रविवार, 29 सितंबर 2013

उमेश गुप्ता के व्यंग्य

// उफान //

        हमारे देश में हर चीज उफान पर है। मंहगाई तूफान पर है। रूपये की अंतर्राष्ट्रीय कीमत चढान पर है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें खौल रही हैं। खाने की वस्तु जला रही हैं। दूध, खाद्य तेल उबाल पर हैं। इन सब तूफानों के बीच देश का आम गरीब आदमी अपनी नैया पार करने की कोशिश कर रहा है।


        देश में न्याय, शिक्षा, आहार, आवास जैसी बुनियादी सुविधाएं मंहगी हैं।  शिक्षा पर मंहगाई का ग्रहण लगा है। लाखों रूपये आवश्यक कोर्स की कीमत है। अस्पताल के बिल, फाईव स्टार होटल के, केश मेमो की याद दिलाते हैं। दबाओं की कीमतें उफान पर हैं। जल, जंगल, जमीन की कीमतें, बिजली के बिल की तरह करंट मारती है। एक आम वेतनभोगी के जिन्दगी भर के वेतन से ज्यादा अर्फोडेबल हाउस की कीमत है।


        देश में अश्लीलता उफान पर है। सिनेमा, टी.व्ही सीरियल, चैनल, अश्लीलता, अंधविश्वास हमारे बेडरूम और डायनिंग टेबिल पर परोस रहे हैं। दिन में जो चैनल अंधविश्वास, भूतप्रेत, तंत्र-मंत्र जादू टोना का विरोध करते हैं वहीं रात में लाखों करोडों रूपये का विज्ञापन प्रचार प्रसार में कोई कमी नहीं छोड़ते हैं। वे ढोंगी, पाखंडी, बाबाओं के निर्मल दर्शन कराते हैं। टोने टोटके, जादूटोने के नाम पर यंत्र बिकवाते हैं। श्री लक्ष्मीयंत्र धनवृद्वि ताबीज, कुबेर  कुंजी  बिकवाकर अपनी धनवृद्धि करते हैं। राम राज्य की आशा जगाकर अंधश्रद्धा का प्रचार करते हैं


        देश में भ्रष्टाचार उबाल पर है। विकेन्द्रीकरण के कारण पंचायत, नगर पंचायत, नगरपालिका, नगरनिगम आदि स्वायत संस्थाएं भ्रष्टाचार का साधन और साध्य बन गई हैं। आम जनता में विकास की सड़क एवं शिक्षा की रोशनी जगाने के नाम पर भ्रष्टाचार का नंगा नाच खेला जा रहा है।


        देश में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन चरमसीमा पर होने के कारण प्राकृतिक प्रकोप उफान पर है। प्राकृतिक प्रकोप के कारण उत्तरांचल में हजारों जाने गई, लाखों बर्बाद हो गये, करोंड़ों का नुकसान हो गया, लेकिन तब भी हम प्रकृति से छेड़-छाड़ करना बंद नहीं कर रहे हैं।
       
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हमें आजादी है कि ...

 

            देश को आजाद हुये 66 वर्ष हो गये हैं, लेकिन अभी देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी दो समय का पोषण आाहर कमाकर खाने में असमर्थ हैं, उसके लिये खाद्य सुरक्षा बिल पास हुआ है। लगभग 35 प्रतिशत आबादी अत्यन्त गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करती है। लगभग 50 प्रतिशत लोग अभी भी अशिक्षित हैं और उनमें से कुछ लोग शिक्षा के नाम पर केवल अपना नाम लिखना जानते हैं। देश की लगभग 30 प्रतिशत आबादी बेरोजगारी का दंश झेल रही है।


        इसके बाद भी हम अपने को पूरी तरह आजाद मानते हैं। हमें पूरी आजादी है कि हम सरकारी नियम, कायदे कानून को न माने और सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करें, गदंगी फैलाये , सड़क किनारे लघुशंका करें दिशा मैदान जाये लेकिन अपने घर में सेप्टीकटेंक का निर्माण न करें।


