रविवार, 6 अक्तूबर 2013

ई-बुक: दशलक्षण धर्म - लेखक : महावीर सरन जैन - अध्याय 7 - तप

7. तप

इन्द्रिय सुखों के लिए व्यक्ति विषय-वासनाओं में लीन रहता है। आत्मा को भूल जाता है। अनात्मा को सब कुछ समझ बैठता है। पथ से भटक जाता है। लक्ष्य से दूर चला जाता है। मंजिल भूल जाता है। आत्म-चेतना राग-द्वेष से आवृत्त हो जाती है।

आत्मस्थ साधक तप के द्वारा साधना का उत्तरोत्तर विकास करता है, वृत्तियों का उत्तरोतर उदात्तीकरण करता है तथा उसका मन उत्तरोतर ऊर्ध्वगामी बनता है।

‘तप’ के कई अर्थ हैं। सामान्य अर्थ में ‘तप’ का अर्थ शरीर को कष्ट देना, शरीर को कृश करना तथा अनेक प्रकार की पीड़ायें सहन करना है। यह तप का शारीरिक अथवा बाह्य पक्ष है। किसी वासना की तृप्ति, कामना की पूर्ति या किसी तृष्णा के लिए किया गया ‘तप’ यथार्थ तप नहीं है। ‘तप’ का उद्देश्य समस्त कामनाओं का संवरण कर तृष्णा का निरोध तथा वासनाओं का हवन करना है। इस कारण जो तप भौतिक सुखों की प्राप्ति हेतु किया जाता है, वह ‘कुतप’ होता है।

आत्मिक दृष्टि से ‘तप’ दृढ़तापूर्वक की गयी कोई कृच्छ क्रिया या अनुष्ठान नहीं है, अपितु आत्मा के दोषों को निर्मूल करके उसे निर्मल बनाना है। इस दृष्टि से तप के अर्थ हैं- चमक, प्रज्वलन तथा परिष्कार। तप की आग में पूर्वबद्ध कर्मों का प्रज्वलन होता है। आत्मा अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप में चमकती है। जिस प्रकार शकुनी नाम का पक्षी अपने परों को फड़फड़ाकर उन पर लगी हुई धूल को झाड़ देता है उसी प्रकार तपस्या के द्वारा मुमुक्षु अपने आत्म-प्रदेशों पर लगी हुई कर्मरज को दूर कर देता है।

‘सत्य’ से आत्मा के प्रकाश के सम्बन्ध में व्यक्ति की समझ, अनुभूति एवं ललक गहरी होती है। क्षमा, मार्दव, आर्जव एवं शौच द्वारा साधक आत्मा पर अनात्मा के बन्धनों के कारणों को दूर करता है। साधक संयम के द्वारा अपने मन को शुद्ध चैतन्य-स्वरूप आत्मा में केन्द्रित करने की भूमिका बनाता है। साधक तप के द्वारा पूर्वबद्ध कर्मो का नाश करता है।

तप एवं संयम परस्पर पूरक हैं। ‘तप’ ज्ञान एवं विवेक के साथ करना चाहिए। ज्ञान एवं विवेक से लक्ष्य का बोध होता है, मंजिल स्पष्ट होती है। ‘तप’ द्वारा व्यक्ति उस मंजिल पर पहुँचता है। आध्यात्मिक साधना में साधक की मंजिल आत्म-दर्शन है। साधक ‘तप’ द्वारा करोड़ो जन्मों के संचित कर्मों को नष्ट कर देता है। जिस प्रकार नाग अपनी केंचुली को छोड़ देता है, उसी प्रकार आत्मस्थ साधक अपनी कर्मरज रूप केंचुली को झाड़ कर अलग कर देता है। साधक को मोक्ष प्राप्ति के लिए क्या करणीय है। इसके लिए उसे आत्मा से पूर्वबद्ध कर्मों को ध्वंस करना है। यह ध्वंस ही कर्मों की निर्जरणा या उनका पूर्ण क्षय है। नाव में जिस छेद से जल आ रहा है उस छेद को बंद कर देने पर बाहर से जल का आना रुक जाता है। नाव में पूर्व आगत जल का कुछ भाग बाह्य प्रभावों से स्वयं सूखता है, शेष को उलीचकर नाव के बाहर करना होता है, नाव को सुखाना होता है। यदि नाव के जल को बाहर न करें, नाव को न सुखाएँ तो नाव में पुनः छेद होने की स्थिति में बाहर से जल आना पुनः आरम्भ हो जाता है।

