रविवार, 6 अक्तूबर 2013

ई-बुक: दशलक्षण धर्म - लेखक : महावीर सरन जैन - अध्याय 10 - ब्रह्मचर्य

10. ब्रह्मचर्य

विभिन्न संदर्भों में ब्रह्मचर्य शब्द का प्रयोग अलग अलग अर्थों में होता है। इस शब्द की लोक में विभिन्न समाजों, संस्कृतियों, देशों एवं कालों में विभिन्न मान्यताएँ रहीं हैं। संयस्त एवं गृहस्थ जीवन के मार्ग एवं लक्ष्य समान नहीं हैं। इस कारण संयासियों के लिए ब्रह्मचर्य के जो प्रतिमान हैं वे गृहस्थों पर लागू नहीं हो सकते। भारत में वैदिक ऋषियों ने वर्णाश्रम व्यवस्था के विधान के अंतर्गत जीवन को चार आश्रमों में बाँटा। ब्राह्मण के धार्मिक जीवन की चार अवस्थाओं के लिए विशिष्ट कर्तव्यों का विधान किया। पहले आश्रम को ब्रह्मचर्य नाम दिया तथा दूसरे आश्रम को गृहस्थ के नाम से अभिहित किया। ब्रह्मचर्य आश्रम में ब्रह्मचर्य व्रत के पालन को अनिवार्य माना। विभिन्न कालों में इंद्रिय सुखों के सम्बंध में सामाजिक मान्यताओं एवं धारणाओं में भी अंतर मिलता है। कहने का तात्पर्य यह है कि ब्रह्मचर्य के विवेचन का विषय विशद एवं गहन विचार की अपेक्षा करता है।

काम-वासना पर विजय प्राप्त करना अत्यत्न कठिन कार्य है। सामान्य व्यक्ति अपने जीवन से काम और वासना को निर्मूल नहीं कर पाता। मुनि एवं तपस्वी उग्र ब्रह्मचर्य व्रत धारण करते हैं। गृहस्थ यह व्रत नहीं ले पाता। इस कारण ब्रह्मचर्य को पारिभाषित करते समय उसके स्वरूप को अलग-अलग स्तरों पर समझना होगा।पहले ब्रह्मचर्य के प्रमुख अर्थों को जानना प्रासंगिक होगा।

(1) जैन दर्शन एवं जैन धर्म में ब्रह्मचर्य साधना का अंग भी है और सिद्धि की अवस्था भी। ब्रह्मचर्य शब्द से साधना के क्रमिक विकास के अनुरूप भिन्न अर्थ छायाओं का बोध होता हैः

(1) मैथुन के प्रति विरक्ति।

(2) इन्द्रियों की चंचलता की निवृत्ति।

(3) चित्त की भ्रान्ति की निवृत्ति।

(4) विषय-वासना आदि प्रवृत्तियों की इच्छा की निवृत्ति।

सिद्ध अवस्था में विशुद्ध चैतन्य का प्रकाशित होना ही ब्रह्मचर्य है। उस अवस्था में आत्म स्वरूप ब्रह्म में रमण करना ही ब्रह्मचर्य है। विषय तथा विषयी का भेद हट जाने पर, जब आत्म ब्रह्म का साक्षात्कार होता है, तब साधक अखण्ड महाव्रत ब्रह्मचर्य में स्थित रहता है। दश लक्षण धर्म के संदर्भ में ब्रह्मचर्य का अर्थ आत्म-ब्रह्म का आचरण है। साधक का आत्म-ब्रह्म में रत होना है। विषय वासनाओं में लीन मनुष्य धर्म के तत्व को नहीं पहचान पाता। जो मनुष्य वासना के प्रवाह से दूर आत्म-रूप भागीरथी के तट पर नहीं पहुँचता, वह संसार के प्रवाह में बहता रहता है। काम-भोगों से कर्मों का बंधन होता है। काम-भोगों की लालसा रखनेवाली प्राणी कभी तृप्त नहीं हो पाते।

