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सिन्धी कहानी - वो जहान - ये मन

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सिन्धी कहानी - वो जहान - ये मन मूल: ए. जे.उत्तम अनुवाद: देवी नागरानी मुझे बोध नहीं था कि चारों तरफ़ फैले हुए बाहरी जहान के तपोबन का एक ति...

सिन्धी कहानी-

वो जहान - ये मन

clip_image002[4]मूल: ए. जे.उत्तम

अनुवाद: देवी नागरानी

मुझे बोध नहीं था कि चारों तरफ़ फैले हुए बाहरी जहान के तपोबन का एक तिनका भी इतना बलवान है कि अंतर्मन पर सालों की अंधेरी गुफ़ाओं पर जमा हुआ मैल, छुहाव से ही मिटा देगा। इस मार्केट में बैठी भाजी वाली के दो-चार शब्दों में जाने क्या बात थी जो अंदर में हलचल मच गई। जाने क्या सोचकर शिकायत कर बैठी ‘‘मुझे आधे रुपए में सिर्फ़ दो चार पत्ते कोतमीर दिये है, पर उस दूसरे आदमी को तो ढेर सारा कोतमीर दे दिया। मैंने भाजियाँ भी ज़्यादा ली हैं, और मैं तो तुम्हारी रोज़ की ग्राहक भी हूँ। मगर ये आदमी तेरा कौन लगता है?’’

भाजी वाली अल्हड़ जवान थी सो शोखी से कहा - ‘‘ये यार लगता है’’ यह सुनकर और भाजी वालियाँ भी हँसने लगीं और बेचारा वह आदमी हक्का-बक्का-सा होकर चलता रहा।

मैं भी कुछ परेशान हुई, पर फिर भी भाजी वाली को तुच्छता का अहसास दिलाने की खातिर कहा - ‘‘इस यार की बात सुनकर कहीं तेरा पति तुझे न मारे !’’

वह तुनककर बोली - ‘‘क्यों मारेगा ? उसको भी तो मिल में मज़दूर सहेलियाँ ‘यार’ बुलाती हैं।’’

मैंने कहा - ‘‘यह सुनकर तुझे ईर्ष्या नहीं होती उसकी सहेलियों से ?’’

कहने लगी - ‘‘कौन-सी पत्नी को ईर्ष्या नहीं होगी ? पर घर-बार और इस काम के बीच इतनी फ़ुर्सत कहाँ है जो उस ईर्ष्या को ले बैठें ? ये आप जैसे फ़ुर्सत मिजाज लोगों का मर्ज़ है। आपके पति के साथ कोई जवान लड़की मुस्कराकर दो मीठे बोल बोलेगी तो भी हसद और अविश्वास होगा कि कहीं वह उसे आप से छीन न ले।’’

ऐसा कहकर वह मिल मज़दूर की पत्नी भाजी वाली तो हँसने लगी पर साथ में सुर मिलाकर और भाजी वालियाँ भी हँसने लगीं।

मेरे मन ने और ज़्यादा सुनने में अपनी लाचारी दिखाई और मैं भाजी की थैलियाँ लेकर घर की ओर रवाना हुई। पर उस भाजी वाली के सीधे-सादे अल्फ़ाज़ - ‘ये यार लगता है, ये आप जैसे फ़ुर्सत-मिज़ाज लोगों का मर्ज़ है।’ मेरे अंदर में प्रतिध्वनित होकर गूँजने लगे और मेरे पाँव घर पहुँचने को बेताब हो उठे।

घर पहुँची, दरवाज़े पर दस्तक दी तो दरवाज़ा खुलते ही बहू को तैयार होकर सहेली के साथ ऑफिस के लिये निकलते देखा। बेटा तो पहले ही ऑफिस गया हुआ था। मुझे देखकर सहेली ने मेरी बहू से कहा - ‘‘अच्छा यार, चलो जल्दी करो।’’ ये न हो कि बहू मेरे साथ बात करने के लिए रुक जाए। कैसी मशीनी मनोवृत्ति हो गई है ! ज़माना भी कितना बदल गया है। हर किसी को लड़कियों ने ‘यार-दोस्त’ बना लिया है। मुझे इस लफ़्ज से जुड़ा मेरा माज़ी याद आने लगा। मुझे विभाजन के वक़्त की सिंध की याद सताने लगी। जब एक कंवारी ने इस लफ़्ज ‘दोस्त’ से मेरे मन में हसद और अविश्वास का बीज बोया था, जिसने यहाँ आकर मेरे पति को दुख के घेराव में घेर लिया।