तप के प्रभाव से कर्मों की निर्जरा होती है। निर्जरण, क्षपण, नाश, कर्मों के अभाव की प्राप्ति - ये सभी शब्द एकार्थवाची हैं:

तवसा उ निज्जरा इह, निज्जरणं खवण नासमेगट्ठा।

कम्मा भावापायणमिह, निज्जरमो जिणा विंति।। (आचार्य हरिभद्र सूरिः सावय पण्णत्ति, 82)

संयमी साधु पाप-कर्मों के द्वार को (अर्थात राग-द्वेष को) रोककर, तपस्या के द्वारा करोड़ों भवों के संचित कर्मों को नष्ट कर देता है:

एवं तु संजयस्सावि, पाव कम्म निरासवे।

भव कोडी संचियं कम्मं, तवसा णिज्जरिज्जई।। (उत्तराध्ययन, 30/6)

तप का महत्व सभी आत्मवादी दर्शनों तथा बौद्ध दर्शन में है। शब्दावली में अन्तर मिलता है। योग सम्प्रदायों में ‘तप’ को क्रिया योग का एक अंग माना जाता है। जैन दर्शन में तप जिस अर्थ में ग्रहण किया जाता है वह योग दर्शन में समाधि प्राप्ति तथा ‘प्रसंख्यान’ एवं ज्ञानाग्नि के प्रज्जवलित होने की स्थिति है। क्रिया योग द्वारा संस्कारों का स्थूल रूप नष्ट होता है। वह सूक्ष्म रूप धारण कर लेता है। समाधि की प्राप्ति से क्लेश क्षीण हो जाते हैं और ध्यान-अग्नि/प्रसंख्यान/ज्ञानाग्नि के द्वारा ये बीज दग्ध हो जाते हैं। जैन दर्शन में संवर में अकषाय में राग-द्वेष आदि विकार नष्ट हो जाते हैं। निर्जरा में उपशम की स्थिति में राग-द्वेष का उत्पादक मोह कर्म शान्त होता है। क्षय की स्थिति में बीजभूत कर्म-राशि भस्म बन जाती है। जैन शास्त्र का कथन है:-

नाणमयवायसहिओ, सीलुज्जलिओ तवो मओ अग्गी।

संसारकरणबीयं, दहइ दवग्गी व तणरासिं।।

(ज्ञानमयी वायु से सहित, शील द्वारा प्रज्जवलित की गई तप-रूपी अग्नि संसार के कारण एवं बीजभूत कर्म-राशि को इस प्रकार भस्म कर देती है, जिस प्रकार वायु के वेग से प्रचण्ड दावाग्नि तृण राशि को भस्म कर देती है)। (मरण समाधि (प्रकीर्णक), 134)

गीता में भी सात्विक तप के तीन प्रकारों की चर्चा है। (गीता, 17/ 14-16)

(1) शरीर तप - देवता, ब्राह्मण, गुरु एवं ज्ञानीजनों का पूजन तथा पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य एवं अहिंसा।

(2) वाड्.मय तप - उद्वेग रहित, प्रिय एवं हितकारी यथार्थ प्रवचन, वेद-शास्त्रों का अध्ययन एवं परमेश्वर के नाम जपने का अभ्यास।

(3) मानस तप - मन की प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवत्-चिन्तन करने का स्वभाव, मनोनिग्रह एवं अन्तःकरण की पवित्रता।

