सोमवार, 26 अगस्त 2013

राम आश्रय की रचना - भीम गाथा


           भीम गाथा
        clip_image002[4]                   
                   
   

रचित & संपादित  –
राम आश्रय
चित्रांकन –विपुल सुधाकर

 


                   भीम गाथा ;----
         भारत रत्न डाक्टर बाबा साहब भीम राव अंबेडकर के जीवन संघर्षों को अक्षरों में बांधना कोई आसान कार्य नहीं । उन्होंने अपने जीवन में जिन बाधाओं और विपदाओं को हँसते हँसते पार किया और दुनिया को यह दिखा कि संसार की कोई भी बाधा उन्हे उनकी मंजिल को पाने से नहीं रोक सकती है । हमारा हिन्दू समाज अपने ही समाज के एक बहुत बड़े हिस्से को शिक्षा की सुविधा से विमुख कर के ही नहीं रखा था बल्कि उनकी उन्नति के सारे रास्ते भी बंद करके रखे थे । यहाँ तक की जिस मंदिर की बुनियाद से लेकर प्राण प्रतिस्ठा तक जी जान से तैयार करते,मंदिर का निर्माण होते ही यह उस मंदिर के लिए अछूत हो जाते थे । दर्शन की बात तो बहुत दूर, उन्हे उस गली से निकलना भी मुश्किल था।पाठशाला, चिकित्शालय, सामाजिक उपयोग की जगहों पर उन्हें जाने की मनाही थी ।   जलाशयों में जानवर तो  पानी पी सकता था परंतु मनुष्य जो जलाशयों को बनाता था वह पानी नहीं पी सकता था ।बाबा साहब ने अपने दृण आत्म विश्वास और ज्ञान के बल पर सारे विश्व को बता दिया मानव-मानव सभी समान हैं । सभी को शिक्षा का अधिकार, रोजगार करने का अधिकार होना चाहिए।स्वतंत्र भारत के कानून मंत्री बनकर उन्हों ने उन सभी के लिए ,ऐसी व्यवस्था किया जिससे भविष्य में कोई भी शिक्षा से विमुख न रह सके । परिणाम स्वरूप आज सभी को यह अधिकार हमारे संविधान में उपलब्ध है । उन्होने न केवल दलितों के लिए बल्कि सारे समाज के लिए संविधान में व्यवस्था किया । जिसके आधार पर आज हमारा देश दिनों दिन प्रगति कर के उन तमाम ऊंचाइयों को छू रहा है और विश्व में अपनी ताकत का लोहा मनवा रहा है । फिर चाहे यह चीन हो या जापान, अमेरिका हो लंदन हो । कोई भी देश आज हमारे देश को आँख दिखाने की कोशिश नहीं कर सकता है। आज शिक्षा ने मानव को उसकी उन्नति के सारे दरवाजे खोल दिया है। 


           स्त्री शिक्षा के लिए उन्होने संविधान सभा में बिल को प्रस्तुत किया परंतु जवाहर लाल नेहरू के धुल मुल नीतियों के कारण यह बिल संविधान सभा से पास नहीं हो सका और शिक्षा के महत्व पूर्ण अधिकार से वंचित रखा गया । परंतु दुर्भाग्य हमारे देश का यह है की आज प्रजातन्त्र की सम्पूर्ण शक्तियाँ  कुछ लोगों के हाथों में सीमित होती जा रहीं हैं जो कि  भविष्य में देश के लिए बहुत बड़ी चुनौती के रूप में उपस्थित हो सकती है और जो देश के लिए खतर नाक सिद्ध हो सकती है इस लिए हमें समय इन कमियों को दूर करने की चेष्ठा करनी होगी ।हमें देश कल औए परिस्थितियों के अनुकूल कार्य करना ही होगा अन्यथा बहुत देर हो जाएगी ।  मैंने अपनी रचनाओं के माध्यम से बाबा साहब भीम राव अंबेडकर जी की 
गाथा ,वंदना ,गीत, और कविताओं की रचना करने की कोशिश किया है । मुझे आशा है की आप को आनंद की अनुभूति देगी ।  

लेखक परिचय ----
राम आश्रय
पिता –श्री छोटे लाल एक साधारण किसान
जन्म स्थान –कसेन्दा 
शिक्षा –प्राइमरी –गाँव के सरकारी पाठशाला
उच्च शिक्षा –इलाहाबाद विश्व विद्यालय
रचित पुस्तकें –हिन्दी में –भीम गाथा , नवीन पथ ,
अँग्रेजी में –माई कामिटमेंट और सोसल मिस्टिक


अनुक्रमणिका सूची :---
1॰ भीम गाथा
2. संविधान रच लाये बाबा
3 बाबा के सपनों का भारत
4॰ नारी मुक्ति
5. संविधान निर्माता
6॰ बाबा इतना तू कर
7. माला की दासता
8. एक सच्चा देश भक्त
9. तूफान
10॰ महात्मा बुद्ध
11.  दान
12 . इतिहास
13 . आँगन
14 . आज का विद्यार्थी
15 . शतरंज
16 . साहित्यकार 
17॰ कलम
18॰ आंशु क्यों बहाते हो
19. भ्रष्टाचार 
20.ओ मेरे बाबा
21.मेरा वतन
22. सोचो जरा
23. पत्थर की दासता  