हमारा अहंकार काम वासना की अतृप्ति को बढ़ाता है। आत्मभाव के आने पर व्यक्ति निष्कपट हो जाता है। वह अपने से कुछ छिपाता नहीं है। ऐसे व्यक्ति की सभी विषय-वासनाएँ आत्म चेतना के समक्ष आकर शान्त हो जाती हैं। वासनाओं की भूख बड़ी उत्कट है। देह-दमन के मार्ग से वासनाओें की भूख को नहीं मिटाया जा सकता। आध्यात्मिक दृष्टि से ब्रह्मचर्य की साधना के लिए रागद्वेष का परिहार, आत्मा एवं अनात्मा की भेद-प्रतीति तथा अध्यात्म योग की ओर अभिमुख होकर अपने को विषयों से बचाने का उत्तरोत्तर प्रयत्न करना चाहिए। इस दृष्टि से ब्रह्मचर्य केवल शुक्रसंयम मात्र नहीं है, अपितु यह आत्मब्रह्म में संचरण की अनवरत साधना है। आत्मा की ओर झाँककर, अन्तश्चेतना की ओर अभिमुख होकर, अचेतन मन की खोज करके, प्रत्येक प्रकार के अंतर्द्वन्द को चेतना की सतह पर लाना आवश्यक है। वासना को दबाना नहीं चाहिए। वासनाओं को दबाने से, वे चेतन मन से अचेतन मन में जाकर वहाँ और भी प्रगाढ़ रूप में बँध जाती हैं। जब तक वासनाएँ अचेतन मन के धरातल पर क्रियाशील रहती हैं तब तक कोई व्यक्ति, प्रयत्न करने पर भी उनसे मुक्त नहीं हो सकता। ऐसा व्यक्ति अज्ञानी होता है। वह उस जन्मान्ध व्यक्ति के समान होता है जो छिद्रवाली नौका पर चढ़कर नदी के किनारे पहुँचना चाहता है, किन्तु किनारा आने के पूर्व ही नदी के बीच जल-प्रवाह में डूब जाता है। जब व्यक्ति अहंकार छोड़ देता है, तभी वह आत्मा के द्वारा सत्य का अन्वेषण कर पाता है। उस स्थिति में वह आत्मा के द्वारा आत्मा का नियन्त्रण करता है। जिस प्रकार पुरानी एवं सूखी लकडि़यों को आग शीघ्र जला देती है, उसी प्रकार आत्म-निष्ठ साधक चेतना के धरातल पर अचेतन मन की वासनाओं को संयम, तप एवं त्याग की अग्नि के द्वारा जला देता है। सयोग केवली अयोग केवली बनने के लिए, अरहंत से सिद्ध होने के लिए संल्लेखना तप करता है। जब शरीर भारभूत हो जाता है तो वह उससे भी मुक्ति पाने का उपाय करता है। प्रशान्त एवं प्रसन्नचित्त आहार आदि का त्याग कर आत्मिक चिन्तन करते हुए समाधिस्थ हो जाता है तथा समाधि रमण की तैयारी करता है। मन वाणी एवं काया का निरोध, ‘सूक्ष्म-क्रिय-अप्रतिपाती-ध्यान’ की संज्ञा से अभिहित है। अभी भी श्वास-प्रश्वास जैसी सूक्ष्म क्रिया शेष रह जाती है।जब उसका भी निरोध हो जाता है तो ‘समुच्छिन्न-क्रिय-अनिवृत्ति ध्यान’ हो जाता है। साधक के अघातिया कर्म भी नष्ट हो जाते हैं। साधक अयोग केवली हो जाता है। वह अकर्मा हो जाता है, सिद्ध हो जाता है, मुक्त हो जाता है, कारण-परमात्मा-स्वरूप से कार्य-परमात्मा-स्वरूप हो जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से ब्रह्मचर्य आत्म-ब्रह्म का स्वभाव है।

आध्यात्मिक दृष्टि से अब्रह्मचर्य अधर्म का मूल है। पुरुष स्त्री समागम के प्रति अनुरक्ति का भाव संयम को खण्डित कर देता है। इन्द्रियों की चंचलता आत्मा को विषय-वासना की ओर प्रवृत्त करती है। चित्त का विक्षेप कषायों का रूप धारण कर लेता है।