योगतंत्र मार्ग के काया-योग, हठ-योग, नाथ-योग, लय-योग, मंत्र-योग, प्राणापान-योग, कुण्डलिनी-योग, नाड़ी-योग, चन्द्र-सूर्य-योग, प्रणव-योग, राजयोग, आत्मयोग एवं ज्ञान-योग आदि विभिन्न सम्प्रदायों में व्यभिचार-निवृत्ति एवं विशुद्ध चैतन्य के प्रकाशित होने की विविध प्रक्रियाओं के विस्तृत वर्णन के साथ काया-शोधन हेतु परिमित आहार की विशद विवेचना, पवन योग में श्वास-प्रश्वास की साधना का विधान तथा पूरक, कुम्भक एवं रेचक प्राणायाम द्वारा सिद्धि की प्रक्रिया वर्णित है। शब्द-योग में मंत्र एवं अजपाजप का विधान है। ध्यान-योग में बीज मंत्र के जाप द्वारा योगमाया की जागृति, सुषुम्णा के मार्ग द्वारा त्रिपुटी संगम में स्नान करके गगन-मण्डल में पहुँचना, शिव-शक्ति के द्वारा कुण्डलिनी का बंधन, कुण्डलिनी शक्ति के महान तेज द्वारा शरीर में ताप का उत्पन्न होना तथा सुधा का स्राव होना आदि कर्मों का विस्तृत वर्णन है।

महर्षि पतंजलि ने अपने सूत्रों में योग के अष्टांगों की विवेचना की है - (1) यम (2) नियम (3) आसन (4) प्राणायाम (5) प्रत्याहार (6) धारणा (7) ध्यान (8) समाधि। ‘तप’ को ‘नियम’ के अन्तर्गत माना गया है - ‘शौच-सन्तोष-तपः - स्वाध्याय-ईश्वर- प्रणिधानानि नियमाः। हम ‘तप’ के जिस स्वरूप की विवेचना कर रहे हैं उस दृष्टि से ‘तप’ के अन्तर्गत आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा एवं ध्यान सभी आ जाते हैं। योग-साधना के लिए शारीरिक अवयवों के नियमित एवं निर्धारित व्यायाम आसन हैं। प्राणायाम से तात्पर्य श्वास-प्रश्वासों पर नियंत्रण कर मन के निरोध का अभ्यास है। अपने विषयों के सम्बन्ध से रहित होने पर, इन्द्रियों का नियंत्रण ‘प्रत्याहार’ है। इसके लिए अनेक साधनों का निर्देश है - (1) विपरीतकरणी-मुद्रा का अभ्यास (2) मूर्च्छा-प्राणायाम का अभ्यास (3) समाहित चित्त से एक लाख बीस हजार प्रणव जप (4) सिद्ध-आसन में नासिका के अग्र भाग पर निमेष-उन्मेष रहित दृष्टि का स्थिरीकरण (5) पद्यासन में अवस्थित होकर कुंभक प्राणायाम के द्वारा श्वासोच्छ्वास की गति को अवरूद्ध करना।

‘धारणा’ के द्वारा ध्याता किसी भी ध्येय में चित्त-वृत्तियों को केन्द्रित करता है।‘धारणा’ की सिद्धि विभिन्न मुद्राओं द्वारा होती है। मन की किसी एक निर्धारित विषय में एकाग्रता ‘ध्यान’ है।

जैन-शास्त्रों में तप को सबसे पहले दो भागों में बाँटा गया है -

(1) बाह्य-तप।

(2) आभ्यन्तर-तप या अन्तरंग-तप।

बाह्य-तप में शारीरिक क्रियाओं की तथा आभ्यन्तर-तप में मानसिक-क्रियाओं की प्रधानता है।

बाह्य तप-

बाह्य तप के 6 भेद हैं:-

1. अनशन

2. ऊनोदरी (अवमौदर्य)

