शशिकांत सिंह 'शशि' का व्यंग्य - लोकतंत्र को खतरा

SHARE:

लोकतंत्र को खतरा देवियों और सज्‍जनों ! आप सबको सूचित किया जाता है कि हमारे लोकतंत्र को भयानक खतरा उत्‍पन्‍न हो गया है। बेचारा अंतिम सांसें ...

लोकतंत्र को खतरा

देवियों और सज्‍जनों ! आप सबको सूचित किया जाता है कि हमारे लोकतंत्र को भयानक खतरा उत्‍पन्‍न हो गया है। बेचारा अंतिम सांसें ले रहा है। आप सब इसके लिए दुआ करें। ये अचानक उत्‍पन्‍न खतरा है। आजादी के पैंसठ सालों में कभी ऐसा नहीं हुआ। लोकतंत्र खूब फल-फूल रहा था। खा-खा के मोटा हो रहा था। गैंडे की तरह सूरत हो गई थी। दूसरे देश वाले भी पूछते थे कि आपका लोकतंत्र क्‍या खाता है ? आखिर इतना मजबूत कैसे है ? हम उन्‍हें गर्व से बताते थे कि हमारी जड़ें काफी गहराई तक हैं, इसलिए लोकतंत्र मजबूत है। इतने आतंकवादी हमले हुये। इतने भ्रष्‍टाचार हुये। इतने नामी-गिरामी नेता जेल गये। कभी लोकतंत्र को नज़ला-ज़ुकाम तक नहीं हुआ। कामराज से लेकर कलमाडी तक इतने घपले हुये मगर क्‍या मजाल कि लोकतंत्र के सिर में दर्द भी हो। भय भूख , भ्रष्‍टाचार से लोग परेशान थे। किसान आत्‍महत्‍या कर रहे थे। संसद भवन में वोट खरीदे जा रहे थे। इतनी कठिनाइयों में भी लोकतंत्र मुस्‍करा रहा था। अजीब जीवट किस्‍म का था हमारा लोकतंत्र। पता नहीं किसकी नजर लग गई है। अब न हंसता है न मुस्‍कराता है। चुपचाप गुमसुम सा रहता है।

यह सब इसलिए हुआ क्‍योंकि लोगों ने सांसदों पर अंगुली उठानी शुरू कर दी। संसदीय लोकतंत्र में संासद पर सवाल खड़े किये जायें। यह बेचारे लोकतंत्र से सहन नहीं हो रहा है। सांसद सर्वोच्‍च हैं। उनकी कही गई हर बात वेदवाक्‍य है। उनके द्वारा किये गये कर्म देवकर्म हैं। समाज के लिए आदर्श हैं। उन पर प्रश्‍न खड़े करना अर्थात लोकतंत्र पर कुल्‍हाड़ी मारना। यह काम किया अन्‍ना हजारे साहब ने। उन्‍होंने आम आदमी को उसकी ताकत से रू-ब-रू करा दिया। उनकी समझ में आ गया कि संसद के बाहर से भी लोकतंत्र के लिए काम किया जा सकता है। बस तभी से लोकतंत्र बीमार चल रहा है। संसद का काम है -कानून बनाना। वह जब चाहे बनाये आप कौन होते हैं , उसे कुछ भी कहने वाले। आपने एक बार चुन कर भेज दिया। अब खामोश होकर तमाशा देखिये। ऐसा नहीं कि हमारे सांसद जागरूक नहीं हैं। विश्‍वास न हो तो आप संसद का सत्र टी वी पर देखिये। हर सांसद चौकन्‍ना नजर आता है। इतने सजग हैं कि सब अपनी बात कहना चाहते है। अब इसमें शोरगुल हो जाये तो सांसदों की क्‍या गलती ? सत्र का मतलब ही यही है। शांति से दूसरों की बात सुनने लगें। सार्थक बहस करने लगें। तब टी वी पर कैसे दिखेंगे ? चलो शोरगुल मच ही गया तो क्‍या ? लोकतंत्र तो सुरक्षित है। कभी-कभी हंगामा हो जाता है, तो क्‍या ? चार घड़े एक साथ रहते हैं तो टकराते ही हैं। हमारे सांसद क्‍या घड़ों से भी गये बीते हैं। टकरा गये तो टकरा गये। विपक्षी पार्टी चिल्‍लाई कि हमें खरीदने की कोशिश की गई । उन्‍होंने नोट हवा में लहराये। पता चला कि उसमें अमर सिंह साहब का नाम आ रहा है। भई हम तो नहीं मानते। सांसद कभी गलती नहींं करता। वह लोकतंत्र की नींव है। पुलिस वाले उन्‍हें जेल ले गये। चलों थोड़ी देर के लिए मान भी लेते हैं कि सांसदों को खरीदने की कोशिश की गई। तो क्‍या हुआ ? लोकतंत्र को खतरा तो नहीं पहुंचा न। लोकतंत्र के पेट में दर्द तो नहीं हुआ। मगर आप कहेंगे कि लोकपाल बिल लाओ तो मंत्री जी को गुस्‍सा आयेगा ही। मंत्री जी जो कहते हैं, वही सही होता है। चलो अड़तालीस साल से यह बिल संसद में पैंडिंग था तो क्‍या हुआ। रहता पचास साल और। हमारा पहला काम जरूरी बिल लाना नहीं हैं। पहला काम है लोकतंत्र को बचाना। मौसम बदल रहा है। कहीं कोई भयानक बीमारी लग गई तो ? आजादी के तुरंत बाद इसे कंबल में लपेट कर लॉकर में डाल दिया गया था। केवल इसके अच्‍छे स्‍वास्‍थ्‍य के लिए। लोकतंत्र की जगह हम तंत्रलोक से काम चला रहे थे। तंत्र लोक अर्थात तंत्र जहां फले-फूले ऐसा लोक। जैसे- देवलोक देवताओंका। ब्रह्मलोक ब्रह्मा का उसी प्रकार तंत्रलोक तंत्र का अर्थात सरकार का। तंत्र जो चाहेगा वही होगा। कभी किसी नागरिक की हिम्‍मत नहीं हुई, आवाज उठाने की। जे पी ने उठाया तो क्‍या हुआ। वह तो राजनीति के रास्‍त आ रहे थे। उनके उठाने की बात और है। उससे कोई खतरा उत्‍पन्‍न नहीं हुआ। तंत्र के फैसले यदि लोक करने लगे तो खतरा उत्‍पन्‍न होगा ही। अब हो गया न बीमार , कौन संभालेगा इसे। दुआ कीजिए।

