शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

पुस्तक समीक्षा - दलित विमर्श की कसौटी पर ‘मुर्दहिया’

दलित विमर्श की कसौटी पर ‘मुर्दहिया’

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डॉ. विजय शिंदे

संसार में मनुष्य का आगमन और बुद्धि नामक तत्व के आधार पर एक-दूसरे पर वर्चस्व स्थापित करने की अनावश्यक मांग सुंदर दुनिया को बेवजह नर्क बना देती है। सालों-साल से एक मनुष्य मालिक और उसके जैसा ही दूसरा रूप जिसके हाथ, पैर, नाक, कान... है वह गुलाम, पीडित, दलित, कुचला। दलितों के मन में हमेशा प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों? पर उनके ‘क्यों’ को हमेशा निर्माण होने से पहले मिटा दिया जाता है। परंतु समय की चोटों से, काल की थपेडों से पीडित भी अपनी पीडाओं को वाणी दे रहा है। एक की गुंज सभी सुन रहे हैं और अपना दुःख भी उसी तरीके का है कहने लगे हैं। शिक्षा से हमेशा दलितों को दूर रखा गया लेकिन समय के चलते परिस्थितियां बदली और चेतनाएं जागृत हो गई। एक, दो, तीन... से होकर शिक्षितों की कतार लंबी हो गई और अपने अधिकारों एवं हक की चेतना से आक्रोश प्रकट होने लगा। कइयों का आक्रोश हवा में दहाड़ता हुआ तो किसी का मौन। अभिव्यक्ति और प्रकटीकरण का स्वरूप अलग रहा परंतु वेदना, संघर्ष, प्रतिरोध, नकार, विद्रोह, आत्मपरीक्षण सबमें बदल-बदल कर आने लगा। ईश्वर से भेजे इंसान एक जैसे, सबके पास प्रतिभाएं एक जैसी। अनुकूल वातावरण के अभाव में दलितों की प्रतिभाएं धूल में पडी सड़ रही थी लेकिन धीरे-धीरे संघर्ष से तपकर निखरने लगी। ज्ञान का शिवधनुष्य हाथ में थाम लिया और एक-एक सीढी पर लड़खड़ाते कदम ताकत के साथ उठने लगे, अपने हक और अधिकार की ओर। एक के साथ दो और दो के साथ कई। संख्या बढ़ी और धीरे-धीरे मुख्य प्रवाह के भीतर समावेश। यह प्रक्रिया दो वाक्य या एक परिच्छेद की नहीं, कई लोगों के आहुतियों के बाद इस मकाम पर पहुंचा जा सका है। प्रत्येक दलित की कहानी अलग और संघर्ष भी अलग। उसके परतों को बड़े प्यार से उलटकर उनकी वेदना, विद्रोह, नकार और संघर्ष को पढ़ना बहुत जरूरी है ताकि प्रत्येक दलित-शोषित-गुलाम व्यक्ति के मूल्य को आंका जा सके। भारतीय साहित्य की विविध भाषाओं में बड़ी प्रखरता के साथ दलितों के संघर्ष की अभिव्यक्ति हुई है और हो रही है। हिंदी साहित्य में देर से ही सही पर सार्थक और आत्मपरीक्षण के साथ दलितों के संघर्ष का चित्रण होना उनके उज्ज्वल भविष्य का संकेत देता है। एक की चेतना हजारों को जागृत करती है एक का विशिष्ट आकार में ढलना सबके लिए आदर्श बनता है। जागृति के साथ आदर्शों को केंद्र में रखकर अपने जीवन के प्रयोजन अगर कोई तय करें तो सौ फिसदी सफलता हाथ में है। और आदर्श अपनी जाति-बिरादरी का हो तो अधिक प्रेरणा भी मिलती है। संघर्ष और चोट से प्राप्त सफलता कई गुना खुशी को बढ़ा भी देती है। ‘जूठन’ कार के शब्दों में –

‘‘पथरीली चट्टान पर

हथौडे की चोट

चिंगारी को जन्म देती है

जो गाहे बगाहे आग बन जाती है।

आग में तपकर

लोहा नर्म पड़ जाता है

ढल जाता है

मनचाहे आकार में

हथौडे की चोट में।’’

(कविता ‘चोट’ – ओमप्रकाश वाल्मीकि)

चिंगारी से आग बनना और हथौडे की चोट से मनचाहा आकार ग्रहण करना जीवन के उद्देश्य को पाना है। प्रत्येक दलित सृजनकर्ता की कहानी भी यहीं बखान करती है। डॉ. तुलसी राम द्वारा लिखित आत्मकथन ‘मुर्दहिया’ यहीं बता रहा है।