(2)योग सम्प्रदाय में ब्रह्मचर्य वीर्य रक्षा की साधना है। योग विधि से वीर्य सुषुम्ना नाड़ी द्वारा ऊर्ध्वगामी होता है और ज्ञान-दीप्ति में परिणत हो जाता है। इसके लिए योगी के लिए प्रतिदिन विभिन्न आसन एवं प्राणायाम करने के निर्देश हैं। उदाहरणार्थ – आसन के अंतर्गत पश्चिमोत्तासन, सर्वांगासन, भद्रासन आदि एवं प्राणायाम के अंतर्गत कपालभाति, अनुलोम विलोम, भस्त्रिका आदि। योग परम्परा में ‘मरणं बिन्दु-पातेन’ कहकर बिन्दु पतन को मृत्यु तथा ‘जीवनं बिन्दु-धारणात्’ कहकर बिन्दु धारण को जीवन की संज्ञा दी गयी है। बिन्दु क्या है? गणित शास्त्र में जिस प्रकार वृत्त एवं त्रिकोण आदि का केन्द्र बिन्दु कहलाता है, उसी प्रकार योग एवं तन्त्र सम्प्रदायों में शरीर अथवा कोषों के केन्द्र को बिन्दु कहते हैं। शरीर का सबसे सूक्ष्म एवं सार भाग बिन्दु है। बिन्दु से रहित शरीर का अस्तित्व ही सम्भव नहीं है। इसमें प्राण एवं मन के चिद् अणु विद्यमान हैं। यौगिक विधान से इन्हें ऊर्जा (विद्युत शक्ति) में परिवर्तित किया जा सकता है।इससे अध्यात्म-शक्ति का पोषण होता है। आत्मा के साक्षात्कार के लिए आवश्यक शक्ति प्राप्त होती है। इस प्रकार ब्रह्मचर्य की प्रथम साधना बिन्दु का परिपाक है, जिसके द्वारा योगी ब्रह्म में स्थित होता है।अलग-अलग कोषों में उनके अलग-अलग केन्द्रों में अलग-अलग एक-एक बिन्दु होने का भी योग-सम्प्रदाय में विधान है। अग्निमय कोष का केन्द्र स्थूल बिन्दु है, जिसके आधार पर हमारा स्थूल शरीर प्रतिष्ठित है। प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय कोषों के आधार पर सूक्ष्म शरीर गठित होता है। इनके भी कोषगत केन्द्रों में एक-एक बिन्दु है। इसके बाद आनन्दमय कोष है। इसके केंन्द्र में जो बिन्दु है उसे ‘अमृत बिन्दु’ कहते हैं। शरीर, प्राण, मन एवं समस्त इन्द्रियों की प्रत्येक क्रिया का पोषक तत्व बिन्दु ही है। इन समस्त क्रियाओं के साथ बिन्दु का क्षरण होता है। बिन्दु के क्षरण को रोके बिना न तो स्थिरता सम्भव है, और न ऊर्ध्व गति की ओर उन्मुखता।

बिन्दु की दो दशाएँ हैं:

(1) अधोगमन।

(2) ऊर्ध्व गमन।

बिन्दु के अधोगमन से बिन्दु का स्खलन होता है। बिन्दु के ऊर्ध्वगमन से जीव का ब्रह्म के साथ मिलन का मार्ग प्रशस्त होता है। ब्रह्मचर्य की साधना में बिन्दु को प्रकाश रूप आत्मा के साथ एकीकृत करने का अभ्यास किया जाता है। इसके लिए पहले साधक स्थिर होता है। इंद्रिय मौन अर्थात् इंद्रिय निग्रह करता है। इस भूमिका पर योगी बिन्दु को स्थिर करते हैं। इसके बाद उसका शोधन करते हैं। वैदिक तथा तांत्रिक साधना में बिन्दु शोधन के अनेक उपाय वर्णित हैं।

पिण्ड में वर्तमान बिन्दु अपनी सूक्ष्म अवस्था में प्रकाश रूप है। ऊर्ध्वीकरण द्वारा बिन्दु को ऊर्जा में परिणत किया जाता है तथा परम- ऊर्जा को आत्मा में मिला दिया जाता है।ब्रह्मरंध्र में निष्फल ब्रह्म के साथ एक रूप होकर बिन्दु ही ब्रह्म हो जाता है।

यह कार्य अत्यन्त कठिन एवं दुष्कर है। ब्रह्मचर्य की साधना के द्वारा बिन्दु को इन्द्रियों के विषयों के जगत से पृथक् करके तथा पवित्र बनाकर ब्रह्ममार्ग में लगाया जाता है, जिससे व्यक्ति को संसार से मुक्ति मिलती है।