जब एक बार कपिल सिब्‍बल साहब ने कह दिया कि 2 जी घोटाला नाम की कोई चीज नहीं है। तो नहीं है। उनकी बात पत्‍थर की लकीर होती है। उनके कहते ही सी बी आई को वापस पवेलियन में लौट जाना चाहिए था। सर्वोच्‍च न्‍यायालय को लक्ष्‍मण-रेखा के अंदर जाकर दुबक जाना चाहिए था। मगर नहीं, जाकर राजा भैया को पकड़ लाये। बिना घोटाले के ,उस बेचारे गरीब आदमी को जेल में डाल रखा है। बेल नहीं दे रहे। मंत्री जी कहते हैं कि एक पैसे का गबन नहीं है। पुलिस जेल में डाल रही है। हद हो गई। वो तो अच्‍छा हुआ कि इस बात से लोकतंत्र को खतरा नहीं हुआ। ये आपस की बात है इससे लोकतंत्र नहीं टूटता। लोकतंत्र टूटता है जब आम आदमी अपनी बात कहने की कोशिश करता है। आप क्‍यों सड़कों पर उतरे? क्‍यों तिरंगा लहराया ? क्‍यों अन्‍ना साहब अनशन पर बैठे ? हमारे संासद हैं न, सब कुछ के लिए। अब मोदी जी बैठे कि नहीं , उपवास पर। माना कि करेाड़ों रुपये पानी में गये। ए सी हाॅल में सी सी टी वी कैमरे के सामने। नौकर-चाकर , अमला-फौज, खुशामदी, चापलुश इन सबके बीच में जब मुख्‍यमंत्री उपवास करेगा तो करोड़ों खर्च होंगे ही। करोड़ कौन सी बड़ी रकम है जिसके लिए हो हल्‍ला किया जाये। अब मोदी जी विदर्भ के किसान तो हैं नहीं कि उपवास उनका रोज का काम है। कभी-कभी तो इतना लंबा उपवास हो जाता है कि जीवन का अंत ही हो जाता है। वहंा न तो काई कैमरा लगा होता न ही मीडिया वाले होते हैं। मगर साहब आदमी से बड़ी है लोकतंत्र इसको पहले बचाना है। मोदी जी दरअसल में आत्‍म-शुद्धि कर रहे थे। सदभावना के लिए उन्‍होंने उपवास किया था। यह काम बहुत जरूरी था। आत्‍म-शुद्धि न होने से कितना भयानक परिणाम हुआ यह देश देख चुका है। सदभावना के लिए अगर मोदी जी उपवास करें तब सचमुच इस देश में सदभावना आ जायेगी ं। लोकतंत्र मजबूत होगा। इधर मोदी जी बैठे उधर शेखावत भी जा बैठे, उपवास पर। मामला जम गया। बेचारी मीडिया को अन्‍ना साहब के आंदोलन के बाद कोई मसाला नहीं मिल रहा था। मिल गया। लोकतंत्र क्‍या खाक बचेगा इस देश का ! इतने बड़े-बड़े नेता उपवास कर रहे थे, मगर जनता सड़क पर नहीं आई। किसी ने तिरंगा नहीं लहरासया। न ही किसी ने कहा ' मैं मोदी हूँ ' न कहा 'मैं शेखावत हूं '। ये तो हद हो गई। इन्‍हीं लापरवाहियेां से टूटता है लोकतंत्र। एक साधारण सा आदमी टोपी लगाकर बैठ गया तो आप लोग सड़कों पर उतर आये। सारे देश में हलचल मच गई। आंदोलन होने लगे। इतनी बड़ी हस्‍तियां बैठी तो चंद तमाशबीनों के अलावा कोई नहीं गया। तभी से लोकतंत्र के पेट में मरोड़ आ रहे हैं। पतली दस्‍त हो रही है।