3. विविक्त-शय्यासन

4. रस-परित्याग

5. काय-क्लेश

6. वृत्ति-परिसंख्यान

1. अनशन- सब प्रकार के आहारों का त्याग ही अनशन कहलाता है। अनशन से शरीर एवं प्राणों का मोह छूट जाता है। कोई व्यक्ति सहसा मृत्यु-पर्यन्त अनशन नहीं कर सकता। जीने के लिए आहार की आवश्यकता होती है। इस कारण साधक पहले समय की अवधि निश्चित करके उपवास करता है। एक दिन के उपवास से 6 माह तक का उपवास करता है। ऋषभदेव द्वारा एक वर्ष तक की कठोर तपोसाधना का विवरण मिलता है। अनशन प्रारम्भ करने के समय से लेकर मृत्यु-पर्यन्त अनशन ‘यावत्कथिक तप’ कहलाता है। जो साधक मृत्यु की आकस्मिक सम्भावना जानकर ‘यावत्कथिक तप’ करता है, उसे ‘अविचार’ तथा जब मृत्यु की तत्काल सम्भावना नहीं होती तथा साधक उत्साह एवं बल के साथ मृत्यु-पर्यन्त अनशन व्रत लेता है वह ‘सविचार’ कहलाता है।

2. ऊनोदरी- ऊनोदरी का अर्थ ‘अल्पाहार’ है। भूख से कम खाना, एकासन करना, इसके अन्तर्गत आता है!

3. विविक्त्त शय्यासन - विषयी जीवों के आवागमन वाले स्थानों को छोड़कर, एकान्त स्थान में रहना ही विविवत्त शय्यासन है।

4. रस-परित्याग- स्वाद वृत्ति पर इस तप द्वारा विजय प्राप्त की जाती है। इसके लिए वह घृत, दूध, दही, शक्कर, तेल, नमक एवं हरी वस्तुओं आदि पौष्टिक एवं सुस्वादु रसों का परित्याग करता है।

5. काय-क्लेश - यह ‘काया-शोधन’ सम्बन्धी तप का प्रकार है। इसके लिए वह विविध प्रकार के आसन करता है, जैसे-कायोत्सर्ग, उत्कट-आसन, वीरासन। वह धूप, शीत, वर्षा आदि बाधाओं को सहन करता है। शरीर का साज श्रृंगार नहीं करता। इस तप से देह के प्रति आसक्ति समाप्त हो जाती है। आत्मा एवं अनात्मा (पुद्गल) के भेद की प्रतीति होती है।

6. वृत्ति-परिसंख्यान - समय, क्षेत्र तथा अभिग्रह का निर्धारण करके पूर्व संकल्प के अनुसार आहार ग्रहण करना ‘वृत्ति-परिसंख्यान है।

आभ्यन्तर-तप –

इसके भी 6 भेद हैं -

1. प्रायश्चित

2. विनय

3. वैयावृत्य

4. उत्सर्ग

5. स्वाध्याय

6. ध्यान

1. प्रायश्चित - प्रमाद एवं असंयम से उत्पन्न दोषों के परिहार के लिए आलोचन, भविष्य में पुनः न करने की प्रतिज्ञा, गुरु के आदेशित दण्ड की स्वीकृति तथा तदनुरूप आचरण द्वारा चित्त-शोधन करना प्रायश्चित है।

2. विनय - धर्म रूपी वृक्ष का मूल विनय है। दर्शन, ज्ञान एवं चारित्र्य की साधना में प्रवृत्त रहना ही विनय तप है। ज्ञानी पुरुषों, सम्यग् दृष्टिजनों एवं चारित्र सम्पन्न व्यक्तियों के प्रति सम्मान, सत्कार तथा वन्दना करना इसी के अन्तर्गत आता है। ऐसा व्यक्ति अपने मन, वचन एवं काया की अशुभ प्रवृत्तियों को रोकता है तथा उन्हें श्रेयस्कर एवं लोक-मंगल के कार्यों में प्रवृत्त करता है।