        हमारे देश के कर्णधारों, नीतिनिर्धारकों, खेवनाहारों, नौकरशाह, ब्यूरोक्रेट, को आजादी है कि वह देश की जनता को मनमाने ढंग से लूटे, कोई भी काम बिना लेनदेन के न करें, और काम की कीमत अनुसार वसूली करें, हमें आजादी है कि हम आम जनता को जरूरत से ज्यादा तंग करें ताकि वह टेबिल के नीचे से दलाल मध्यस्थ के माध्यम से अधिक पैसा देकर काम करवायें।


        हमें आजादी है कि जितना वेतन, सुविधा, मानदेय, प्राप्त होता है, उसके अनुसार काम न करें। अपने कार्यालयीन समय में मोबाईल पर बात कर अपना और लोगों का समय बर्बाद करें। सरकारी काम की जगह व्यक्तिगत कार्य में समय बर्बाद करें। हमें आजादी के नाम पर हर वो गलत काम करवाने की आजादी है जो हमारे लिये लाभप्रद है।


        हमें बिजली की चोरी की आजादी है, सरकारी जल, जंगल, जमीन हड़पने और अतिक्रमण करने की आजादी है। हमें रेत उत्खनन, खनिज चुराने की आजादी है।
        हमें आजादी है कि हम यातायात नियमों का उल्लंघन कर सड़क पर बिना लायसेंस, परमिट, रजिस्टेशन  के वाहन चलाये तथा पकड़े जाने पर दमदार लोगों से फोन करवाकर दम पड़वाने की आजादी है। हमें आजादी है कि हम व्ही0आई0पी0 बनकर, व्यवस्था से हटकर, सभी नियम कानून तोड़कर अपना काम करवायें।


        हमें आजादी है कि हम सरकारी संपत्ति अपने पिता की संपत्ति समझ कर उसे नष्ट करें, बर्बाद करें। हमें आजादी है कि हम राजा महाराजाओं द्वारा निर्मित किले, मंदिर, ऐतिहासिक इमारतों को नष्ट करें, उन पर अपना प्यार कर इजहार कर उसे सार्वजनिक करें।


        हमें आजादी है कि हम नकली दवा बेचें, पेट्रोल में मिट्टी का तेल मिलाकर बेचें, टैक्स चोरी करें तथा काम करवाने के बाद मजदूरी न दें, हमें पर्यावरण प्रदूषित करने की आजादी, मैच फिक्सिंग कर देश का तिरंगा लजाने की आजादी है।


        देश के दुखहन्ताओं की  आजादी है कि वह खेल, कफन, कोयला, तेल, तोप के नाम पर घपला और घोटाला करें। देश की जनता की लाखों करोड़ों की कमाई खा जावे और जनता को पूर्व की तरह भुखमरी के आधीन पराधीन रहने दें, उन्हें देश को दीमक की तरह खोखला करने की आजादी है।


        हमारे देश के निर्माताओं को आजादी है कि वह देश की नीति निर्धारण संस्थाओं में लड़कर उसे अखाड़ा बनाये और देश की जनता की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक नीतियों, सुविधाओं के साथ दंग करें तथा जनता को पूर्व की तरह मूल अधिकारों से वंचित करें और एहसास कराये कि आजादी छीनने वाले चले गये लेकिन अपनी दमनकारी नीतियां छोड़ गये।


        हमारे विघ्नकर्ताओं को आजादी है कि सत्ता के मोह और लालच में, कुर्सी के लोभ और होड़ में पद की चाहत और प्यार में लालबत्ती की चाह और राह में आज जनता को जाति के नाम पर लड़वायें, धर्म के नाम पर दंगा फसाद करवायें, आतंक फैलाये, वोट के लिये नोट बांटे, धनबल, जनबल, गनबल, बाहुबल के आधार पर अभिमत प्राप्त करें।


