शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

शशिकांत सिंह 'शशि' की 2 व्यंग्य कहानियाँ

दोषी लकड़हारा

व्‍यंग्‍य कहानी

एक मूर्ख लकड़हारा था। उसके लड़के दिन-रात उसे ताने देते रहते। उसके पास सुनने के अलावा कोई विकल्‍प नहीं था। कोई उसे हरिशचंद्र जी महाराज कहता तो कोई महात्‍मा गांधी। चुपचाप सुनता रहता। कर भी क्‍या सकता था। उसने जवानी में एक गलती कर दी थी। उसी की सजा पा रहा था। जवानी में वह इर्मानदार रहा था। साथ ही उसके अंदर त्‍याग करने की बीमारी भी थी। यह वही लकड़हारा था जिसे जल के देवता मिले थे और उसे सोने के तथा चांदी की कुल्‍हाड़ी दे रहे थे लेकिन उसने नहीं ली। उसने अपनी लोहे की कुल्‍हाड़ी ही ली। कहानीकार ने यह तो लिख दिया कि देवता ने सोने और चांदी की कुल्‍हाड़ियां भी उसे वरदान में सौंप दीं। ऐसा हुआ नहीं था। कहानीकार ने आने वाले बवाल से बचने के लिए ऐसा लिखकर अपनी जान बचा ली। दरअसल हुआ यह था कि घर आते ही सबसे पहले उसे पत्‍नी ने ताने दिए और मूर्ख कहा। पत्‍नी ने तो साफ-साफ ऐलान कर दिया कि उसकी जिन्‍दगी बरबाद हो गई क्‍योंकि उसके पल्‍ल्‍ो ऐसा घामड़ बांध दिया गया। वह स्‍थाई तौर पर मायके सिधार जाएगी। काश सोने की कुल्‍हाड़ी ले लेता तो आज जिन्‍दगी ही बदल गई होती। चलो चांदी की ही ले लेता तो कुछ कर्ज तो उतरता। गहने वगैरह भी बन जाते और इस खानदानी धंधों से भी मुक्‍ती मिलती। लकड़हारा यह सुनकर चुप रह गया। तब से वह सुनता और चुप रहता ही आया है।

गांव में एक ऐसा आदमी भी था जिसने लकड़हारे की कहानी सुनी और तालाब पर चला गया था। जानबूझकर उसने अपनी कुल्‍हाड़ी गिरा दी थी हालांकि उसे कहानी के अंत में मिला तो कुछ नहीं लेकिन उसकी गंाव में बड़ी तारीफ हुई। उसे संघर्ष करने वाला आदमी माना गया। उसके पुत्रों ने आजीवन उसकी इसी बात के लिए सेवा की कि उसने कम से कम धन के लिए प्रयास तो किया। सोने और चांदी की कुल्‍हाड़ियों के लिए गया तो सही। यदि मिल जाती तो .............। यदि जलदेवता ने बेइर्मानी नहीं की होती तो देश में अम्‍बानी बंधुओं के बाद उन्‍हीं का नाम होता। जल देवता की यह नीति तो दोरंगी थी। एक को तो आप सोने और चांदी की कुल्‍हाड़ी दे रहे हो जो कि मूर्ख था लक्ष्‍मी की कद्र नहीं जानता था। जल देवता को पहले से ही पता रहा होगा कि वह लेगा नहीं इसलिए केवल दिखाने भर के लिए कुल्‍हाड़ियां लेकर आए थे। उसके बाद तो लकड़हारे के उस चालाक पड़ोसी ने और उसके पुत्रों ने बड़ी पूजा की। मन्‍नतें मानीं। चारों धाम करने का वायदा भी किया लेकिन जलदेवता टस से मस नहीं हुए। एक जलमंदिर बनाने का प्रलोभन भी दिया गया लेकिन जल देवता कभी दिखे नहीं। हर मंगलवार और शनिवार को समझदार परिवार तालाब के किनारे जाकर भजन करता था लेकिन जल के देवता नहीं आए। उन्‍होंने तो मूर्ख लकड़हारे के सामने प्रस्‍ताव भी रखा कि कुल्‍हाड़ी प्र्राप्‍त करने में उनकी मदद करे। आधा-आधा बांट लेंगे लेकिन जिसने पूरा छोड़ दिया वह भला आधे पर क्‍यों मान जाता। अंत में थक-हार कर वह परिवार राजनीति में चला गया। मूर्ख लकड़हारे को कई ऐसे आॅफर आए जिससे वह अपनी जिंदगी बना सकता था लेकिन वह नहीं माना। एक बाबा मिले जो प्रवचन करन के लिए उसको अपने मंच पर ले जाना चाहते थे ताकि भक्‍तों को उनपर पूरा भरोसा हो जाए। सालों से नीति और त्‍याग की बातें कर रहे थे लेकिन रंग जम ही नहीं रहा था। बाबा ने लोक और परलोक दोनों का महत्‍व बताया मगर लकड़हारा नहीं गया। उसे लगता था कि किसी को प्रवचन देने से पहले खुद को सुधारना चाहिए। ऐसा बाबा नहीं कर रहे हैं। बाबा ने बताया कि यह बिजनेश है इसमें कमाने की पूरी गंुजायश होती है। बिना पूंजी का धंधा है। मूर्ख लकड़हारे को बुद्धि की कोई बात समझ में आती ही नहीं थी। उसने लाखों कमाने का मौका छोड़कर पुत्रों की नजर में अपनी आधी इज्‍जत गवां दी। लक्ष्‍मी बार-बार दरवाजे पर दस्‍तक देती और मूर्ख उसे छोड़ देता। गरीबी घर में पांव मोड़कर बैठ गई थी। लकड़ियां काटने भी उसे अकेले जाना पड़ता था। लड़के जाते नहीं थे। उन्‍हें लगता था कि बड़े आदमी के बेटे है। भला जंगल से लकड़ी काटेंगे। इज्‍जत नहीं चली जाएगी। बूढ़ा बाप जंगल से लकड़ी काट कर लाता था। सब मिलकर खाते थे। ऊपर से उसकी इर्मानादारी का मजाक भी उड़ाते। अपनी खराब हालत के लिए भी उसीके कोसते। छोटा कहता-

-” यदि आपके पास व्‍यावहारिक बुद्धि होती और आपने सोने की कुल्‍हाड़ी ले ली होती तो आज हमारे पास दिल्‍ली और मुंबई में अपने प्‍लाॅट होते। हम आलीशान बंगले में रह रहे होते। बड़ा भाई तो फिल्‍मों में चला गया होता। उसको अभिनय का इतना शौक है। 'दबंग' फिल्‍म उसने तेरह बार देखी है। मैं बहुत बड़ा क्रिकेटर बनता। आज लोगों को राहुल द्रविड़ और सौरभ गांगुली की कमी नहीं खलती। आपने लोहे की कुल्‍हाड़ी लेकर हमारे साथ ही नहीं देश के साथ भी गद्दारी की है। ”