योगसूत्र में ब्रह्मचारी की अवस्था का वर्णन प्रकारान्तर से श्रद्धा रूप में किया गया है। ब्रह्मचर्य पालन से संरक्षित वीर्य का संचय होने पर शरीर के अन्दर दिव्य-तेज अथवा दिव्य विद्युत ऊर्जा का विकास होता है। चित्त की चंचलता नष्ट हो जाती है। प्राणों की गति स्थिर हो जाती है। ध्येय की ओर ध्याता के चित्त का एकल प्रवाह उत्पन्न होता है। चित्त के समाहित होने पर ‘ध्येय’ आवरण मुक्त होकर उज्जवल रूप में अपनी ज्योति से उद्भासित एवं ज्योतित हो उठता है।

(3) जैन दर्शन एवं जैन धर्म तथा योग सम्प्रदाय के अतिरिक्त सभी आत्मिक धर्मों एवं दर्शनों में भी ब्रह्मचर्य का महत्व प्रतिपादित है। महाभारत के ‘सनत्सुजातपर्व’ में ब्रह्मचर्य को चतुष्पाद कहा गया है। उसके विवेचन से यह स्पष्ट है कि ब्रह्मचर्य का जितना सम्बन्ध स्त्री समागम से विरति, बिन्दु साधन एवं मनोजय से है, उससे अधिक ‘ब्रह्म’ की अनुभूति से है। ब्रह्मचर्य के द्वारा ही पर-ममत्व के परिहार का विधान है। इस प्रकार जो साधक विषयवासनाओं में प्रवृत्त अपनी इंद्रियों एवं अपने मन को ब्रह्मचर्य की आराधना के द्वारा आत्मा की ओर लगा लेता है, वह मुक्त हो जाता है। इसके बाद अन्य साधनों का महत्त्व नहीं रह जाता। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा- जैसे बड़े जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय की आवश्यकता नहीं रह जाती, वैसे ही ब्रह्मज्ञानी के लिए सर्व वेद निष्प्रयोजन हो जाते हैं।

यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके।

तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः।।(गीता, 2/46)

(4)गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के पूर्व विद्यार्जन करने वालों के लिए ब्रह्मचर्य से तात्पर्य इंद्रिय निग्रह एवं संयम पूर्ण जीवन व्यतीत करना है। इसके लिए सात्विक भोजन करना, सकारात्मक चिंतन करना, अपने साध्य एवं लक्ष्य को पूरा करने के लिए अपने मन को उनकी पूर्ति की दिशा में व्यस्त रखना आदि करणीय हैं। सामाजिक दृष्टि से विवाह के पूर्व ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। ब्रह्मचर्य का सम्बन्ध व्यक्ति की मानसिकता से है। यौवन काल के आने पर जब शरीर की अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ क्रियाशील होती हैं, तो पुरुषों को स्वप्नदोष हो सकता है। परन्तु यदि यह क्रिया प्रकृतिगत है, तो इससे चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। आज से पचास साल पहले वीर्य के स्खलित होने से उत्पन्न होने वाले दुष्परिणामों से इतना भयाक्रांत कर दिया जाता था कि स्वप्न दोष होने पर युवा यह धारणा बना लेता था कि उससे पाप कर्म हो गया है, इससे कमजोरी, थकान, दुर्बलता आ जाएगी। मन ही मन वह अपने को कोसता था। वैज्ञानिक अध्ययनों ने अब इस धारणा को बदल दिया है। यह जरूर है कि उसे कामुक एवं विकृत यौन व्यवहार एवं चिंतन के प्रति व्यस्त, संलिप्त एवं आसक्त नहीं होना चाहिए। संयम के साथ रहना सीखना चाहिए। मन को एकाग्र कर अपने कार्यों का निष्पादन करना चाहिए।