1.         भीम  गाथा
नमन करूँ मैं भीम को, सादर शीश नवाय ।
दया करहु मुझ पर प्रभो,सेवक है असहाय ॥
ज्ञान की दौलत दीजिए,कीजे एक उपकार ।
साथ मेरे तुम होइए,नाव लगा दो पार॥ 
भीम बड़े भट मानी छोड़े अमित कहानी ,
खुशी सरजा भवानी सरस्वती मुसकानी ।
बोली प्रेम मयी वाणी सुनो भीम बलखानी,
तेरे संघर्ष की कहानी है दुनिया सारी जानी  ।
नेता करें न मनमानी ऐसा मंत्र दिया तू ज्ञानी,
उनकी चाल को समझे जनता हो गई सयानी ।
हुई तेरी मेहरवानी किसान ढंग से करे किसानी,
भूख और लाचारी अब हो गईं सारी बात पुरानी ।
लिया ज्ञान की कमान अपने कर में संभाल ,
भेदा दुष्टों का अभिमान किया अधम निढाल ।
आप करुणा की शान किया जग में कमाल ,
मिला सबको सम्मान सब हुए माला माल ।
फैली ज्ञान की ज्योति हटी तिमिर की कटारी,
आज देश में आई सच्ची हरित क्रांति की बारी। 
मन की पीड़ा सारी भूल मिले प्रमुदित नर नारी, 
सारी हृदय की गाँठे खोल पुछे कुशल आचारी ।
भीम बड़े ही सुजान रचा भारत का विधान,
सबको शिक्षा का अधिकार ऐसा किया प्रविधान।
पाखंडी आज हुए परेशान जीत बाबा की आशान ,
बाबा तुम हो बड़े महान फैला ज्ञान जग जहान  ।
आज की सरकार है सभी गरीबों के है सदा साथ,
सबको मिला अधिकार शिक्षित बालक एक साथ ।
जाति धर्म मिटी की दीवार सभी लोग एक साथ ,
किसका करते इंतेजार प्रभु देता है उनका साथ।
जो देते अपने कर्मो से सदा सृजन का साथ, 
अब लो अपने अधिकार आज दुनिया तेरे साथ ।
सबको शिक्षा का अधिकार हुआ संविधान में पास,    
देश से मिटा अंधकार जागा सबमें आत्मविश्वास ।
शासन सत्ता की अब डोर पहुंची जनता के पास,
आज हुआ चमन गुलजार फैली खुशबू आस पास । 
आज देश में बहती नही  कोई धारा प्रतिकूल,
विष हुआ अमृत और परिस्थियाँ हो गई सब अनुकूल ।
एकता बीज उगे और घट गई जड़ता की सभी कूल,
राग, व्देष कटुता मिटी आज बिखर गए सब सूल ।
ममता फैली सभी दिशा,छायी अब समता की मूल,
उपवन में खिले खुशियों के फूल मौसम हुआ अनुकूल।   
आयी प्रेम की बहार लोग गए सारी ईर्ष्या भूल ,
धन वैभव सुख समृद्धि आई प्यार की बरसे सुंदर फूल ।
अम्बर डोला धरती काँपी, हिला पाखंडी आज !
बाबा तेरे एक वार से, सुधरा आज समाज ॥
   

   

 

 

   
2                           संविधान रच लाये बाबा   I
शोषित जन को मंगल करने ,
उन सबका जीवन खुशियों से भरने I
दुखियों के सब दुख को हरने ,
राजा और रंक को बराबर करने I  
फैली विषमता को जड़ से मिटाने ,
ऊंच - नीच का मतभेद हटाने I 
आपस में  सबको साथ मिलाने,
विश्वाश और सदभाव बढ़ाने I   
मानव मानव को समान बनाने ,
शाशन सत्ता को सुदृण बनाने I
सबको उनका अधिकार दिलाने ,
समाज से कुरीतियों को जड़ से मिटाने I 
देश की एकता को मजबूत बनाने ,
समता और ममता का पाठ पढाने I
प्रांतवाद की बढ़ती दीवार गिराने,
ज्वलंत समस्याओ का समाधान दिलाने I संविधान रच लाये बाबा   I
शिक्षा की ज्योति को घर - घर पहुंचाने ,
मंदिर , मस्जिद का वर्चस्व घटाने I
जाति धर्म और मजहब को मिटाने ,
अपने देश के गौरव को बढाने I     संविधान रच लाये बाबा   I


