ई-बुक: दशलक्षण धर्म - लेखक : महावीर सरन जैन - अध्याय 7 - तप

SHARE:

7. तप इन्द्रिय सुखों के लिए व्यक्ति विषय-वासनाओं में लीन रहता है। आत्मा को भूल जाता है। अनात्मा को सब कुछ समझ बैठता है। पथ से भटक जाता है।...

7. तप

इन्द्रिय सुखों के लिए व्यक्ति विषय-वासनाओं में लीन रहता है। आत्मा को भूल जाता है। अनात्मा को सब कुछ समझ बैठता है। पथ से भटक जाता है। लक्ष्य से दूर चला जाता है। मंजिल भूल जाता है। आत्म-चेतना राग-द्वेष से आवृत्त हो जाती है।

आत्मस्थ साधक तप के द्वारा साधना का उत्तरोत्तर विकास करता है, वृत्तियों का उत्तरोतर उदात्तीकरण करता है तथा उसका मन उत्तरोतर ऊर्ध्वगामी बनता है।

‘तप’ के कई अर्थ हैं। सामान्य अर्थ में ‘तप’ का अर्थ शरीर को कष्ट देना, शरीर को कृश करना तथा अनेक प्रकार की पीड़ायें सहन करना है। यह तप का शारीरिक अथवा बाह्य पक्ष है। किसी वासना की तृप्ति, कामना की पूर्ति या किसी तृष्णा के लिए किया गया ‘तप’ यथार्थ तप नहीं है। ‘तप’ का उद्देश्य समस्त कामनाओं का संवरण कर तृष्णा का निरोध तथा वासनाओं का हवन करना है। इस कारण जो तप भौतिक सुखों की प्राप्ति हेतु किया जाता है, वह ‘कुतप’ होता है।

आत्मिक दृष्टि से ‘तप’ दृढ़तापूर्वक की गयी कोई कृच्छ क्रिया या अनुष्ठान नहीं है, अपितु आत्मा के दोषों को निर्मूल करके उसे निर्मल बनाना है। इस दृष्टि से तप के अर्थ हैं- चमक, प्रज्वलन तथा परिष्कार। तप की आग में पूर्वबद्ध कर्मों का प्रज्वलन होता है। आत्मा अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप में चमकती है। जिस प्रकार शकुनी नाम का पक्षी अपने परों को फड़फड़ाकर उन पर लगी हुई धूल को झाड़ देता है उसी प्रकार तपस्या के द्वारा मुमुक्षु अपने आत्म-प्रदेशों पर लगी हुई कर्मरज को दूर कर देता है।

‘सत्य’ से आत्मा के प्रकाश के सम्बन्ध में व्यक्ति की समझ, अनुभूति एवं ललक गहरी होती है। क्षमा, मार्दव, आर्जव एवं शौच द्वारा साधक आत्मा पर अनात्मा के बन्धनों के कारणों को दूर करता है। साधक संयम के द्वारा अपने मन को शुद्ध चैतन्य-स्वरूप आत्मा में केन्द्रित करने की भूमिका बनाता है। साधक तप के द्वारा पूर्वबद्ध कर्मो का नाश करता है।

तप एवं संयम परस्पर पूरक हैं। ‘तप’ ज्ञान एवं विवेक के साथ करना चाहिए। ज्ञान एवं विवेक से लक्ष्य का बोध होता है, मंजिल स्पष्ट होती है। ‘तप’ द्वारा व्यक्ति उस मंजिल पर पहुँचता है। आध्यात्मिक साधना में साधक की मंजिल आत्म-दर्शन है। साधक ‘तप’ द्वारा करोड़ो जन्मों के संचित कर्मों को नष्ट कर देता है। जिस प्रकार नाग अपनी केंचुली को छोड़ देता है, उसी प्रकार आत्मस्थ साधक अपनी कर्मरज रूप केंचुली को झाड़ कर अलग कर देता है। साधक को मोक्ष प्राप्ति के लिए क्या करणीय है। इसके लिए उसे आत्मा से पूर्वबद्ध कर्मों को ध्वंस करना है। यह ध्वंस ही कर्मों की निर्जरणा या उनका पूर्ण क्षय है। नाव में जिस छेद से जल आ रहा है उस छेद को बंद कर देने पर बाहर से जल का आना रुक जाता है। नाव में पूर्व आगत जल का कुछ भाग बाह्य प्रभावों से स्वयं सूखता है, शेष को उलीचकर नाव के बाहर करना होता है, नाव को सुखाना होता है। यदि नाव के जल को बाहर न करें, नाव को न सुखाएँ तो नाव में पुनः छेद होने की स्थिति में बाहर से जल आना पुनः आरम्भ हो जाता है।