(5)गृहस्थ के लिए ब्रह्मचर्य के अलग अर्थ हैं। गृहस्थ जीवन में ब्रह्मचर्य का अर्थ परस्त्री का त्याग, अपनी पत्नी के द्वारा ही काम-वासना की संतुष्टि तथा कामभाव का संयमीकरण है संतानोपत्ति के लिए तथा पति एवं पत्नी के बीच प्रेम सम्बंध को स्थायित्व प्रदान करने के लिए शारीरिक सम्बंधों के साथ-साथ दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम, समर्पण, विश्वास, आस्था आदि भावों का होना जरूरी है। समाज में सबको यह शिक्षा मिलनी चाहिए कि प्रेम में जिस प्रकार सम्भोग का सुख प्राप्त करना जरूरी है उसी प्रकार दोनों का मानसिक धरातल पर एक दूसरे के प्रति एकात्म भाव की प्रतीति भी जरूरी है। मनुष्य का प्रेम पाशविक कृत्य नहीं है। केवल शारीरिक मिलन नहीं है। मनुष्य ने प्रेम सम्बंधों में परस्पर आस्था, विश्वास, स्नेह, प्रसन्नता, उल्लास, मुदिता, सुख, संतोष तथा अनुराग को परिव्याप्त किया है। इन गुणों के विकास के कारण पति एवं पत्नी के जीवन में कलह, तनाव, संघर्ष की स्थितियाँ पैदा नहीं होतीं। इसके विपरीत उन्हें अतीव मानसिक सुख एवं तृप्ति का अनुभव होता है। पति एवं पत्नी के बीच कामकला के महत्व एवं सत्ता की अनिवार्यता को नकारा नहीं जा सकता। मध्य युग में सम्भोग या सेक्स को घृणित कृत्य माना गया। नारी को समस्त दुर्गुणों की खान, पाप की हेतु एवं पतन की जड़ जैसे विशेषण प्रदान किए गए। जिस प्रक्रिया के कारण हमारी, आपकी, प्राणी मात्र की सत्ता और अस्तित्व है वह प्रक्रिया घृणित और त्याज्य कैसे मानी जा सकती है। सम्भोग या सेक्स सम्पूर्ण सृष्टि का कारक है। इसकी वैज्ञानिक ढंग से विवेचना होनी चाहिए। इस प्रक्रिया में संयम के महत्व तथा इस प्रक्रिया में सुख-प्राप्ति की समय सीमा को बढ़ाने के उपायों के बारे में शिक्षा देने की आवश्यकता है। यह रेखांकित करने की जरूरत है कि सम्भोग क्रिया में शरीर और मन दोनों मिलने चाहिएँ। यह मानवीय कृत्य है; अपने शरीर की भूख मिटाने के लिए पाशविक कृत्य नहीं है। इस संदर्भ में, मैं विद्वानों का ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहता हूँ कि मध्य युग के पहले भारत में ‘ काम ' को हेय दृष्‍टि से नहीं देखा जाता था। इसे जीवन के लिए उपादेय एवं श्रेयस्‍कर माना जाता था। मेरे इस कथन की प्रामाणिकता के लिए आप खजुराहो में पाषाण खंडों में उत्‍कीर्ण करने वाले नर - नारी युग्‍मों के कलात्‍मक शिल्‍प वैभव पर तटस्थ भाव से चिंतन मनन करें। इनमें समर्पण भाव से अभिभूत एकीभूत आलिंगन के फलीभूत पृथकता के द्वैत भाव को मेटकर तन - मन की एकचित्‍तता, मग्‍नता एवं एकात्‍मता में अस्‍तित्‍व के हेतु भोग से प्राप्‍त ‘ कामानन्‍द ' की स्‍थितियाँ अंकित हैं। इस प्रकार के मिथुन युग्‍मों का शिल्‍पांकन न केवल खजुराहो अपितु कोणार्क, भुवनेश्‍वर एवं पुरी आदि अनेक देव मन्‍दिरों में भी हुआ है।

पाश्‍चात्‍य विचारणा में नर - नारी के दैहिक मिलन को ही सेक्‍स, काम, प्रेम का आधार माना गया है। प्रेम शरीर से ही आरम्‍भ होता है। शरीर ही प्रेम की जन्‍मभूमि है। जिन पाश्‍चात्‍य चिन्‍तकों ने ‘सेक्‍स' पर विचार किया है उनमें निम्‍नलिखित चिन्‍तकों के नाम अधिक महत्‍वपूर्ण हैं -

1.सिग्‍मंड फ्रायड (1856 – 1939)

