मनोज 'आजिज़' की लघुकथा - जड़ की समझ

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(लघुकथा )

जड़ की समझ 

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               -- मनोज 'आजिज़'

ट्रेन तो लेट थी ही, रस्ते की भीड़ भी कम न थी । काफ़ी जद्दो-जहद के बाद सुभाष ढकुरिया पहुंचा । इंटरव्यू की जगह साफ़ पता नहीं थी और वह धैर्य खोता जा रहा था । महानगरों में लोगों की व्यस्तता बिना काम के भी रहती है । किसी से पूछे भी तो कोई सुनकर भी अनसुने की ढोंग रचता और कोई इसकी अंग्रेजी मिश्रित हिंदी को समझ नहीं पाता । मेन रोड की बाँयीं ओर खड़े होकर कभी आती-जाती गाड़ियों को देखता तो कभी लम्बी सांसें छोड़कर किसी रेलिंग के सहारे खड़ा रहता ।

इसी बीच अपने भारी थैले को कंधे से उतारकर एक चबूतरे पर रख कर बैठने जाता कि उसे थोड़ी ही दूरी पर एक महिला दिखी जो एक छोटी सी कुटिया के बाहर पैंट-कमीजों पर लोहे की स्त्री फेर रही थी । सुभाष की नज़र उस महिला की साड़ी पर पड़ी । उसने साड़ी के पहनावे पर अंदेशा लगाया कि वह महिला उसी के क्षेत्र की होगी । थैले को फिर कंधे पर लादा और कदम बढ़ाया । पास जाकर खड़ा हुआ तो कोई ग्राहक समझकर महिला ने थोड़ी-मोड़ी बांग्ला  में कहा  -- कि काज आछे बबुआ ? सुभाष उस महिला की बांग्ला से असहजता समझ गया और उसके मुंह से निकल पड़ा -- गोड़ लगs तनी माँ जी ! शूट-बूट वाले किसी युवक से उस विराट नगर में एक स्त्री करने वाली महिला को ये उम्मीद नहीं थी । वह काम छोड़कर सामने आयी और बोली-- जीते रहs बबुआ ! दोनों एक दूसरे के हाथों को पकड़ रखे थे और वह स्पर्श उनके लिए ' प्यासे को पानी' जैसा था । समय कम था । सुभाष ने टूटी-फूटी भोजपुरी में झट से माफोई ऑफिस का पता पूछा । महिला ने जवाब दी-- ऊ पुलवा भिरि बबुआ । नजिके हs । बैठ जा, तनि पानी पी लs । सुभाष तो नौकरी की ता;तलाश में था और उसे जल्दी ऑफिस पहुंचना था पर वह थम गया और जम भी गया । पानी पिया, बातें की ।

उसे पता चला वह महिला उस कुटिया में अकेले ही वैधव्य-जीवन बीता रही है और गाँव-घर से भी नाता टूट चूका है । सुमधुर कही जानी वाली बांग्ला भी उन्हें थपेड़ लगता है और सुभाष का गोड़ लगना उनकी घर-वापसी जैसी थी । सुभाष इंटरव्यू में अच्छा किया । नौकरी की खबर बाद में मिलती । उसे घर वापस आना था । फिर ट्रेन से सफ़र शुरू । रस्ते भर उस महिला की बोली कानों में गूंजती रही । घर पहुँच कर सुभाष ने अपने पिता से कहा-- पापा, आज मेरी भाषा मेरी शिक्षा से अव्वल निकली और वही मुझे इंटरव्यू दिला पाई वरना मैं सिर्फ अंग्रेजी की दुनिया में गोता लगाता रहता और ऑफिस तक शायद पहुँच ही नहीं पाता । मेरी भाषा की महत्ता मुझे समझ में आई । सुभाष के पिता भी अपनी गलती को मन ही मन भांप कर सहम सा गए और एक लम्बी साँस लेते हुए ' काम ऑन माय सन' न कहकर ' आ जा बबुआ, गले लग जा ' कहते हुए गले मिले । घर के अन्दर से माँ चीखती हुई बोली-- अब समझे जी ? कहते थे न जड़ मत काटिये ! माँ खाने पर बुलाई तो सुभाष ने  स्फूर्त जवाब दिया-- आव तनि माँ ।

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