रविवार, 11 अगस्त 2013

सिन्धी कहानी - सच्चा पाकिस्तानी

सिन्धी कहानी

सच्चा पाकिस्तानी

मूल: हरी पंकज

अनुवाद: देवी नागरानी

वीज़ा ख़त्म हो रही थी, किसी भी हालत में तीन दिनों के भीतर लैगोस पहुँचना था। इसलिये किसी भी एअरलाइन में सीट हासिल करने की कोशिश कर रहा था। आख़िर कीनिया ऐअरवेज़ में सीट मिली। पहले तो मुँह का ज़ायका कुछ बिगड़ा, पर जब फ्लाईट रूट देखा - मुंबई, कराची, नैरोबी, दुआला, कनू, लैगोस... तो आँखे कराची पर ठहर गईं। वैसे तो मुझे सफ़र में रुक-रुक कर जाना क़तई पसंद नहीं, बोरिंग और परेशानी का बाइस लगता है।

पर कराची...

बदन में सरसराहट होने लगी। तन-मन सिमटकर बारह साल के बच्चे का हो गया। छलांग लगाकर उछलने लगा और हँस पड़ा। कराची और मेरा बचपन, दोनों एक दूसरे से जुड़े हैं और फिर कराची जाने का मौक़ा मिल रहा है और वही बचपन का आलम...।

यादों की कुछ झलकियाँ...

छुट्टियों के दिनों में सुबह के छः बजे, नंगे पांव, तारी, अब्दुल, ईसर और क़ादर के साथ सराई क्वाटर स्कूल से चक्कर लगाकर, कोनों से सटकर निकलते थे। बातों और ठहाकों के साथ-साथ हमारा एक ही काम था, खजूर के लम्बे झाड़ों से खजूर, मौसम अनुसार फल, बेर, कैरियाँ, जामुन और सब टोड़ना, रेलवे, ग्राउंड तक पहुँचकर शाह को सलाम करके, भरी हुई झोलियों के साथ लौटना।

प्रेअर रोड पर वो सेऊ का मकान, बाजू में झूनी पुरानी गली और गलियों के उस तरफ़ आऊट् राम रोड... इस तरफ बन्दर रोड...।

ईसर सुबह आँख खुलते ही पहले पिता के पाँव छूता, पिता भक्ति सिखाता था, दौलत ने मुझे साइकिल चलानी सिखाई, तो किशन दलवानी ने आज़ादी के संग्राम में मुझको स्कूल बन्द करवाने सिखाए थे। सोढ़ा की मशहूर दुकान जो बाशेमल की थी, वहीं ‘संसार समाचार’ में से ‘टारज़न’ और हून्दराज दास की ‘जुगनू’ कॉलम नामक अख़बार पढ़ना सीख गया था।

और वो क़ादर... मकरानी ? बस जब खजूर या मेवा तोड़ते हुए पकड़े जाते, तो वह आगे बढ़कर दहशत भरे स्वर में कहते - ‘अरे ओ, कदेरो दादा का नाम सुना है ? मैं उसका ही बेटा हूँ क़ादर..!’ और हम मार से बच जाते थे।

विक्टोरिया घोड़े-गाड़ी के पिछली तरफ़ चलानेवाले की नज़र बचाकर चढ़ जाते थे तो कोई दुश्मन देखकर चिल्ला उठता - ‘गाड़ीवाले... पीछे चाबुक...’ बस फिर तो बदन पर नीले निशान पड़ जाते थे। और अब्दुल उस चुगलख़ोर को पकड़कर मारता था... होली के दिन हम पाँचों के साथ और बच्चे भी जुड़ जाते। सफ़ेद पोशाक वालों को, रंग लगाने का डर देकर, होलका माता और गाय के घास के बहाने पैसे ऐंठते। मजाल जो कोई बच पाए।

आशूरों के दिन ताबूतों की सर्कस पहुँचने के पहले ही, बाशेमल की होटल के आगे, लकड़ी के तख़्तों पर शरबत, चने-चावल तैयार रखते। ताबूतों के नीचे तीन चक्कर लगाकर, दुआ माँगकर, शरबत और चने-चावल बाँटना शुरू कर देते थे।

गिली-डंडा, बिलौर, सिगरेट के खाली पाकेट, माचिस, सीपें, इमली के बीज, हमारी पूँजी थी।

ख़ैर छोड़ो इन बातों को। कराची और बेटे बचपन पर दस पन्ने तो क्या, दस हज़ार पन्ने लिखूँ, तो भी दिल नहीं भरता! हमारे जहाज़ ने कराची के ऊपर एक पूरा चक्कर मारा। मेरी आँखें पूरी तरह खुली हुई थी, पर समझ में कुछ नहीं आया। कल्पना की, अंदाज़ा लगाया, ज़रूर सदर होगी, बन्दर रोड, बर्न्स गार्डन, हाईकोर्ट, नेटी-चेटी, कयामाड़ी, मनहोरो होगा, काफ़ी दूर से ‘मेरी वेधर टॉवर’ के घड़ियाल की एक झलक मिली, वो भी एक पल के लिये !