बेचारा बूढ़ा चुपचाप सुनता और कर ही क्‍या सकता था। बड़े बेटे सो बातचीत ही बंद थी। दो पोते थे। उन्‍हें भी पता था कि इस परिवार को बरबाद करने के असली गुनहगार दादा जी ही हैं। उन्‍हें भी मजाक सूझती। एक दिन छोटा पोता जिसकी उम्र बारह साल रही होगी। कह रहा था।

-” दादा जी आपने सोना पहचाना नहीं क्‍या ? आपके समय में भी सोने की कीमत कम नहीं रही होगी। आपको क्‍या लगा कि कुल्‍हाड़ी नकली सोने की है ? आपको लेकर देखना चाहिए था। यदि असली निकलती तो सबकी किस्‍मत ही बदल जाती। नकली होती तो हमारे पास से क्‍या जाता। मुफ्‍त की चीज थी। खोने के लिए तो कुछ भी नहीं था। कम से कम चांदी वाली ही ले लेते। दो किलो से कम की तो नहीं ही रही होगी। आज उसकी कीमत.......बहुत हो जाती।”

बूढ़े के पास जवाब नहीं था। शुरू में तो बोल भी दिया करता था कि आदमी को अपने परिश्रम और ईमानदारी पर ही भरोसा करना चाहिए। मनुष्‍य अपने कर्मों से ही महान बनता है।एक पेट के लिए दो हाथ काफी हैं। देवता ने मुझे ईमानदारी का वरदान दिया यही क्‍या कम है। हमें अपनेपर भरोसा करके जीना चाहिए। यह सुनते ही बेटे तो मजाक करने ही लगते। बहुएं भी परदे की ओट से हंसने लगतीं। पोते बुरा सा मुंह बनाकर चले जाते। लकड़हारे की समझ में धीरे धीरे आया कि वह जो बातें समझाना चाहता है । उनका चलन बंद हो गया है। नये जमाने की बातें वह जानता था नहीं इसलिए चुप रहने लगा।

बच्‍चों का नाराज होना एकदम से बेमानी नहीं था। मूर्ख लकड़हारे ने एक नहीं कई गलतियां ऐसी की थीं जिसे माफ नहीं किया जा सकता। उसे राजनीति में जाने का सुनहरा मौका भी आया था। एक प्रख्‍यात पार्टी के आलाकमान ने उसे खाने पर बुलाया। पत्र-पत्रिकाओं में यह बात उछली कि राज्‍य के सबसे ईमानदार आदमी को राज्‍य की ओर से सम्‍मानित किया जाएगा। कैमरे के सामने लकड़हारे को आलाकमान ने नरियल , शॉल और दस हजार रुपये नकद देकर सम्‍मानित भी किया। अंदर डीनर के समय आलाकमान ने एक प्रस्‍ताव रखा जिसे कोई भी समझदार आदमी ठुकरा नहीं सकता।

-” बंधुवर ! आप तो त्‍याग और इर्मानदारी के प्रतीक हैं। आप इस कलयुग में अपवाद हैं। यूं कहा जाए कि आपके ही बल पर यह देश टिका है तो अतिश्‍योक्‍ति नहीं होगी। हम जैसे स्‍वार्थी तत्‍वों के कारण तो देश कब का बरबाद हो जाता। अब , आपसे एक ही विनती है ,हमारे दल के लिए इस बार चुनावों में प्रचार कर दें। आप हमारे स्‍टार प्रचारक होंगे। बदले में आप जहां से चाहें हम टिकट देने के लिए तैयार हैं। हमारी सरकार बनी तो आपको हम मंत्री बना देंगे। आप बस आदेश करें। हम अपनी सीट भी खाली करने के लिए तैयार हैं। आपके लिए तो...........।आपका जीतना तो मुश्‍किल है नहीं। कहीं से भी जीत जाएंगे। आज भी जनता को आप जैसे लोग ही पसंद आते हैं। खुद बेशक दस घपले करे लेकिन प्रत्‍याशी इर्मानदार ही चाहिए। खुद मौका मिले तो कफन तक बेच दें लेकिन प्रतिनिधि से हमेशा त्‍याग की उम्‍मीद लगाएं रहेंगे। आप हमारी उम्‍मीद हैं। ”

लकड़हारे ने डरते-डरते कहा-

-” मुझे तो राजनीति आती ही नहीं। मैं तो लकड़ी काटना जानता हूं। चुनावों के बारे में मेरी जानकारी अत्‍यंत सीमित है। बस मतदान करना आता है। आप को धोखा हुआ है। ”

-” अरे नहीं दोस्‍त , हम हीरा पहचानना खूब जानते हैं। आप बस हां कह दें। बाकी सब हम पर छोड़ दें। हम आपका बाजार बना देंगे। आपको भाषण लिखकर देंगे। करना कुछ नहीं है। हम ऐसे ही व्‍यक्‍ति की तलाश में थे जिसे राजनीति नहीं आती हो। यहां तो ससूर सब हमारे ही पद पर आंखें गड़ाए बैठे हैं। राजनीति में हमेशा ऐसे आदमी की तलाश रहती है जो राजनीति नहीं जानता हो। गर्दन झुकाकर जी जी कहता रहे। ऐसे लोग बड़े ऊंचे पदों पर गए हैं भारतीय राजनीति में। आप के लिए भी मार्ग खुला हुआ है। ”

मूर्ख लकड़हारे ने सोचने का समय लिया और वापस आ गया। घर वालों ने सुना तो उसके पीछे पड़ गए। पत्‍नी ने कहा-

-” आपको पता नहीं आजकल राजनीति में बड़ी बरक्‍कत है। नाते-रिश्‍तेदार सब पीछे-पीछे घूमेंगे। अखबारों में फोटों छपती है। लोग डरने लगते हैं। गुंडे-मवाली भी परेशान नहीं करते। आपको तो वहीं हां कर देना चाहिए था। खैर आपने ना भी नहीं की है। आप कल ही बात पक्‍की कर लीजिए। ”

बड़ा बेटा, जो कभी बात नहीं करता था। मां की ओर मुखातिब होकर बोला-

-” मां तुम भी .............। तुम्‍हें तो पता है कि ऐसे लोग राजनीति में नहीं जाते। राजनीति को गंदा खेल मानते हैं। ये कभी ं हां नहीं करेंगे। इन्‍हें केवल अपना नाम प्‍यारा है। परिवार के मान सम्‍मान से इन्‍हें कोई लेना-देना नहीं है। भला अपनी ईमानदारी की नीति को छोड़कर ये राजनीति में जाएंगे ? लोग क्‍या कहेंगे। ”