3. वैयावृत्त्य- इसमें व्यक्ति अपने आत्मिक गुणों का विकास करता है तथा आचार्य, गुरुजनों, शास्त्रों, तपस्वियों, स्थविरों आदि पूज्य पात्रों तथा वृद्ध, रुग्ण, निर्बल आदि अशक्तों की सेवा करता है। इसी सेवा भावना के कारण उसमें समभाव एवं आत्मतुल्यता की दृष्टि विकसित होती है तथा त्याग की भावना जागृत होती है।

4. उत्सर्ग - शरीर के प्रति ममत्व का त्याग, अंतरंग-परिग्रह अर्थात क्रोध आदि कषायों का त्याग करना तथा संसार की किसी भी वस्तु को अपनी न मानना ‘उत्सर्ग’ है।

5. स्वाध्याय- धर्मशास्त्रों का अनुशीलन करना, शंकाओं को गुरुजनों से पूछना तथा समाधान के लिए उनके प्रति आभार प्रकट करना, उपार्जित ज्ञान को बार-बार दुहराना, सूत्रों के सम्बन्ध में अनुचिंतन करना तथा आत्मा की पूर्णता की ओर अग्रसर करने के लिए धर्मोपदेश करना स्वाध्याय के अंग हैं।

6. ध्यान - मन की एकाग्रता को ‘ध्यान’ कहा जाता है। किसी भी प्रकार के असद् विचार या विषय रूप ‘अप्रशस्त-ध्यान’ को त्याग कर इसके विरुद्ध ‘प्रशस्त-ध्यान’ में आत्मा को स्थिर करना वास्तविक ध्यान है। ध्यान को ‘परम-तप’ कहा गया है।

ध्यान के 4 भेद हैं -

1. आर्त ध्यान

2. रौद्र ध्यान

3. धर्म ध्यान

4. शुक्ल ध्यान

इनमें आर्त ध्यान एवं रौद्र ध्यान अशुभ हैं। अनिष्ट की प्राप्ति, इष्ट के वियोग, दुःखों की वेदना तथा भोग की अभिलाषाओं से जो कषायों को उत्पन्न करने वाला ध्यान किया जाता है, वह आर्त-ध्यान कहलाता है। चोरी, अपनी सम्पत्ति की रक्षा, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति तथा जीवों का घात करने के लिए चित्त की एकाग्रता ‘रौद्र ध्यान’ है। इस कारण ‘आर्त एवं ‘रौद्र’ ध्यान त्याज्य हैं, अनिष्ट कारक हैं। साधक को धर्म ध्यान एवं शुक्ल ध्यान की साधना करनी चाहिए। धर्म ध्यान चित्त-विशुद्धि का प्रारम्भिक अभ्यास है। ‘शुक्ल ध्यान’ में निरोध का अभ्यास परिपक्व हो जाता है। शुक्ल ध्यान के चार प्रकार हैं:-

1. पृथक्त्व वितर्क - सवीचार

2. एकत्व वितर्क - अवीचार

3. सूक्ष्म-क्रिय - अप्रतिपाती

4. समुच्छिन्न-क्रिय-अनिवृत्ति।

पहले प्रकार में शब्द, अर्थ, मन, वाणी के धरातलों पर पृथक-पृथक भेद-प्रधान ध्यान का अभ्यास दृढ़ होता है। दूसरे में इनका अभेद-प्रधान ध्यान होता है। इनके अभ्यास से साधक-आत्मा सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, वीतराग और अनन्त शक्ति-सम्पन्न हो जाती है। आयु का अन्त निकट आने पर क्रमशः मन, वाणी एवं काया का निरोध करता है। यह ‘सूक्ष्म-क्रिय-अप्रतिपाती ध्यान’ होता है। अभी भी श्वास-प्रश्वास जैसी सूक्ष्म क्रिया शेष रह जाती है। जब उसका भी निरोध हो जाता है तो इसे ‘समुच्छिन्न-क्रिय-अनिवृत्ति-ध्यान’ कहा जाता है।