तप के प्रभाव से कर्मों की निर्जरा होती है। निर्जरण, क्षपण, नाश, कर्मों के अभाव की प्राप्ति - ये सभी शब्द एकार्थवाची हैं:

तवसा उ निज्जरा इह, निज्जरणं खवण नासमेगट्ठा।

कम्मा भावापायणमिह, निज्जरमो जिणा विंति।। (आचार्य हरिभद्र सूरिः सावय पण्णत्ति, 82)

संयमी साधु पाप-कर्मों के द्वार को (अर्थात राग-द्वेष को) रोककर, तपस्या के द्वारा करोड़ों भवों के संचित कर्मों को नष्ट कर देता है:

एवं तु संजयस्सावि, पाव कम्म निरासवे।

भव कोडी संचियं कम्मं, तवसा णिज्जरिज्जई।। (उत्तराध्ययन, 30/6)

तप का महत्व सभी आत्मवादी दर्शनों तथा बौद्ध दर्शन में है। शब्दावली में अन्तर मिलता है। योग सम्प्रदायों में ‘तप’ को क्रिया योग का एक अंग माना जाता है। जैन दर्शन में तप जिस अर्थ में ग्रहण किया जाता है वह योग दर्शन में समाधि प्राप्ति तथा ‘प्रसंख्यान’ एवं ज्ञानाग्नि के प्रज्जवलित होने की स्थिति है। क्रिया योग द्वारा संस्कारों का स्थूल रूप नष्ट होता है। वह सूक्ष्म रूप धारण कर लेता है। समाधि की प्राप्ति से क्लेश क्षीण हो जाते हैं और ध्यान-अग्नि/प्रसंख्यान/ज्ञानाग्नि के द्वारा ये बीज दग्ध हो जाते हैं। जैन दर्शन में संवर में अकषाय में राग-द्वेष आदि विकार नष्ट हो जाते हैं। निर्जरा में उपशम की स्थिति में राग-द्वेष का उत्पादक मोह कर्म शान्त होता है। क्षय की स्थिति में बीजभूत कर्म-राशि भस्म बन जाती है। जैन शास्त्र का कथन है:-

नाणमयवायसहिओ, सीलुज्जलिओ तवो मओ अग्गी।

संसारकरणबीयं, दहइ दवग्गी व तणरासिं।।

(ज्ञानमयी वायु से सहित, शील द्वारा प्रज्जवलित की गई तप-रूपी अग्नि संसार के कारण एवं बीजभूत कर्म-राशि को इस प्रकार भस्म कर देती है, जिस प्रकार वायु के वेग से प्रचण्ड दावाग्नि तृण राशि को भस्म कर देती है)। (मरण समाधि (प्रकीर्णक), 134)

गीता में भी सात्विक तप के तीन प्रकारों की चर्चा है। (गीता, 17/ 14-16)

(1) शरीर तप - देवता, ब्राह्मण, गुरु एवं ज्ञानीजनों का पूजन तथा पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य एवं अहिंसा।

(2) वाड्.मय तप - उद्वेग रहित, प्रिय एवं हितकारी यथार्थ प्रवचन, वेद-शास्त्रों का अध्ययन एवं परमेश्वर के नाम जपने का अभ्यास।

(3) मानस तप - मन की प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवत्-चिन्तन करने का स्वभाव, मनोनिग्रह एवं अन्तःकरण की पवित्रता।

योगतंत्र मार्ग के काया-योग, हठ-योग, नाथ-योग, लय-योग, मंत्र-योग, प्राणापान-योग, कुण्डलिनी-योग, नाड़ी-योग, चन्द्र-सूर्य-योग, प्रणव-योग, राजयोग, आत्मयोग एवं ज्ञान-योग आदि विभिन्न सम्प्रदायों में व्यभिचार-निवृत्ति एवं विशुद्ध चैतन्य के प्रकाशित होने की विविध प्रक्रियाओं के विस्तृत वर्णन के साथ काया-शोधन हेतु परिमित आहार की विशद विवेचना, पवन योग में श्वास-प्रश्वास की साधना का विधान तथा पूरक, कुम्भक एवं रेचक प्राणायाम द्वारा सिद्धि की प्रक्रिया वर्णित है। शब्द-योग में मंत्र एवं अजपाजप का विधान है। ध्यान-योग में बीज मंत्र के जाप द्वारा योगमाया की जागृति, सुषुम्णा के मार्ग द्वारा त्रिपुटी संगम में स्नान करके गगन-मण्डल में पहुँचना, शिव-शक्ति के द्वारा कुण्डलिनी का बंधन, कुण्डलिनी शक्ति के महान तेज द्वारा शरीर में ताप का उत्पन्न होना तथा सुधा का स्राव होना आदि कर्मों का विस्तृत वर्णन है।