      3.      बाबा के सपनों का भारत
शोषण पर निर्मित समाज ,हिंदूवाद की देन ।
बंटा देश जो आज है , घृणा की सच्ची देन ॥
जातिवाद की अमर बेल ,फैली है हर शाखा पर ,
तोड़ रही यह अमर प्रेम, नस्तर करती हर आशा पर ,
अपना कलुषित कपाट खोल, मानवता को घायल कर,
जन जन में दिया नफरत घोल ,हिन्दू साहित्य के नाम पर ,
निहित स्वार्थों में पड़कर , किया देस्ग का खंडन ।
ममता की जड़ कट कर , तोड़ दिया सब बंधन ॥
मानवता का कर दिया मर्दन ,कुटिल नीति से जोड़ तोड़ कर ,
ब्राह्मण वाद का किया संवर्धन , अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर ,
बना दिया सामाजिक बंधन ,नाना आड्म्बरों को आज जोड़कर ,
सारे समाज का कर दिया विघटन , शिक्षा पर अधिकार जमाकर ,
ज्ञान ज्योति को लूट कर, शासक हुए खुशहाल ।
धन वैभव सब अर्जित कर , सबको किया कंगाल ॥
गरीबों को शिक्षा से वंचित कर , सूर्य पर विजय समझ लिया ,
नाना जुल्म किया समाज पर ,अपने को ईश्वर समझ लिया ,
दृढ़ प्रतिज्ञ बाबा अंबेडकर ,अंगद सादृश्य पग जमा दिया ,
उनके अभियान को जड़ से ध्वस्त कर ,नये युग का संचार किया,
नए पथ का सृजन किया , कष्ट अनेकों सहकर ।
अज्ञान का विनाश किया , गरीबों के बीच रहकर ॥
शिक्षा का अस्तित्व समझाकर,मुरदों में प्राण फुक दिये ,
शासन में हिस्सेदारी लेकर , सब कुटिल नीति को तोड़ दिये ,   
देश के संविधान का सृजन कर , सबको एक सूत्र में जोड़ दिये ,
स्वतंत्र देश के कानून मंत्री बनकर , हीरा सादृश्य सिर ताज हुए ,
नीति पुरानी तोड़कर, जोड़ा सकल समाज । 
समता ममता साथ कर,साधा सबका काज ॥
बाबा के सपनों का भारत ,आज धरा पर उदित हुआ ,
समानता पर निर्मित भारत,दुनिया का आदर्श है बना हुआ ,
बाबा ने किया प्रयत्न अथक , जो इस युग का प्रादुर्भाव हुआ ,
कोई समाज अब नही रहा पृथक , अब नई किरण का उदय हुआ ,
संविधान का सृजन हुआ, श्री कमलों के हाथ ।
नव युग का संचार हुआ ,आज देश के साथ ॥ 

 

 

 


               4.   नारी  मुक्ति

हिंदुवादी समाज में , कैद नारी जीवन ।
दासी बनी यथार्थ में , हाथ पड़े थे बंधन I।
हिंदुवाद के अदभुत खेल  में ,नारी कैद घर अंदर में ,
बचपन पिता की छाया में, यौवन ममता  माया  में ।
पती प्रेम के चक्कर में ,जीवन भर जकड़ी बंधन में ,
दुख हजारों सहती घर में ,घाव लिये अंतस्थल में ।
पोषित पुरुष प्रधान जग, नारी पीड़ित रोज ।
सेवा करती रात दिन ,रख मन अन्दर राज ।।
सारे समाज में बिगुल बजा , नारी मुक्ति  का संग्राम चला ।
हिंदुवादियों का पारा  चढ़ा , नारी को लगा दिया फहरा कड़ा । 
दासी से उठा उसे देवी कहा , उसके सिर देवी का ताज मढ़ा ।
शिक्षा का अमृत स्वय चखा , नारी को शिक्षा से दूर ही रखा ।
युद्ध भूमि में नारी ने ,दिया पुरुष का साथ ।
जीत लिया रण क्षेत्र को , मिला प्रेम से हाथ ।।    
बदलती चाल फिरंगियों की , अब आकर एक करवट ली ।
जब बागडोर आजादी की , नारी ने अपने हाथों में ली ।।
लक्ष्मी बाई ने हाथ में ली ,रणभूमि में दुश्मन को हरा दी ।
हर मोर्चे पर कामयाबी मिली , मैदान अपने नाम कर ली ।
नारी विजय संग्राम से , मचा जगत मेँ  शोर ।
सब बाधा पथ से हटी , दुश्मन हुआ कमजोर ।।
सदियो की पड़ी दासता से , आजाद हुआ जब अपना वतन ।
पूज्य बाबा अंबेडकर जी ने , किया नारी मुक्ति का जतन ।
नेहरू बिल को बचा न सके , सभा मेँ बिल का हो गया पतन ।
दब गयी  आवाज सभा के कोने में , तत्काल किया बिल का दफन ।
रानी दासी का मिटा, सारा फैला द्वेष ।
नारी अब नारी हुई , कोई रहा न भेद ।। 
त्याग बाबा का सार्थक हो गया , नारी घर और दफ्तर ले ली ।
उनका स्वप्न साकार हो गया ,आज सभा ने बिल पास कर दी ।
नारी को अधिकार मिल गया ,सदियों से वंचित अधिकार पा ली ।
आज नारी पुरुष के समान हो गयी , अपनी लड़ाई स्वयं जीत ली ।
समता फैली देश में, मिला सभी को प्यार । 
हुई एकता चहु ओर में , गिरी सभी दीवार ।।

 

 

 

5.            संविधान निर्माता ।
हे स्वर्णिम तंत्र विधाता ,संविधान निर्माता ।
तुम नवजीवन दाता ,गरीबों के भाग्य विधाता ॥
तुम ओज मयी, तुम वीर मयी,तुम शक्ती के दाता ,
तुम न्याय मयी,तुम बंधु मयी,तुम समता के दाता ,
तुम ज्ञान मयी,तुम शील मयी,तुम सौभाग्य विधाता,
जीर्ण शीर्ण जर-जर समाज के,तुम हो नव जीवन दाता,
बाधाओं से,विपदाओं से,तुम हो निजात के दाता ,
जुल्म और अत्याचारों  से,तुम हो विराम के दाता,
गूंगे बहरे मुर्दों में,तुम हो उनके अधिकारों  के दाता,
शिक्षा से वंचित समाज के, तुम हो नव जीवन दाता,
तुम रिद्धि मयी ,तुम सिद्धि मयी,तुम हो सुखों के दाता,
तुम सत्य मयी,तुम प्रेम मयी,तुम हो करुणा के दाता ,
तुम आनंद मयी, तुम कीर्ति मयी,तुम हो यस के दाता ,
प्रबुध और शिक्षित समाज के ,तुम हो सच्चे निर्माता ,
भ्रष्टाचार, गरीबी से,तुम हो सबके संरक्षण कर्ता,
तुम शोषित के,तुम शोषण के,तुम हो उन्मूलन कर्ता ,
दुष्टों और भ्रष्टों से तुम, हो गरीबों के संरक्षण कर्ता,
दीन दुखी मन क्षीर्ण जनों के,तुम हो पालन कर्ता,
हे स्वर्णिम तंत्र विधाता ,संविधान निर्माता .