छोटा बेटा जो अभी-अभी क्रिकेट खेल कर आया था। उसने इस खबर को बड़ी उपलब्‍धि के रूप में लिया और पूरे उत्‍साह के साथ बोला-

-” अरे, नहीं भैया आप तो बाबूजी को बेकार ही ताने देते रहते हैं। यदि इन्‍हें परिवार की चिंता नहीं होती तो वहीं नेताजी को मना करके आ जाते। कल हम दोनों जाएंगे और एक अच्‍छे क्ष्‍ोत्र से टिकट लेकर आएंगे। ”

लकड़हारा चुप ही रहा। किसी ने उससे उसकी राय नहीं पूछी। सब अपनी-अपनी राय देते रहे। उस रात लकड़हारे की सेवा बड़े मन से की गई। सबको यही उम्‍मीद थी कि राजनीति का दरवाजा खुल गया। अब कोठी, कार और सरकार तीनों अपने हो जाएंगे। बड़े-बड़े लोग पैरवी के कराने के लिए आएंगे। नेताजी कहां हैं ? नेताजी के लिए उपहार लाया था। नेता जी को आम पसंद है। आम के दस टोकरे भेज रहा हूं। नेता जी के पास समय है ? पत्रिका के लिए इंटरव्‍यू लेना है। वाह.....वाह क्‍या बात होगी। रात भर सब अपने अपने-अपने तरीके से खुश थे। बस मूर्ख लकड़हारा सोचता रहा।

-” मैं अनपढ़ आदमी भला राजनीति में जाकर क्‍या करूंगा। वहां तो बड़े-बड़े काम करने होते हैं। अंग्रेजी पढ़नी होती है। देश के लिए निर्णय लेने होते हैं। समाज के लिए काम करना होता है। नेताजी तो केवल अपना काम निकालना चाहते हैं। मैेने भला ऐसा क्‍या काम किया है कि मैं नेता बन सकता हूं। मैने तो वही किया जो किसी को भी करना चाहिए। नहंीं मुझे मना कर देना चाहिए। इतने बड़े-बड़े लोगों में भला मेरा क्‍या काम। अपने लिए तो जंगल सही है लकड़ी काटना और शाम को घर आना। जिंदगी का आनंद तो संतोष में है। बच्‍च्‍ो नहीं जानते। उनकी मां को भी जिंदगी की समझ नहीं है। ”

दूसरे दिन नेता जी के पास जाकर लकड़हारे ने मना कर दिया। तबसे परिवार में उसकी इज्‍जत और कम हो गई। यूं कहिए कि खत्‍म हो गई। यह कम से कम पांच साल पहले की बात होगी। अब तो बेचारा लकड़ियां काटने भी नहीं जाता है। दिन भर पड़े रहना और खांसना। घर वालों को लगता है कि जो वह रोटी खाता है वह बेकार जाता है। भला जो आदमी घर के लिए सोने की कुल्‍हाड़ी नहीं ला सका। राजनीति नहीं कर सका। बाबागिरी नहंी कर सका। उसे रोटी खाने का क्‍या हक है।

गांव का जो समझदार लकड़हारा था। उसकी मूर्त्‍ति गांव के चौराहे पर लगी है। उसने समझदारी दिखाई। बड़े ही आत्‍मविश्‍वास के साथ उसने लोगों को बताना शुरू किया कि मैं सोने और चांदी की कुल्‍हाड़ी लेना चाहता था तो क्‍या अपने लिए ? अपने गंाव के लिए , अपने समाज के लिए। मुझे क्‍या लालच है ? दो रोटी खाता हूं। दो बच्‍च्‍ो हैं। अपना भी भला और दुनिया का भी। मै तो चाहता था कि गांव में एक अस्‍पताल बने । बच्‍चों के लिए बाल विद्या मंदिर की स्‍थापना हो। ऐसा हो नहीं सका। जलदेवता को मेरी बात ही समझ में नहीं आई। ये देवता लोग भी स्‍वभाव से बुजुआर् होते हैं। उनके अंदर भी सामंतवादी प्रवृतियां होती हैं। मैं तो लड़ूंगा। अंतिम सांस तक संघर्ष करूंगा। उनकी यह बात असर कर गई। गांव में सरपंच बन गए। बाद में स्‍थानीय राजनीति में गए। वहीं से राज्‍य की राजनीति में चले गए। राजनीति में चले जाने के बाद तो और भी ईमानदार हो गए। बाद में यह बात फैल गई कि दरअसल कुल्‍हाड़ी नहीं लेने वाला लकड़हारा तो देवता से मिला हुआ था। उसे अंत में कैसे कुल्‍हाड़ी मिल गई ? ये सब लकड़हारे की जालसाजी थी। तभी तो मुंह छुपाकर पड़ा रहता है। हिम्‍मत होती तो जनता का सामना करता। उसकी इज्‍जत तो उसके घर में नहीं है। बाहर क्‍या होगी ? तीन बार विधायक रहने के बाद समझदार लकड़हारे की मृत्‍यु हो गई। उनकी मूर्त्‍ति गांव के चौराहे पर लगाई गई है। उसके नीचे लिखा है। ईमानदारी और त्‍याग प्रतीक श्री श्री ...................... जी।

मूर्ख लकड़हारे के दोनों बेटों ने भी कोशिश की थी कि समझदार लकड़हारे के साथ राजनीति में घुसें लेकिन उन्‍हें यह कहकर मना कर दिया गया कि ईमानदारी छूत की बीमारी है। क्‍या पता तुमलोगों के अंदर भी उसके किटाणु हों। बाप से बेटे को मिल गई हो। हमारा तो सत्‍यानाश ही हो जाएगा। इस्‍तेमाल तो हम तुम्‍हारे बाप के नाम का कर सकते हैं लेकिन इस बात की क्‍या गारंटी कि तुमलोग जीवन भर बेईमान बने रहोगे। कहीं ऐन मौके पर ईमानदार हो गए तो हमारा क्‍या होगा ? बेचारे लाख सफाई देते रहे कि वे कभी ईमादार नहीं होंगे। बाप पर नहीं मां पर गए हैं लेकिन उनकी नहीं सुनी गई । इसका दोष भी बेटों ने मूर्ख लकड़हारे पर ही लगाया और मन भर उसे ताने दिए। वह सुनता रहा। एक ही गलती के लिए जीवन भर सजा पाता रहा। अभी मरा नहीं है। ऐसे लोग मरते नहीं हैं