2.डी.एच.लारेंस (1885 – 1930)

3.अल्‍फ्रेड चार्ल्‍स किंजी (1894 – 1956)

4.माइकेल फकोल्‍ट (1929 – 1984)

पाश्‍चात्‍य चिन्‍तकों के सेक्‍स सम्‍बंधी चिन्‍तन का सार यह है कि सेक्‍स नर नारी का शारीरिक मिलन है। सेक्‍स दैहिक, सांसारिक एवं स्‍थूल कर्म है। सेक्‍स नर नारी के बीच रुधिर का संवाद है अथवा रुधिर की ऊष्‍मा से परिणत सहज सम्‍भोग है। सम्‍भोग की सहज वृत्‍ति से भयभीत होना, सम्‍भोग की सहज वृत्‍ति से पलायन करना, सम्‍भोग की सहज वृत्‍ति से विमुख होना अस्‍वास्‍थकर है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि सेक्‍स सम्‍बंधी पाश्‍चात्‍य चिन्‍तन कामाकुल ऐन्द्रीय संवेगों की शारीरिक वास्‍तविकता के चारों ओर चक्‍कर लगाता है।

भारतीय चिन्‍तन में ‘काम' को उसके समग्र स्‍वरूप में स्‍वीकार किया गया है एवं उसे सम्‍मान भी दिया गया है। धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की चार उपलब्‍धियों में से एक उपलब्‍धि ‘काम' भी है किन्‍तु उसका स्‍थान धर्म एवं अर्थ के बाद है तथा काम ही जीवन की मंजिल नहीं है, उसकी एकान्‍तिक सत्‍ता नहीं है। काम के बाद मोक्ष की दिशा में उन्‍मुख होना है। धर्म से विवेक प्राप्‍त होता है, संयम प्राप्‍त होता है, दायित्‍व बोध होता है, कर्तव्‍य पालन होता है। अर्थ व्‍यक्‍ति को पुरुषार्थी, सम्‍पन्‍न, समर्थ, सक्षम बनाता है। इसके बाद ही गार्हस्‍थ जीवन का विधान है जिसमें पुरुष एवं स्‍त्री के बीच प्रजनन के पावन उद्‌देश्‍य से मर्यादित काम का प्रेम में पर्यवसान होता है। प्रेम प्रसंगों के गति पथ की सीमा शरीर पर आकर रुक नही जाती, शरीर के धरातल पर ही निःशेष नहीं हो जाती अपितु प्रेममूलक ऐन्द्रिय संवेगों की भावों में परिणति और भावों का विचारों में पर्यवसान तथा विचारों एवं प्रत्‍ययों का पुनः भावों एवं संवेगों में रूपान्‍तरण - यह चक्र चलता रहता है। काम ऐन्‍द्रिय सीमाओं से ऊपर उठकर अतीन्‍द्रिय उन्‍नयन की ओर उन्‍मुख होता है। प्रेम शरीर में जन्‍म लेता है लेकिन वह ऊर्ध्‍व गति धारण कर प्रेमी प्रेमिका के मन के आकाश की ओर उड्‌डीयमान होता है।

भारतीय पौराणिक मान्‍यता के अनुसार काम ही कामदेव हैं और उनकी पत्‍नी रति हैं। काम और रति के सहयोग से संसृति का आकार बनता है। ये दोनों सृष्‍टि के पूर्व विद्‌यमान थे। इन्‍हीं से सृष्‍टि के समस्‍त पदार्थ उत्‍पन्‍न हुए। प्रश्‍नोपनिषद्‌ में वर्णित है कि कात्‍यायन कबंधी के आचार्य पिप्‍पलाद से यह प्रश्‍न करते हैं कि सृष्‍टि में जो कुछ दृष्‍टिगोचर है वह आदि में किससे उत्‍पन्‍न हुआ। इसका उत्तर आचार्य ने निम्न शब्दों में दिया -

तस्‍मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापतिः।

स तपोऽतप्‍यत स तपस्‍तप्‍त्‍वा स मिथुनमुत्‍पादयत।

रयिं च प्राणं चेत्‍येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्‍यत इति।

