गुरुवार, 1 अगस्त 2013

रामवृक्ष सिंह का आलेख - किन्नरों के काम का विविधीकरण

किन्नरों के काम का विविधीकरण

यों तो अपने देश के किन्नर कुदरत की एक महत्त्वपूर्ण नेमत से महरूम होकर भी प्रकटतया खूब संपन्न और खाते-पीते, नाचते-गाते, मौज करते, बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमते-फिरते नज़र आते हैं। लेकिन उनके दर्द को हम और आप नहीं समझ सकते। हम केवल उनकी आर्थिक मदद कर सकते हैं और वे जिस हाल में रहें उनके खुशहाल रहने की कामना मात्र कर सकते हैं। बस इसी सदुद्देश्य और सद्भावना को लेकर ये सुझाव यहाँ दिए जा रहे हैं।

 

चचा चार्ल्स डार्विन के अनुसार दुनिया में जीवित बचने के ज़रूरी है नित परिवर्तित हो रही परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालते रहना और अपने भीतर आवश्यकतानुरूप परिवर्तन करते रहना। सदियों से हम सब यही करते आए हैं। जैसी हवा बही, वैसे ही हम भी चल पड़े। लेकिन मानव और खास तौर से भारतीय समाज का एक हिस्सा ऐसा है, जिसके काम में विविधता का अभाव है। हमारे विशाल हृदय में समाज के उस उपेक्षित हिस्से के लिए बड़ी जगह है, और हमारे उर्वर दिमाग में उनके काम के विविधीकरण को लेकर बहुत ढेर सारे परामर्श हैं- वे भी बिना किसी शुल्क के। वही हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।

हम सब जानते हैं कि किन्नरों के पवित्र पाँव हमारे घर, आँगन या फ्लैट के कॉरिडोर में तब पड़ते हैं, जब घर में कोई बहुत ही शुभ कार्य संपन्न हो चुका होता है, जैसे शादी-ब्याह, लड़के (लड़की नहीं) का जन्म। कभी-कभी ट्रेनों में भी इनकी कामिनी मूरत, मोहिनी सूरत से साबका पड़ जाता है। जिन लोगों के दुकानें हैं, उनके पास इन लोगों के दीदार के और भी कुछ मौके होते होंगे। भोपाल में रहते थे तो होली-दीवाली के मौके पर भी कभी मंगलवारा इलाके के किन्नर तो कभी बुधवारा के किन्नर अपना चंदा वसूलने आ जाते थे। चन्दा वसूलना एक बात है और अपनी किन्नर-कला यानी नाच-गाने का सशुल्क प्रदर्शन करना दूसरी बात। ऐसा तो तभी होता है जब आपके बेटे की शादी हुई हो, आँगन में नई-नई बहू उतरी हो, या जब घर में पुत्र का जन्म हुआ हो।

अब जमाना बदल गया है। शादी की जगह लिव-इन ने लेनी शुरू कर दी है। लड़के-लड़कियाँ कब पति-पत्नीवत साथ रहने लगे, कुछ पता ही नहीं चलता। बच्चों की जचगी से ज्यादा तो गर्भपात कराए जा रहे हैं। मुहल्ले में भूले-भटके कोई एक बच्चा पैदा हो जाता है, तो पुराने, बाबा आदम के खयालात और तरबीयत वाले हम लोगों को बड़ा अच्छा लगता है, वरना आजकल की लड़कियाँ अव्वल तो शादी ही नहीं करना चाहतीं और यदि भूलवश अथवा अपने माँ-बाप पर तरस खाकर कर भी लेती हैं तो बच्चे नहीं करना चाहतीं। ऐसे में बेचारे किन्नरों की बड़ी मुसीबत है। उनकी कमाई के तो दोनों ही मुख्य स्रोत धीरे-धीरे कम हो रहे हैं।

