शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

सुशील यादव का व्यंग्य - जड़ खोदने की कला

जड खोदने की कला

जंगल विभाग से उनका रिटायरमेंट क्या हुआ वे पडोसियों के लिए कष्ट दायक हो गए। कही भी चले आते हैं। तरह –तरह की खबर ,दुबे,चौबे,शर्मा ,द्वेवेदी सब के घरों का हाल उनसे मुंह –ज़ुबानी पूछ लें। कहाँ क्या चल रहा है?उन्हें एक-एक की खबर होती है।

उनको , चूहों से अगर बच गए हों तो,घर के , पूरे साल भर के अखबार की खबरों को कुतरने में चंद दिन लगते हैं।

अखबार पढ़ने के बारे में वो कहते हैं कि जंगल के सर्विस में उनको स्टडी का मौक़ा नहीं मिला सो वे राजनैतिक –सामाजिक सरोकार से दूर थे। अब फुर्सत है सो अध्ययन –मनन में समय बिताने की सोच रहे हैं।

मैंने कहा ,फिर अखबार ही क्यों ?मनन –चिंतन के लिए साहित्य का भण्डार है ,पढते क्यों नहीं ?

वो बोले अब साहित्य-वगैरा पढ़ के कोई एक्जाम तो पास करना नहीं है। मोहल्ले –पडौस में ज्ञान बघारने के लिए रोज टी वी देख लो , कुछ अखबार बांच लो काफी है।

मैंने मन में सोचा ,पांडे जी का तर्क अकाट्य है। हर आदमी इतना ही ज्ञान रखता है इन दिनों|काम चलना चाहिए। ज्यादा ज्ञानी हुए नही कि समाज के लिए मिस-फिट हो जाता है आदमी|

मैंने पांडे जी को छेड़ते हुए कहा ,चुनाव-उनाव क्यों नहीं लड़ लेते। अभी पार्षद बनने का ,फिर अगले साल एम् एल ए बनाने का खूब मौक़ा है।

उसे लगा कि मैंने उनको बुढापे की वैतरणी पार करने का नुस्खा दे दिया है।

वो तुरंत लपक लिए , ऐसे आदमी मुझे भले लगते हैं जो बिना किसी तर्क के मेरी बात मान लेते हैं , बोले ऐसा हो सकता है?

अपने को एम्.एल.ए तक तो जाना नहीं है। खर्चा बहुत होता है ,पूरा पेंशन निपट जाएगा तो खायेंगे-पहनेंगे क्या ?

पांडे जी को जितना लाइटली मै लेता था उतने वो थे नहीं। जिस आदमी को पेंशन बचाने का शऊर हो, वो आर्थिक मामले में भला कहाँ से किसी के कहने में आ सकता है ? किसी के चढाने को वे उसी हद तक लेते थे जितनी वे चढ़ सकें। बहरहाल उनने मेरी सलाह को ,बतौर टर्निंग –प्वाइंट नोट कर लिया। वे चले गए।

अगले महीनों तक वे कई बार टकराए , कभी सब्जी –भाजी ले कर बाजार से लौटते हुए , कभी किराने का सामान लादे हुए। हाय –हेलो से ज्यादा बात नहीं हुई। एक दिन वे रेल -रिजवेशन की लाइन में लगे थे ,मैंने पूछा ,पांडे जी कही घूमने जा रहे हैं क्या ?

वो बोले , बोले क्या बस महीने भर की दास्तान सुनाने लगे।

किस–किस नेता से मिले ,कितनी पार्टी का चक्कर लगाया। सक्रिय सदस्य बनने के लिए कई एक पार्टी का मुआयना कर आए हैं।

अब अभी राजधानी जा रहे हैं। दो-तीन पार्टी हेड से मिल देखते हैं ,देखे क्या बनता है ?

मैंने कहा , पांडे जी मैंने तो यूं ही मजाक में कह दिया था ,चुनाव-सुनाव के बारे में। आपने सीरियसली ले लिया। मुझे अपने कथन के साथ –साथ , पांडे जी में भविष्य का पार्षद भी दिख रहा था, उनकी जीवटता को देखते हुए।

उनका रिजर्वेशन का नम्बर आ गया वे टिकट ले लिए। दूसरी जगह जाने के लिए मेरा टिकट वेटिंग का निकला सो मैंने अपना निर्णय बदल दिया।

वो ऑटो से आए थे मगर वापसी में मेरे स्कूटर में चिपक लिए।

रास्ते भर लोकल पालिटिक्स की बातों से ऊपर नहीं उठे|सब की बखिया उधेडते रहे। मेयर ने पानी की टंकी में कितना छेद किया। दीगर पार्षद क्या –क्या गुल खिला रहे हैं। विधायक रात कहाँ सोने जाता है। मुझे लगा महीने भर में पांडे जी ने थीसिस जितना आंकड़ा जमा कर लिया है। मन ही मन ,उनके खोजी चालूपन को दाद दिए बिना नहीं रह सका|

मैंने पूछा ये सब इतनी जल्दी कैसे जमा हो गया?बहुत मेहनत की होगी आपने ?

वो मंजे हुए अंदाज में कहने लगे ,हाँ मेहनत तो होती है। जंगल में हम लोग खूब मेहनत किए हैं। हम लोग मिनिस्टर –अफसरान को शेर दिखने के लिए जो तरीका अपनाते रहे, वही यहाँ काम करता है। खबर को बाहर निकालने के लिए ‘मचान’ बाँध कर बैठो। शेर को कुछ भूखा रखो ,चारा –पानी का सही इंतजाम हो तो हांके में शेर आ जाता है। दफ्तर के छोटे –छोटेबाबू, बाबूनुमा अफसर या दफ्तर के बेवडों को, अर्जी पकड़ा दो वे सब लेखा-जोखा आप ही आप समझा देते हैं। ध्यान से सुनो तो वे, आंकडे देते वक्त साहब लोगो के ‘गुणगान’ यूँ करते हैं कि वो तो पाक साफ हैं बाकी सब उनको ही पहुचता है।

मेरा स्कूटर कई बार, पांडे जी के बयान से दचके खाते-खाते बचा। मैंने मन ही मन सोचा पांडे ने कमाल का काम किया है। मैंने चलते में पूछ लिया ,पांडे जी ,लगता है ,जंगल महकमे में पेडों को जम के उखाड़ा है आपने ।

जमी हुई जडों को अच्छी तरह से उखाडने वाले पांडे जी के प्रति मेरी प्रजातंत्रीय-श्रधा जाने क्यों उंमड आई|

मेरे कटाक्ष पर वे ही.-ही कर हंस दिये|

मुझे हल्का सा ब्रेक लगाना पड़ा। घर भी करीब था वे उतर लिए।

मैं पांडे जी के रूप में जाते हुए, भावी पार्षद को देख रहा था। उनमें मुझे एक कर्मठ नेता की आगामी छवि दिख रही थी|

शायद प्रजातन्त्र की नीव रखने वालो ने, उसकी इमारत की खिड़की – दरवाजों में ,कभी दीमक या घुन लगने के बारे में सोचा भी नहीं होगा?

बहरहाल , मुझे पांडे जी में कोई ओछापन नहीं दिख रहा था ,उस जैसे जुझारू आदमी को झोंककर छोटी-मोटी परेशानियों से बाहर निकला जा सकता है

|मैं अपने आकलन में अलग से जुट गया।

उंनके पार्षद बन जाने पर,मेरे घर के सामने सड़क के बीचो-बीच खड़े खम्भे को उखड़वाने का, शायद मैं उनको पहला काम सौपूं ?

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सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग

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