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हातिम की हाय-हाय

व्‍यंग्‍य कहानी

हजारों सालों से जन्‍नत में पड़े-पड़े हातिम को बोरियत हो रही थी। जिंदगी में कोई रोमांच नहीं। बस बैठे-बैठे उबासी लेते रहो। उसने खुदा से मिन्‍नतें की कि एक बार धरती की यात्रा करने का मौका दिया जाए। वह भारत को देखना चाहता है। देवताओं की धरती जिसके बारे में स्‍वर्ग में चर्चा होती रहती थी कि वहां पत्‍ता भी इर्श्‍वर की मर्जी से ही डोलता है। पहले तो खुदा ने समझाने की कोशिश की लेकिन जब वह नहीं माना तो जाने की इजाजत दे दी गई। हातिम भटकता हुआ एक बस्‍ती में पहुंचा, जहां उसने एक अजीब नजारा देखा। बस्‍ती के सारे लोग एक नल को घेर कर खड़े थे। बड़ा ही मारके सीन था। औरत-मर्द, बच्‍च्‍ो लगभग बीस-पच्‍चीस लोग नल को घेर कर खड़े थे। हातिम को लगा कि बस्‍ती पर कोई कहर बरपाया है। उसने एक आदमी को अलग ले जाकर पूछा-

-” ऐ खुदा के नेक बंदे ! इस बस्‍ती पर कौन सा कहर बरपाया है। क्‍या किसी जादू का साया है। इन आदमजातों को क्‍या हुआ ? इस बेजान नलके को घेर कर क्‍यों खड़े हैं ? क्‍या कोई जादू होने वाला है। या हो गया है ? ”

उस आदमी ने हातिम को ऊपर से नीचे तक गौर से देखा और बोला -

-” आपको यहां कभी देखा नहीं। कहां से आए हैं ? आपकी भाषा भी अजीब है। आपको इतना भी नहीं पता कि एक नल को घेर कर लोग कब खड़े होते हैं। पानी आने की उम्‍मीद है। आज दस दिन से पानी नहीं आया है। हो सकता है कि आज पानी आ जाए। ”

हातिम ने आजतक पानी की किल्‍लत नही देखी थी। भोजन की कमी नहीं देखी थी। यमन का शाहजादा था। उसकी समझ में बात नहीं आई। उसने एक बुजुर्गवार की कदमबोसी की और उनसे दरियाफ्‍त की -

-” ऐ नेक बंदे , यह पानी का आना क्‍या बला है ? क्‍या पानी यहां आसमान से नहीं आता ? क्‍या यहंा की जमीन पानी नहीं देती ? पानी कौन देता है ? क्‍यों नहीं आया ?”

बुजुर्ग तुरंत समझ गए कि यह कहानियों का हातिम है। कहानी से निकल कर आया है। वास्‍तविक जिंदगी की समझ नही है। आग का दरिया पार करना आासान है मगर नगरपालिका के दफ्‍तर जाकर पानी की कंपलेन करना और उसे प्राप्‍त करना कठिन। उन्‍होंन समझाया -

-” बेटे , तुम इस चक्‍कर में मत पड़ो। पानी नहीं आया तो आ जाएगा। इलेक्‍शन होने वाले हैं। सभी समस्‍याओं का समाधान हो जाएगा। कम से कम आश्‍वासनों की बारिश तो होगी ही। तुम चिंता मत करो। नगरपालका वाले पानी छोड़ते हैं मगर वहां से कोई काम कराना इतना आसान नहीं है ं तुम तो हातिम हो यदि बोतल का चिराग भी होता तो भाग जाता। तुम्‍हारी जो भाषा है इसे सुनकर तो कोई तुम्‍हारा काम नहीं करेगा। जाओ कहानियों में लौट जाओ। ”

हातिम ठहरे धुन के पक्‍के। आब-ए-हयात ढूंढ़ चुके थे। भला उससे भी मुश्‍किल काम होगा ? अपनी भाषा और भूषा बदली ,जा पहुंचे नगरपालिका के दफ्‍तर। यह ऐसी जगह हैं जहां दुनिया का कोई नियम काम नहीं करता। कोई भी काम करवाना हो तो एक खास किस्‍म की बेहयाई चाहिए जिसमें नंगापन भी हो और गुंडापन भी। हातिम आजतक नेकी की राह पर चले थे। बदी की जानकारी उस अनुपात में नहीं थी। पहुंचे तो वहां कोई नहीं था। आॅफिस में ताला भी नहीं लगा था लेकिन किसी कमरे में आदमजात नहीं। उन्‍होंने बाहर एक पान वाले से पूछा-

-”भाई साहब , दफ्‍तर में कोई नहीं है। मैं किसी अधिकारी से मिलना चाहता हूं। मुझे एक दरियाफ्‍त करनी है। दरअसल एक मुहल्‍ला है जिसमें पानी नहीं आ रहा। वहां लोग काफी परेशान हैं ं उनके दर्द को बयां करने आया था। ”

-” पहली बार आए हैं क्‍या ? ”

-” जी हां। ”

-” कमाल है। पहली बार ही आए और आपको उम्‍मीद है कि कोई न कोई मिल जाएगा। हद हो गई भोलेपन की। एइसा है भोले भगवान की यहां आना आपके हाथ में है। दर्शन होना या नहीं होना भगवान के हाथ में। मैं भी यहां अपने काम से ही आया करता था। इतनी जान पहचान हो गई कि यहीं दुकान डालकर बैठ गया। आप भले आदमी हैं इसलिए बता देता हूं कि वह जो सामने मुंह में पान ठूंसे बैठे हैं। वह हैं गोलू भाई। नगरपालिका की एकमात्र चाबी। उन्‍हें खुश कीजिए काम हो जाएगा। ”

-” किस ओहदे पर हैं ?”

-” आदेशपाल हैं। आपतो जानते ही होंगे - नीचे आदेशपाल, ऊपर राजपाल। ”

हातिम गए गोलू भाई के पास। गोलू भाई पान खाने और थूकने के बाद बचे हुए समय में आने जाने वालों की मदद करते थे। उन्‍होंने हातिम को गौर से देखा और कुल पांच शब्‍द कहे -” आपकी मदद हम क्‍यों करें ?”

-” जी हम समझे नहीं। ”

-” नहीं समझे वह तो लग ही रहा है। एइसा है कि हम काम करते हैं सरकार का तो वह हमें वेतन देती है। आपका काम करेंगे तो आप हमें क्‍या देंगे ?”