6.                   बाबा इतना तू कर !
बाबा इतना तू कर, बस तू एक प्रेम डोर बन ।
बेला, चमेली, जूही, चम्पा की कलियों की सुन ,
गेंदा, गुड़हल ,गुलाब,फूल सारी बगिया से चुन,
अनेकों फूलों को जोड़ ,बस एक माला तू बन ॥
बाबा इतना तू कर, सारे जगत में मधुर रस घोल ।
बागों में , बहारों में ,हर गली और कूँचों में ,
खेत खलिहान और हर शहर की सड़कों में ,  
सभी जगहों को मिला, एक मंजिल तू बन ॥
बाबा इतना तू कर,बस एक धारा तू बन ।
गंगा, यमुना ,महानदी ,कृष्णा, कावेरी ,
ब्रह्मपुत्र ,नर्मदा , सोन गंडक और कोसी ,
सारी नदियों को जोड़, एक धारा तू बन ॥
बाबा इतना तू कर, बस एक भारत तू बन ।
हिन्दू, मुस्लिम ,सिक्ख ,जैन और ईसाई ,
बौद्ध, पारसी यहाँ आज मिलकर रहें भाई ,
सारे मजहब को जोड़, एक मानव समाज तू बन
बाबा इतना तू कर, बस तू एक प्रेम डोर बन ।


7.    माला की दासता
साथियों सुनाता हूँ माला की दास्तां
गले में हर बनी एक सुंदर मोती की ।
शोभित थी गले में, गली से न वास्ता ,
मूल को छोड़कर उसने बड़ी भूल की ।
झूमती घमंड में थी छोडती न रास्ता
अपने तीखे वचनों सब को घायल की । 
एक भूल की और काटा रिश्ता अपनों से,
गले से टूटी और गली में आ गिरी ।
देखे पथिक राह में घृणा के भाव से,
उसके बुरे कार्य की उसको सजा मिली ।
बार-बार हुई पद दलित पथिकों से,
उसे प्यार मिला नहीं किसी रही की ।
हुई मूर्छित होकर गिरी सड़क पे ,
पर द्या मिली न किसी मानव की ।
हे साथी सोचो तुम अपने मन में ,
अगर राह में एक सुंदर हार गिरे ।
क्या ! हार सड़क में कहीं पड़ा रहे ,
क्षण मात्र में राही जो राह से निकला ।
उसने कैसा उसको अपना प्यार दिया,
झट गले लगाकर अपना सारा प्यार दिया ।
अब व्यर्थ गवाओं न एक क्षण तुम,जग में मोती बन रहना छोड़ दो ।
मोती से अब माला बनकर तुम,अपनी ताक़त जग को दिखला दो ।
मंजिल पर चल कर देखो तुम,अपने मन में रखकर विश्वास को ।
निश्चित कर अपनी विजय तुम,बाबा के सपनों को एक नया आकार दो ।
हुंकार लगा अब आवाज दो तुम,बाबा के संघर्षों को व्यर्थ आज मत होने दो।
करो प्रतिज्ञा सब मिलकर तुम , अपनी एकता से अपना भविष्य बना लो ।


        8        एक सच्चा देश भक्त
देश भक्त समाज के लिए ,शाश्वत सुपथ का निर्माण करता ।
सदा सुनहरे भविष्य के लिए ,नई नीतियों का सदा सृजन करता ।
मनोहर कल्पनाओं के लिए ,कठिन परिश्रम से भूमि तैयार करता ।
मानवता के पोषण के लिए ,दुखों का सदा समूल विनाश करता ।
        
समाज में समता लाने के लिए ,आपसी विश्वास जगाने का प्रयास करता ।
हमेशा देश की रक्षा के लिए, एक जागरूक प्रहरी तैयार करता ।  
जो गर्मी की तेज धूप सह कर ,दुश्मन से अपने देश की रक्षा करता ।
सर्द हवा के झोंकों से लड़कर, अपने देश पर प्राण निछावर करता ।

भूख-प्यास को खुशी से सहकर ,जन जन के जीवन की रखवाली करता ।
सुनहरे कल के उन्नति के लिए ,नई पौध को तन मन से संवर्धन करता ।
वृक्ष के मूल को नीर से सींचकर, उसकी शाखाओं को सदा सँवारता ।
फल की अपेक्षा मन में न रखकर,नाना बुराइयों से सदा उन्हे बचाता ।

अपने प्रयत्नों से आगे बढ़ कर ,औरों के लिए कल्प तरु तैयार करता ।
विपत्ति में धैर्य धारण कर ,घोर निराशा के बीच आशा के बीज बोता ।
अपने परिजनों में भरोसा जागृत कर,प्रेम को नए सिरे से परिभाषित करता ।
समाज में सभी के उत्थान के लिए,सुखमय वातावरन का निर्माण करता ।

अपने मित्र को सदा घोर संकट से ,बचाने में उसकी सहायता करता ।

    देश भक्त समाज के लिए, शाश्वत सुपथ का निर्माण करता ।

 