दलित विमर्श की सारी कसौटियों पर ‘मुर्दहिया’ को परखा जा सकता है। बचपन से महाविद्यालयीन जीवन तक का मार्मिक और वेदनामयी शब्दों में किया गया वर्णन किसी महाकाव्य से कम नहीं है। एक-एक घटना और प्रसंग प्रत्येक व्यक्ति को आत्मपरीक्षण करने का आवाहन करता है, कई सवाल सामाजिक व्यवस्था पर भी खड़े कर देता है। एक दलित, गरीब, उपेक्षित बच्चे का उच्च विद्याविभूषित होना प्रशंसा का पात्र है। सामाजिक व्यवस्था में दलित होना, फिर ईश्वरीय अवकृपा और चेचक की मार से काना बनना उस बच्चे के लिए दोहरा अभिशाप है। वह घर से भी दलित-उपेक्षित बनता है। संपूर्ण विपरीत स्थितियों के बावजूद भी सारी व्यवस्था पर जीत पाना और स्थापित होना भविष्य के अच्छे दृश्यों को दिखाता है। दुनिया की नजरों से एक ‘कनवा’ डॉ. तुलसी राम तक सफर तय कर सकता है तो इनसे बेहतर स्थिति का कोई भी दलित चेतना पाकर अपने पंखों में लंबी उड़ान की ताकत पा सकता है। ‘अपशकुन’ और ‘कनवा’ की दर्दनाक लकिरों को रगड़-रगड़कर मिटाना कोई तुलसी राम से सीखे। दलितों के कई आदर्शों में एक नवीन ताजा आदर्श डॉ. तुलसी राम है। जिनके वाणी की मिठास, स्वाभाविक मृदुता, प्रेम, क्षमाशीलता और कई अत्याचारों एवं उपेक्षाओं को सहन करने की सहनशीलता डॉ. तुलसी राम है। ऐसा व्यक्ति नजदीक से देख, पढ़ अगर आम व्यक्ति कुछ पाए तो आसमान को छू लेने का अनुभव कर सकता है।

1. वेदना

वेदना सबकी एक जैसी होती नहीं पर सबकी वेदनाओं को देख-पढ़कर मन में ‘आह’ जरूर पैदा होती है और प्रश्न उठता है कि यह वेदना उसे क्यों? उसे खुश रहने का अधिकार क्यों नहीं? दलितों के जीवन और उनके संघर्ष के साथ हमेशा वेदना जुड़ती है। नए समीक्षक दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र बताते वक्त वेदना की कसौटियों पर उसे आंकते भी है। आम वेदना और दलितों की वेदनाओं मे अंतर होता है। दुघर्टनावश प्राप्त आम वेदना स्वीकार्य है पर सामाजिक अधमता के कारण दी गई वेदनाएं चीढ़ निर्माण करती है। ‘मुर्दहिया’ का नायक तुलसी राम कोई एक दलित नहीं तो दलितों के संपूर्ण बच्चे और युवा पीढी की वेदनाओं को व्यक्त करता है। कम-ज्यादा रूप में यह प्रसंग हर एक दलित के हिस्से आए हैं जो सामाजिक घटियता को दिखाते हैं।

डॉ. तुलसी राम ने चमार जाति में जन्म लिया और दलित होने का दुःख सामाजिक व्यवस्था के कारण पाया पर चेचक की आपदा से दाईं आंख का खोना ‘अशुभ’ की श्रेणी में लाकर पटक देता है, अतः उनका दर्शन घर से लेकर बाहर तक के लिए ‘अपशकुन’ बना देता है। पास-पडोस, अपनों और अन्यों से की गई जातिगत और आंखगत टिप्पणियां उन्हें हमेशा वेदना देती है। ‘कनवा बड़ा तेज हौ’, ‘एक फाटक बंद है’ कहना तथा जाति पर आधारित की गई टिप्पणियां मर्मांतक वेदना देती है। स्कूल में बर्तन छूकर पानी पीने की आजादी नहीं और सवर्ण छात्र द्वारा उनके लिए पानी देने की विधा में आनंद ले-लेकर कपडे भिगोते जाना भद्दे मजाक से कम नहीं था। ‘‘हम अंजुरी मुंह से लगाए झुके रहते, और वे बहुत ऊपर से चबूतरे पर खड़े-खड़े पानी गिराते। वे पानी बहुत कम पिलाते थे किंतु सिर पर गिराते ज्यादा थे जिससे हम बुरी तरह भीग जाते थे।... पानी पीना वास्तव में एक विकट समस्या थी।’’ (पृ. 54) यह घटना आजादी के बाद की है जहां संविधान में सबके लिए समानधिकार था कानूनी तौर पर। छुआछूत मिटने का सभी बढ़-चढ़कर ऐलान कर चुके थे, ऐसे समय में यह दृश्य वेदना और घृणा निर्माण करते हैं। आत्मकथा के भीतर तुलसी राम जी ने पारूपुर गांव के एक ‘मुसहर’ परिवार का जिक्र किया है, जो पलाश की पत्तियों से पत्तल बनाया करता है। शादी-विवाह जैसे त्यौहारों के लिए सबके खाने की पत्तल का इंतजाम करता यह परिवार जूठी पत्तलों से झाड़-झाड़कर भोजन को इकठ्ठा करता है, यह दृश्य अमानवीयता की हद है। पढाई-लिखाई में ईमानदार और प्रतिभा के धनी तुलसी राम मन लगाकर मेहनत कर रहे हैं। इम्तहान की फीस के लिए चार आने की उसकी मांग मुन्नर चाचा ठुकराते हैं कोई बात नहीं पर ‘‘ई सब इंतिहाने के बदले पइसा ले जाइके नोनियानिया क पकौडी खालै।’’ (पृ. 108) कहना बाल मानसिकता को आहत कर देता है। जहां पर अपनी ईमामदारी का कोई मूल्य नहीं वहां पर रहना बहुत मुश्किल है ऐसा किसी बच्चे का सोचना उसकी दीन-हीन-पीडित स्थिति का बखान करता है; बिना सोचे समझे की गई टिप्पणी किसी के हृदय पर गहरे घांव कर सकती है इसका परिचय भी देती है। स्कूल में दलितों की बैठने की अलग कतार या पहली बार पाजामा पहन स्कूल जाने पर ब्राह्मणों द्वारा की गई टिप्पणी ‘‘बाप के पाद ना आवे, पूत शंख बजावे’’ उच्च वर्णियों की ईष्या-द्वेष को भी दिखाता है। ‘मुर्दहिया’ आत्मकथन में घटना-दर-घटना वर्णित कई प्रसंग पीडा और वेदना का निर्माण करते हैं।