        हमें आजादी नहीं है कि हम पूर्व की तरह सरकार की गलत नीतियों का विरोध करें। यदि आज हम पूर्व की तरह सरकार की कुनीतियों का विरोध करते हैं तो हमें पहले की तरह लाठी पड़ती है। डन्डा खाने पड़ते हैं। झूठे मुकदमा झेलने पड़ते हैं। अदालत के चक्कर काटने पड़ते हैं। जेल की हवा खानी पड़ती है।


        देश को आजाद हुए 66 साल हो गये हैं लेकिन हमें अशिक्षा की पराधीनता तंग नहीं करती। भुखमरी नहीं सताती है। असमानता नहीं रूलाती है। दण्ड व्यवस्था का खौफ नहीं तंगाता है इसे जो लोग आजादी मानते हैं, उन्हें मूल अधिकारों की चाहत नहीं है। देश के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, हृास की चिंता नहीं है।


        अंग्रेजी दासता समाप्ती के बाद हमने मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखे थे कि हम अपने तौर-तरीके से देश चलायेंगे, लोगों को सम्मान प्राप्त होगा, मूल अधिकार प्राप्त होंगे, बुराईयों से स्वतंत्रता मिलेगी लेकिन आज हम ऐसी आजादी से सैकड़ों साल दूर हैं।


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  लुढ़कना

        हमारा राष्ट्रीय चरित्र ही लुढ़कना है। इसलिये यदि देश का रूपया तेजी से विदेशी मुद्रा के मुकाबले लुढ़क रहा है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं हैं। रूपया रोज देश में भ्रष्टाचार के बढ़ते आंकड़े की तरह नये रिकार्ड बना रहा है। लोग कह रहे हैं कि रूपया लुढ़कने की यही गति जारी रही तो सौ रूपया एक डालर पौंड के बराबर हो जायेगा इसमें भी कोई आश्चर्य की बात नहीं है।


        हमारे देश में सब कुछ लुढ़क-फुढ़क रहा है। पूरा देश लुढ़कने की कगार पर है। हम आंतकवाद, नक्सलवाद की ओर लुढ़क रहे हैं। हममें क्षेत्रीयता, धार्मिकता, सांप्रदायिकता, जातियता की भावना लुढ़क गई है। हमारा राष्ट्रीय चरित्र भ्रष्टाचार में तर हो गया है। भ्रष्टाचार लुढ़क कर देशवासियों के खून में समा गया है।


        हमारे देश के राजनीतिज्ञों नीति निर्धारकों का चरित्र लुढ़काव की चरमसीमा पर है उनके चरित्र पतन के लुढ़कने का कोई मुकाबला नहीं कर सकता है उनका चाल, चरित्र, चेहरा,  सब कुछ लुढ़कना दर्शाता है।


        हमारे देश की सीमा में असुरक्षा लुढ़क गई है। सीमा के अंदर घुसकर आंतकवादी आकर गर्दन काटकर ले जाते हैं। हम अपनी सुरक्षा में कुछ कदम नहीं उठा पाते हैं देश की सीमा के अंदर घुसकर दुश्मनी ताकतें घुसपैठ करती हैं। हम शांति, एकता, अखण्डता, भाईचारा, विश्वशांति के नाम पर चुप रहते हैं। विदेशी, दुश्मनी ताकतें, देश के अंदर लुढ़ककर देशद्रोहियों के साथ मिलकर देश की एकता अखण्डता को खोखला कर रही है।


        हमारे देश में शिक्षा का स्तर लुढ़का है। शालीनता लुढ़की है, शुचिता लुढ़की है, अश्लीलता ने पैर पसारे हैं। सिनेमा, टी0व्ही0 सीरियल, इंटरनेट अश्लीलता, फूहड़ता परोस रही हैं। 