जहाज़ दूसरा चक्कर लगाने के पहले ही आकर रन्-वे पर उतरा। लाऊड-स्पीकर पर मधुर ज़नानी आवाज़ सुनाई दी ‘अभी हम कराची के डर्ग रोड हवाई अड्डे पर उतरे हैं। इस वक़्त यहाँ रात के बारह बजकर पैंतीस मिनट हुए हैं। जिनको कराची उतरना है, वो उतर सकते हैं। हमारे साथ सफ़र करने के लिये धन्यवाद... !’

और फिर मर्दानी आवाज़ में... ‘मैं कैप्टन अली नूर हूँ, एक अहम सूचना आप सभी के लिये, कृपया ध्यान से सुनें। जहाज़ यहाँ एक घंटा रुकेगा, जिनको आगे सफ़र करना है, वे कृपया अपनी कुर्सियों पर बैठे रहें। यहाँ मार्शल-लॉ ज़ारी है, और क़ानून भी बहुत सख़्त है। किसी को भी जहाज़ से नीचे उतरने की इजाज़त नहीं है। उम्मीद है आप हमें पूरा सहकार देंगे।’

हाथ का सामान लेकर यात्री दरवाज़े की तरफ़ बढ़ने लगे। मैं भी उठा पर बिना सामान के अपनी जन्मभूमि पर पहुँचने पर दिल की धड़कन अजीब ढंग से बढ़ गई। माँ की गोद से बिछड़ा बेटा, फिर माँ की गोद पहुँचा। भीतर की हलचल और खुशी को समेटते हुए, लम्बी सांस से उनपर क़ाबू पाने की कोशिश करते हुए और सभी उतरने वाले यात्रियों के पीछे चलता हुआ, दरवाज़े तक आया। नीचे उतरने वाली सीड़ी के दोनों तरफ़ छः साहसी फौजी, तीन इस तरफ़, तीन उस तरफ़ खड़े थे। छः मशिन गन्स !

उतरने वालों की आख़िर में मैं था। एक फौजी ने हाथ के इशारे से पूछा - ‘सामान?’

मैंने भी हाथ के इशारे से कहा - ‘कुछ भी नहीं’

‘कराची ?’

‘नहीं लैगोस। ’

दो ख़तरनाक मशिन गन्स मेरी छाती को निशाना बनाए हुई थीं। मैंने दोनों हाथ ऊपर करते हुए हंसकर हिन्दुस्तानी ज़ुबान में कहा - ‘यार, ये मेरे बचपन शहर है, यहीं तो मैं बड़ा हुआ हूँ।’

एक आदमी ने उर्दू में कहा - ‘मेहरबानी करके अपनी जगह पर जाकर बैठो।’ उसकी आवाज़ में सभ्यता और नर्मी देख, मेरे मन का हौसला बढ़ा और मैंने कहा - ‘यार आप लोगों का क्या जाता है ? जहाज़ यहाँ एक घंटा रुकेगा। वो सामने लाऊंज है, कैंटीन से एक गिलास पानी पीकर आऊँगा, और क्या ?’

‘पानी आपको इस जहाज़ पर भी मिल सकता है।’

मैंने इल्तिजा भरे स्वर में कहा - ‘पर उस कैंटीन का पानी सिन्धु नदी का जल होगा। मेरी माँ की छाती का दूध...!’

अचानक उर्दू आवाज़ से सभ्यता और नर्मी ग़ायब हो गई और मशीन गन्स का तनाव भी बढ़ गया - वापस अपनी जगह पर... ‘अच्छा भाई अच्छा, नाराज़ होने की क्या बात है ! चला जाऊँगा।’ और कुछ पल सोचते हुए समझौते के स्वर में कहा - ‘पानी न सही, प्यासा ही चला जाऊँगा, कैंटीन दूर है... बचपन में जाने कितनी बार इस ड्रग रोड पर खाली माचिस की डिब्बियाँ हासिल करने आया था। सिर्फ़ एक मेहरबानी कीजिये, मुझे इस जहाज़ की सीड़ी से नीचे उतरकर इस ज़मीन को छूने दीजिये !’

‘मतलब ?’

‘इस ज़मीन की मिट्टी की मैं पैदाइश हूँ, इस मिट्टी का तिलक अपने माथे पर लगाऊँगा और मुट्ठी भर मिट्टी अपनी जेब में डालूँगा।’

वे तुरन्त ही समझ गए कोई तड़ीपार सिन्धी-हिन्दू वापस लौटा है। उनकी आँखे आग उगलने लगी। अब दो नहीं, चार गन्स का रुख बेदर्दी से मेरी ओर हुआ। एक फौजी के इशारे पर एअर-होस्टेस मुझे बाँह से खींचकर मेरी सीट तक लाई और कहने लगी - ‘बन्दूक के साथ बहस करते हो ?’