(अधीश्‍वर प्रजापति को जब प्रजा उत्‍पन्‍न करने की कामना हुई तो उन्‍होने तप किया। तप के बाद उन्‍होंने ‘मिथुन' - द्वित्‍व, युग्‍म, जोड़ा - उत्‍पन्‍न किया। यह मिथुन रयि = रति एवं प्राण = काम है। यही मेरी विविध प्रकार की प्रजा उत्‍पन्‍न करेंगे। ) काम प्राण शक्‍ति एवं रयि रति शक्‍ति के प्रतीक हैं।

भारतीय साधना का यह वैशिष्‍ट्‌य है कि यह काम का पर्यवसान मोक्ष में मानती है। कामाध्‍यात्‍म काम = भोग एवं अध्‍यात्‍म = मोक्ष का एकीकरण है जो सिद्धों का मार्ग है। भारतीय तंत्र साधना का सार है कि रति के आनन्‍द से, कामानन्‍द से, संभोग के आनन्‍द से ब्रह्मानन्‍द की प्राप्‍ति सम्‍भव है। इसके लिए तांत्रिक योग का आश्रय लेते हैं जिसका फलितार्थ होता है कि साधारण अवस्‍था में तो जगत के जीव जन्‍तु अधोलिंग ही रहते हैं, कुण्‍डलिनी शक्‍ति के प्रबुद्‌ध होने पर ये ऊर्ध्‍वलिंग के रूप में आ सकते हैं अर्थात्‌ कुण्‍डलिनी शक्‍ति के उद्‌बोधन के बिना जीव की ऊर्ध्‍वगति नहीं हो सकती। इस सम्बंध में पहले संकेत किया जा चुका है।

ब्रह्मचर्य की विरोधी स्थितियाँ हैं : काम का उदय होना, काम की इच्छा होना, काम के प्रति आसक्ति होना, कामाचार, इन्द्रियों की चंचलता, चित्त का विपेक्ष, तथा भौतिक सुखों को वास्तविक मानना। गृहस्थ की दृष्टि से परस्त्री के प्रति काम-प्रवृत्ति का उदय ब्रह्मचर्य अवस्था का पतन है।

ब्रह्मचर्य की साधना के लिए शारीरिक दृष्टि से आहार का विवेक एवं मलशुद्धि आवश्यक है। विवाह पूर्व जीवन में ऐसे भोजन से बचना चाहिए जो गरिष्ठ हो तथा विषय वासनाओं को उभारने वाला हो। वासना पर संयम के लिए दैनिक जीवन में योग-साधनों का अभ्यास एवं ध्यान भी आवश्यक है। विवाह के पश्चात भी व्यक्ति को चाहिए कि वह अपनी पाशविक वृत्तियों को संयमित करे। प्रेम केवल देह-कृत्य नहीं है। भावात्मक लगाव एवं आकर्षण से ही प्रेम सम्बन्धों में स्थायित्व आ सकता है।

मनोविज्ञान भी अब मानने लगा है कि मानस का क्षेत्र केवल मन तक ही सीमित नहीं है। मनोविज्ञान के क्षेत्र में भारतीय मनीषियों ने मन से अधिक सूक्ष्म प्रत्ययों का अविष्कार किया है। महर्षि अरविंद ने मनो चेतना के ऊर्ध्व रूप को ‘अतिमानस’ की संज्ञा दी है। मनोचेतना के विकास में मन के आधार से चेतना का ऊर्ध्व आरोहण सम्भव है। मन की प्रवृत्तियों का उन्नयन या उदात्तीकरण ही ब्रह्मचर्य है। चेतना का ऊर्ध्व-आरोहण ही मनोवैज्ञानिक दृष्टि से ब्रह्मचर्य है।

लोक जीवन में ब्रह्मचर्य के पालन के लिए किसी महान लक्ष्य की प्राप्ति की तीव्र आकांक्षा एवं मनोभिलाषा एवं महनीय आदर्श और संयम की आवश्यकता है। संयम के द्वारा व्यक्ति चेतन-मन के धरातल पर प्रवृत्तियों का आत्म नियन्त्रण कर व्यक्तित्व का विकास कर पाता है, इसके सम्बन्ध में विवेचना की जा चुकी है। मन के अहंकार के विगलित होने पर हम दमित तथा उद्दाम काम वासना को पहचान पाते हैं तथा संयम के द्वारा उसको नियंत्रित कर पाते हैं। स्वच्छंद, उन्मुक्त एवं संयम हीन कामाचरण से मनुष्य न तो अपना कल्याण कर सकता है और न समाज का।