इसकी काट के तौर पर किन्नरों ने अपने दाम बढ़ा दिए हैं। पहले जो काम पाँच सौ या एक हजार में हो जाता था, उसी के अब ग्यारह हजार और इक्कीस हजार वसूल लिए जाते हैं। सोने के गहने और कपड़े-लत्ते अलग से। पीछे जब सोने के दाम गिरे थे, हमारी पत्नी कह रही थीं कि कुछ गहने किन्नरों को नेग में देने के लिए भी खरीद लो। लेकिन हम अब-तब करते रह गए और सोने के दाम फिर चढ़ गए। खैर... अब चूंकि शादी-विवाह और पुत्र-जन्म के अवसर ही कम आते हैं, इसलिए फीस के कई गुना बढ़ जाने के बावजूद, कुल मिलाकर किन्नरों की आय में भी कमी ही आई है।

इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए किन्नरों को अपने काम का विविधीकरण करना चाहिए। आधुनिक शहरी मानव के जीवन में शादी और पुत्रोत्पत्ति के अलावा भी कुछ ऐसे अवसर होते हैं, जब वह प्रसन्न होता है, और उसका मन उदारतापूर्वक खर्च करने को उद्यत हो उठता है। ऐसे अवसर जिनके लिए वह उत्सव मनाना चाहता है। खासकर नौकरीपेशा और शहरातियों के जीवन में सेलिब्रेशन के ऐसे अवसर प्रायः आते ही रहते हैं। और पाठकों को बताते चलें कि किन्नर शहर में ही पाए जाते हैं, गाँवों में नहीं।

तो किन्नरों को चाहिए कि जब किसी के बच्चे का एडमिशन शहर के किसी नामी स्कूल में, या किसी इंजीनियरिंग कॉलेज के बीटेक कोर्स में, या मेडिकल में या एमबीए में हो जाए तब और जब वहाँ की पढ़ाई पूरी होने के बाद उसका कहीं प्लेसमेंट हो जाए, तब चट से उसके घर पहुँच जाएँ और दो-चार ठुमके लगाके, अय-हय, अय-हय करके, टपर-टपर तालियाँ पीटके, अपनी साड़ी उलटकर, अपना सबकुछ, घर के सब लोगों के सामने प्रदर्शित कर देने का भय दिखाकर मोटी फीस वसूल ले जाएँ।

इसी प्रकार जब किसी को कमीशन या बोर्ड की प्रतियोगी परीक्षा के ज़रिए कोई नौकरी मिल जाए तब, और नौकरी मिलने के बाद जब किसी की पदोन्नति हो जाए तब, अथवा जब कोई घोटाला करके सस्पेंड हुआ पडा हो और उसकी बहाली हो जाए तब भी किन्नरों को पूरे दल-बल के साथ, अपनी स्कॉर्पियो लेकर उसके आवास पर टपक जाना चाहिए। बहरहाल, यह तो हुई नौकरी-पेशा और बाइज्जत लोगों की बात।

ऐसे बहुत-से मौके नेता लोगों और बेहद बाइज्जत लोगों (जिन्हें स्थानीय भाषा में वीआईपी तथा वीवीआईपी भी कहा जाता है) के जीवन में भी आते हैं। मसलन जब वे किसी जघन्य अपराध के केस, या घूसखोरी काण्ड में जेल की सज़ा काट कर आएं तब किन्नर लोग उनके परिवार के सामने बड़े धाँसू और ठसकेदार तरीके से नमूंदार हों और अपनी जन्म-सिद्ध अधिकार वाली मोटी फीस वसूलें। जिन शहरों में फिल्में बनती और रिलीज़ होती हैं, वहाँ के किन्नर फिल्म के प्रीमियर के समय यह काम कर सकते हैं। वहाँ के अन्डर वर्ल्ड डॉन ने किसी को टपकाया हो और इस खुशी में कॉकटेल पार्टी चल रही हो, तब भी किन्नर वसूली करने पहुँच सकते हैं।