हद तो तब हो गई जब एक इतने बड़े नेता का नाम भी 2 जी घोटाले में घसीटा जा रहा है। पी चिदंबरम जी का नाम तो सच्‍चाई और इर्मानदारी का प्रतीक है। उनके ऊपर शक अर्थात ंलोकतंत्र की जड़ों पर प्रहार। चलो मान लिया कि वित्‍त मंत्रालय ने एक खत भेज दिया तो क्‍या हो गया ? मित्रों में खतों-खुतबात तो चलते ही रहते है। इसमें इतना हल्‍ला मचाने की क्‍या जरूरत ? वो तो अच्‍छा हुआ कि विपक्षी पार्टी वालों को अपना काम याद आ गया और वे इस्‍तीफा मांगने लगे। लोकतंत्र बच गया। कहीं यह इस्‍तीफा किसी आम आदमी ने मांग लिया होता तब लोकतंत्र की ख्‍ौर नहीं थीं। अन्‍ना या उनके किसी साथी ने यदि इस तरह की हरकत की होती तो मनीष तिवारी साहब अब तक तू-तड़ाक कर चुके होते। कांग्रेस के प्रवक्‍ता हैं, मजाक नहीं हैं। ज्‍यादा से ज्‍याद बाद में माफी मांग लेते हिंदी में। कितने पुराने केस निकाल-निकाल कर जांच हो रही होती। लोकतंत्र की तबियत भी खराब हो जाती। लेकिन बी जे पी के द्वारा इस्‍तीफा मांगना तो एक किस्‍म को दोस्‍ताना मैच है। इससे किसी पर कोई फर्क नहीं पड़ता न लोकतंत्रपर न आम आदमी पर। सबको पता है कि परंपरा का निर्वाह हो रहा है।

