज हिन्दुस्तान के 15, 16 करोड़ लोगों के सभ्य व्यवहार और साहित्य की यही भाषा है। हाँ, वह लिखी जाती है दो लिपियों में और इसी एतबार से हम उसे हिन्दी या उर्दू कहते हैं, पर वह है एक ही। बोलचाल में तो उसमें बहुत कम फर्क है। हाँ, लिखने में फर्क बढ़ जाता है”।

प्रेमचन्द ने अपने कथा-साहित्य एवं विचार-साहित्य में हिन्दी और उर्दू के फर्क को दूर करने की लगातार कोशिश की। आरम्भिक रचनाओं में उनके प्रयोग कहीं-कहीं सहज नहीं लगते। उदाहरणार्थ: “खण्डहर की टूटी महराबें, गिरी हुई दीवारें, धूल धूसरित मीनारें इन लाशों को देखतीं”। मगर धीरे-धीरे उनकी भाषा में गाँव के किसानों तथा शहर के मजदूरों की रोजमर्रा बोली जाने वाली ज़बान की रवानगी का रंग गाढ़ा होता गया है। कथा-भाषा के निर्माण की ऐतिहासिक आवश्यकता को प्रेमचन्द ने बखूबी पहचाना और इसी कारण उनके निर्मला, रंगभूमि, गबन, कर्मभूमि तथा गोदान उपन्यासों में तथा परवर्ती कहानियों में आम आदमी के आँगन में बोली जाने वाली भाषा-धारा का बहाव तेज़ होता गया है। यह भाषा पत्थरों और चट्टानों के बीच ठहरा हुआ पानी नहीं है। यह भाषा पत्थरों और चट्टानों के ऊपर से बहता हुआ पानी है जिसमें आम आदमी के द्वारा बोले जानेवाले अरबी-फारसी शब्दों का तो प्रयोग हुआ ही है; अंग्रेजी शब्दों का भी खूब प्रयोग हुआ है। अपील, अस्पताल, ऑफिसर, इंस्पैक्टर, एक्टर, एजेंट, एडवोकेट, कलर, कमिश्नर, कम्पनी, कॉलिज, कांस्टेबिल, कैम्प, कौंसिल, गजट, गवर्नर, गैलन, गैस, चेयरमेन, चैक, जेल, जेलर, टिकट, डाक्टर, डायरी, डिप्टी, डिपो, डेस्क, ड्राइवर, थियेटर, नोट, पार्क, पिस्तौल,पुलिस, फंड, फिल्म, फैक्टरी, बस, बिस्कुट, बूट, बैंक, बैंच, बैरंग, बोतल, बोर्ड, ब्लाउज, मास्टर, मिनिट, मिल, मेम, मैनेजर, मोटर, रेल, लेडी, सरकस, सिगरेट, सिनेमा, सिमेंट, सुपरिन्टेंडैंट, स्टेशन आदि हजारों शब्द इसके उदाहरण हैं। अंग्रेजी के ये शब्द ‘ऊधारी’ के नहीं हैं; जनजीवन में प्रयुक्त शब्द भंडार के आधारभूत, अनिवार्य, अवैकल्पिक एवं अपरिहार्य अंग हैं।

प्रेमचंद के समय में छायावादी रचनाकार ठेठ हिन्दी की प्रकृति के विपरीत तत्सम बहुल संस्कृतनिष्ठ भाषा रच रहे थे तो उर्दू के अदबीकार फारसी का मुलम्मा चढ़ा रहे थे। प्रेमचंद दोनों अतिवादों से बचे। प्रेमचन्द के कथा-साहित्य ने हिन्दी फिल्मों की ही तरह गाँवों और कस्बों की सड़कों एवं बाजारों में आम आदमी के द्वारा रोजमर्रा की जिंदगी में बोली जाने वाली बोलचाल की भाषा को नई पहचान दी। जन-भाषा की क्षमता एवं सामर्थ्य ‘शुद्धता’ से नहीं, ‘निखालिस होने’ से नहीं, ‘ठेठ’ होने से नहीं अपितु विचारों एवं भावों को व्यक्त करने की ताकत से आती है।हिन्दी को अमिश्रित, शुद्ध एवं खालिस बनाने के प्रति आसक्त तथाकथित विद्वानों की बात यदि मान ली जाए तो कभी सोचा है कि उसका क्या परिणाम होगा।उस स्थिति में तो हमें अपनी भाषा से आकाश, मनुष्य, चन्द्रमा, दर्शन, शरीर एवं भाषा जैसे शब्दों को निकाल बाहर करना होगा। इसका कारण यह है कि ये सारे शब्द हिन्दी के नहीं अपितु संस्कृत के हैं। ठेठ हिन्दी के शब्द तो क्रमशः आकास, मानुस, चन्दा, दरसन, सरीर तथा भाखा हैं। जरा सोचिए, संस्कृत के कितने शब्द हिन्दी में आते आते कितना बदल गए हैं। उदाहरणार्थ, कर्ण का कान, हस्त का हाथ तथा नासिका का नाक हो गया है।

अपनी भाषा को उन्होंने गाँधी जी की भाँति ‘हिंदुस्तानी’ कहा जो ‘बोलचाल के अधिक निकट’ थी। इस सम्बंध में उन्होंने स्वयं कहाः

‘साहित्यिक भाषा बोलचाल की भाषा से अलग समझी जाती है। मेरा ऐसा विश्वास है कि साहित्यिक अभिव्यक्ति को बोलचाल की भाषा के निकट से निकट पहुँचना चाहिए’।

प्रेमचंद की भाषा में ‘समाज के सबसे निचले स्तर के अशिक्षित, देहाती एवं तथाकथित गँवारू लोगों द्वारा बोली जाने वाले शब्दों एवं भाषिक रूपों का भी जमकर प्रयोग हुआ है। उदाहरण के लिए ‘महावर, नफरी, चंगेरी, ठिकोना, पचड़ा, बिसूर, डींग, बेसहाने, हुमक, धौंस, बधिया, कचूमर’ आदि जनप्रचलित ठेठ शब्द प्रस्तुत हैं। प्रेमचंद के द्वारा समाज के सबसे निचले स्तर के देहाती लोगों की बोली से शब्दों को पकड़ लाने, खींच लाने पर फिदा समकालीन आलोचक बेनीपुरी की टिप्पणी है –

‘जनता द्वारा बोले जाने वाले कितने ही शब्दों को उनकी कुटिया मड़ैया से घसीटकर वह सरस्वती के मंदिर में लाए और यों ही कितने अनधिकारी शब्दों, जो केवल बड़प्पन का बोझ लिए हमारे सिर पर सवार थे, इस मंदिर से निकाल फेंका।’

प्रेमचन्द के कथा-साहित्य में मानव-भावों के सजीव चित्रांकन का जितना महत्व है उतना ही महत्व उनके भाषिक प्रदेय का भी है

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

(सेवा निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान)

123, हरि एन्कलेव

बुलन्द शहर – 203001

mahavirsaranjain@gmail.com

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