आजकल अपने देश में जगह-जगह मॉल खुल रहे हैं। जगह-जगह विभिन्न खेलों के मैच होते हैं। ऐसे मौकों पर और मैच में जीत के मौके पर भी किन्नर लोग अपने हिस्से की रकम का दावा पेश कर सकते हैं। देश के प्रभावशाली लोग करोड़ों रुपये का वारा-न्यारा करके भी शान से मौज-मस्ती करते रहते हैं। इस काली कमाई के बारे में जैसे ही पता चले, किन्नरों को ऐन मौके पर प्रकट हो जाना चाहिए और अपने हिस्से की वसूली करके, आशीर्वाद देना चाहिए कि ऐसे ही घोटाले करके करोड़ों- अरबों रुपये का वारा-न्यारा करते जाओ, देश को धन्य करते जाओ।

अपने देश के खिलाड़ी खूब मोटी कमाई कर रहे हैं। किसी-किसी को तो खेल के माध्यम से कम और विज्ञापनों तथा मैच फिक्सिंग के माध्यम से अधिक कमाई होती है। ऐसे खिलाड़ियों से भी किन्नर लोग वसूली कर सकते हैं और आशीर्वाद दे सकते हैं कि ऐसे ही खेलते रहो, मैच फिक्स करते रहो, दर्शकों को उल्लू बनाते रहो और देश का नाम डुबाते रहो।

चूंकि देश में मोटी कमाई करनेवाले लोगों के पास समय का खासा अभाव हो चला है और वे अपने-अपने काले-सफेद धंधों में बहुत व्यस्त रहते हैं, इसलिए किन्नरों को ऐसे लोगों से वसूली के बारे में, उनके साथ वार्षिक करार (एएमसी) कर लेना चाहिए, जिसके तहत हर महीने किन्नरों के खाते में एक निश्चित रकम, टीडीएस काटकर जमा हो जाया करे। इसके विकल्प के तौर पर सरकार ही कोई अधिनियम ला सकती है या आयोग बनाकर किन्नरों द्वारा की जानेवाली वसूली का संस्थानीकरण कर सकती है। किन्नरों की समस्याओं और कमाई के स्रोत बढ़ाने के उद्देश्य से एक किन्नर मंत्रालय अथवा किन्नर विकास निगम भी स्थापित किया जा सकता है। इससे एक ओर जहाँ सरकार की राजस्व अधिप्राप्ति बढ़ेगी, वहीं दूसरी ओर देश के बेरोजगार युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। आज के अखबारों में लिखा है कि जो नेताजी लोग बड़े-बड़े अपराधों में नाम रौशन कर चुके हैं, उनकी माली हालत शराफत के तमगे पाए नेताओं से कहीं अच्छी है। यानी बड़ा अपराधी नेता, बड़ा मालदार नेता। किन्नरों का काम आसान हो गया। अब उन्हें छुटभैये, टुटपुँजिए नेताओं के पास जाने की जरूरत नहीं, वे पहुँचें सीधे मालदार, शातिर अपराधी नेताजी के पास और उनसे कहें- अय-हय बड़े-बड़ों को टपकाया, बड़ा माल बनाया, कुछ इधर भी तो लाओ मेरे भाया। अपने देश के एक प्रसिद्ध और वयोवृद्ध (अब लगभग शतायु होने की और अग्रसर) गप्प (इसे गल्प न पढ़ा जाए)-लेखक ने अपने किसी उपन्यास में किन्नरों के माँसल, रोमांटित वृत्तान्तों का वर्णन भी किया है। किन्तु अपने तईं वह केवल रसाभास का सबब है, रस-निष्पत्ति का नहीं। इसलिए उसका कुरुचिपूर्ण वर्णन यहाँ नहीं करेंगे

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डॉ. आर.वी. सिंह

उप महाप्रबन्धक (हिन्दी)/ Dy. G.M. (Hindi)
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक/ Small Inds. Dev. Bank of India
प्रधान कार्यालय/Head Office
लखनऊ/Lucknow- 226 001

2 blogger-facebook:

  1. Akhilesh Chandra Srivastava9:48 pm

    dr saheb ne kinnaron par adhyyan kar ke ek achcha lekh likha hai aur unke jeevan ke vibhinn pahluvon par prakash dala hai badhaiee

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेनामी5:04 pm

    किन्नर मंत्रालय का विकल्प बाइज्जत अपने देश के किन्नरों को चाहिए

    उत्तर देंहटाएं

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