लोकतंत्र है तभी तक आम आदमी सुरक्षित है। वह अपनी मर्जी की सरकार चुन सकता है । हां उसके बाद चुनी हुई सरकार अपनी मर्जी का कर सकती है। उस पर कोई प्रश्‍न नहीं उठा सकता। अब योजना आयोग ने गरीबी की नई परिभाषा दी । शहरों में जो एक दिन में कम से कम 32 रुपये और गांवों में 26 रुपये कमाता हो वही गरीबी रेखा के नीचे होगा। बाकी सब ऊपर होंगे। इसका मतलब यह नहीं है कि उनके मन में गरीबों के प्रति दया नहीं है। पूछ कर देखिये आहलुवालिया साहब से, दया का सागर उनके दिल में लहराता मिल जायेगा। उन्‍होंने कहा है कि शहरी गरीब वह है जो रोज 32 रुपये भी नहीं कमा पाता। अर्थात यदि वह 32 रुपये कमा लेता है तो उसकी गिनती अमीरों में की जायेगी। यह क्‍या कम है कि उसे एक समय का भोजन नसीब हो जायेगा। गरीब का मतलब कि आप बिना खाये पिये जिंदा रह रहे है। केवल सांस की आस में जिंदा हैं। उससे अधिक कुछ भी किये तो आपकी गिनती बड़े लोगों में की जायेगी। महंगाई बढ़ गई तो उससे क्‍या आपको अगर एक छटांक दाल भी मिल जाता है तो आप शहर के रइर्सों में शामिल हैं। पढ़ाई-लिखाई की बात गरीब कैसे करेगा ? इसलिए सरदार साहब ने 32 रुपये रखा। उसे केवल खाना है। उसके बच्‍च्‍ो क्‍येां होंगे ? और यदि होंगे तो पढ़ेगें क्‍यों ? उसे इलाज की क्‍या जरूरत है ? डाॅक्‍टर और दवाइयां उसे क्‍यों चाहिए ? घर की जरूरत उसे किस बात के लिए होनी चाहिए ? सरकार का नजरिया बिल्‍कुल दुरूस्‍त है। आप यदि गरीब हैं तो केवल किसी तरह खाना जुटाइये। नहीं तो आप को अमीरों की श्रेणी में डाल दिया जायेगा। गांवों में तो सरकार की कृपा से 26 रुपये ही चाहिये प्रतिदिन एक आदमी को अमीर कहलााने के लिए। उससे कम कमायेगा तभी गरीब कहलायेगा। वह इससे कम कमायेाग नहीं क्‍योंकि उसे अपने परिवार का पेट भी भरना है। अपने आप वह लाल कार्ड , राशन कार्ड और हेल्‍थ कार्ड जैसे सुविधाओं से वंचित हो जायेगा। दरअसल सरकार चाहती है कि देश से गरीबी मिटे। इंदिरा जी के जमाने से लेकर आजतक कितनी कोशिशें की गईं, गरीबी मिटाने की। गरीबी इतनी जिद्दी है कि नहीं मिटी। डॉ  सिंह अर्थशास्‍त्री हैं। उन्‍हें पता है कि बड़ी से बड़ी समस्‍याएं भी आंकड़ों से दूर हो जाती हैं। आंकड़ें दुरूस्‍त कर देना ही इस समस्‍या का समाधान हैं। अब देखिये इन नये मापदंडों से कैसे भागती है गरीबी। गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों का प्रतिशत पाँच तक आ जायेगा। मिट गई न गरीबी। जिस रेखा के नीचे रहने वाले 30 प्रतिशत के आसपास है , वह एक ही झटके में पाँच तक आ जायेगी। यह सरकार की सफलता नहीं तो और क्‍या है। हो सकता है इन कदमों से लोकतंत्र की सेहत में सुधार आये।

विदेशी पूंजी वालों को जब पता चलेगा कि भारत की गरीबी मिट गई तो और तेजी से अपनी पूंजी लगायेंगे। देश का विकास होगा। मान लीजिये सरकार ने देखा कि इससे भी गरीबी नहीं मिट रही। तो गरीबा रेखा के मापदंडों को और नीचे लायेगी। शहर में रहने वाला अगर दस रुपये कमाता है और गांवों में रहने वाला पाँच रुपये कमाता है तो वह गरीबी रेखा के नीचे आयेगा । तब तो सुसुरी गरीबी निश्‍चित ही मिट जायेगी। देश विकसित हो जायेगा। अमीरों की संख्‍या बढ़ जायेगी। इसे कहते हैं देश को विकसित बनाने का नुस्‍खा। इन कदमों से निश्‍चित ही लोकतंत्र का सिर दर्द दूर होगा। डर इस बात का है कि कहीं किसी अराजक तत्‍व ने आंदोलन छेड़ दिया तो ? कहीं कोई सरकार से यह ने पूछ बैठे कि आपके मंत्रियों के पास करोड़ों की दौलत है। लगातार बढ़ रही है। सबसे गरीब मंत्री के पास भी एक करोड़ की दौलत है और देश का आम आदमी के पास होना चाहिए 32 और 26 रुपये। उसका इसमें ही गुजारा होना चाहिए अगर उसे गरीबी रेखा वाले फायदे लेने हैं तो। यदि कोई गैर-राजनीतिक व्‍यक्‍ति इस बात को उठाकर आंदालन करने लगे तो लोकतंत्र का टूटना तय है। लोकतंत्र कभी भी एक गैर-राजनीतिक आदमी की बात नहीं सुनना चाहता। उसकी तबीयत खराब हो जाती है। सांसदों से यदि किसी ने पूछ लिया कि आपने पिछले साठ वर्षों में एक भी दिन 26 रुपये पर गुजारा किया क्‍या ? तो हो गया लोकतंत्र को खतरा। आप कोई भी प्रश्‍न सांसद से नहीं पूछ सकते। कहते है कि संसद खुद तय करेगी कि उसे क्‍या करना है। महिला बिल की हालत देखिये। पता नहीं किस बस्‍ते में रखी दीमक के भेट चढ़ रही होगी। सांसदों की जब इच्‍छा होगी तब पास करेंगे। महंगाई पर इतना हल्‍ला हो रहा है लेकिन सांसदों की इच्‍छा नहीं हो रही कि कुछ करें तो नहीं हो रहा है। प्रधानमंत्री कहते हैं कि हमारे पास जादू की छड़ी नहीं है। यह जुमला कभी माननीय लालू यादव बोला करते थे। वह तो शुक्र है कि नीतिश कुमार के पास कहीं से जादू की छड़ी आई और बिहार विकास के रास्‍त्‍ो पर चल पड़ा। अब यह बात अगर लालू जी से पूछ ली जाये तो लोकतंत्र पर खतरा आ जायेगा।

