सोमवार, 19 अगस्त 2013

साताप्पा लहू चव्हाण का आलेख - इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता में बहुजन–दलित संवेदना

इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता में बहुजनदलित संवेदना

Ø डॉ. साताप्पा लहू चव्हाण
E-mail - drsatappachavan@gmail.com.

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इक्कीसवीं सदी को ‘ तकनीकी सदी ’कहा जाता है. तकनीकी विकास के कारण संपूर्ण हिंदी साहित्य विश्वस्तर पर पहुँच गया. सामाजिक समता का सही रूप तकनीकी सदी में परिलक्षित होता है. ज्ञान देने और लेने की पारंपरिक प्रक्रिया को छोडकर नई प्रक्रिया को इक्कीसवीं सदी ने जन्म दिया है. ‘ज्ञान’ के स्रोत सब के लिए खुले करने करने की प्रक्रिया को तकनीकी सदी ने ही बल दिया है.‘The world at your Fingertips’ का का नारा लगाकर इक्कीसवीं सदी ने ज्ञान की प्रक्रिया को विस्तार दिया.अतः तकनीकी विकास के कारण बहुजन दलित संवेदना का स्वर सामान्य पाठकों तक पहुँच रहा है. इस बात को नकारा नहीं जा सकता.

भारत में अनेक सामाजिक आंदोलन हुए. किसान आंदोलन, दलित आंदोलन, नारी आंदोलन,श्रमिक आंदोलन, वामपंथी आंदोलन तथा गैर–सरकारी संगठनों के आंदोलनों को सामाजिक आंदोलन के अंतर्गत देखना उचित होगा.प्रचलित सामाजिक व्यवस्था को संपूर्णतः बदलना हर सामाजिक आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य रहा है,इस बात से हमें सहमत होना होगा.दलित आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य भी समाज व्यवस्था में संपूर्ण बदलाव लाने का ही रहा है. डॉ.बी.आर. आंबेडकर कहते हैं,“सर्वप्रथम मैं महाभारत के चालिसवें अध्याय के ‘शांति पर्व’के रचनाकार का आभारी हूँ. यद्यपि यह कहना कठिन है कि वह कौन था – व्यास, वैशम्पायन, सूत, लोमहर्ष अथवा भृगु. इनमें से कोई भी क्यों न हो, उसने पैजवन का पूर्ण वृतांत देकर अनुग्रह ही किया है. यदि यह पैजवन को शूद्र न कहता तो शूद्रों के उद्भव का मूल स्रोत ही विलुप्त हो जाता.भावी पीढी के लिए इतनी महत्वपूर्ण सूचना–सामग्री को सुरक्षित रखे जाने वाले रचनाकार का यह अपर उपकार है. इस प्रमाण–साक्ष्य वृतांत के अभाव में इस शोध ग्रंथ की रचना ही असंभव थी.” 1 डॉ.अंबेडकर जी ने 10 अक्टूबर, 1946 में व्यक्त किए

यह विचार आज भी प्रासंगिक लगते है. बहुजन दलित संवेदना प्रकट करते वक्त साहित्यकरों के लिए यह विचार निश्चित ही मार्गदर्शक तत्व बन जाते है.

इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता खास कर दलित कविताओं में आक्रोश की अभिव्यक्ति अपनी संवेदना प्रकट करने के लिए ही हुई है. किसी विशिष्ट वर्ग के विरूद्ध संघर्ष करने की भावना इक्कीसवीं सदी की दलित कविताओं में परिलक्षित नहीं होती. दलित कवि अपनी संवेदनाओं को प्रकट करना चाहते है. “भारत में दलितों की असहमति और व्याप्त असंतोष तथा आक्रोश की अभिव्यक्ति स्थापित सामाजिक,सांस्कृतिक व्यवस्था के अंतर्गत ही होती है.उनका प्रयास सांस्कृतिकरण के माध्यम से परंपरागत जाति व्यवस्था के अंतर्गत अपनी स्थिति में सुधार करना होता है.न कि उसके विरूद्ध संघर्ष करना.”2 इक्कीसवीं सदी की हिंदी दलित कविता इसी विचार को प्रस्तुत करती दृष्टिगोचर होती है.