2. संघर्ष

कोई भी सफलता सहजता से मिलती नहीं उसके साथ संघर्ष जुड़ जाता है। दुनिया के प्रत्येक प्रसिद्ध व्यक्ति को संघर्ष की कसौटी पर कसा गया है। दुनिया का आम व्यक्ति और दलित में जमीन-आसमान का अंतर है। अभाव, अज्ञान, भूख, अंधश्रद्धा, अस्वास्थ्य... के चलते सफलता हासिल करना साधारण कार्य नहीं। डॉ. तुलसी राम का संघर्ष और उनके साथ उनकी जाति तथा अन्य हरिजनों का संघर्ष ‘मुर्दहिया’ में वर्णित है। एक व्यक्ति, एक जाति, और एक समूह का संघर्ष सारे दलितों की संघर्ष गाथा का बखान करता है।

सहज, सरल और सार्थक जीवन जीने के लिए पैसों की जरूरत होती है और दलित के पास पैसा कम और अभाव ज्यादा होते हैं। अर्थाभाव की मार झेलते छोटे-बड़े परिवार खाने की चीजों से ओढ़ने तक के लिए तरसते हैं, शिक्षा और किताबें तो दूर की बात है। तुलसी राम जाड़े के दिनों के संघर्ष का वर्णन करते हैं। ‘‘हमारे घर में सोने के लिए जाड़े के दिनों में घर की फर्श पर धान का पोरा अर्थात् पुआल बिछाया जाता था। उस पर कोई रेवा या गुदडी बिछाकर हम धोती ओढ़कर सो जाते। इसके बाद मेरे पिता जी पुनः ढेर सारा पुआल हम लोगों के ऊपर फैला देते।... वे दिन आज भी याद आते हैं, तो मुझे लगता है कि मुर्दों-सा लेटे हुए हमारे नीचे पुआल, ऊपर भी पुआल और बीच में कफन ओढ़े हम सो नहीं बल्कि रात भर अपनी-अपनी चिताओं के जलने का इंतजार कर रहे हो।’’ (पृ. 34) एक तरफ यह स्थितियां और दूसरी ओर इसी देश में टाटा-बिर्ला-अंबानी जैसे अमीर लोग। आज भी हमारे देश से गरीबी हटी नहीं। अर्थाभाव, की मार और ऊपर से निम्न जाति का होना; जीवन मानो एकाध लड़ाई छिड़ने जैसा है। पिता जी के साथ मिलकर जमीन में गड़ी सड़ी लाश को ऊपर निकालना और सुदेस्सर पांडे को सोने की मुनरी देने की घटना में लेखकीय संघर्षशील जिंदगी के विड़बना का चित्रण है। दलित मजदूरों से मुफ्त में काम करवाना दिनभर के काम के बदले में एक-एक केडा फसल पाना शोषण और संघर्ष की चरमसीमा है। मरी हुई गाय का चमड़ा निकालते वक्त छोटे तुलसी राम का ‘हाहो-हाहो’ करते गिद्धों को भगाना और चादर की तरह चौपत कर चमड़े को ढोना हरिजनों के संघर्ष का वर्णन करता है। भाड़ों द्वारा गाए जाने वाले गीत का लेखक ने जिक्र किया है -

‘‘हरिजन जाति सहै दुख भारी हो।

हरिजन जाति सहै दुख भारी।।

जेकर खेतवा दिन भर जोत ली,

ऊहै देला गारी हो, दुख भारी।।

हरिजन जाति सहै, दुख भारी।।’’ (पृ. 106)

दिन भर की कड़ी मेहनत ओर संघर्ष के बाद भी पाया क्या? गाली। गाली, संघर्ष और अवहेलना का द्योतक है। लेखक का पढ़ाई के लिए किया गया संघर्ष, दादी मां तथा अध्यापकीय प्रेरणा स्रोतों के बावजूद परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा ‘काम के डर से पढ़ने का बहाना बनाकर बैठ गया है’, कहना लेखक के आत्मविश्वास को तोड़ देता है, उसे दुबारा ताकत के साथ जुटाना संघर्ष ही है। गांव के ब्राह्मणों द्वारा लेखक की मेहनत और बौद्धिक क्षमता को पागल हो जाने की स्थितियों का करार देना ईर्ष्या, द्वेष और षड़यंत्र का परिचायक है। इन विपरीत स्थितियों पर विजय पाना किसी युद्ध से कम नहीं है।