मैं हताश होकर अपनी सीच पर बैठा, मन में उमड़ती हुई भावनाओं को सिसकियों में बदलते देखा और आँसुओं को रोकने के लिये रूमाल इस्तेमाल किया। विचार और वेदना को बस में करते हुए कुछ पलों के लिये आँखें मूँद ली। जब आँखें खोली तो मेरी सीट के कुछ ही आगे एक शख़्स जहाज़ की कुर्सियों की सफ़ाई कर रहा था। मैंने आहिस्ता से पूछा - ‘ओए यार, तुम तो नयन-नक्श से मुझे सिन्धी लगते हो।’

उसने चौंककर पहले इधर-उधर देखा और पास में खड़े अफ्रीकन नीग्रो को देखते ही फुसफुसाती हुई आवाज़ में कहा - ‘ऐं सरताज, हूँ तो सिन्धी, पर यहाँ सिन्धी बात करने से मेरी नौकरी चली जाएगी। मेहरबानी करके बिलकुल धीमे बोलिये, यहाँ सिन्धी बात करना मना है और मैं ग़रीब बच्चों वाला हूँ, मालिक !’

कुर्सियों की सफ़ाई के बहाने वह मेरे पास आ गया - ‘पर भाई, यह तो सिंध है ! ये कराची, ये ड्रग रोड, क्या कर दिया है हमारी सिंधड़ी को ? नीचे उतरने ही नहीं देते!’

उसने शिकायती अंदाज़ में कहा - ‘हमने क्या कर दिया है सिन्ध को ? आप में से कितने कायर मर्द सिन्ध से हिन्द भाग गए और हम बाक़ी सिनधियों सिंधियों को गर्क़ में छोड़ गए।’

‘दीन-धरम की जुनूनी कशमकश में हमें जाना पड़ा था !’

‘आप न जाते तो आपकी दौलत यूँ महाजनों को तो न मिलती !’

‘पर वो तो आपके दीन-धर्म के भाई हैं !’

‘ख़ुदा जाने किस ख़ता की सज़ा देकर यह क़हर ढाया हमपर। हमारा ही बुरा वक़्त था जो पाकिस्तान के लिये हामी भरी। जाने कैसा हाकिम है जो सांस लेना दूभर हो गया है।’ दो पल रुककर कहा - ‘मैं तो अनपढ़ गवार हूँ, पर सिन्ध के घर-घर में यही बात होती है कि दीन-भाई तो दीन-भाई है, पर हमजुबाँ ही हम-शहरी होते हैं और वही अपने प्यारे भी होते हैं। सारे हिन्दुस्तान-पाकिस्तान को आज़ादी मिली, पर सिन्ध अभी भी गुलाम है ख़ाविंद।’

बात करते हुए वह जहाज़ के आगे और पीछे वाले दरवाजों पर भी नज़र धर रहा था। उसके अहसासों में डर घुला हुआ देखकर मैं अपनी कुर्सी छोड़कर उसके क़रीब इस तरह टहलने लगा कि वह अपना काम भी करता रहा और हमारी गुफ़्तगू में भी कोई बाधा न पड़ी।

‘और आपका वो सईद बाबा जो था ?’

‘वो बिचारा पीर होकर भी राहें तकता रहा, आखिर गुज़र गया !’

मैंने पूछा ‘उस पीर पागारी के जो पोइलग थे ? उस शेख़ अयाज़ की क़लम में तो ताक़त थी।’

‘मालिक, इतनी बातें तो विस्तार से मैं नहीं जानता, बाक़ी यह जानता हूँ कि, अयाज़ ने जीते जी जब कुछ कहा तो उसे चुप कराया गया।’ और फिर इधर-उधर देखकर कहा - ‘मुझे एक बार गुस्से में ‘जाट’ तो कहिये।’

‘नहीं बाबा, मुसलमान कुल्हाड़ियों से मेरे टुकड़े-टुकड़े कर देंगे।’

‘अब उस जुनून से भी तोबा कर ली गई है। ये नए हाकिम हमें पाकिस्तानी तो क्या, पर सच्चा मुसलमान होने तक को क़बूल नहीं करते। मालिक, एक हक़ीक़त बयाँ करू? मेरे वालिद अब आँखों से देख नहीं पाते। एक दिन किसी अनजान आवाज़ ने कहा - ‘अरे जाट...’ तो पिताजी ने उन्हें गले से लगाते कहा - ‘व्यापारी, कब हिन्दुस्तान से लौटकर वापस आए ? मैं जाट, तुम व्यापारी’, ‘व्यापारी और जाट’ लफ़्जों में कितना प्यार भरा हुआ है, दरवेशों की इस धरती के बेटे हम सिन्धी प्यार से नाचते गाते हैं। हम फौजी तो है नहीं, फिर बंदूकों से क्या...।‘

अचानक दो मशिन-गन वालों को आते देखकर वह तनाव में आ गया और गुस्से भरी ऊँची आवाज़ में मुझे कहने लगा - ‘व्यापारी, क्यों दिमाग़ खाते हो ? एक बार कहा न, जहाज़ से

नीचे उतरने की सख़्त मनाही है।’

· मशीन गन वालों में से एक ने कहा - ‘शाबास, तुम जैसे ही, सच्चे पाकिस्तानी हैं।’

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------