हातिम ने गोलू भाई को समझाने की कोशिश की कि दुनिया में इन्‍सानियत नाम की भी चीज होती है। एक बस्‍ती के लोग प्‍यास से मर रहे हैं। उनको पानी चाहिए। उसके लिए गोलू भाई के मदद की जरूरत है। गोलू भाई ने उन्‍हें रिश्‍वत के सामाजिक और सांस्‍कृतिक महत्‍व को बताने की कोशिश की। इस कला में हातिम भारी पड़े। गोलू भाई पहले समझ गए। भावुक होने के बाद वे मदद करने के लिए तैयार भी हो गए। तब उन्‍होंने एक राज़ की बात बताई। बड़े बाबू की बेटी की शादी होने वाली थी। बेटी की शादी में सारे स्‍टाॅफ को जाना था इसलिए आॅफिस चार दिनों से बंद था। आज बेटी विदा हो गई। कल लोग आ जाएंगे। आज तो सब थके होंगे। रही बात पानी की तो कल जब सबलोग आ जाएंगे तो विचार होगा। गारंटी तो नहीं है कि काम हो ही जाएगा लेकिन प्रयास तो होगा ही। मामला काफी संगीन था। बेटी की शादी में जाना तो मानवीय कदम है। पानी तो बाद में भी जाएगा। आदमी पानी तो पी ही लेगा। जिसने मुंह दिया है और भोजन देता है। वह दो गिलास पानी नहीं देगा ? अंत में गोलू भाई ने यह भी बताया कि यहां आदर्शों और सिद्धांतों की बातें नहीं होती। पैरवी और पैसे की होती है। पैरवी के साथ पैसा। नगरपालिका है नगर भर को पाल रहा है तो इसे भी पालने वाला चाहिए न।

हातिम दूसरे दिन पहुंचे। उन्‍हें किसी ने बता दिया था कि नगरपालिका का आफिस दस बजे खुल जाता है। यह आंशिक सत्‍य था। कमरे खुल जाते हैं लेकिन अधिकारी बारह बजे तक पधारते हैं। इंतजार करने के बाद एक साहब आए। उन्‍होंने हातिम की बात सुनी भी और नहीं भी सुनी। क्‍योंकि जब तक हातिम बोलते रहे तब तक साहब कोई कागज खोज रहे थे। अंत में उन्‍होंने भी पांच शब्‍द कहे -

-” कल बड़े बाबू से आकर कहिए। ”

उसके बाद उन्‍होंने मुंह बंद करके फाइल खोल ली। हातिम को उम्‍मीद थी कि इसके बाद शायद कुछ घटित हो लेकिन उन्‍हें लौटना पड़ा। रास्‍त्‍ो में मिल गए गोलू भाई। उन्‍होंने एक ठहाका लगाया और बोले-

-” भले आदमी हर जगह के अपने-अपने नियम होते हैं। यहां का नियम माल-पानी है। आप देते नहीं है। हब हर आदमी मेरी तरह भला तो है नहीं कि आपसे बात कर लेगा। घूमते रहिए। थक जाएंगे। बिना तोले कोई नहीं बोलेगा। ”

हातिम ने नेकी की राह पर हजारों साल गुजारे थे। भारत के बाहर रहने के कारण उन्‍हें बाबूवाद की जानकारी भी नहीं थी। उन्‍हें अब भी यही उम्‍मीद थी कि बड़े बाबू के आने के सबकुछ ठीक हो जाएगा। आखिर इतना बड़ा बाबू है तो इर्मान की बात कुछ न कुछ तो करेगा ही। यह गलतफहमी होना अच्‍छी बात है इससे आदमी सरकारी दफ्‍तरों में जाकर सकुशल लौट आता है।

हातिम मुहल्‍ल्‍ो में लौटे तो दंग रह गए। लोग अब भी नल को घेर कर खड़े थे। किसी के चेहरे पर उबन नहीं। आपस में हंसी-मजाक भी चल रहे थे और पानी का इंतजार भी हो रहा था। खासतौर पर औरतें और बच्‍चों वहां दिख रहे थे। मर्द शायद अपने काम में तल्‍लीन थे।

हातिम की समझ में यह में बात नहीं आई कि आदमी पानी के बिना भी इतना खुश कैसे रह सकता है। उन्‍होंने बुजुर्गवार के पास जाकर सारी बातें बताई और उनसे मुहल्‍ले वालों की खुशी का राज जानना चाहा। सारी बातें सुनने के बाद बाबा ने सलाह दी-

-” मैं तो यही कह सकता हूं कि आप इस चक्‍कर में न पड़ें। आप आज पहले दिन गए हैं। वहां जाते-जाते एक दिन थक जाएंगे। पानी नहीं आएगा। आएगा तभी, जब चुनाव आएंगे। यदि रिश्‍वत भी दी जाए तो .......जल्‍दी नहीं आएगा। मुहल्‍लेवालें जो आपको इतने खुश दिखाई दे रहे हैं; उसके पीछे भी कारण यही है। इन्‍हें अभावों में जीने की आदत है। पानी, बिजली, सड़क ,भोजन , काम ; इन सब चीजों की कमी हमेशा रही है। सदियों से रही है। आदी हो चुके हैं। इंतजार करते-करते इनको आदत हो गई है। बगल के मुहल्‍ले से पानी लाकर काम चला रहे हैं। बिजली नहीं है तो लैंप और लालटेन है। आप इनकी चिंता न करें। दस दिन क्‍या दस साल भी पानी नहीं आए तो ये लोग काम चला लेंगे। ”

हातिम को लगा कि वह अजूबों के देश में आ गया है। अमन-चैन का यही कारण है। यहां का राजा भी कमाल है। बिजली , पानी की चिंता ही नहीं करता। उसने बूढ़े आदमी से पूछा-

-” ऐ खुदा के नेक बंदे ! यहां का बादशाह आवाम की फिक्र नहीं करता। आवाम की परेशानियों को दूर करने की कोशिश नहीं करता ?”

-” यहां का बादशाह जनता के द्वारा चुना जाता है। उसे जनता की परेशानियों से ज्‍यादा इस बात की चिंता रहती है कि पांच साल तक सिंहासन पर कैसे रहेगा। अपने लिए ताउम्र की व्‍यवस्‍था करने में ही उसके पांच साल निकल जाते हैं। जनता पर उसे भरोसा नहीं रहता कि वह उसे दुबारा वोट देगी। जनता को उस पर भरोसा नहीं है कि वह कुछ भी करेगा। ऐसे ही चल रहा है। ”

-” ये क्‍या माज़रा है ?”