इक्कीसवीं सदी में वैज्ञानिक विकास के कारण मानव समाज काफी प्रभावित हुआ है.शोषित जनता को अपनी स्वतंत्र जीवनशैली को विकसित करने की प्रेरना देना इक्कीसवीं सदी की दलित कविता का प्रमुख उद्देश्य रहा है. डॉ. एन.सिंह “ ‘पीडा जो चीख उठी’ कविता संकलन को पहला दलित संकलन मानते है. ‘पीडा जो चीख उठी’ में पच्चीस दलित कवियों की दो−दो कविताएँ संकलित हैं.हालाँकि यह प्रथम दलित कविता संकलन है. लेकिन इसका कोई संपादक नहीं है.”3 इक्कीसवीं सदी की हिंदी दलित कविता जीवंत भाषा का परिचय देती है. उत्पीडित समाज मन को प्रस्तुत करती दृष्टिगोचर होती है. वर्ष दो हजार के बाद दलित−शोषितों का दुख अभिव्यक्त करनेवाली कवितओं ने व्यापक दलित संवेदना को प्रस्तुत किया.ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता दृष्टव्य है−

“ मौज़-मस्ती में डूबे लोग
सहम जाते हैं
थके-हारे मज़दूरों की फुसफुसाहटों में
बामन की दुत्कार सहते
दो घूँट पानी के लिए मिन्नतें करते
पीड़ितजनों की आह में
ज़िन्दा रहते हैं शब्द
जो कभी नहीं मरते
खड़े रहते हैं
सच को सच कहने के लिए
क्योंकि,
शब्द कभी झूठ नहीं बोलते !” 4

इक्कीसवीं सदी का दलित कवि शब्दों का महत्व जान चुका है. शब्दों के द्वारा ही वह अन्याय और शोषण के विरोध में अपनी संवेदना को अभिव्यक्ति दे रहा है. भारतीय दलित समाज को विद्रोही और विस्फोटक चेतना प्रदान करने का प्रयास इक्कीसवीं सदी के कवि करते नजर आते है. अछूतों के प्रति मिलनेवाली सहानुभूति वह नहीं चाहते हैं. वह अपना हक चाहते है. सामाजिक व राजनीतिक गतिविधियों से उत्पन्न विकृतियों को दलित कवियोंने स्पष्टता से रेखांकित किया है.

मानवीय अधिकारों के प्रति सजगता और सुविधाभोगी समाज के प्रति आक्रोश इक्कीसवीं सदी की हिंदी दलित कविता में स्पष्टता से परिलक्षित होता है. ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, कवंल भारती,जयप्रकाश कर्दम, एन. सिंह,कर्मशील भारती, डॉ.श्यौराज सिंह ‘बेचैन’, भगीरथ मेघवाल, डॉ. सोहन पाल, डॉ.पुरूषोत्तम, डॉ.दयानंद ‘बटोही’, डॉ.मनोज सोनकर,सुरजपाल चौहान, डॉ. कुसुम वियोगी आदि कवियों ने दलित संवेदना को आत्मसजगता के साथ प्रस्तुति दी है.“ हिंदी दलित कविता की नित नई संभावनाएँ खुल रही है. लेकिन उसकी कुछ सीमाएँ भी स्पष्ट होती जा रही है. जैसे प्रत्येक दलित कवि लगभग एक ही प्रकार की संवेदनाओं को अभिव्यक्ति दे रहा है. इस पुनरावृत्ति का कारण संभवतः सभी कवियों का एक ही प्रकार की स्थितियों और अनुभवों से गुजरना है. सच मायने में यह कविता अपमानित पीढियों की कोख से जन्मी है. बावजूद इसके दलित कवियों की कविताएँ आत्माख्यान से निकलकर अपने शिल्प को निखारने का प्रयास कर रही हैं. वह अब विकास की प्रारंभिक सीढियाँ पार कर चुकी है.”5 कहना आवश्यक नहीं कि इक्कीसवीं सदी की हिंदी दलित कविता सब्र और धैर्य के साथ विकासशील बन रही है. परंपरागत रूढियों एवं विकृतियों को चुनौती देने का सफल प्रयास इन कविताओं में दृष्टिगोचर होता है. सामाजिक और शैक्षणिक समस्याओं को दलित कवियों ने सूक्ष्म और मनोवैज्ञानिक तरीके से प्रस्तुत किया है. श्यामलाल शमी ‘कुछ नहीं बदला’ कविता द्वारा कहते हैं,−