9    तूफान
भ्रष्टाचार के प्रचंड तूफान ने ,
वृक्षों को जड़ से हिला दिया ,
दूर तक उड़ा दिया उनकी डाल को 
कमजोर को छोड़ा नहीं,इस प्रचंड तूफान ने ।
क्षत विक्षत कर दिया प्रबुद्ध समाज को,
धरती से मिटा दिया कितनों को जड़ से,
इस प्रचंड तूफान ने ।
सोचने पर लोग विवश हुए,
उग्र दानव के अगूढ़ रहस्य को,
मानव हृदय को विचलित किया , इस प्रचंड तूफान ने ।
झोपड़ी से जा छान दूर पड़ी ,
धिककारती अपने भाग्य को ।
लहू लुहान कर दिया था। इस प्रचंड तूफान ने ।
जड़ता गहरा गई थी जगत में ,
सूझता न था किसी के हाथ को ।
समाज में उलट फेर कर दिया था इस प्रचंड तूफान ने ।
ढृण प्रतिज्ञ अन्वेषियों ने खोजा,
इस भयंकर दानव के संरक्षक को,
अपने हथियार सारे डाल दिए ,
इस प्रचंड भ्रष्टाचार के तूफान का ,
सारी धरा से विनाश अब हुआ ।
नव ज्योति मिली जगत को, भ्रष्टाचार का अंत हुआ ॥

   


              10   महात्मा बुद्ध

प्रकृति का यह नियम शाश्वत, कोई न परिपूर्ण हुआ  ,
जिसने किया परमार्थ यहाँ, वह अमर जगत में हुआ ।
हर मानव यह आश ले संसार में सब जगह घूमा फिरा ,
जो कुछ मिला उन्हें खोज में, वह दीन दुखियों में भरा ।
ज्ञान के आतुर परिंदे खोज में, उड़ते अम्बर में यहाँ-वहाँ,
बन न पाये स्थिर बसिन्दे, हर क्षण भटकते थे यहाँ-वहाँ ।
जो भी उनके पास आया, वे सदा खुस हो सब लुटाते रहे ,
ज्ञान ज्योति में विस्तार आया वह सदा आगे बढ़ते रहे ।
निश्चल बादल सदृश्य ठहर, बस एक जगह बरसने लगे ,
बस वहीं गुरु नाम से, विश्व विख्यात विदयालय बने ॥
ज्ञान की ऊर्जा संसार में, चारों तरफ फैलाता रहा ,
तिमिर से लड़ने शक्ति, हर इंसान में जगाता रहा ।
बीज बोता सतमार्ग का, जीवन में पून्यार्जन करता रहा ,
कल्याण कर इंसान का, सबकी मंगल कामना करता रहा ॥
ज्ञान सलिल सागर सदृश्य, नाना रत्नों से परिपूर्ण हुए ,
सारी बुराइयाँ संसार की, अपने तेज ज्ञान से मिटाते हुए ॥
समाज को हर काल में शुद्ध कर, संहार से बचाते रहे ,
खुल स्वर्ग का व्दार जग में ऐसा उपक्रम चलाते रहे ।
खुला जग में ज्ञान पीठ एक नया अद्भुत रूप धरण कर ,
ज्ञान ज्योति की पूञ्ज फैली सारी अज्ञानता को कुचलकर ॥

   

 

           11      दान

एक दान है विद्यादान, करो सदा मन लाय ।
ज्यों ज्यों खर्चे जगत में ,त्यों त्यों बढ़ता जाय ॥
जो देता दिल खोल कर , जग में पूजा जाय ।
धन संपदा सब कुछ मिले ,नाम अमर कर जाय ॥
दान दूसरा जगत में , जो प्रभु का वरदान ।
कर दो सोच विचार कर , जग में मिले सम्मान ॥
ईश सृष्टि के विस्तार में, कर सच्चा योगदान ।
इस सृजन के संग्राम में ,अपना कर बलिदान ॥
अभय दान उससे बड़ा , जो गुरु का आदेश ।
शत्रु को भी उपहार कर, ले उसका आशीष ।।
शांती लाए लक्ष्मी बसे ,मिटे हृदय के क्लेश ।
राज पाठ दोनों मिले , पहुंचे सच्चा संदेश ॥

अंग दान सबसे महान , ज्यों जग जीता जाय ।
कर न सका जो दान यह , फिर पीछे पछताय ॥
जग से जाने से पहिले , करो नेत्र का दान ।
तेरी उपस्थिति दे सके , करो जगत का कल्याण ॥

 

 

 


12     इतिहास    
इतिहास का उपहास मत  कर,यह  तेरे आतीत का दर्पण है ।  
ये जीवन के सभी मोड़ों पर ,ये ज्ञान ज्योति का प्रकाश पुंज है ।
स्वर्ग से सुदर राज महल पर ,सारी दुनिया आज फिदा है ।
मानव सभ्यता के विकास पथ पर ,चलता फिरता एक कथा चित्र है ।
पर्वत का सीना आज फाड़कर ,तूने जो विजय  पथ बनाया है । 
गिरिवर की उतुंग चोटी पर ,पद चिन्ह तुम्हारे जो अंकित हैं ।
नदी की बहती धारा को मोड़कर ,बिजली जो आज तुमने बनाई है ।
बंजर धरती पर बीज रोपकर ,जो फसल आज तूने उपजाई है ।
सागर की लहरों से लड़कर ,कनिष्क ,विराट को तैराया है ।
वारिध को रण मेन परास्त कर ,मोती चुन गर्त से बाहर लाये हो ।
अम्बर मेन उड़ते वायुयान पर ,नजर सभी की टिकी हुई है ।
अब चंदा से लेकर मंगल पर ,तेरी शोर्य पताका फैली है ।
यह जीवन की उन्नति अवनति पर,एक वृसितित लेखा जोखा है ।
अपने इतिहास का उपहास मत  कर,यह  तेरे आतीत का सच्चा  दर्पण है । 