3. आत्मपरीक्षण

प्रगति और विकास की चोटी तक पहुंचना है तो जागृति, चेतना और आत्मपरीक्षण की जरूरत है। यह न केवल दलितों के लिए आम आदमी के लिए भी है। लेकिन दलितों के लिए आत्मपरीक्षण की अत्यंत आवश्यकता है। सालों से काल-कोठरी में पड़े अंधेरे में पत्थरों से टकराते रहना इनके हिस्से में लिखा था। अवहेलना, अन्याय, अत्याचार, अपमान, शोषण, पीडा, दुःख... इनके विड़बनापूर्ण जीवन के अलंकार थे। जीवन की कुरूपता संपूर्ण तरीके से इन पर मेहरबान थी और उसे मानो किसी अलंकार–सा इन्होंने माथे पर सजाए रखा था, बिना आत्मपरीक्षण के। कोई विचार नहीं, कोई सोच नहीं, नकार नहीं, प्रतिरोध नहीं। अंधभक्ति, अंधश्रद्धा, अज्ञान, अशिक्षा के चलते जो जीवन सामने परोसा उसे सर-आंखों पर लिया। यह सोच बदलनी पडेगी, आत्मपरीक्षण करना पडेगा। अशिक्षा के अंधकार को ठोकर मारकर शिक्षा का दीपक हाथों में लेकर खुली आंखों से दुनिया की ओर देख प्रत्येक घटना, व्यवहार तथा बर्ताव का परीक्षण करना पडेगा। अपने हिस्से आई जिंदगी का पूर्ण मूल्यांकन करना पडेगा। सवाल करने पडेंगे। ‘नहीं’ कहना या ‘ना’ की ताकत जुटानी पडेगी। आज दलित समाज जिस मकाम पर पहुंचा है वहां तक पहुंचने के पीछे लंबा संघर्ष है, अतः वर्तमान में आत्मपरीक्षण के साथ सही दिशा का चुनाव और आत्मा की आवाज का परीक्षण भी अत्यंत आवश्यक बनता है। डॉ. तुलसी राम ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो स्थान पाया है उसका मूलाधार आत्मपरीक्षण, सब्र और मेहनत है। उहोंने शिक्षा को उद्देश्य मानकर जीवन का मंत्र बनाया और उसे पाने के लिए प्रत्येक कदम फूंक-फूंककर रखा। प्रत्येक प्रतिक्रिया और घटना का आत्मपरीक्षण किया।

लेखक के दादा की मृत्यु भूत से पीट-पीटकर होने का जिक्र सभी करते हैं और स्वीकारते भी हैं पर लेखक का तर्क और आत्मपरीक्षण बताता है कि उनके किसी दुश्मन ने इस अंधविश्वास का गलत लाभ उठाया होगा, यह तर्क लेखक की आरंभिक चेतना का द्योतक है। दलित लोगों द्वारा अपने लोगों को ही ‘कुजाति’ करना और वापसी के लिए दंड़स्वरूप सूअर-भात खिलाने की मांग गरीबी के भीतर और डूबते जाना है। जरूरी है ‘कुजाति’ प्रथा का आत्मपरीक्षण करें। लेखक अपने घर के बारे में लिखते हैं पर लेखक का घर-परिवार सारे दलितों का हैं। ‘‘हमारा परिवार संयुक्त स्वरूप से बृहत् होने के साथ-साथ वास्तव में एक अजायबघर ही था, जिसमें भूत-प्रेत, देवी-देवता, संपन्नता-विपन्नता, शकुन-अपशकुन, मान-अपमान, न्याय-अन्याय, सत्य-असत्य, ईर्ष्या-द्वेष, सुख-दुख आदि-आदि सबकुछ था किंतु शिक्षा कभी नहीं थी।’’ (पृ. 21) यह वाक्य दलितों के शिक्षा अभाव को दर्शाता है।