जब तक व्यक्ति इंद्रियों पर नियन्त्रण नहीं कर पाता, तब तक सम्भोग के सुख को भी पूर्णतया के साथ नहीं भोग पाता। जब व्यक्ति प्रेम में एकनिष्ठता का आचरण नहीं करता, मधुकरीवृत्ति अपना लेता है तो वह मनुष्य से पशु के धरातल पर उतर आता है। मन की कोमल वृत्तियाँ तथा उसकी सौन्दर्य-चेतना नष्ट भ्रष्ट हो जाती है। ऐसी स्थिति में वह प्रेम सम्बन्धों के मानसिक तोष अर्थात हार्दिक आनन्द का कभी भी अनुभव नहीं कर सकता।

सामाजिक व्यवस्था के लिए ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है। जब आदिम मनुष्य जंगली जीवन जीता होगा, तब उन्मुक्त यौनाचार करता होगा। जीवन में कोई व्यवस्था न होगी। सुरक्षा की कोई भावना न होगी। परस्पर मिलजुलकर रहने की कोई आवश्यकता न होगी।

मानव सभ्यता के क्रमिक विकास के साथ, जब मनुष्य ने समाज की रचना की, सामाजिक सदस्यों ने मिलजुलकर रहना सीखा, अपने अस्तित्व और आवश्यकताओें के अनुरूप दूसरों के अस्तित्व एवं उनकी आवश्यकताओं का अनुभव एवं आदर करना सीखा, तो परिवार संस्था ने जन्म लिया। परिवार में पति-पत्नी के सम्बन्ध स्थापित हुए तथा उनमें पवित्रता का भाव उत्पन्न हुआ।

पति द्वारा पत्नीत्व व्रत का पालन तथा पत्नी द्वारा पतिव्रत का पालन जहाँ दोनों के व्यक्तिगत जीवन में प्रेम, सन्तोष, विश्वास, अनुराग एवं आस्था की भावनाओं का निर्माण एवं विकास करता है, पारिवारिक जीवन में शान्ति, सद्भाव एवं परस्पर मिलजुलकर एकत्व की अनुभूति के साथ कार्य करने की भावनाओं का निर्माण करता है, वहीं सामाजिक जीवन की व्यवस्था को भी बनाए रखता है।

इस प्रकार ब्रह्मचर्य व्यक्तिगत जीवन में नैतिक मूल्यों की स्वीकृति तथा अनेक मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक समस्याओं का समाधान है। ब्रह्मचर्य आध्यात्मिक धरातल पर साधक का परमार्थ महाव्रत है तथा सिद्धि की चरम परिणति है। जिस प्रकार दान के प्रकारों में अभयदान सर्वोपरि दान है, ध्यान के प्रकारों में शुक्ल-ध्यान सर्वापरि ध्यान है, ज्ञान के प्रकारों में सर्वज्ञ ज्ञान सर्वोपरि ज्ञान है उसी प्रकार गुण समूहों में ब्रह्मचर्य सर्वोपरि गुण है, आत्मा की महत्तम निर्मलता है, साधक की आत्म-स्वरूप में प्रतिष्ठा है।

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अणेगा गुणा अहीणा भवंति एक्कंमि बंभचेरे।

एक ब्रह्मचर्य की साधना से अनेक गुण स्वतः प्राप्त हो जाते हैं।

स इसी, स मुणी, स संजए, स एव भिक्खु, जे सुद्धं चरइ बंभचेरं।

वही ऋषि है, वही मुनि है, वही भिक्खु है, जो शुद्ध ब्रह्मचर्य का पालन करता है।

जीवो बंभ जीवम्मि, चेव चरिया हविज्ज जा जदिणो।

तं जाण बंभचेरं, विमुक्कपरदेहतित्तिस्स ।।

जीव ही ब्रह्म है। देह की आसक्ति से मुक्त मुनि की आत्म-ब्रह्म के लिए जो चर्या है, वही ब्रह्मचर्य है।

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

(सेवा निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान)

123, हरि एन्कलेव, चाँदपुर रोड

बुलन्द शहर – 203 001

mahavirsaranjain@gmail.com

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