 

 

 

                       13          आँगन में
नए वर्ष की स्वर्ण किरण,पहले आए तेरे आँगन में ,
अंधकार की काली छाया, टिक न पाये तेरे आँगन में । 
प्रीत,स्नेह और धन वैभव ,लाये कुबेर तेरे आँगन में ,
दुनियाँ की सारी सुख सुविधा ,भर जाएँ तेरे आँगन में ।
फूल कली से महके उपवन , भँवरे गायें तेरे आँगन में ,
प्यारी चिड़ियों की मधुर गूंज , हर क्षण गूँजे तेरे आँगन में ।
सौरभ सुगंध बन तेरा गौरव ,छा जाये जग के आँगन में ,
दुख दरिद्र और हीन भावना , कभी न आए तेरे जीवन में ।
काम क्रोध और मन में लालच , कभी न टिके तेरे दामन में ,
चन्दा ले चमके धवल चाँदनी , हर शाम तुम्हारे आँगन में  ।
तारों की झिल मिल ज्योति , हर रात सजे तेरे आँगन में ,
रतनाकर की हर उठती तरंग , रत्न भरे तेरे आँगन में ।
कारे कजरारे सांवन के बादल , मोती बरसाएँ तेरे आँगन में ,
सबकी उन्नति और प्रेम भावना, हो लक्ष्य तुम्हारे जीवन में ।
शांति और सदभाव की कामना , फैले सबके जीवन में ,
नए वर्ष की स्वर्ण किरण,पहले आए तेरे आँगन में ॥

 


   14    आज का विद्यार्थी
हमारी प्रगति में गुरुजनों का योगदान ,
सभा में बैठे गुरुजन हैं महिमा से मंडित ।
सदा हमको दिया विद्या का श्रेष्ठ दान ,
ज्ञान विज्ञान से आज हम हैं सुशोभित ।
अजी ! छोटे में हमने वादा किया था ,
बड़ों का सम्मान गुरुजनों  का आदर ।
हर सुबह हमने प्रतिज्ञा किया था ,
कभी भी न किसी का करेंगे निरादर ।
मान सम्मान का पूरा ध्यान रखा था ।
छोटी -छोटी गलतियों ध्यान हटाकर ,
कभी काम न किया तो निकम्मा कहा था ।
बुरी आदतों से हमें रखा  बचा कर,
जो बचपन हमने उनसे  वादा किया था ।
पूरा करेंगे सारे कसमें निभा कर ,
पाँच सितंबर उन्हें दे देंगे सम्मान ।
उनकी सारी  शिकायत को दूर कर, 
पढ़ देगें व्याख्यान निभा देंगे वादा ।
आशा की ज्योति फिर से जलाकर ,
अपने गुरुजन के मन में है आश जगाना ।

 

         15   शतरंज
शतरंज के एचआर मोहरे , चलते अपनी चाल ।
बैरी को सब मिल मारते , रखते सबका ख्याल ॥
शतरंज समाज का सच्चा है आइना ,
हर खिलाड़ी सदा जीत की करता कामना ।
वर्तमान में भविष्य का दिखलाता रास्ता ,
बैरी से डटकर सदा करता है सामना ।
अपने प्रतिद्व्दी को कम नही आँकता ,
युद्ध के मैदान से पीछे नहीं भागता ।
खतरों की प्रवाह न करता सिपाही , 
राजा की शान हैं ये सच्चे सिपाही ।
अपने राजा की राह करते आसान ,
राजा की जीत में सदा पाते सम्मान ।
शतरंज में प्रजातन्त्र का , झलकता है सही रूप ।
समाज के हर क्षेत्र का , रखता समग्र प्रारूप ॥
फैला जगत में आज सर्वत्र एक रूप ,
शासन में जनता का दिखता स्वरूप ।
सूरज सादृश्य सबको देता है धूप ,
भेद भाव छोड़ बना सबके अनुरूप ।
नाना जाति धर्म बंटा अपना समाज ,
प्रगति पथ है खुला सबके लिए आज ।
गरीब मजदूर सब मिलकर रहते आज ,
बढ़ रहा आगे प्रतिदिन अपना समाज ।
मंत्री अधिकारी सब हैं एक दूजे के साथ ,
जन नायक आज मांग रहे जंता से साथ ।
प्रखर बुद्धी का परिचय दे , शतरंज जीते प्रवीण ।
दुश्मन से बाजी छीने , कर सबको पराधीन ॥
शतरंज बुद्धि जीवियों का उत्तम खेल ,
समाज के हर वर्ग का दिखलाता मेल ।
समय का इस खेल में नही कोई मोल ,
दुश्मन पर विजय की देता राह खोल ।
संकट में धैर्य रखकर लेता उत्तर खोज ,
आलस्य को त्याग सतर्क रहता हर रोज ।
बाजी हर चाल की चलता है  नाप तोल ,
हर किसी से रखता आपस में मेल जोल ।
उसके यश की पताका जग में फैले चहु ओर ,
सूरज की तरह अम्बर में चमके चारों ओर ।
दिखा रहा शतरंज आज , शासक की योग्यता ।
साम्राज्य में आपूर्व तेज , सूर्य सादृश्य चमकता ॥

 