-” इसे लोकतंत्र कहते हैं। ”

हातिम का नगरपालिका कार्यालय में आज लगातार चौथा दिन था। आते और बड़े बाबू का इंतजार करके चले जाते। हिम्‍मत और साहस की तो कोई कमी थी नहीं। इस बीच गोलू भाई ने समझाने की कोशिश भी की कि तपस्‍या करने पर शिवजी प्रसन्‍न हो जाएंगे लेकिन तिवारी जी नहीं। ज़ाहिर तौर पर तिवारी जी बड़े बाबू का नाम था। माल-पानी की व्‍यवस्‍था होने पर तो मोबाइल से भी बात की जा सकती है लेकिन सूखा-सूखी बात करने से उनके नाराज हो जाने का खतरा है। पांचवे दिन हातिम की किस्‍मत ने पलटी खाई। बड़े बाबू का स्‍कूटर आकर रुका। गोलू भाई दौड़कर गए। हेलमेट थाम लिया। बैग पकड़ ली। भुनभुनाते हुए से बड़े बाबू आॅफिस में प्रवेश कर गए। थोड़ी देर में गोलू भाई बाहर आए। पानी लेकर अंदर गए। बाहर आए। ठंडा लेकर अंदर गए। हातिम ने अनुमान लगा लिया कि यही बड़े बाबू है ं। वह अंदर चला गया। जब तक गोलू भाई उन्‍हें रोकें तब तक तो वह अंदर पहुंच चुके थे।

-” साहब , मैं आज चार दिन से आपके दफ्‍तर का चक्‍कर काट रहा हूं। आपसे मिलने के लिए। बात यह है कि ..........।”

-” आपको जो भी कहना हो लिखकर दीजिए। आवेदन पत्र लाइए। काम के बोझ से पहले हीआदमी परेशान है। ऊपर से आपकी रामकथा कौन सुनेगा ? सांस लेने की फुर्सत नहीं है। वी आर एस के लिए आवेदन दिए भी तीन महीने हो गए। कोई सुनने वाला नहीं। नीचे से ऊपर तक कोई काम करने वाला नहीं। आदमी बेमौत मर जाएगा। ”

हातिम बाहर आए। उन्‍हें उर्दू आती थी। अर्जी लिखकर ले गए। बैरंग वापस आना पड़ा। बड़ा बाबू को उर्दू आती नहीं थी। हिन्‍दी में लिखने का फरमान सुनाया गया। हातिम हिंदी बोल तो सकते थे लेकिन लिखना ! काम आ गए गोलू भाई। उन्‍होंने हिन्‍दी में तर्जुमा किया। एक बार फिर से आवेदन पत्र बड़ा बाबू की टेबुल पर था लेकिन तब तक उनके पास फाइलों की ढ़ेर लग गई। गर्दन उठाने का भी समय नहीं। उन्‍होंने हातिम को अगले दिन आने के लिए कहा। हातिम लौट गए। मुहल्‍ले में गर्दन लटकाए आए लेकिन यहां तो गम का नामोनिशान नहीं। लोग हंसी-मजाक भी कर रहे थे और पानी का इंतजार भी। औरतें अपनी-अपनी बाल्‍टी रखकर अपने काम में लग गई थी। बच्‍चों को यह हिदायत दी गई थी कि जैसे ही पानी आए। सूचित करें। बच्‍च्‍ो खेलने में तल्‍लीन थे। आज हातिम को हैरानी नहीं हुई। सीधे मंदिर में चले गए। वहीं वह बूढ़ा आदमी भी रहता था। उसने हातिम को देखा लेकिन बोला कुछ नहीं।

दूसरे दिन हातिम पहुंचे तो बड़ा बाबू अच्‍छे मूड में थे। जाते ही चहके-

-” आइए साहब। हम तो आप जैसे लोगों की दिल से कद्र करते हैं। समाज के लिए जीना ही जीना है। अपने लिए तो जानवर भी जीता है। आप जो कर रहे हैं। वह स्‍वर्ण अक्षरों में लिखा जाने योग्‍य है। आपको कभी देखा तो नहीं है , उस मुहल्‍ले में। मैं तो लगभग सबको जानता हूं। रहमान साहब, गफूर भाई, चौधरी जी , शर्मा जी .........................। आपको नहीं देखा। आपका नाम ? ”

-” हातिम। ”

-” बिल्‍कुल ठीक। यही नाम होना ही चाहिए था। आप गफूर भाई के साहबजादे हैं। ”

-” जी नहीं। मैं बाहरी आदमी हूं। मेरा घर उस मुहल्‍ले में नहीं है। ”

-” तभी तो.....तभी तो.....। खामखाह आप अपना और मेरा दोनों का समय बरबाद कर रहे हैं। अजी साहब जब आप उस मुहल्‍ले के नहीं हैं तो आपकी अर्जी का कोई मतलब ही नहीं। पहले मुहल्‍ले वालों के हस्‍ताक्षर लेकर आइए। बाबा का ढ़ाबा थोड़े ही है कि मुंह उठाए और चले आए। मुहल्‍ले के कम से कम दस लोगों के हस्‍ताक्षर और वार्ड सदस्‍य या मेयर का अनुमोदन। बस अब निकलिए और भी काम है। ”

हातिम की समझ में नहीं आया कि अचानक बड़ा बाबू का मूड क्‍यों उखड़ गया। बाहर आकर उन्‍होंने गोलू भाई से जानने की कोशिश की। गोलू भाई ठीक उसी प्रकार मुस्‍कराये जैसे पार्थ के प्रश्‍नों को सुनकर कृष्‍ण मुस्‍कराते थे। उवाचे-

-” आपको तो पहले ही बता दिया था कि यहां के अपने नियम हैं। आप माने नहीं। अपने नियमों से चलेंगे तो यही सब होगा। मैं तो अभी ही दस हस्‍ताक्षर करके और वार्ड के अनुमोदन के साथ साहब को दे आता लेकिन आप ..................।”

-” यहां तो कोई नहीं है फिर कैसे ?”

-” वही तो कमाल है। पांच हस्‍ताक्षर दायें हाथ से और पांच बायें से। मगर उसके लिए माल-पानी चाहिए। आपके पास है नहीं। लगे रहिए। हमारा काम है आपको सही और गलत के बारे में बताना। मानना न मानना आपका काम है। ”

हातिम मंदिर में बैठ कर सोच रहा था कि दस लोगों के हस्‍ताक्षर कैसे करायें। कोशिश करने से वह तो हो भी जाएगा लेकिन यह वार्ड मेंबर कहां मिलेगा ? तभी बाबा आ गए। उनके पास कोई काम था नहीं। बेटे-बहू ने घर से निकाल दिया था। तब से इस मंदिर में पड़े रहते थे। मुहल्‍ल्‍ो वाले खाने को दे दिया करते थे। उन्‍होंने हातिम को बताया-

-” हस्‍ताक्षर तो लोग कर देंगे। वार्ड मेंबर भी मिल जाएगा लेकिन तुम्‍हारे साथ कोई आॅफिस तक नहीं जाएगा। ये अपनी मांद में छिपकर बैठने वाले लोग हैं। बाहर तभी जाएंगे जब पेट के परेशान

करेगा। हो सके तो तुम्‍हारा ही विरोध करेंगे। वैसे पानी वाला काम भी तभी होगा जब उन्‍हें पैसे मिलेंगे। यहां तो बिना पैसे के पत्‍ता भी नहीं हिलता।”