“ कुछ नहीं बदला,

नहीं बदले

हमारे गाँव

है वही पंडा,

वही मंदिर

गजब है

मूर्ति पूजन का

न हक तब था,

न अब है... ”6

इक्कीसवीं सदी में सूचना प्रौद्योगिकी के कारण नया बदलाव आया. मीडिया जनसामान्य को प्रस्तुति दे रहा है लेकिन वर्तमान साहित्य ‘ बहुजन समाज’ की सही पहचान करा रहा है. जो दलित समाज रीढविहीन अवस्था में था वही समाज शैक्षणिक विकास के कारण तनकर खडा हो रहा है, दलित स्वाभिमान के साथ−साथ मनुष्य के अधिकारों को प्रस्तुति दे रहा है. इस अवस्था का संवेदनात्मक चित्रण इक्कीसवीं सदी की हिंदी दलित कविताओं में दृष्टिगोचर होता है. दलित संवेदना को प्रमुखता से प्रस्तुति देनेवाले संपादकों में ‘हंस’ के संपादक राजेंद्र यादव,‘युद्धरत आम आदमी’ की संपादिका रमणिका गुप्ता,‘संचेतना’ के संपादक डॉ. महीप सिंह,‘पश्यंती’ के संपादक प्रणव कुमार,‘नारी संवाद’ की संपादिका डॉ. रेणु दिवान,‘बयान’ के संपादक मोहनदास नैमिशराय आदि प्रमुख है. दलित संवेदना को निडरता के साथ प्रस्तुति देना और हिंदी साहित्य में प्रस्तुत दलित समाज की समस्याओं पर विचार−गोष्ठीओं का आयोजन करने में हिंदी संपादकों की प्रमुख भूमिका रहीं है.मराठी−हिंदी के मूर्धन्य विद्वान डॉ. सूर्यनारायण रणसुभे कहते हैं, “सच्ची कविता हमेशा आम आदमी की ही बात करती रहेगी.मुक्तक, खण्डकाव्य से लेकर लंबी कविता का दौर पिछ्ली सदी में चल. अगली सदी में कविता अधिक सूक्ष्म, अधिक गहरी और अधिक व्यापकता को लेकर प्रकट होगी. इसमें भी दो स्तर होंगे.एक अभिजनों की कविता जो सूक्ष्म सौंदर्य को प्रकट करती जाएगी, दूसरी संघर्षरत आम आदमी से जुडी कविता जो इस मनुष्य की अस्मिता और संघर्ष को रेखांकित करती जाएगी.”7 हमें डॉ. रणसुभेजी के विचारों से सहमत होना होगा ताकि इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविताओं में दलित संवेदना के साथ –साथ आम आदमी की पीडा को अधिक प्रस्तुति मिल रही है. दलित चेतना से संपन्न कविताओं में कृष्ण परख,सत्यप्रकाश, राजेश चंद्रा, श्यामलाल शमी,संगीता नौटियाल की कविताएँ प्रमुखता से सामने आती है. रमणिका गुप्ताजी कहती है,“आज प्रजातंत्र है, राजा−महाराजा के युग बीत गए.इसलिए तो हमें अपनी सोच के साथ –साथ अपनी भाषा‚मुहावरें, मिथक और प्रतीक भी बदलने होंगे. आज व्यक्ति नहीं समाज के संदर्भ में बात करनी होगी, तभी एक समान मापदण्ड बनेंगे,दोहरे मापदण्ड मिटेंगे. साहित्य क्रांति नहीं लाता पर क्रांति की प्रेरणा देता है. साहित्य मानसिकता बदलने का काम बखूबी कर सकता है. साहित्य मानव के रिश्ते मधुर बना सकता है. इसलिए आज हम मानव के इन रिश्तों की पहचान करने की चुनौती को स्वीकारें, जो मनुष्य – मनुष्य में जाति,वर्ण, वर्ग,लिंग और भूगोल भेद को मिटाने के लिए, हर दोहरे –तिहरे मापदण्डों वाली मानसिकता को समूल नष्ट कर दे.”8 हिंदी साहित्य में बहुजन दलित संवेदना को इक्कीसवीं सदी में प्रमुखता से रेखांकित करने का प्रयास हुआ परिलक्षित होता है. मानसिक,सामाजिक,आर्थिक और धार्मिक शोषण के विरोध में हिंदी कविताओं में विशेषकर दलित कविताओं में विद्रोह प्रस्तुत हुआ है.गहन अनुभूति और प्रामाणिकता के कारण ही अनेक हिंदी कवि दलित संवेदना को प्रस्तुत करने में सफल हुए दृष्टिगोचर होते है. कृष्ण परख की कविता ‘दोनों के लक्ष्य अलग –अलग’ दृष्टव्य है,−