तो देवियों और सज्‍जनों लोकतंत्र बेचारा बहुत बीमार है। देश की जनता जब से सांसदों से सवाल पूछने लगी हैं। सबसे पहले तो हमें यह एहतियात बरतनी है कि हमें किसी भी सांसद से प्रश्‍न नहीं पूछना है। यह भी नहीं कि रेड्डी बंधु जेल क्‍यों गये। क्‍या केंन्‍द्र सरकार को इसके बारे में बिल्‍कुल ही जानकारी नहीं थी ? अवैध खनन हुआ और माल भी कमाया गया। वह पैसा अब देश को कौन देगा ? लूट का धन वापस कैसे लाया जाये। इसके बारे में संसद कानून क्‍यों नहीं बनाती ? हमें इस तरह के प्रश्‍नों से बचना है। नहीं तो लोकतंत्र टूट जायेगा। टूट गया तो हमें ही क्षति होगी। उनका तो कुछ नहीं बिगड़ेगा। उनके पास ताकत है। धन है। जन है। निरीह तो आम आदमी है। उसे कुछ नहीं पूछना। दूसरा एहतियात हमें यह बरतना है कि बूथ पर जाकर किसी न किसी के पक्ष में बटन दबाना है। देखने की जरूरत इसलिए नहीं है क्‍योंकि सब एक ही हम्‍माम में खडे हैं। तन का रंग अलग हो सकता है मन एक ही हैं। हमारे कर्त्‍तव्‍य हैं कि हम बटन दबाते जायें। यदि हमारे प्रतिनिधि क्ष्‍ोत्र में आते हैं तो उनके चरणों पर बिछ जायें। उनका स्‍वागत करें। अपना दर्द न बतायें। बिना बिजली, पानी , सड़क के रहना जारी रखें। हमें 32 रुपये में ही गुजारा करना है। हम सजग रहें कि परिवार का कोई सदस्‍य दिन में दो टाइम खाना न खाये। कपड़ों से यथा संभव बचें। एक छोटी सी जगह में रहकर भी हमारे अंदर देश सेवा का जज्‍बा हो। जब भी किसी राजनीतिक दल का रथ आये हम जाकर लाखों लाख की संख्‍या में वहां शोभा बढ़ायें। सीजन रथ यात्राओं का ही चल रहा है। अन्‍ना जैसे लोगों की बातें न सुनें क्‍योंकि वे लोग ऐसी बात बताते हैं जिससे लोकतंत्र टूटता है। अन्‍याय के विरूद्ध अहिंसात्‍मक लड़ाई लड़ना सीखकर हम लोकतंत्र का नुकसान करेंगें । आखिर इस देश को जन की नहीं प्रजा की जरूरत है। देश में प्रजातंत्र है। जनतंत्र नहीं। लोकतंत्र बीमार है। प्रजा की तरह रहना है। जन बनने की कोशिश की तो लोकतंत्र को खतरा पहुंचेगा।

शशिकांत सिंह 'शशि'

जवाहर नवोदय विद्यालय

शंकरनगर, नांदेड़ 7387311701

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: शशिकांत सिंह 'शशि' का व्यंग्य - लोकतंत्र को खतरा
शशिकांत सिंह 'शशि' का व्यंग्य - लोकतंत्र को खतरा
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2013/08/blog-post_710.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2013/08/blog-post_710.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content