हस्‍ताक्षर तो मिल गए। लोगों ने समझाया भी हातिम को कि इस झंझट में न पड़े। कुछ लोगों ने तो पूछा भी कि उसे यह सब करके क्‍या मिलेगा ? बहुत सारे लोगों ने हस्‍ताक्षर करने से यह कहकर मना कर दिया कि उन्‍हें इस झंझट में नहीं पड़ना है। उनके बाल-बच्‍च्‍ो हैं। नगरपालिका से लड़ने की फुर्सत उनके पास नहीं है। हातिम के पास न तो बीबी है न बच्‍चा , जब तक चाहे लड़ता रहे। पानी के लिए क्‍या लड़ना ? लड़ाई-झगड़े में क्‍या रखा है ? मनुष्‍य को शांति में विश्‍वास रखना चाहिए। खैर, थोड़ी कठिनाई से ही सही हस्‍ताक्षर तो मिल गए। अब रही बात वार्ड मेंबर की तो उनके घर तक हातिम जाकर दो बार आ गये। वह घर पर नहीं थे। आलाकमान से मिलने दिल्‍ली गए थे। अगले साल विधान सभा के चुनाव होने वाले थे। वार्ड साहब को लगता था कि वह राज्‍य की राजनीति के योग्‍य हैं। इसी सिलसिले में उनका जाना जरूरी थी। उनका विरोधी जयपाल तो पहले से ही जाकर बैठा था। टिकटों की मारामारी चल रही थी। ऐसे में पीछे रहने का मतलब था। अपने पांव पर कुल्‍हाड़ी मारना।

आखिरकार एक दिन ऐसा भी आया जब वार्ड साहब और हातिम आमने-सामने थे। उन्‍होंने पूछा-

-” पानी नहीं आ रहा है, यह निहायत शर्म की बात है। आप सबने यदि फोन किया होता तो मैं पहले ही आ जाता। नहीं तो कम से कम उस बड़े बाबू के बच्‍च्‍ो की खबर तो लेता ही। आपने बड़ी मेहनत की जबकि परदेसी आदमी हैं। यहां तो मुहल्‍ल्‍ो वाले कुछ नहीं करते। उनको तो अपनी लड़ाई भी लड़नी नहीं आती। खैर आप चिंता मत कीजिए। मैं कल मुहल्‍ल्‍ो में आता हूं। नल को देखकर ; पानी का मुआयना करके; हस्‍ताक्षर कर दूंगा। चाय लेंगे ......।”

हातिम वापस आ गए। चार दिन वार्ड मेंबर साहब नहीं आए। पांचवे दिन एक आदमी की शादी में पधारे। उनके आते ही मानो मुहल्‍ले की सारी समस्‍याएं खत्‍म हो गईं। लोग जयजयकार करते, आगे-पीछे घूमने लगे। एक होड़ सी मची थी कि वार्ड मेंबर का सबसे नजदीकी कौन है। उन्‍होंने पानी के बारे में पूछा तो लोगों ने हंसते हुए कहा-

-” हां.. पानी कुछ दिनों से नहीं आ रहा है। यह तो होता ही रहता है। आज नहीं आ रहा है तो कल आ जाएगा। अब किसी के हाथ में तो है नहीं। कोई तकनीकी फाल्‍ट आ गई होगी। हम लोग लगे हुए हैं। हस्‍ताक्षर कराके लेकर गए भी थे। एक-दो दिन में पानी आ जाएगा। यह बताइए कि टिकट आपको ही मिल रहा है न ? हम उस कमीने जयपाल को वोट नहीं देंगे। यदि दूसरे किसी को टिकट मिला तो..........। आपको ही हम विधायक के रूप में देखना चाहते हैं। हमारा विधायक कैसा हो ..............।”

नारों में असली मुद्दा दब गया। हातिम को हैरानी हुई। लोग अपनी समस्‍याओं को उठा ही नहीं रहे। इनको इस बात की कोई फिक्र ही नहीं कि पानी नहीं आ रहा है। कमाल है। हस्‍ताक्षर वाली बात पर तो कोई बोल ही नहीं रहा। वह खुद ही आगे बढ़ा। भीड़ को चीरकर नेता जी के पास पहुंचा। सामने कागज रखी और बोला-

-” मैं , श्रीमान कल आपसे मिला था। इस पर आपके ..............।”

-” हां.. हां आप तो हमसे कल मिले ही थे। पानी नहीं आ रहा है। कमाल है। कब से पानी नहीं आ रहा है ?”

-” यही कोई दो चार दिनों से ....।” भीड़ से आवाज आई।

-” लगभग तीस दिन होने जा रहे हैं। ” हातिम ने जोर देकर कहा।

वार्ड साहब ने हस्‍ताक्षर तो कर दिए लेकिन उन्‍हें यह बात नागवार गुजरी कि एक परदेसी सबके सामने उनसे इस प्रकार बात करे। उन्‍होंने भी तय कर लिया - ठीक है बेटा तुम दिखा दो पानी लाकर।

हस्‍ताक्षर मिल जाने के बाद हातिम को तो मानो पंख लग गए। इतनी खुशी तो जादूगर के पहले प्रश्‍न को हल कर लेने के बाद भी नहीं हुई थी। पूरे उत्‍साह के साथ गए और बाबा को बताया -

-” ऐ रहमत-ए-खुदाई ! मैंने खु़दा के फ़ज़ल से फ़तह हासिल की। ”

-” ये फ़तह नहीं है , यूं समझो ,गड्ढे में जाने का रास्‍ता साफ हो गया है। तुम्‍हें क्‍या लगता है कि वार्ड के हस्‍ताक्षर के बाद बड़ा बाबू काम कर देगा। ये नेता लोग हस्‍ताक्षर भी करेंगे और फोन करके कह भी देंगे कि काम मत करना। देखते रहो तुम.......।”

हातिम पर इन बातों का कोई प्रभाव पड़ता नहीं था। अगले दिन जा धमके नगरपालिका के दफ्‍तर। बड़ा बाबू तो नहीं थे। उन्‍हें किसी जरूरी काम से बाहर जाना पड़ गया था। छोटे बाबू थे। हातिम ने उन्‍हें अर्जी दी। देखने के बाद उन्‍होंने कुल पांच शब्‍द कहे-

-”उधर डब्‍ब्‍ो में रख दो। ”