“मनु का मकसद है

अंबेडकर को उगने नहीं देना

अंबेडकर का मकसद है

मनु को ज्ञान देना ”9

कहना आवश्यक नहीं कि हिंदी कविताओं में दलित संवेदना सकारात्मकता के साथ प्रस्तुत हुई है. बहुजन दलित समाज का अपमान,शोषण और दमन को इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविताओं में प्रमुखता से चित्रित किया गया है.

स्वाधीनता और सम्मान पाने के लिए दलित समाज संघर्षरत रहा है. इस संघर्ष के पिछे का वैचारिक आंदोलन भी हिंदी कविता में स्पष्टता से नजर आता है. हिंदी के प्रख्यात विद्वान नामवर सिंह, कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी,सुधीश पचौरी, मैंनेजर पांडेय, डॉ.अर्चना वर्मा,डॉ. धर्मवीर,निर्मला जैन, उदय प्रकाश, उदित राज,अशोक वाजपेयी, बलवंत सिंह, विमल थोराट आदि ने हिंदी दलित साहित्य पर ‘हंस’के ‘सत्ता−विमर्श और दलित’विशेषांक में अपने विचार व्यक्त किए है. इन विचारों को पढने से ज्ञात होता है कि हिंदी साहित्य में विशेषकर काव्य विधा में दलित संवेदना को अधिक मात्रा में प्रस्तुति मिल रहीं है. इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविताओं में प्रहारत्मक क्षमता का विकास नजर आता है. बदतर मानवी जीवन का हिस्सा बना दलित−वर्ग आज भी संघर्षरत है. राजेश चंद्रा की कविता ‘विडम्बना’दृष्टव्य है, −

“ हम पथरों में

भगवान देख लेते है

लेकिन इंसान में

इंसान भी देख नहीं पाते

हम बडे अजिब लोग हैं.