लेखकीय आत्मपरीक्षण, सब्र, सहनशीलता का उदाहरण पांचवी की परीक्षा के दौरान का है। दादी के कहने पर परीक्षा के पहले नहाना और ‘चमरिया माई’ की पूजा करना लेखक चाह रहे थे पर सवर्ण रामचरण यादव के ‘‘जल्दि से भाग चमार कहीं क। बड़कन लोगन के पोखरा में तू नहरबे?’’ (पृ. 83) कहते समय का रौद्र रूप देख डरना और भागना। परीक्षा के पहले आत्मविश्वास टूटते जाना, मन में मौन विद्रोह, आक्रोश, दुःख, डर, भय पर शिक्षा को पाने के लिए आत्मा की कुर्बानी देना आत्मपरीक्षण ही है। लेखक आगे लिखते हैं कि ‘‘इस घटना ने उस पुरानी पीडा से मुझे मुक्त कर दिया। और मुझे लगने लगा कि वैसी घटनाएं बदले की भावना से नहीं, बल्कि वैचारिक चेतना से ही रोकी जा सकती है।’’ (पृ. 84) लेखक के जीवन पर बुद्ध विचार का गहरा प्रभाव है, उसका परीक्षण करते वे लिखते हैं कि ‘‘उनके ज्ञान का मुख्य निचौड़ था दुनिया में दुख है, दुख का कारण है, दुख का निवारण है तथा दुख निवारण का मार्ग है।’’ (पृ. 144) आदि लेखकीय तात्विक विवेचन, परीक्षण और चिंतन भविष्य का रास्ता तय करने में सहायक होता है। अर्थात् प्रत्येक कृति का आत्मपरीक्षण दलितों का जीवन बदल सकता है। आत्मपरीक्षण, अनुभव, घटना और प्रसंग के आधार पर जीवन को मूल्यांकित करने की लेखक की अपेक्षा है।

4. प्रतिरोध

किसी अन्याय को रोके रखना, उसका विरोध करना अपनी स्वतंत्रता का ऐलान कर देता है या युं कहे कि होने वाले अत्याचारों को रोकने की पहली पहल होती है। मानवी स्वभाव का स्वाभाविक गुण है कि सामने वाला थोडा नरम दिखा कि अपना शोषण तंत्र शुरू कर देता है। किसी के गलत मनसुबों को भापकर समय रहते उसे रोका नहीं गया तो गुलामी तय समझे। दलितों के साथ भी ऐसे ही होता है। दलित है समझ में आया कि सामने वाले की वाणी, आचरण और व्यवहार बदल जाता है। यह पहचान की बात नवीन जगहों की हो गई लेकिन जिस गांव में दलित रह रहे हैं उसकी जाति-कुल तो छिपता नहीं, अतः पहचान-अपहचान का सवाल ही पैदा होता नहीं। किसी दलित व्यक्ति का किसी सवर्ण से पहला संपर्क उसके आगे की जिंदगी, व्यवहार एवं भूमिका को तय करता है। अतः अपने व्यक्तित्व की पहचान समाज में बनानी होती है। डॉ. तुलसी राम का व्यक्तित्व विशिष्ट परिस्थिति में ढलता गया, आकार ग्रहण करता गया जो उस समय की घटनाओं में सही ठहरता है। ‘मुर्दहिया’ के कुछ प्रसंगों में सारे दलित समाज का प्रतिरोध ताकतवर बनकर आता है, जो लेखकीय समाज का दर्शन कराता है। लेखक ने ‘मुर्दहिया’ के कई प्रसंगों में दलित और ब्राह्मण के आमने-सामने आने का वर्णन किया है। जब बात लाठी-डंड़े तक आती है तब चौधरी चाचा के यहां पंचायत बिठायी जाती है। ‘कूर’ बांधने की प्रथा के तहत एक रेखा खिंची जाती है और इस पार से उस पार आवाहन दिया जाता अगर दम हो तो, रेखा लांघकर मारने का साहस करो। ब्राह्मणों के पास कुल्हाडी, भाले, बल्लम रहते थे पर दलितों के पास केवल लाठी। लेकिन दलित महिलाएं प्रतिरोध बनकर सामने आती है और मरे जानवरों की तलवारनुमा पसलियां, गढ्डों में फेंकी गंदगी – ‘बियाना’, मल-मूत्र हंडियों में भर-भरकर उन पर टूट जाती तो ब्राह्मण भाग जाते और क्षमा भी मांगते। (पृ. 64) उक्त दृश्य संपूर्ण दलितों के प्रतिरोध को दिखाता है।