डब्‍ब्‍ो में अर्जी रख देने के बाद हातिम ने गोलू भाई से डब्‍ब्‍ो का तिलिस्‍म जानना चाहा। उन्‍होंने प्रकाश डाला कि यह डब्‍बा आम आदमी की समस्‍याओं को जानने के लिए बनाया गया है। आप इसे शिकायती-डब्‍बा भी कह सकते हैं। आपने जो अर्जी डाल दी। वह कल खुलेगी। कल यदि बड़ा बाबू आ गये तो.......इस पर विचार होगा। आप चिंता मत कीजिए। वार्ड का हस्‍ताक्षर है। आपको शुभ सूचना ही मिलेगी। हां , आपको थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा। कब तक ! यह कहना मुश्‍किल है। अब, कम से कम दो चार दिन आने की जरूरत नहीं है। सरकारी नियमों के मुताबिक अर्जी देने के बीस दिन के अंदर कार्यवाही होती है। हातिम के पास वापस लौटने के अलावा कोई चारा नहीं था। चार दिन के बाद उन्‍होंने नगरपालिका के आॅफिस में फिर कदम रखे और किस्‍मत का चक्‍कर देखिए कि उस दिन बड़ा बाबू भी आ मौजूद थे। उन्‍होंने सारी अर्जियां देख ली थीं। सबके जवाब तैयार थे। हातिम को देखते ही उन्‍होंने गर्मजोशी से स्‍वागत किया -” मान गए आपको। आपमें वाकई हातिम वाली ही हिम्‍मत है। हमने आपकी अर्जी देख ली है। इस पर एक्‍शन लेने का आदेश भी दे दिया है। आप निश्‍चिंत रहें। कार्यवाही होगी। हमारा तकनीकी विभाग आपके क्ष्‍ोत्र का दौरा करेगा। यदि तकनीकी फाल्‍ट हुआ तो दूर कर दिया जाएगा। यदि नहीं हुआ तो फिर अगले विभाग को रेफर होगा। काम हो जाएगा। ”

-” जी कब तक काम हो जाएगा ? ”

-” हानि,लाभ, जीवन, मरण, यश,अपयश विधि हाथ। कहना मुश्‍किल है कि कब तक काम होगा लेकिन हो जरूर जाएगा। देर हो सकती है लेकिन अंधेर तो बिल्‍कुल ही नहीं होगा। ”

लगभग दो महीने लग गए। एक दिन हातिम को बताया गया कि जो पाइपलाईन उस मुहल्‍ल्‍ो तक जाती है उसमें एक नन्‍हा सा छिद्र है। उसे बंद करने के बाद पानी जाने लगेगा। उसे बंद करने के लिए आवश्‍यक संसाधन नगरपालिका के पास नहीं है। उसके लिए उपरवालों को लिखा गया है। संसाधन उपलब्‍ध होते ही, काम हो जाएगा। तब तक आने की जरूरत नहीं है। सूचना भेज दी जाएगी। हातिम को जितना आश्‍चर्य नगरपालिका वालों पर नहीं हो रहा था उससे ज्‍यादा हैरानी मुहल्‍ल्‍ोवालों को देख कर हो रहा था। वहां गम और परेशानी का नामोनिशान नहीं था। लोग अब हातिम को देखते ही कहते।

-” कहिए पानी का हाल-चाल। आज कहां तक पहुंचे। ”

उसके बाद सबलोग हंसने लगते। कुछ लोग 'वाटर इंचार्ज' कहने लगे थे। यह हातिम के लिए हैरानी की बात थी। उसने जब भी जादूगर का कोई सवाल हल किया था। उसे लोगों ने बधाई दी थी। जादूगरों ने भी उसका लोहा माना था। यहां तो हालात ही अलग थे। उसके साथ कोई चलने के लिए तो तैयार नहीं ही था। उल्‍टा उसका मजाक उड़ाया जाता था।

बीस दिन के बाद एक पत्र आया नगरपालिका वालों की ओर से।

-'आपके आवेदन पत्र दिनांक...........क्रंमांक.....के अनुसार पाइप का मरम्‍मत हो चुका है।

आशा है आपके मुहल्‍ल्‍ो में पानी जा रहा होगा। धन्‍यवाद।

हातिम ने इंतजार किया कि शायद एक दो दिन में पानी आ जाए लेकिन कोई लाभ नहीं। पानी का नल उसी तरह सूखा था। अब तो वहां बच्‍च्‍ो भी नहीं खेलते थे। लोग बगल वाले मुहल्‍ले से पानी लाकर काम चला रहे थे।

हातिम भागा हुआ नगरपालिका के दफ्‍तर पहुंचा। वहां मिल गए गोलू भाई। उन्‍होंने हाल-चाल पूछने के बाद बताया कि कागज पर सारा काम मुकम्‍मल हो चुका है। पानी को जाना चाहिए लेकिन नहीं जा रहा है तो यह एक प्राकृतिक आपदा है। आप नियमों से चलने वाले आदमी हैं। कोई न कोई नियम इसके लिए भी निकालिए। पानी का जाना अब ईश्वर के हाथ में है। हमारे यहां से कोई फाल्‍ट नहीं है। पानी दिया जा रहा है। बगल वाले मुहल्‍ले में तो पानी जा ही रहा है। पहली बार निराश होकर लौटे हातिम।

बाबा ने समझाया -

-” मैंने तो पहले ही कहा था कि इन चक्‍करों में मत पड़ो। कहानियों में लौट जाओ। तुम ही नहीं माने। आज यदि मुहल्‍ले के लोग चंदा करके रिश्‍वत दे आएं तो शाम तक पानी आ जाए। कहीं कोई फाल्‍ट नहीं है। कोई पाईप नहीं फूटी है। कमाने का एक तरीका है। बड़ा बाबू की बेटी की शादी थी। खर्च अधिक हो गया होगा। वह जनता से ही वसूलेगा। ये लोग और करते क्‍या हैं? केवल वेतन के बल पर थोड़े ही ऐश होता है। बड़ा बाबू का बेटा अमेरिका से पढ़कर आया है। तुम इन चक्‍करों में पड़ो ही मत। अभी भी वक्‍त है लौट जाओ। कल से यही मुहल्‍ले वाले तुम्‍हारे ऊपर पत्‍थर मारेंगे। निकाल बाहर करेंगे तुम्‍हें। इज्‍जत से लौट जाओ , इसी में तुम्‍हारा भला है। क्‍या पता कल कोई तुम्‍हारे खिलाफ पुलिस में चला जाए। नाम-पता, ठिकाना मालूम नहीं और नेतागिरी कर रहे हो। लोग तुम्‍हारे खिलाफ ही हाय-हाय करने लग जाएंगे। लौट जाओ तो अच्‍छा है । ”

समय अच्‍छा चल रहा था हातिम की समझ में बात आ गई । खुदा को याद करके वापस लौट गए।

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शशिकांत सिंह 'शशि'

जवाहर नवोदय विद्यालय , शंकरनगर

जिला-नांदेड़, महाराष्‍ट्र , 431736

मो-07387311701

skantsingh28@gmail.com

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