महर्षि पतंजलि ने अपने सूत्रों में योग के अष्टांगों की विवेचना की है - (1) यम (2) नियम (3) आसन (4) प्राणायाम (5) प्रत्याहार (6) धारणा (7) ध्यान (8) समाधि। ‘तप’ को ‘नियम’ के अन्तर्गत माना गया है - ‘शौच-सन्तोष-तपः - स्वाध्याय-ईश्वर- प्रणिधानानि नियमाः। हम ‘तप’ के जिस स्वरूप की विवेचना कर रहे हैं उस दृष्टि से ‘तप’ के अन्तर्गत आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा एवं ध्यान सभी आ जाते हैं। योग-साधना के लिए शारीरिक अवयवों के नियमित एवं निर्धारित व्यायाम आसन हैं। प्राणायाम से तात्पर्य श्वास-प्रश्वासों पर नियंत्रण कर मन के निरोध का अभ्यास है। अपने विषयों के सम्बन्ध से रहित होने पर, इन्द्रियों का नियंत्रण ‘प्रत्याहार’ है। इसके लिए अनेक साधनों का निर्देश है - (1) विपरीतकरणी-मुद्रा का अभ्यास (2) मूर्च्छा-प्राणायाम का अभ्यास (3) समाहित चित्त से एक लाख बीस हजार प्रणव जप (4) सिद्ध-आसन में नासिका के अग्र भाग पर निमेष-उन्मेष रहित दृष्टि का स्थिरीकरण (5) पद्यासन में अवस्थित होकर कुंभक प्राणायाम के द्वारा श्वासोच्छ्वास की गति को अवरूद्ध करना।

‘धारणा’ के द्वारा ध्याता किसी भी ध्येय में चित्त-वृत्तियों को केन्द्रित करता है।‘धारणा’ की सिद्धि विभिन्न मुद्राओं द्वारा होती है। मन की किसी एक निर्धारित विषय में एकाग्रता ‘ध्यान’ है।

जैन-शास्त्रों में तप को सबसे पहले दो भागों में बाँटा गया है -

(1) बाह्य-तप।

(2) आभ्यन्तर-तप या अन्तरंग-तप।

बाह्य-तप में शारीरिक क्रियाओं की तथा आभ्यन्तर-तप में मानसिक-क्रियाओं की प्रधानता है।

बाह्य तप-

बाह्य तप के 6 भेद हैं:-

1. अनशन

2. ऊनोदरी (अवमौदर्य)

3. विविक्त-शय्यासन

4. रस-परित्याग

5. काय-क्लेश

6. वृत्ति-परिसंख्यान

1. अनशन- सब प्रकार के आहारों का त्याग ही अनशन कहलाता है। अनशन से शरीर एवं प्राणों का मोह छूट जाता है। कोई व्यक्ति सहसा मृत्यु-पर्यन्त अनशन नहीं कर सकता। जीने के लिए आहार की आवश्यकता होती है। इस कारण साधक पहले समय की अवधि निश्चित करके उपवास करता है। एक दिन के उपवास से 6 माह तक का उपवास करता है। ऋषभदेव द्वारा एक वर्ष तक की कठोर तपोसाधना का विवरण मिलता है। अनशन प्रारम्भ करने के समय से लेकर मृत्यु-पर्यन्त अनशन ‘यावत्कथिक तप’ कहलाता है। जो साधक मृत्यु की आकस्मिक सम्भावना जानकर ‘यावत्कथिक तप’ करता है, उसे ‘अविचार’ तथा जब मृत्यु की तत्काल सम्भावना नहीं होती तथा साधक उत्साह एवं बल के साथ मृत्यु-पर्यन्त अनशन व्रत लेता है वह ‘सविचार’ कहलाता है।

2. ऊनोदरी- ऊनोदरी का अर्थ ‘अल्पाहार’ है। भूख से कम खाना, एकासन करना, इसके अन्तर्गत आता है!