16     साहित्यकार    
साहित्यकार है एक सफल मालाकार ,
जो नाना फूलों से बना देता सुंदर माला ।
रचता है कविता लिखता, कहानी का सार ,
जो सबके दिल को प्रभावित केआर डाला ।
भाषा के शब्दों को चुनकर देता आकार ,
अपनी कल्पनाओं को देता सुंदर आकार ।
समाज में फैली विसंगति को मिटाकर ,
देता है अपने देश के गौरव को संवार । 
त्याग बलिदान की सच्ची इबारत रचकर ,
भर देता है जन जन के मन में प्यार ।
अपनी सहज मनोवृतियों से सृजन कर ,
लाता है पुरानी परम्परायों में सुधार ।
राग ,द्वेष ,ईष्या को मानव हृदय से मिटाकर ,
भविष्य की  नयी  पौध करता है तैयार ।
जो विपत्ति के तेज धूप में गहन छाया बनकर ,
जोड़ दे सबको, बनकर माला की एक डोर ।

 


17.  कलम
मानव के मस्तिस्क  पटल पर,
नन्ही सी आकृत ले ,मैंने कदम रखा ।
चल पड़ी मई आशा के जीवन पथ पर ,
जहां मुझे खुद को कुछ नहीं था पता ।
हंस रहे थे लोग मेरे परिणित  पर,समय ने मुझको दिया सुनहरा मौका ।
मैं  छा गयी मानव के मस्तिस्क  पटल पर,
मैं ने सजने सँवारने का नहीं छोड़ा मौका ।
देखते ही देखते मैं छा गयी बाजार पर ,हर तरफ संसार में होने लगी चर्चा ।
बच्चे ,बड़े हर किसी के जेब पर,
मैंने आसानी से कर लिया कब्जा ।
मैं  छा गयी मानव के मस्तिस्क  पटल पर,मेरे रूप सौंदर्य का बट गया पर्चा ।
मैं सदा रहने लगी मानव के मुख पर ,
मुझे साथ रखने के लिए लोग करने लगे खर्चा ।
बाजार में बिकने लगी नाना रूप धारण कर ,सुंदरता के साथ मैं ने बढ़ायी अपनी क्षमता ।
दो घड़ी से बड़ अब मैं चलने लगी सप्ताह भर ,
धरती से लेकर अम्बर की ऊंचाई को छुआ ।
मैं  छा गयी मानव के मस्तिस्क  पटल पर,दिखा दिया मानव को वह अजेय लम्हा ।
मैं नन्ही सी कलम ,मुझे विश्वाश  है अपने ऊपर ,
मैं दे सकूँ सबको सुख का लम्हा । मैं  छा गयी मानव के मस्तिस्क  पटल पर ।

 

18    आंशू  सदा बहाते क्यों !
जब वर्षा रानी रूठ गयी, तो आंशू क्यों बहाते हो ।
जड़ जंगल रह सावधान, सब  अपना धर्म निभाते ।
मीठे-मीठे सुमधुर फल देकर , सबकी भूख मिटाते ।
पशु पक्षी को परम प्यार दे , सदा उनकी रक्षा करते ।
हर प्राणी को शरण में रखकर ,धरती की शान बढ़ाते । 
जड़ चेतन का सुंदर रिश्ता , जीवन में  सदा निभाते ।
बदले में कुछ आश न रखकर , मानव को पाठ पढ़ाते ।
पर मूर्ख इंशान !इनकी प्यार की भाषा कहाँ समझते  ।
प्यार के बदले नस्तर देकर , सब जड़ से इन्हे मिटाते ।
वर्षा लाने वाले उपवन की ,रक्षा मन से कभी न करते ।
नभ में छाए घन  देखकर ,इन्द्र की  पूजा हैं नित करते ।
जीवन देने वाले वन को , सच्चा प्यार कभी न करते ।
जब वर्षा रानी रूठ गयी, तो आंशू सदा  बहाते । नदियां सारी सूख गयी, तो आंशू सदा बहाते ।
लालच के वशीभूत होकर , जंगल से पेड़ को काटते । नदियों पर फिर बांध बनाकर , पानी को एसे बांटे ।
नदी किनारे उद्दयोग लगाकर , जल में जहर मिलाते ।
नदी का पानी शहरों में लेकर, अपनी प्यास बुझाते ।
जंगल पर अधिकार जमाकर, पशु पक्षी से बसेरा छीने ।
नदी के जीवन चक्र तोड़कर , ये झूठी शान दिखाते ।  
नदियां बहना भूल गयी तों  अब आंशू क्यों हो बहाते I


19.    भ्रष्टाचार
आज भ्रष्टाचार ने कोहराम मचा दिया ,
प्रजातन्त्र की नींव को जड़ से हिला दिया ।
ईमान की दीवार को नश्त नाबूत कर दिया,
देश की सुरक्षा पीआर प्रश्न चिन्ह लगा दिया ।
शासन में परिवार वाद ने अपना घर बना लिया,
बेईमानी का बीज हर क्यारी में उगा दिया ।
प्यार और सद्भाव को झकझोर कर रख दिया ,
चारों तरफ नफरत की बाड़ खड़ी कर दिया ।
चापलूसों का समाज में हुजूम सा लगा दिया ,
मेहनत कस इंसान का जीवन बेकार कर दिया ।
सबके लिए उन्हें मात्र हंसी का पात्र बना दिया,
नेता और बाबू ने लूटना अपना ईमान बना लिया ।
आज महगाई ने सभी का जीना दुश्वार बना दिया,   
बाजार में कालाबाजारी और लूट सरे आम कर दिया ।
देश के नवजवानों को उनके पथ से भ्रष्ट कर दिया ,
लेखनी और किताब की जगह उन्हें बंदूक दे दिया ।
उदारीकरण के नाम पर देश को गिरवी रख दिया ,
बड़ी कंपनियों को देश के नेताओं ने हथियाँ लिया ।
   समाज कल्याण के नाम पर टैक्स बचा लिया ।
सड़क से संसद तक कानून का मखौल उड़ा दिया ,
   घपलों और घोटाओं से देश को शर्म शार कर दिया ।
     अपने देश का पैसा विदेशी बैको में जमा कर दिया ,
      देश को आर्थिक बदहाली के किनारे खड़ा कर दिया ।
मेरे देश के नवजवानों जागो अब समय आ गया ,
बचा लो देश की गरिमा यह संदेश आ गया ॥