हम महापुरूषों की जयंतियाँ

बडी धूम से मनाते हैं

लेकिन उनकी बातों को मानने से

हमेशा कतराते हैं... ”10

इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता हमें समतामूलक समाज की स्थापना हेतु प्रवाहमयी उर्जा प्रदान करती है. दलित संवेदना को प्रस्तुति देते वक्त आत्मपरीक्षण की सलाह देती है. अंधविश्वासी परंपरा को छोड गम्भीरतापूर्वक विचार करने के लिए प्रवृत्त करती है.“हमें विकास के लिए जातिवाद से ऊपर उठना चाहिए ताकि मानवीय समाज का स्तर उठा सकें. हमारी सांस्कृतिक दृष्टि मानवीय हो और हमारी कठोरतम जाति−प्रथा में रोपी गई चण्डालों या अछूतों की भावना का पूरी तरह परित्याग होना चाहिए.हमें मानव निर्मितजाति तथा संप्रदाय के कठघरों को तोड फेंकना चाहिए आज के नेताओं में मौजूद आडम्बर तथा दम्भमयी ईमानदारी का भी पर्दाफाश कर देना चाहिए. आदमी−आदमी में अंतर करना, भेदभाव रखना शिष्टाचार के विपरीत है.”11 वर्तमान हिंदी दलित कवियों के साथ−साथ प्रगतिशील गैर−दलित हिंदी कवियों ने भी सामाजिक बुराइयों पर प्रहार किया है.मानवीय सहानुभूति से दलित समाज की संवेदना को शब्दरूप दिया है. सामंती शोषण के विरोध में दलित कविता जोरदार आंदोलन छेडती नजर आती है.सूरजपाल चौहान,ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, कवंल भारती,जयप्रकाश कर्दम,डॉ. मनोज सोनकर की कविताओं में दलितों के अलिखित इतिहास का जिक्र हुआ है. इन कविताओं में दलित समाज की संवेदना,चेतना और भरपूर अपेक्षाओं का भी लेखा−जोखा प्रस्तुत हुआ है. “आधुनिक हिंदी कविता में दलित चेतना को व्यापक अभिव्यक्ति मिली है.हिंदी कविता का सृजन करनेवाले प्रगतिशील कवियों ने दलित−शोषित की पक्षधरता की है. उनके द्वारा रचित कविताओं में शोषित वर्ग के दुख−दर्द को अभिव्यक्ति मिल सकी है. स्वयं दलित न होने पर भी इन कवियों ने शोषित तथा दलितों के जीवन में बदलाव लाने हेतु जन –चेतना को जाग्र्त किया.”12 कहना आवश्यक नहीं कि दलित और गैर−दलित हिंदी कवियों ने हिंदी काव्यविश्व में दलित संवेदना को प्रमुखता से प्रस्तुति दी है. इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता व्यापक सामाजिक आंदोलन की माँग करती है.

दलित समाज की असहमती,असंतोष और आक्रोश को अभिव्यक्ती देकर मौलिक परिवर्तन की बात करती है. अतः हमें इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता में बहुजन–दलित संवेदना को खोजते वक्त परंपरागत जातिव्यवस्था को तोडकर दर्शन की पुर्नस्थापना करनेवाली काव्यपरंपरा का जिक्र करना ही होगा. इस नई बहुजन–दलित काव्यधारा का विचार इक्कीसवीं सदी में होना आवश्यक है. आज तक बहुजन–दलित कव्यसंकलन प्रकाशित नहीं हुआ है. इसे प्रकाशित करना इक्कीसवीं सदी के बहुजन–दलित काव्यचिंतकों की जिम्मेदारी होगी.इसे नकारा नहीं जा सकता.

निष्कर्ष:

निष्कर्षतः स्पष्ट हो जाता है कि इक्कीसवीं सदी ने ज्ञान की प्रक्रिया को विस्तार दिया.अतः तकनीकी विकास के कारण बहुजन दलित संवेदना का स्वर सामान्य पाठकों तक पहुँच रहा है. इस बात को नकारा नहीं जा सकता. किसान आंदोलन, दलित आंदोलन, नारी आंदोलन,श्रमिक आंदोलन, वामपंथी आंदोलन तथा गैर–सरकारी संगठनों के आंदोलनों को सामाजिक आंदोलन के अंतर्गत देखना उचित होगा. इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता खास कर दलित कविताओं में आक्रोश की अभिव्यक्ति अपनी संवेदना प्रकट करने के लिए ही हुई है. किसी विशिष्ट वर्ग के विरूद्ध संघर्ष करने की भावना इक्कीसवीं सदी की दलित कविताओं में परिलक्षित नहीं होती. दलित कवि अपनी संवेदनाओं को प्रकट करना चाहते है. शोषित जनता को अपनी स्वतंत्र जीवनशैली को विकसित करने की प्रेरना देना इक्कीसवीं सदी की दलित कविता का प्रमुख उद्देश्य रहा है. इक्कीसवीं सदी की हिंदी दलित कविता जीवंत भाषा का परिचय देती है. उत्पीडित समाज मन को प्रस्तुत करती दृष्टिगोचर होती है.