लेखक ने जेदी चाचा के अहिंसात्मक प्रतिरोध को वर्णित किया है। जेदी चाचा किसी भी अन्याय के प्रति आवाज उठाते और सत्याग्रह पर बैठ जाते। इस परेशानी से मुक्ति पाने के लिए और जेदी चाचा को सबक सिखाने के लिए झूठ-मूठ का बकरी चोरी का आरोप लगाकर थाने ले लिया गया। पिटवाया गया और रस्सी से बांधकर पकड़कर ले जाया गया। मूल बात यह थी कि यह आरोप तथ्यहीन थे और बासू पांडे के पास कभी कोई बकरी थी भी नहीं। बाद में जेदी चाचा छुटे भी परंतु सारे दलितों पर पुलिस का भय हांवी रहा। जेदी चाचा ने अपना सत्याग्रह जारी रखा। ‘‘बासू पांडे के इस छलिया कपट से आघातित होकर जेदी चाचा प्रतिरोधस्वरूप नए किस्म का सत्याग्रह करने लगे। वे सब काम-धाम बंद कर दाढी-मूंछ बढाना शुरू कर दिए तथा निचंड़ धूप में चारपाई डालकर एक चादर ओढ़कर दिनभर सोते रहते थे। पूछने पर कहते थे कि जब तक बामन न्याय नहीं करते, मैं दाढी-मूंछ बढाता रहूंगा तथा धूप में ही सोऊंगा। वे इस मामले में निहायत जिद्दी थे। पंचायत आदि द्वारा किसी अन्य समझौते को वे मानने से साफ इनकार कर दिए थे।’’ (पृ. 92) जेदी चाचा का यह सत्याग्रह, असहकार प्रतिरोधकस्वरूप है हांलाकि इसमें उनकी मौत होती है लेकिन सारे दलित समाज में संवेदना, चेतना का टिमटिमता दीप जलाकर, यह बात कोई कम नहीं। लेखक को प्राप्त हुई 162 रुपए की स्कॉलरशीप में से 81 रुपए की लूट करने वाले देवराज सिंह दोस्ती के नाम पर धब्बा है। जो आदमी अपनी फाकाकशी में पकौडी खिलाकर स्वागत करता है, दोस्ती के लिए जान देने की बात करता है उसके सीने पर छुरी रखकर 81 रुपए की लूट करना कहां की मर्दुमकी है। लेखकीय अहिंसात्मक वृत्ति कहे या दूध का जला छाछ भी फूंककर पीता है वाली वृत्ति कहे आगे के लिए सचेत रहती हैं। इस घटना के बाद भी उनका यह लिखना कि ‘‘देवराज सिंह से कभी दुबारा मुलाखात नहीं हुई। मगर, कभी मिल गए, तो मैं उनका स्वागत पकौडियों से अवश्य करूंगा।’’ (पृ.178) मौन प्रतिरोध है। जो ऐसी प्रवृत्ति वाले लोगों के मुंह पर झनझनाता थप्पड़ जड़ देता है। कुलमिलाकर निष्कर्ष यह निकलता है कि दलितों के भीतर का एक पात्र भविष्य को बनाने के लिए कई कुर्बानियां देता है और अपने प्रतिरोध को ‘डिफेन्सीव’ भी बनाता है। उसका कारण तत्कालीन परिस्थितियां है। हर आदमी की प्रकृति उसे नए-नए मार्ग बता देती है और उसके हिसाब से उसका बर्ताव भी तय होता है। ‘मुर्दहिया’ के अन्य ग्रामीण दलित पात्र सवर्णों को ‘कूर’ में पराजीत करवाते हैं यह बात प्रशंसनीय है। ऐसी घटनाओं से उनको आत्मबल भी मिलता है।

5. नकार

नकार दो प्रकार का होता है, एक आपको दिए हुए कार्य, स्थान एवं स्थितियों को नकारना और दूसरा सामाजिकता नकारता के भीतर एक शक्ति पाकर सारे समाज को नकारते अपने अस्तित्व को ढूंढ़ना। कहां जाता है कि आप किसी को जितना दबाने की कोशिश करेंगे वे उतनी ही ताकत के साथ उठने का प्रयास करेंगे। पीढियों से दबा दलित समाज जबरदस्त आत्मविश्वास के साथ उठ चुका है, अब कोई भी दबाव उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। अर्थात् नकार से शक्ति पाना हमारी फितरत में हो। डॉ. तुलसी राम जैसे अनेक दलित लोगों का निर्माण सामाजिक नकार के पश्चात् ही हुआ है। प्रत्येक दलित पात्र ध्यान रखे कि आत्मसम्मान, प्रतिष्ठा एवं अधिकार पाने का एक जरिया है – शिक्षा। दुनिया भर के अभाव और पीडाओं को झेलते सबकी हिकारत एवं ‘अपशकुन’ अगर डॉ. तुलसी राम बन सकती है तो आम दलित क्यों नहीं? सबके पास प्रतिभा होती है और अभाव की परिस्थिति में और निखरती है, प्रज्वलित होती है। दलित ऐसी परिस्थिति पहले से पा चुके हैं, बस जरूरत है केवल शिक्षा की। साधारण शिक्षा से बीस साल जुडी मेहनत न केवल किसी एक व्यक्ति को उठाती है बल्कि उसके पूरी जाति और समूह में ताकत भर देती है। अतः जरूरत है सामाजिक नकार का पूरा-पूरा लाभ उठाए।

डॉ. तुलसी राम के परिवार में वे सबसे छोटे रहें। दलितों की चिट्ठियों को पढ़ने से ब्राह्मणों का नकार तुलसी को स्कूल भेज देता है और अपनी प्रतिभा के बलबूते पर सारे ठाकुर, ब्राह्मण और सवर्णों को पिटते हुए हमेशा क्लास में अव्वल आता है।ब्राह्मणों से हुई पढाई-लिखाई की गलतियों से उनको पिटने का मौका लेखक को मिला करता था, और पढ़ने का, मेहनत करने का हौसला बढ़ जाता है। अतः सामाजिक नकार उनके लिए हीत का कार्य करता है।