उस वक़्त सिंध में मैट्रिक ही पास की थी कि मुल्क का विभाजन हुआ। कॉलेज में पढ़ने की कितनी खुशी और ख़्वाहिश थी, लेकिन इस विभाजन ने हमारी हर ख़ुशी और ख़्वाहिश का अंत कर दिया। हमारे लिये चारों ओर डर, दहशत और बेसलामती वाली हालत पैदा हो गई, बावजूद इसके सिन्ध में बाहर से आए लोग बसने लगे तो वहाँ रहना और ही संकटमय हो गया।

अंग्रेजों द्वारा विभाजन के ऐलान से रातों-रात हम सिंध धरती के मालिक, ग़ैर से हो गए और आए हुए ग़ैर धाकड़ महमान मालिक बन गए, क्योंकि वे मुसलमान थे और हम हिन्दू। यह मतभेद का ज़हर, प्यार-मुहब्बत में रहने वाले हिन्दुओं में नए सिरे से फैल गया, हालाँकि जिस जिन्ना साहब ने हिंदू-मुसलमान को जुदा क़ौम कहकर बँटवारा कराया, उसने पाकिस्तान को गवर्नर-जेनरल होने पर पहले दिन कहा कि अब पाकिस्तान में न कोई मुसलमान और न कोई हिन्दू बुलाया जाएगा, पर मुल्क का एक जैसा शहरवासी बराबर और हक़दार रहेगा, मगर इस ऐलानों पर अमल नहीं किया गया।

इसलिये जवान पीढ़ी को जैसे मौक़ा मिला वैसे ही अपना घर, उसमें सजाई हुई हर शै को कौड़ियों के दाम बेचकर जाना पड़ा। कुछ तो अपने कच्ची उम्र की कन्याओं की शादी कराने में लग गए। रातो-रात मंगनी और ब्याह होने लगे। कहीं पर न पूरी तरह से शादी की रस्में निभाई गईं, न खुशी के साथ नाचना-गाना ही हुआ। बस ख़ामोशी की घुटन में ही बंधन बाँधे गए और सात फेरे लगवाए गए। न जात का पता लगवाया, न सूरत और सीरत, न इल्म, न ही अक़्ल, न प्यार व पसंदी, न स्वभाव और विचारों को ही देखा गया। मैं भी इसी तरह बंधन में बाँध दी गई, ख़ुद से सात-आठ साल बड़ी उम्र वाले कॉलेज पढ़े हुए एक मास्टर के साथ, माँ-बाप की अनेकों मिन्नतें की कि मैं अभी नाबालिग बालिका हूँ, कॉलेज में पढ़ने दो, छोटी उम्र में ही शादी के जंजाल में न फँसाओ पर उन्होंने मुझे मेरी उम्र की औरतों को दिखाते हुए कहा कि वे उसकी उम्र में दो-तीन बच्चों की माएँ बन चुकी है। इस तरह मुझे शादी करवाकर मेरी माँ, छोटा भाई और बहन सिंध से चले गए। हैदराबाद स्टेशन पर, ट्रेन में चढ़ते समय उन्हें भेड़-बकरियों की तरह जूझने का नज़ारा याद करके आज भी मेरी छाती में धड़कन तेज़ हो जाती है।

मैके की रवानगी के बाद हम घर लौटे तो मेरा पति मुझे भीतर छोड़कर, ख़ुद पड़ोस में मुस्लिम दोस्तों के पास चला गया। मैंने भीतर आकर कुछ साँस ली ही थी कि सास ने कोई किताब मुझे देते हुए नाटकीय ढंग से कहा - ‘‘अरी बहुरिया, ये देख, वो पड़ोस वाली कॉलेजी छोरी है न, उसने यह किताब तेरे पति के लिये दिया है। जब पूछा कि तू उसकी कौन लगती हो, तो खुशी से हँसते हुए कहा – वह मेरा दोस्त है।’’