 

 

 

 

 

  20    ओ मेरे बाबा
तुम ईष्ट देव मेरे ,आराध्य देव मेरे । तुम प्राण देव मेरे , तुम हो सर्व देव मेरे ॥
सूरज से तुम हो न्यारे ,चन्दा से हो तुम प्यारे ।
लाखों गरीब जन के ,आँखों के तुम हो तारे ।
तुम इंसान नहीं भगवन मेरे,हर कम तुम सँवारे ।
आरती करू मैं हर दिन , आरती शाम और सवेरे ।
गंगा से तुम हो पावन ,तुमने पतित को तारे ।
शिक्षा का अमृत घर-घर , तुम आज ले पधारे ।
समझा हमारे दुख को , संविधान ले पधारे ।
वंदन करू मैं निसि दिन ,नित शाम और सवेरे ।
मुसीबतों में तुम प्ले ,सदा अन्याय से लड़े ।
कभी भूल से भी आप,अपनी मंजिल से न डिगे ।
किश्ती निकली मझधार से ,लहरों से न डरे ।
नमन करू मैं हर दिन , नित शाम और सवेरे ।
अज्ञानता से सब लड़ सकें , वह ज्ञान दे दिए ।
प्रभु मांगे बिना ही आपने , सब कुछ हमें दिए ।
घाव भरे हमारे मन के , सब कष्ट हर लिए ।
पूजा करू मैं हर दिन , नित शाम और सवेरे ।
तुम ईष्ट देव मेरे ,आराध्य देव मेरे । तुम प्राण देव मेरे , तुम हो सर्व देव मेरे ॥


        21    मेरा वतन
आज मेरे वतन को क्या हो गया ।
कल बागों में कोयल कूक रही ,बैठी पेड़ों पर चिड़ियां चाहक रहीं ,
कलियाँ मंद पवन में झूम रहीं ,अपनी भीनीं सुगंध को बिखेर रहीं ,
कल झरनों का पानी जीवन देता रहा ,पशुओं की प्यास को हरता रहा ,
कण कण में नव जीवन भरता रहा ,जग सुख और वैभव लुटाता रहा ,
  कल हिन्दू ,मुस्लिम ईसाई में एकता रही ,सच्चे प्रेम की सरिता बहती रही ,
धर्म के नाम पर कोई शिकायत नहीं ,सभी आपस में करते थे प्यार सभी ,
देश प्रगति पथ पर आगे बदता रहा , गली गाँव शहरों में प्रेम बीज बोता रहा ,
दुखों पर स्नेह का मलहम लगाता रहा , अपने दुश्मन पर सदा जीत पता रहा ,
कल वैज्ञानिक नए शोध करते रहे , अपने गौरव को जगत में फैलते रहे ,
नित नए रोज अस्त्र बनाते रहे ,अपने वतन की सुरक्षा को बढ़ाते रहे ,
नदियां कलुषित हुईं, प्रगति बाधित हुई ,कलियाँ मुरझा गयीं ,खुशबू खंडित हुई ,
सारे झरने सुख गए , वैज्ञानिक गुम हो गए ,धर्म चक्र रुक सा गया , जीवन थम सा गया ।
आज नेता बुद्धिजीवी कर लो विचार मंथन ,
नयी पीड़ी के लिए अब कर लो थोड़ा चिंतन,
मानव की कुरुरता पशु झेल रहे हर दिन ,
अब पक्षियों के सामने आ खड़ा है दुर्दिन ,आज मेरे वतन को क्या हो गया ।

22                     सोचो जरा !
सूरज रोज सवेरे आता , चंदा चाँदनी है बिखराती ।
विराम दायिनी रजनी आती,सबको सुख दे जाती ।
अम्बर में तारे गतिशील ,हैं ये सड़कें आती जाती ।
आयु हमारी बदती रोज ,मणि से शोभित है नागराज ।
मंदिर में हैं परमपिता ,सबके आँखों में है ज्योति ।
सूरज में बस्ती है लाली , हाथी के मस्तक में मोती ।
स्वर्ग में फैला इंद्रासन,सबके तन में है जीवन ।
कानों से उत्पन्न कर्ण ,उत्तानपाद से जन्मे ध्रुव तारा ।
विष्णु सोते शेष नाग पर , राम के डर से हिला संन्दर ।
हनुमान जी निगले थे सूर्य,  । रावण था दशकंदर ।
अहिल्या पाषाण बनी थी ,राम चरण रज से इंसान बनी थीं ।
गज आनन थे देव गणेश ,तीन नेत्र से प्रसिद्ध महेश । 
ये दोस्तों छोड़ दो सारे भ्रम ,टूट जायेगे सब फैले मर्म ।
जब होगा ज्ञान का संसर्ग , हम सब का मन होगा निर्मल ॥ 

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------