सोमवार, 19 अगस्त 2013

पुस्तक समीक्षाएँ

पुस्‍तक समीक्षा

मेरे हिस्‍से का आकाश - लेखिका - ज्‍योति जैन (कविता संकलन)य दिशा प्रकाशन दिल्‍ली, पृष्‍ठ 167, रू. 200

लेखिका सम्‍पर्क - ज्‍योति जैन, 1432/24, नन्‍दा नगर, इन्‍दौर, 452011 (मध्‍य प्रदेश) jyotijain218@gmail.com

101 कविताओं का संकलन छः विभिन्‍न खंडों में विभाजित है - कोमल अहसास प्रेम का, स्‍त्री शक्‍ति, वामा विमर्श, उलझे सुलझे धागे, राष्‍ट्रनमन, अलग-अलग रंग एवं ज्‍योति हूँ मैं। सभी रचनाऐं सामयिक, संवेदनशील, सृजनात्‍मक, सकारात्‍मक, संदेशपूर्ण हैं। हर रचना गागर में सागर है, जीवन के हर रंग हैं, कहीं समाधान है, कहीं पाठकों के लिए चिन्‍तन-मनन-मंथन हेतु बहुत कुछ मिल जाता है।

इन्‍टरनेट, फेसबुक की चारदीवारी में आज हम सब उलझे हुए हैं, ऊबे हुए हैं, उदास हैं, ऐसे मशीनी कृत्रिम वातावरण में ज्‍योति का यह संकलन एक ताजी हवा का झोंका है, एक बार हाथ में आने पर घंटोंं इन भाव भरी सात्‍विक सरल रचनाओं में तन मन डूब जाता है।

हर रचना पूर्ण है, पर अंतिम खंड की रचनाऐं उत्‍कृष्‍ट हैं, गुणवत्‍तापूर्ण हैं। 24 केरेट का खरा सोना है, अंतिम खंड में ज्‍योति स्‍वयं को परिभाषित करती है एवं पाठकों को दर्पण दिखलाती है।

नारी शक्‍ति, देश प्रेम, रिश्‍ते नाते, प्रेम स्‍नेह, प्‍यार ममता, प्रकृति, पर्व, त्‍यौहार, पर्यावरण, पक्षी हर सामयिक पर ज्‍योति की सशक्‍त कलम ने शब्‍दों में भाव भर दिए हैं।

वटवृक्ष, माँ रिटायर नहीं होगी, शुक्रिया मां, शिखा, चानी इत्‍यादि कविताओं में कुछ धागे सुलझे हुए हैं। कुछ हमेशा उलझे रहेंगे, हमारे देश संस्‍कृति के हर परिवार की यह कहानी है, पढ़ते हुए पाठक की आंखे नम ही नहीं होतीं, कहीं कहीं छलक भी जाती हैं, यही ज्‍योति की कलम की सार्थकता है।

स्‍मृति जोशी को सुंदर संकलन हेतु साधुवाद। अशोक चक्रधर ने पुस्‍तक परिचय में सजग संवेदनाओं की आकर्षक सादगी उद्‌बोधन कर ज्‍योति की कलम की ज्‍योति को अखंड ज्‍योति बनने का आशीर्वाद दिया है। समर्पण में ज्‍योति ने जीवनसाथी का परिचय देकर एक शुभ कार्य किया है।

प्रत्‍येक काव्‍य रसिक इस संग्रह से बहुत कुछ पाएगा, अनुजा ज्‍योति को 21 अगस्‍त जन्‍मदिन पर दिलीप भाई की दिल से मंगलकामना सहित यह समीक्षा एक उपहार है। पाठकों के साथ दिलीप भी ज्‍योति बहन के अगले काव्‍य संकलन की प्रतीक्षा करेगा।

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पुस्‍तक समीक्षा

बिजूका - लेखिका - ज्‍योति जैन (लघुकथा संग्रह)य राग रंग प्रकाशन, इन्‍दौर, पृष्‍ठ 104 रू. 150