        हम अनैतिकता, असमाजिकता और असहिष्णुता की ओर लुढ़क रहे हैं। परिवार में बुजुर्ग बोझ और निर्जीव वस्तु बनते जा रहे हैं, उन्हें अब कोई अनुभव की किताब, दुआओं का बैंक, आशीर्वाद की खान मानने को तैयार नहीं हैं यही कारण है कि हम सामाजिक विघटन की ओर लुढ़ककर आश्रयगृह, वृद्धा आश्रम की ओर बढ़ रहे हैं।


        हमारे देश में इन्सानियत लुढ़की है। इन्सान लुढ़का है। ईमान लुढ़का है। ईमानदारी लुढ़की है। सब तरफ लुढ़कन का दौरा जारी है जो हमें आर्थिक परतंत्रता, राजनैतिक, पराधीनता, सामाजिक असमानता, नरक की हैवानियत की ओर ले जा रहा है। हम परतंत्र भारत की तरह गुलाम बनकर जातिवाद, अंध विश्वास की ओर पूर्व की तरह लुढ़कते, सरकते, फिसलते नजर आ रहे हैं। दहेज बालविवाह, घरेलू हिंसा, बलात्कार, गैंगरेप सभी समाज का आवश्यक अंग हो गये हैं।  
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  // बी0पी0एल0//

        हमारे देश में बी.पी.एल. शब्द बहुत लोकप्रिय है। इसमें देश के बडे-बडे नेता, धनी, कुबेर, जमींदार शामिल हैं, जो इसकी जमात में शामिल होकर इसका कार्ड बनवाकर गरीबों की सुख-सुविधाऐं, आनन्द प्राप्त करते हैं और उनका राशन अपने नाम से खाते हैं। उनके मिट्टी के तेल से अपने घर के चिराग जलाते हैं।


        बी.पी.एल. का अर्थ भी सबके लिये अलग-अलग हैं। अर्थशास्त्र में इसका अर्थ बिलो प्रापर्टी लाइफ है वो राजनीति शास्त्र में इसका तात्पर्य बिना पैंदी का लौटा है, जिसका अनुसरण शतप्रतिशत अनुयायी करते हैं।


        हमारे देश में नेताओं की लौटे की तरह लुढ़कने की इस आदत से तो सब परिचित हैं, लेकिन देश का आम आदमी भी इस लुडकन से प्रभावित हो गया है और वह भी जहां पैसा, सुविधा, फायदा, लाभ देखता है, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, क्षेत्रवाद, नरूलवाद, जातिवाद की फिसलन पर लुढ़क जाता है।


        नेताओं को तो जन्मसिद्व अधिकार ही वोट के लिये लुढ़कना है, लेकिन उनके लुढ़कने, खिसकने, फिसलने की कोई सीमा तय नहीं रहती है वो अनैतिकता की सीमा को भी लांग कर नहीं रूकते हैं।


        लेकिन हमारे देश में आम नागरिक को अपनी लुढ़कन पर नियंत्रण रखना चाहिये, उसे देश की अस्मिता को दांव पर लगाकर करणधारों की पड़ोसी देशों से दबने की सीमा तक नहीं लुढ़कना चाहिये, लेकिन वह भी नैतिकता, ईमानदारी, देशभक्ति को ताक पर रखकर ग्लेश्यिर के मजे लुढ़क कर ले रहा है।


        आज हम देश की फिसलन, लुढ़कन, डूबत के लिये एक-दूसरे को दोष दे रहे हैं। घूम फिरकर नेताओं पर बात आकर समाप्त कर देते हैं। सारा दोष, जिम्मा, जबावदारी उन पर डालकर अपना पडला झाड़ लेते हैं।


        ये नेता कौन हैं ये हमारी ही उपज हैं, हमारे ही नीतियों से उत्पन्न हुये हैं, हमारे ही चन्दे से ही इनकी पार्टी चलती है, हम ही चुनकर नेता बनाते हैं। हम ही इनके जनक हैं। हम जो करते हैं, हम जो चाहते हैं उसी के आधार पर यह नीति निर्धारित करते हैं फिर भी हम इनसे ही सबसे ज्यादा हैरान परेशान हैं और यह ही सबसे ज्यादा दागदार हैं।