वही ‘दोस्त’ लफ़्ज, ‘यार’ के रूप में आज उस भाजी वाली के मुँह से सुनकर तीस साल पहले की सिंध की कहानी आँखों के आगे फिर उभर आई। उस ज़माने में दोस्त लफ़्ज पर मेरी सास को तो अजब लगा था, पर मेरी भी सोच झुंझला गई। फिर उस किताब में अंग्रेजी शायर बायरन का ‘‘डान जान’’ का इश्की किस्सा व रोमांस वाले फोटो देखे तो ख़ून कुछ जमने-सा लगा। वे तस्वीरें सास को दिखाते हुए कहा - ‘‘देखो अपने लाड़ले के करतूत, कैसी किताबें पढ़ाता है कँवारी लड़कियों को ?’’

यह सुनते ही सास ने जो सुनाया वह आज तक नहीं भूली हूँ मैं, कहा - ‘‘बेड़ा ग़रक़ हो ज़माने का, देखो ना कंवारी छोरी को क्या ज़रूरत थी जो तेरे पति को दोस्त बनाने चली है।’’

मुझे सास का यह सच दिल से लगा जो आज भी नहीं बिसरा। हक़ीक़त में मेरी स्वर्गवासी सास सीधी-सादी, साफ़ गोयाई व सच कहने की पक्षधर थी। कभी उसका बेटा उसके खिलाफ़ की हुई मेरी शिकायत मानकर उसे कुछ कहता तो वह बेधड़क कहती थी - ‘‘पगला गया है। दर्द पीकर तुझे जनम दिया है। माँ का अदब-लिहाज़ कर, बीवी का ग़ुलाम न बन।’’

यह सुनकर सारे घर में एक खिलखिलाहट का स्वर सुनाई देता, पर मैंने उस वायुमंडल को पार करते जब पति को गुस्से से कहा - ‘‘यह देखो ‘डान’ जान की रोमांस का किताब आपकी सहेली दे गई है।’’

उसने माँ की तरह सीधे-सादे अंदाज़ में कहा, ‘‘तुमने कॉलेज नहीं पढ़ा है, नहीं तो इस किताब पर इस क़दर गुस्सा व हसद न होता। यह आज़ादी के पैगंबर कवि बाइरन और शैली वगैरह कॉलेजी कोर्स में पढ़ने पड़ते हैं। ख़ुद हमारे टैगोर, जवाहरलाल के भी ये प्रिय कवि थे। यह ‘डान जान’ किताब पड़ोसन मिस भारवानी ने ख़ुद पढ़ने के लिये कॉलेज की लाइब्रेरी से लिया है, वही मुझे भी पढ़ने को दे रही है। सच मानो किताब ही हमारी सब से दुर्लभ दोस्त है।’’

मैंने तन्ज़ी रवैये से पूछा - ‘‘उस सहेली मिस भारवानी से भी ?’’

और पति ने उस तन्ज़ का जवाब बेहद सादगी से दिया, ‘‘अरे हाँ, और नहीं तो क्या?’’

उन्हें बराबर किताबों से बेहद प्यार था, वे बेहद चाव के साथ पढ़ा करते थे, जो कुछ उन्हें अहम लगता था उसके नीचे लकींरे खींचते थे। कितने ही आदमी उनके पास किताब देने-लेने और सलाह करने आया करते थे। पर भूल से भी वही सहेली उनके पास आई थी तो बहुत जलन और हसद हुआ करता था और उसके कहे लफ़्ज ‘वो मेरा दोस्त’ है, दिमाग़ पर हथौड़े की तरह चोट करते।