3. विविक्त्त शय्यासन - विषयी जीवों के आवागमन वाले स्थानों को छोड़कर, एकान्त स्थान में रहना ही विविवत्त शय्यासन है।

4. रस-परित्याग- स्वाद वृत्ति पर इस तप द्वारा विजय प्राप्त की जाती है। इसके लिए वह घृत, दूध, दही, शक्कर, तेल, नमक एवं हरी वस्तुओं आदि पौष्टिक एवं सुस्वादु रसों का परित्याग करता है।

5. काय-क्लेश - यह ‘काया-शोधन’ सम्बन्धी तप का प्रकार है। इसके लिए वह विविध प्रकार के आसन करता है, जैसे-कायोत्सर्ग, उत्कट-आसन, वीरासन। वह धूप, शीत, वर्षा आदि बाधाओं को सहन करता है। शरीर का साज श्रृंगार नहीं करता। इस तप से देह के प्रति आसक्ति समाप्त हो जाती है। आत्मा एवं अनात्मा (पुद्गल) के भेद की प्रतीति होती है।

6. वृत्ति-परिसंख्यान - समय, क्षेत्र तथा अभिग्रह का निर्धारण करके पूर्व संकल्प के अनुसार आहार ग्रहण करना ‘वृत्ति-परिसंख्यान है।

आभ्यन्तर-तप –

इसके भी 6 भेद हैं -

1. प्रायश्चित

2. विनय

3. वैयावृत्य

4. उत्सर्ग

5. स्वाध्याय

6. ध्यान

1. प्रायश्चित - प्रमाद एवं असंयम से उत्पन्न दोषों के परिहार के लिए आलोचन, भविष्य में पुनः न करने की प्रतिज्ञा, गुरु के आदेशित दण्ड की स्वीकृति तथा तदनुरूप आचरण द्वारा चित्त-शोधन करना प्रायश्चित है।

2. विनय - धर्म रूपी वृक्ष का मूल विनय है। दर्शन, ज्ञान एवं चारित्र्य की साधना में प्रवृत्त रहना ही विनय तप है। ज्ञानी पुरुषों, सम्यग् दृष्टिजनों एवं चारित्र सम्पन्न व्यक्तियों के प्रति सम्मान, सत्कार तथा वन्दना करना इसी के अन्तर्गत आता है। ऐसा व्यक्ति अपने मन, वचन एवं काया की अशुभ प्रवृत्तियों को रोकता है तथा उन्हें श्रेयस्कर एवं लोक-मंगल के कार्यों में प्रवृत्त करता है।

3. वैयावृत्त्य- इसमें व्यक्ति अपने आत्मिक गुणों का विकास करता है तथा आचार्य, गुरुजनों, शास्त्रों, तपस्वियों, स्थविरों आदि पूज्य पात्रों तथा वृद्ध, रुग्ण, निर्बल आदि अशक्तों की सेवा करता है। इसी सेवा भावना के कारण उसमें समभाव एवं आत्मतुल्यता की दृष्टि विकसित होती है तथा त्याग की भावना जागृत होती है।

4. उत्सर्ग - शरीर के प्रति ममत्व का त्याग, अंतरंग-परिग्रह अर्थात क्रोध आदि कषायों का त्याग करना तथा संसार की किसी भी वस्तु को अपनी न मानना ‘उत्सर्ग’ है।

5. स्वाध्याय- धर्मशास्त्रों का अनुशीलन करना, शंकाओं को गुरुजनों से पूछना तथा समाधान के लिए उनके प्रति आभार प्रकट करना, उपार्जित ज्ञान को बार-बार दुहराना, सूत्रों के सम्बन्ध में अनुचिंतन करना तथा आत्मा की पूर्णता की ओर अग्रसर करने के लिए धर्मोपदेश करना स्वाध्याय के अंग हैं।

6. ध्यान - मन की एकाग्रता को ‘ध्यान’ कहा जाता है। किसी भी प्रकार के असद् विचार या विषय रूप ‘अप्रशस्त-ध्यान’ को त्याग कर इसके विरुद्ध ‘प्रशस्त-ध्यान’ में आत्मा को स्थिर करना वास्तविक ध्यान है। ध्यान को ‘परम-तप’ कहा गया है।