लेखिका सम्‍पर्क - ज्‍योति जैन, 1432/24, नन्‍दा नगर, इन्‍दौर, 452011 (मध्‍य प्रदेश) jyotijain218@gmail.com

81 लघुकथाओं का संकलन है बिजूका। जलतरंग, भोरवेला, मेरे हिस्‍से का आकाश के पश्‍चात ज्‍योति की यह चौथी पुस्‍तक हिन्‍दी साहित्‍य को एक और उपहार है, गृहिणी जब लिखकर मन के भाव समाज के समक्ष प्रस्‍तुत करती है तो कई रचनाओं में पाठक स्‍वयं को स्‍वतः ही पाता है। जीवन के इन आंधी तूफानों, उतार चढ़ाव, सुख दुःख से हम सभी जूझते हैं, ज्‍योति की सशक्‍त कलम ने ईमानदार लेखन की एक ऐसी ज्‍योति प्रत्‍वलित की है, जो पाठकों के लिए पथ प्रदर्शक भी है, गलतियों को सुधारने का अवसर देती है। यत्र तत्र सर्वत्र पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहने वाली ज्‍योति से साहित्‍य में रूचि रखने वाले परिचित हैं ही, पर संकलन में एक साथ पढ़ना मानसिक संतोष देता है।

आधी रात तक फेसबुक पर उलझने की अपेक्षा इन लघु कथाओं को पढ़ना निश्‍चय ही समय का सार्थक सदुपयोग होगा। हर सामयिक विषय पर सृजन निश्‍चय ही सराहनीय है। सुपात्र, गृहिणी, मौन की भाषा, अपशगुन, पानी के पेड़, सौदा, शपथ, मुक्‍ति, नेग, पोस्‍टमार्टम, बड़ा आदमी, गुनाह, बिजूका, अबला, संवेदना इत्‍यादि शीर्षक स्‍वयं ही लेखन का विस्‍तृत क्षेत्र प्रमाणित करते हैं।

सतीश दुबे की भूमिका में इस पुस्‍तक को प्रमाण पत्र तो दिया ही है। सृजन की निरन्‍तरता बनाए रखने का आदेश भी है।

संजय पटेल के इस पुस्‍तक पर विचार निश्‍चय ही ज्‍योति को इस पथ पर अग्रसर होने की प्रेरणा देगी। भाषा सरल है, सहज है, हर वर्ग का पाठक इस संकलन को अपने घरेलू व्‍यक्‍तिगत पुस्‍तालय में स्‍थान भी देगा एवं जब तब इसे पढे़गा भी। रात्रि में सोने से पूर्व टेबल लेम्‍प की रोशनी में एक अच्‍छी पुस्‍तक पढ़ने की इच्‍छा अभी भी अनेकों साहित्‍य में रूचि रखने वालों को होती ही है, उनके लिए यह पुस्‍तक उन्‍हें गुणवत्‍तापूर्ण सामग्री देकर संतुष्‍ट करेगी।

ज्‍योति गद्य पद्य हर विद्या में माहिर हैं। यह संकलन ज्‍योति ने अपने परिवार की सबसे छोटी सदस्‍य वेदिका को समर्पित किया है। हम पाठक निर्णय नहीं कर पा रहे कि वेदिका और ज्‍योति में कौन हारा कौन जीता, फिर भी वेदिका को स्‍नेह के साथ यह संदेश भी कि नानीजी को खूब परेशान भी करना, पर लिखने भी देना।

रक्षा बन्‍धन 20 अगस्‍त को छोटी बहन ज्‍योति को दिलीप भैया की और से यह समीक्षा का छोटा सा उपहार। दिलीप भाई यह वचन देता है कि वह बहन की पुस्‍तकों की रक्षा करेगा एवं पांचवी पुस्‍तक की प्रतीक्षा तो करेगा हीA

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