मैं इसलिये ही सिंध से तब्दीली के लिये पति को बरबस कहती रही, पर वे ऐसा करने को तैयार न थे। इस क़दर कि उसके सब रिश्तेदार भी वहाँ से चले गये, पर फिर भी कहने लगे - ‘‘ये जननी जन्म भूमि कैसे छोडूँ ? श्री रामचन्द्र जी ने भी अपनी जन्मभूमि अयोध्या को सोने की लंका के आगे तुच्छ समझा था। हमारी सिंधड़ी हमारे लिये ऐसी ही अहम पवित्र भूमि है।’’

पर मेरा शक फिर भी बढ़ता रहा कि ये सब बहाने बना रहे हैं, वो इस सहेली से दूर होना नहीं चाहते। हसद और शक ने मन पर मैल की परतें चढ़ा दीं। उस सहेली के लफ्ज़ याद आया करते थे - ‘वो मेरा दोस्त है।’

वहाँ विभाजन के कारण मुल्क की हालत बदत्तर होने लगी। अख़बारों में हिन्दू-मुस्लिम के बीच में नफ़रत और कुलफ़त बढ़ जाने की खबरें छपने लगी। सिन्ध में जहाँ पहले हिन्दू मुसलमान पास पड़ोस में माई-बाप बनकर बैठे थे, वे अभी एक दूसरे के दोस्त और मददगार भी नहीं बन सके। इसके बावजूद मेरे पति सिन्ध को छोड़ने की मेरी बात से सहमत नहीं हुए। उस वक़्त विभाजन को छः महीने भी नहीं हुए थे कि बाहरी लोग भीतर आए और हैदराबाद में फ़साद को बढ़ावा देने लगे। कुछ वक़्त पहले कराची में भी उन्होंने फसाद करवाया था, जो विभाजन के पहले सिन्ध में नहीं हुए थे।

उन फ़सादों में हमारे सिन्धी मुसलमान दोस्तों का वक़्त के पहले हमें आगाह करना और मदद करना हमारे बचाव का कारण बना, और कई जगहों पर भी सिन्धी मुसलमान हिन्दुओं का बचाव हुआ, जैसे भारत में भी फ़सादों के वक़्त हिन्दुओं ने अपने मुस्लिम पड़ोसियों और दोस्तों का बचाव किया था।

उस मनहूस जनवरी महीने के अंत में देशपिता महात्मा गांधी की शहीदी की ख़बर सुनकर हाहाकार मच गया। मेरे पति ने तो रोकर ख़ुद को बेहाल कर दिया। वे इतने दुखी और उदास हुए कि आख़िर सिन्ध छोड़ने के मेरे प्रस्ताव को मान लिया, हालाँकि उनकी सहेली अभी भी वहाँ से कहीं गई न थी। तब जाकर ख़ुशी हुई और मेरे मन को कुछ चैन मिला। लेकिन अजब तब लगा जब वहाँ से रवाना हो रहे थे, तब वह मेरे पति से मिलने आई तो दिल में दबा हसद फिर जाग उठा। हँसते हुए उसने कहा - ‘‘इस बहन को भी साथ लेकर नहीं जाओगे ?’’ मैंने जब उसको देखा अनदेखा किया तो उसने फिर से अंग्रेजी में अपने दोस्त से कहा - ‘‘मुझको भुला भूला तो न दोगे ?’’ तो मैं जलभुन उठी। हालाँकि इसी अंदाज में मेरे पति के दोस्तों ने भी मेरे साथ अपनाइय से बात की है, पर उनको तो कभी भी हसद नहीं हुआ है। आज भी उस भाजी वाली की गुफ़्तार ने इस नज़ारे को मन के पर्दे पर ज़िन्दा करके खड़ा कर दिया है।

हम मुम्बई की ओर रवाना होने के लिये कराची में आए, वहीं पति के कुछ मुस्लिम दोस्त अलविदा कहने आए और भरे गले से बार-बार कहा - ‘‘माँ सिंधड़ी को न भुलाना।’’ मेरे पति को अलविदा कहने कहा - ‘‘दुआ करना कि यहीं अपनी माँ के पास जल्दी लौट आएँ।’’ मुझे उसकी यह बात बिलकुल भी भली नहीं लगी और मैंने पति से कहा - ‘‘अब यहाँ कौन-सा रिश्तेदार बैठा है, जिसके पास लौट कर आना है ? अभी ताज़ी शादी की है, पत्नी की ओर भी कुछ फ़र्ज पालने का ख़्याल है या नहीं ?’’ जवाब में बड़े स्नेह से कहा, ‘‘यहाँ देखा नहीं कि तेरा ख़्याल इतना रखा कि माँ से जोरू के गुलाम का ख़िताब मिला। उसके जाने के बाद यह ख़बर न रखी कि घर वाले अब कहाँ है ?’’