भारतीय समाज, जाति-धर्म, संपत्ति-जमीन-जायदाद का मालिकाना हक भी लेखक नकारते हैं। दलितों का संघर्ष, पीडा, भूखमरी को देखकर लेखक को पीडा होती है। ‘‘ऐसी परिस्थितियों से गुजरने वाले वातावरण में ‘हकबट’ तथा ‘सभी कमाएंगे सभी खाएंगे’ इतना ज्यादा मेरे दिल को छू गए थे कि मैं आने वाली सारी जिंदगी में समाजवाद तथा सोवियत संघ का अंधभक्त बना रहा।’’ (पृ. 38) सामाजिक नकार, अन्याय-अत्याचार, असमान अधिकार का नतिजा है कि लेखक की सोच ऐसी बनी। यह केवल लेखकीय मंशा ही नहीं तो प्रत्येक दलित इस बात का पुरस्कार करता है।

6. विद्रोह

वेदना, संघर्ष, आत्मपरीक्षण, प्रतिरोध और नकार विद्रोह को जन्म देता है। विद्रोह दलित विमर्श की कसौटी में चरमोत्कर्ष की अवस्था है। सामाजिक असंतोष संपूर्ण स्थितियों को नकारते हुए अत्याचार के विरूद्ध लड़ने के मनसुभों को पुख्ता करता है। लेखकीय गांव में दलित और सवर्ण की लडाइयां, संघर्षात्मक स्थिति विद्रोह ही तो है, लेकिन वह लंबी शक्ल नहीं लेती। ऐसी घटनाओं में भविष्य के संकेत मिलते हैं।

यहां एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना का उल्लेख करना आवश्यक है जो लेखक के साथ दसवीं की फायनल परीक्षा के दौरान घटित होती है। उन्हीं की क्लास में पढ़ता हीरालाल बचपन से लेखक के साथ बेवजह भीड़ता था और अपमानित करता था। बार-बार ‘चमरा-चमरा’ कहकर अपमानित करना आम बात थी पर उसका ‘‘का रे चमरा तं येहो आ गइले।... देखत हईं तू कइसे इम्तिहान दे ला।’’ (पृ. 156) कहना लेखक को भयभीत करता है। रूपराम तक यह बात जब पहुंच जाती है, वह विद्रोह कर उठते हैं। दस-पंद्रह आदमियों को लेकर लाठी-भाले के साथ गरजना, दलित समाज के प्रति उनकी एकजुटता का बेजोड़ उदाहरण है, लेखक के रोकने के पश्चात् वे सब रूके नहीं तो हीरालाल का पिटना तय था। ऐसे दस-बीस पात्र अगर हाथों में लाठी और आवाज में दहाड़ लेकर बरसने लगे तो सवर्णों के अन्याय और हिकारत को मिटाया जा सकता है।

डॉ. तुलसी राम का बचपन हमेशा मौन और आत्मपरीक्षण के साथ गुजरता है। उनके मन में कई बाते चलती हैं लेकिन सामाजिक जीत और परिवर्तन के लिए कई बार सहनशीलता को अपनाती है। उनके कड़वे विद्रोह से एक बार चकित होना भी होता है। ‘‘सन् 1961 के ही जाडों की बात है, पिता जी मां को मारने के लिए फरुही लेकर दौडे। मैं वहीं खडा था। मैंने बहुत जोर से पिता जी को एक तमाचा मारा।’’ (पृ. 126) इसके बाद पिता जी द्वारा उन्हें भी पिटा गया परंतु बेटे की इस पहल के बाद दुबारा मां को मारने से वे घबराने लगे। यह प्रसंग लेखक के उबलते विद्रोह को दिखाता है। सामाजिक दबाव, अत्याचार के विरोध में उनका विद्रोह ‘लडाई’ के नाते कभी फूटा नहीं परंतु ‘पढाई’ के नाते फूटा और उसका रूख शिक्षा की ओर मोड़ने में लेखक ने सफलता पाई और यह थप्पड़ समाज का ठेका ले चुके सवर्णों के गाल पर जबरदस्त पडा है। लेखकीय प्रतिभा, समयसूचकता, सब्र, मेहनत, सामाजिक भान विद्रोह के ही अंग बनकर सामने आ जाते हैं।

निष्कर्ष

डॉ. तुलसी राम द्वारा लिखित ‘मुर्दहिया’ आत्मकथन अपशकुन से शुभशकुन तक के सफर को वर्णित करता है। शिक्षा से कौनसा परिवर्तन हो सकता है इसका बखान और आदर्श उदाहरण प्रस्तुत आत्मकथन है। उनके आत्मकथन के अगले हिस्से का सबको इंतजार रहेगा। दोनों आत्मकथनों को पढ़कर दलित समाज के संघर्षरत युवक, विद्यार्थी और बच्चे आत्मबल पाए। वर्तमान युग में आप बडी किताबें, ग्रंथ एवं चिंतनात्मक तात्विक बातें पढे बेहतर है पर इनके नहीं पढ़ने से कोई विशेष हानि नहीं होगी। लेकिन ‘मुर्दहिया’ जैसी कृतियां, कृतियां नहीं तो जीती-जागती जिंदगी का चलचित्र है, जो प्रत्येक दलित पात्र को अपनी लगती है; अतः ऐसी रचानाओं को पढे। दलित होने के नाते सामाजिक बहिष्कार और एक आंख से अंधा होने के कारण पारिवारिक बहिष्कार-उपेक्षा के शिकार डॉ. तुलसी राम दोहरी मार झेलते हैं। ज्ञान और शिक्षा की आंख पाकर वे जिस मुकाम पर पहुंच चुके हैं उससे उनकी एक आंख अलंकार बनकर आती है, जो उनके लिए बहुमूल्य है। आशा है डॉ. तुलसी राम की एक आंख दलितों की आंखें खोलने में सफल हो जाएगी।

हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था प्रायव्हेटायझेशन के दौर से गुजर रही है और सरकारी नीतियां प्राथमिक शिक्षा से उच्च शिक्षा तक नकारात्मक बनती जा रही है। ‘मुर्दहिया’ को पढ़ते इसका एहसास हो जाता है कि हमारे देश में प्रतिभा की कमी नहीं है परंतु उस प्रतिभा को निखारने के लिए उचित शिक्षा तंत्र की आवश्यकता है। सरकारी तंत्र सारी शिक्षा की जिम्मेदारी उठाए और प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक का सफर पूर्ण रूप से मुफ्त करे। आगे चलकर यह भी पहल करे कि प्रत्येक विद्यार्थी को स्कूल की उपस्थिति के लिए खाना नहीं तो आर्थिक रूप में भरपूर शिक्षावृत्ति दे। कोई जाति-धर्म माने बिना सबके लिए शिक्षावृत्ति और मेधावी-प्रतिभासंपन्न छात्रों के लिए उनसे चार गुना शिक्षावृत्ति बहाल करे तो भारत का भविष्य उज्ज्वल बन सकता है। दलित-पीडित पात्र शिक्षा के बलबूते पर लंबी उडान ले सकता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत एक देश के नाते विकसित देशों की तुलना में अपना अस्तित्व दलित रूप में ही पाता है। अतः शिक्षा के वर्तमान स्थिति पर पूनर्विचार करते हुए केवल मुफ्त नहीं तो सबके लिए शिक्षावृत्ति के साथ पढाई की कल्पना मंहगी है पर असंभव नहीं। ‘मुर्दहिया’ के बहाने केवल दलित नहीं तो प्रत्येक भारतवासी अपना आत्मपरीक्षण करें तो बेहतर होगा।

समीक्षा ग्रंथ –

मुर्दहिया (आत्मकथन) – डॉ. तुलसी राम, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., नई दिल्ली,

प्रथम संस्करण - 2010, पेपर बैक्स संस्करण – 2012, पृष्ठ 184, मूल्य – 125

डॉ. विजय शिंदे

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देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र)

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

8 blogger-facebook:

  1. बहुत ही सुन्दर ढंग से इस पुस्तक की समीक्षा की है आपने,धन्यबाद।

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    1. लंबी और विस्तृत समीक्षा पढना मेहनत का काम है आपने समय निकालकर पढा धन्यवाद।

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  2. उपरोक्त समीक्षा में उतरते हुए अनुभव हुआ कि वर्णित प्रत्येक घटना की एक गवाह मैं भी हूँ.. हमारे समाज का इतना वीभत्स चेहरा देख कर शर्म आती है.. गहरे तक झझकोर रही है ये..

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    1. अमरित जी डॉ. तुलसी राम जी के लेखन की यहीं ताकत है। आत्मकथन है, और जो अनुभव उन्होंने लिए बडे पेशन्स के साथ सहे और अपने आपको उस मकाम पर लेकर जाने में सफल हो गए जहां कभी 'ध्रुव' पहुंचे थे। प्रत्येक आदमी का अधिकार होता है और उसके हक की एक जगह भी होती है, जिसे उसे देना चाहिए। अगर कोई नहीं दे रहा है तो अधिकार को पाने का लंबा संघर्ष करना पडता है। अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति के स्वभावानुसार अधिकार पाने की लडाई अलग होती है। जो तुलसी राम ने पाया वह प्रत्येक दलित-पीडित को मिले यहीं अपेक्षा।

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  3. हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था प्रायव्हेटायझेशन के दौर से गुजर रही है और सरकारी नीतियां प्राथमिक शिक्षा से उच्च शिक्षा तक नकारात्मक बनती जा रही है।

    puri tarah se sahmat hoon shinde saheb badi vichitra isthiti banti ja rahi hai ...sargarbhit samiksha ....

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    1. डॉ. निशा जी आप भी शिक्षा क्षेत्र से जुडी हैं और सरकार जिस तरह उसके प्रति देख रही है वह कोई अच्छा संकेत नहीं देती है। अतः यह चिंता का विषय है कि जिसके माध्यम से सभी जाति-धर्म से उठकर प्रगति के रास्तों पर चल सकते हैं वह शिक्षा है और उसे खत्म करना मतलब पीडित पीडित रहे और गरीब गरीब रहे ऐसे इंतजाम किए जाना है।

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  4. aap ne pustak ki smiksha bhut a chche se ki hai.aap her pustak ko badI gambhIrataa se padte hai.
    Vinnie,

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    1. विन्नी जी आपने भी समीक्षा को गहराई के साथ पढा। आपके सूक्ष्म निरीक्षण से मुझे अगली समिक्षा के लिए हौसला मिलता रहेगा। टिप्पणी के लिए आभार।

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