वर्ष दो हजार के बाद दलित−शोषितों का दुख अभिव्यक्त करनेवाली कवितओं ने व्यापक दलित संवेदना को प्रस्तुत किया है. भारतीय दलित समाज को विद्रोही और विस्फोटक चेतना प्रदान करने का प्रयास इक्कीसवीं सदी के कवि करते नजर आते है. अछूतों के प्रति मिलनेवाली सहानुभूति वह नहीं चाहते हैं. वह अपना हक चाहते है. सामाजिक व राजनीतिक गतिविधियों से उत्पन्न विकृतियों को दलित कवियोंने स्पष्टता से रेखांकित किया है. मानवीय अधिकारों के प्रति सजगता और सुविधाभोगी समाज के प्रति आक्रोश इक्कीसवीं सदी की हिंदी दलित कविता में स्पष्टता से परिलक्षित होता है.

इक्कीसवीं सदी की हिंदी दलित कविता सब्र और धैर्य के साथ विकासशील बन रही है. सामाजिक और शैक्षणिक समस्याओं को दलित कवियों ने सूक्ष्म और मनोवैज्ञानिक तरी के से प्रस्तुत किया है. आम आदमी की पीडा को प्रस्तुति देना, दलित समाज की संवेदना,चेतना और भरपूर अपेक्षाओं को व्यापक अभिव्यक्ति मिली है. हमें इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता में बहुजन–दलित संवेदना को खोजते वक्त परंपरागत जातिव्यवस्था को तोडकर दर्शन की पुर्नस्थापना करनेवाली काव्यपरंपरा का जिक्र करना ही होगा. इस नई बहुजन–दलित काव्यधारा का विचार इक्कीसवीं सदी में होना आवश्यक है.

संदर्भ निदेश :

1. डॉ.बी.आर.अंबेडकर− शूद्र कौन ?,पृष्ठ−14

2. डॉ. शैलेंद्र सेंगर –भारत में सामाजिक आंदोलन, पृष्ठ−27

3. प्रधान संपादक मीरा गौतम−अंतिम दो दशकों का हिंदी साहित्य, पृष्ठ−111

4. www.kavitakosh.org Dtd.24.7.2013

5. प्रधान संपादक मीरा गौतम−अंतिम दो दशकों का हिंदी साहित्य, पृष्ठ−117

6.संपादक राजेंद्र यादव−‘हंस’, अगस्त, 2004, पृष्ठ−190

7. डॉ. सूर्यनारायण रणसुभे−दलित साहित्य : स्वरूप और संवेदना, पृष्ठ−119 −

8. रमणिका गुप्ता− दलित चेतना : साहित्यिक एवं सामाजिक सरोकार, पृष्ठ−41

9. संपादक राजेंद्र यादव−‘हंस’, अगस्त, 2004, पृष्ठ−191

10. वही, पृष्ठ−192

11. के.डी. गंगराडे –गांधीजी के आदर्श और ग्रामीण विकास, पृष्ठ−62

12. डॉ. रमेश कुमार−दलित चिंतन के सरोकार, पृष्ठ−93

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डॉ. साताप्पा लहू चव्हाण
सहायक प्राध्यापक
स्नातकोत्तर हिंदी विभाग,
अहमदनगर महाविद्यालय,
अहमदनगर 414001. (महाराष्ट्र)
दूरभाष - 09850619074
E-mail -
drsatappachavan@gmail.com

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