मैंने भी खुनकी के साथ कहा - ‘‘वैसे तो आपसे बंध जाने के बाद मैंने भी तो अपनों को भुला दिया है।’’

हम जब मुंबई जैसे अजगर शहर में पहुँचे तो हमसे पहले आए सिन्धी बड़े दर-बदर थे। जाने कितना अरसा खुले आसमान के नीचे बिताना पड़ा, उसके बाद कल्याण कैम्प की बैरकों में टाट के परदे लगाकर भी रहना पड़ा। कभी टीन की तपती छतों के नीचे तो कभी बारिश में बहती छतों के नीचे भी सोना पड़ा। रोज़गार के लिये अपने कांधों पर भरोसा होने के बावजूद भी मकानों में काम करते मालिकों की बातें सुननी और सहनी पड़ती थी। ऐसी मुसीबत के वक़्त में सिन्ध के कुशादे कमरों और बड़े आँगन वाले हवादार घरों में गुजारे सुख के पल और शांतमय जीवन की बहुत याद आती थी। सच में हाथ से सबकुछ छूट जाने के बाद ही हर शै की क़द्र होती है, जैसे सिन्ध वालों को भी अब हमारी क़द्र हुई है।

हम कैम्प छोड़कर मुम्बई की बसी हुई बस्तियों में आ बसे, दो-तीन सालों में ही हम दो से चार हो गए। मेरा सारा वक़्त घर में ही बेटे और बेटी के लालन-पालन में गुज़र जाता था, इसलिये पति ने भी नौकरी करने के लिये ज़ोर नहीं दिया। ख़ुद ही सारा समय आजीविका के लिये मास्टरी और टयूशन करते रहे, पर कभी कोई जवान छोकरी पति के पास पढ़ने, ट्यूशन लेने या किसी और काम से आती तो उनकी सिन्ध वाली सहेली याद आ जाती। उसका कभी-कभी ख़त आता रहता था। तब मेरे मन में हसद जाग उठता, इसलिये घर में अक्सर खट-पट चलती रहती थी। बेटी बड़ी होते ही बाप की, और बेटा मेरी तरफ़दारी करने लगा।

एक दिन मुम्बई के बाहर बसे सिन्धी घर में बेटी की शादी हो गई, पर वह सुखी न रही। बेटा कॉलेज पढ़ने के साथ-साथ नौकरी भी करने लगा। कॉलेज पूरा करके, सिविल मैरेज करके बहू घर ले आया। न सलाह, न मश्वरा और न कोई शगुन-रस्म। बस शादी कर ली। इसलिये घर में किलकिल और बढ़ गई। बेटा मेरी तरफ़ था, पर बहू ससुर की तरफ़दारी करती रही, तो हसद की आग और भड़क उठी। फिर हसद के साथ स्त्री हठ हमजोली हुआ तो पति के खिलाफ़ मन मैला ही रहा।

आख़िर एक दिन अचानक ही दिल टूटने के कारण वह स्वर्गवासी हुए। तब बहू ने उस घटना के लिए कई दोष मुझपर मड़े, पर हासिद व हठीला मन मानकर भी न मान पाया। मन मसोसे कई दिन पड़ी रही। आख़िर सब्ज़ी-तरकारी के लिये घर से निकलना ही पड़ा और बदले हुए ज़माने से साक्षात्कार हुआ, जिसमें एक मज़दूर की पत्नी भाजीवाली के साफ़, सीधे, सच्चे शब्द मेरे हासिद और हठीले मन को शिक्सत दे गए। (१९८८)

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रचनाकार: सिन्धी कहानी - वो जहान - ये मन
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