रविवार, 11 अगस्त 2013

सिन्धी कहानी - मासूम यादें

सिन्धी कहानी

मासूम यादें

मूल: कमला मोहनलाल बेलाणी

अनुवाद: देवी नागरानी

इक सोज़ भरी कहानी, खून के आँसू बहाती हुई रागिनी बनकर मेरे अंदर को चीरती रही। मेरे अंदर से यह किसी आवाज़ आलाप बनकर कह रही है तुमने ऐसा क्यों किया ? क्यों इन्सानियत का ख़ून किया ?

मैं रोती हूँ... तड़पती हूँ... नैनों से असुवन का आबशार बहाती हूँ... बावजूद इसके जग में जीती हूँ। मैंने उसको बार-बार चूमा, उसकी उंगलियों को अपनी ऊँगलियों से उलझाकर स्पर्श महसूस करती रही। वह शर्मा जाता था। उसकी शर्मीली मुस्कराहट पर मैं अपना सर क़ुरबान करने को तैयार थी। नहीं जानती थी कि उसकी आँखों में कौन-सा जादू भरा था। चाहती थी कि मैं उसकी आँखों में बस जाऊँ, वह आँखें बंद कर ले और मैं उनमें समा जाऊँ।

उसने मेरे गालों पर अपना हाथ फेरा था। मेरी आँखों से आँखें मिलाई थी। ख़ामोश ज़ुबान से ये भी कहा था - ‘‘हमारा संबंध जनम-जनम का है।’’ मैंने बार-बार उसका नाम पूछा था, पर वह मेरी तरफ़ देखकर सिर्फ़ मुस्कराता था। शायद चेहरे की मुस्कान ही उसका नाम था।

मैं हर शाम बाग़ में जाती रही, उसका इन्तज़ार करती रही। न कभी मैंने और न कभी उसने नागा किया। संयोग से अगर रास्ते में मिल जाता, तो वह अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ा देता था और सहज ही मेरे मुँह से निकल जाता था - ‘‘मैं तो तुम्हारी तरफ़ आ रही थी।’’ एक अजीब कशमकश थी, एक अनोखी कशिश भरी प्रीत थी।

एक शाम वह बगीचे में देर से आया। मैं बाग़ के कोने में एक मुंडेर पर बैठी थी। वह मेरी तरफ़ बढ़ा और क़दम की रफ़्तार बढ़ाते हुए आकर मेरे गले से लिपट गया।

कुछ आदमी हमारी तरफ़ बढ़ रहे थे। वह उनको देखकर सुबकने लगा और मैंने उसे अपनी बाहों के घेरे में और ज़्यादा कस लिया। मैंने ऐसे महसूस किया जैसे हम दोनों एक हो गए हैं। अजनबी बढ़ते रहे - जैसे वे नज़दीक आते रहे वैसे ही वह मेरी छाती से बेल की तरह चिपकता रहा। मैंने उनसे पूछा - ‘‘आप इस तरह मेरी तरफ़ सावली निगाहों से क्यों देख रहे हैं ?’’

एक ने कहा - ‘‘यह हरिजन है।’’

दूसरा बोला - ‘‘यह गूँगा है।’’

तीसरे ने कहा - ‘‘अनाथ बालक है। आश्रम से भाग आया है।’’

मेरी बांहें ढीली पड़ गई। मेरी मासूम मुहब्बत का महल पल में ढेर हो गया। उफ़ ! मैंने हरिजन बालक को गले से लगाया था! उसने मेरे गालों पर हाथ फेरा था! मैंने उसके गालों को चूमा था!

मैं सारी रात रोती रही, गीली आँखों से दूर गगन की ओर देखती रही। तारे-सितारे टिमटिमा रहे थे। एक तारा आसमान की छाती से टूटकर तेज़ रफ़्तार से गिरता हुआ ग़ायब हो गया। मेरे सीने से सर्द आह निकली। दिल के दर्द की रफ़्तार बढ़ती रही, महसूस किया जैसे कोई भारी भरकम वज़न मेरी छाती पर रखा हुआ हो। दर्द के दबाव को मैं झेल नहीं पाई। ख़ुश्क लबों पर जीभ फेरी, सिसकी को रोकने की कोशिश की, पर अनायास वो बाहर आई। लगातार सिसकियों की आवाज़ पर मेरे घर के सदस्य नींद से जाग उठे।

पति ने पूछा - ‘‘क्यों क्या हुआ ?’’

सास ने कहा - ‘‘कहाँ पर दर्द है ?’’

मैंने होश सँभालते हुए उनसे कहा कि मैं बिलकुल ठीक हूँ वो जाकर आराम से सो गए। दूसरे दिन मैं दस्तूर के मुताबिक बाग़ में गई। वह नहीं आया। उसके बिना सारा चमन उजड़ा हुआ लगा।

माली फूलों की क्यारियों को जड़ से उखाड़ कर फेंक रहा था। नज़र उठाकर उनकी ओर देखा तक नहीं, शायद वे मुरझा चुके थे, बदज़ेब हो गए थे। उन फूलों की जैसे बाग़ में ज़रूरत ही न रही।

सामने तालाब के पानी में कमल का फूल गर्दन ऊँची किये खड़ा था। उस फूल के सामने शायद और फूल शर्मा गए, क्योंकि कमल निर्लेप है, पवित्र है। ऐसे पवित्र फूल के आगे और किसी फूल की महक का क्या महत्व? संसार का चलन ही ऐसा है। मैं ब्राह्मण हूँ और वह हरिजन का अनाथ बालक और गूँगा... !!

ये मुरझाए फूल अपनी कहानी कमल फूल को सुना नहीं सकते, क्योंकि वे बेज़ुबान है, हरिजन है, अनाथ है।

मैंने हरिजन आश्रम में क़दम रखा। गाँधी का अमर पुतला देखा। उनके हाथ में लकड़ी देखी... उनके क़दम देखे, उनकी आँखों से आँखें मिला न सकी।

मेरी वेशभूषा देखकर हरिजन बच्चे सहमे से अपने कमरों की ओर दौड़ने लगे। मुझे उसकी तलाश थी। मैंने एक सेवक से पूछा - ‘‘वह कहाँ है जो हर शाम बाग़ में आता था ?’’ जवाब मिला - ‘‘कौन ? क्या वही गूँगा हरिजन अनाथ बालक जो शाम को प्रार्थना के वक़्त ग़ायब हो जाता था ?’’

मैंने कहा - ‘‘प्रार्थना से प्रीत प्यारी समझी होगी। इस सबब चला आता था... मैं उसी की तलाश में हूँ।’’

सेवादार ने उत्तर में कहा - ‘‘वो आपको अब फिर नहीं मिलेगा। कल शाम जब उसे बाग़ से पकड़कर ले आ रहे थे, तो बीच रास्ते में वह हाथ छुड़ाकर भागा और मोटर के नीचे आकर मर गया।’’

मुझपर अनायास कौंधती बिजली बरसी। ठंडी आह भरते हुए होश संभाला और घर लौट आई। उस पल से मेरे नैनों की नींद अधूरी है। हर रात गांधीजी की लाठी की ठक-ठक सुनती हूँ। धीरे-धीरे वह आवाज़ मेरी कानों से दूर होती जाती है। जितनी दूर वह आवाज़ जाती है, उतनी ही वह मेरे दिल के क़रीब होती जाती है। काश ! यह बापू की अधूरी कहानी, सिर्फ़ लेखकों और शायरों की क़लम की नोक तक नहीं, बल्कि उनके सीने की गहराइयों तक पहुँचे और समाज के ठेकेदारों के दिलों में हलचल मचाए।

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