निर्जरा के संदर्भ में तप का तत्त्वार्थ ‘शुक्ल ध्यान’ है। यही ध्यान-अग्नि है। संसारी जीव लोहा है। साधक के लिए निर्देश है कि वह तप की धोंकनी से सद्ध्यान की धधकती अग्नि प्रज्जवलित करे:

झाणं हवेइ अग्गी तवयरणं भत्तली समक्खादो।

जीवो हवेइ लोहं धम्मिदव्वो परम जोगीहिं।।

(ध्यान (वीतराग निर्विकल्प समाधि रूप) अग्नि है। संसारी जीव लोहा है। तपमयी धोंकनी के द्वारा धधकती अग्नि में योगी बनकर निज को स्वर्ण समान ज्योतिर्मयी शुचिमय बना लो)। (आचार्य कुंदकुंदः समयसार, 233)

‘तप’ का व्यक्ति की मानसिकता के साथ गहरा सम्बन्ध है। तप व्यक्ति की विचारधारा को प्रभावित करता है। तप व्यक्ति को भाग्यवादी नहीं बनाता, अपितु उसके पुरुषार्थ को जागृत करता है। तपस्वी-साधक अनुग्रह, अनुकम्पा तथा दया की भीख नहीं माँगता। वह अपने ही पुरुषार्थ के बल पर उच्चतम आध्यात्मिक विकास करता है। तप व्यक्ति को परावलम्बी नहीं बनाता, अपितु अपने पैरों के बल खड़ा होना सिखाता है।

‘तप’ द्वारा मन की गति बहिर्मुखी से अन्तर्मुखी तथा अधोमुखी से ऊर्ध्वमुखी होती है।

तप का महत्व केवल आत्मस्थ साधक के लिए ही नहीं है। इसका महत्व गृहस्थ के लिए भी है।जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्ति के लिए साधना करनी पड़ती है। साधना की प्रत्येक विधि तपोमूलक होती है। तप के द्वारा भाग्य की पूर्वलिखित रेखाओं को भी मिटाया जा सकता है। सृष्टि का आधार तप है। इसी के कारण शेषनाग पृथ्वी को धारण करते हैं। पार्वती की तपस्या प्रसिद्ध है, जिन्होंने बेल की सूखी पत्तियाँ भी खाना छोड़ दिया, जिसके कारण उनका नाम अपर्णा पड़ा। बिना तपस्या और साधना के कुछ प्राप्त नहीं होता। आधुनिक अस्तित्ववादी दर्शन भी यह मानता है कि व्यक्तित्व निर्माण के लिए स्वप्रयत्नों एवं कर्म का महत्व है। सार प्रकृति का निश्चित, आकारयुक्त, प्रयोजनशील निष्क्रिय तत्व है किन्तु अस्तित्व (Existence) चेतना सम्पन्न, क्रियाशील एवं अनिश्चित तत्व है, जो मनुष्य में परिलक्षित होता है। सृष्टि की यह चेतना सत्ता अपने चिन्तन एवं निर्णय के लिए पूर्ण स्वतन्त्र है।कला, साहित्य, राजनीति, विज्ञान प्रत्येक विषय-क्षेत्र में मूर्धन्य स्थान प्राप्त करने के लिए साधना अनिवार्य है। संगीतज्ञ अभ्यास करता है। वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में खो जाता है। ये लौकिक दृष्टि से तप के ही नामान्तर हैं।

इस प्रकार तप लौकिक दृष्टि से साधना में मन की एकाग्रता है तो आध्यात्मिक दृष्टि से वह अग्नि है, जिसमें मन के कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ), वासनायें, कल्मषतायें जल जाती हैं तथा आत्मा का शुद्ध चैतन्य-स्वभाव प्रदीप्त हो उठता है।

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तवेण परिसुज्झई।(तप से आत्मा शुद्ध होती है)।

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