        हम अपना चुनाव सही क्यों नहीं करते हैं। जब हमें चुनने का अवसर प्राप्त होता है तब हम सूरदास की तरह बनकर कंस का चुनाव कर देते हैं  और उसके बाद उसकी रावण नीति को लेकर रोते रहते हैं।


        यह अवश्य है कि हमारे पास चुनाव की सीमा नहीं हैं जितने खडे होते हैं सब दागी बागी होते हैं। लेकिन उनके सबसे कम बागी को चुनकर सुधारा जा सकता है अथवा सबमें से किसी को चुनकर भी अपना अभिमत दिया जा सकता है।


        हमारे देश की लुढ़कन, डूबत, फिसलन के लिये सब एक-दूसरे को दोष दे रहे हैं। सब एक-दूसरे का उत्तरदायी बता रहे हैं, लेकिन मौका मिलने पर कोई भी चौका मारने में पीछे नहीं है सब मौका मिलते ही फिसलने, लुढ़कने, खिसकने, उफनने, तैरने, डूबने, गोता लगाने में देर नहीं करते हैं।


        इसके बाद भी सबकी उंगलियां एक-दूसरे पर तनी हुई हैं। सबकी निगाहें एक-दूसरे को सक की निगाह से देख रहे हैं, लेकिन कोई भी अपनी तरफ ध्यान देकर देखने तैयार नहीं हैं। सब मेहनत, मजदूरी की जगह आराम की नौकरी के लिये जुगाड लगा रहे हैं। सरकारी नौकरी के लिये सिफारिश, लेन-देन के लिये तैयार रहते हैं। सब कानून व्यवस्था में छेद बनाकर अपनी जगह बनाना चाहते हैं।


        आज कोई भी ईमानदारी का हैलमेट पहनकर सदाचार का लायसैंस लेकर नैतिकता का सीमा कराकर चरित्र का रजिस्ट्रेशन करवाकर देशप्रेम का परिमिट लेकर देशभांति की फिटनिश के साथ चलना नहीं चाहता हैं।


        जिसे देखो वह बेईमानी की सड़क पर चलकर भ्रष्टाचार के वाहन में सवार होकर अनैतिकता की स्पीड से बैठकर विकास की मंजिल, समृद्वि, प्रगति की ट्रेन, सुख सुविधाओं की गाडी, धन का पहाण, ताजमहल या आशियाना चाहता हैं।


        वह जानता है कि ताजमहल अन्य से एक सुन्दरी स्त्री की कब्रगाह बस है, लेकिन वह लोगों की खूबसूरती, बुलन्दता, एश्वर्य, यश समान दिखाना चाहता है।

 
        इसलिये आवश्यक है कि हम सुधरें, अपने को सुधारे हम सुधरेगें तो समाज सुधरेगा, समाज सुधरेगा तो देश सुधरेगा। जब तक हम खुदको नहीं सुधारते तब तक हम किसी को सुधारने का भाषण, उपदेश भी नहीं दे सकते हैं।


        आज देश के तमाम धर्मगुरू, खाउ अफसर, उडाउ नेता सब हमारी देन हैं। इन भस्मासुर को हमने ही समाज में पैदा किया है, हमें ही इन्हें भस्म करना होगा। इसके लिये संपूर्ण समाज को शिव, विष्णू और मोहनी बनना पडेगा। दस रावन को जब एक राम मार सकता है तो देश के एकसौ बीस करोड राम इन चंद भस्मासुरों का अंत कर सकते हैं, अगर अगर उनके पीछे पड जायें तो यह भस्मासुर खुद अपने सिर पर अपना हाथ रखकर भस्म हो जायेंगे।

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