ध्यान के 4 भेद हैं -

1. आर्त ध्यान

2. रौद्र ध्यान

3. धर्म ध्यान

4. शुक्ल ध्यान

इनमें आर्त ध्यान एवं रौद्र ध्यान अशुभ हैं। अनिष्ट की प्राप्ति, इष्ट के वियोग, दुःखों की वेदना तथा भोग की अभिलाषाओं से जो कषायों को उत्पन्न करने वाला ध्यान किया जाता है, वह आर्त-ध्यान कहलाता है। चोरी, अपनी सम्पत्ति की रक्षा, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति तथा जीवों का घात करने के लिए चित्त की एकाग्रता ‘रौद्र ध्यान’ है। इस कारण ‘आर्त एवं ‘रौद्र’ ध्यान त्याज्य हैं, अनिष्ट कारक हैं। साधक को धर्म ध्यान एवं शुक्ल ध्यान की साधना करनी चाहिए। धर्म ध्यान चित्त-विशुद्धि का प्रारम्भिक अभ्यास है। ‘शुक्ल ध्यान’ में निरोध का अभ्यास परिपक्व हो जाता है। शुक्ल ध्यान के चार प्रकार हैं:-

1. पृथक्त्व वितर्क - सवीचार

2. एकत्व वितर्क - अवीचार

3. सूक्ष्म-क्रिय - अप्रतिपाती

4. समुच्छिन्न-क्रिय-अनिवृत्ति।

पहले प्रकार में शब्द, अर्थ, मन, वाणी के धरातलों पर पृथक-पृथक भेद-प्रधान ध्यान का अभ्यास दृढ़ होता है। दूसरे में इनका अभेद-प्रधान ध्यान होता है। इनके अभ्यास से साधक-आत्मा सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, वीतराग और अनन्त शक्ति-सम्पन्न हो जाती है। आयु का अन्त निकट आने पर क्रमशः मन, वाणी एवं काया का निरोध करता है। यह ‘सूक्ष्म-क्रिय-अप्रतिपाती ध्यान’ होता है। अभी भी श्वास-प्रश्वास जैसी सूक्ष्म क्रिया शेष रह जाती है। जब उसका भी निरोध हो जाता है तो इसे ‘समुच्छिन्न-क्रिय-अनिवृत्ति-ध्यान’ कहा जाता है।

निर्जरा के संदर्भ में तप का तत्त्वार्थ ‘शुक्ल ध्यान’ है। यही ध्यान-अग्नि है। संसारी जीव लोहा है। साधक के लिए निर्देश है कि वह तप की धोंकनी से सद्ध्यान की धधकती अग्नि प्रज्जवलित करे:

झाणं हवेइ अग्गी तवयरणं भत्तली समक्खादो।

जीवो हवेइ लोहं धम्मिदव्वो परम जोगीहिं।।

(ध्यान (वीतराग निर्विकल्प समाधि रूप) अग्नि है। संसारी जीव लोहा है। तपमयी धोंकनी के द्वारा धधकती अग्नि में योगी बनकर निज को स्वर्ण समान ज्योतिर्मयी शुचिमय बना लो)। (आचार्य कुंदकुंदः समयसार, 233)

‘तप’ का व्यक्ति की मानसिकता के साथ गहरा सम्बन्ध है। तप व्यक्ति की विचारधारा को प्रभावित करता है। तप व्यक्ति को भाग्यवादी नहीं बनाता, अपितु उसके पुरुषार्थ को जागृत करता है। तपस्वी-साधक अनुग्रह, अनुकम्पा तथा दया की भीख नहीं माँगता। वह अपने ही पुरुषार्थ के बल पर उच्चतम आध्यात्मिक विकास करता है। तप व्यक्ति को परावलम्बी नहीं बनाता, अपितु अपने पैरों के बल खड़ा होना सिखाता है।

‘तप’ द्वारा मन की गति बहिर्मुखी से अन्तर्मुखी तथा अधोमुखी से ऊर्ध्वमुखी होती है।

तप का महत्व केवल आत्मस्थ साधक के लिए ही नहीं है। इसका महत्व गृहस्थ के लिए भी है।जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्ति के लिए साधना करनी पड़ती है। साधना की प्रत्येक विधि तपोमूलक होती है। तप के द्वारा भाग्य की पूर्वलिखित रेखाओं को भी मिटाया जा सकता है। सृष्टि का आधार तप है। इसी के कारण शेषनाग पृथ्वी को धारण करते हैं। पार्वती की तपस्या प्रसिद्ध है, जिन्होंने बेल की सूखी पत्तियाँ भी खाना छोड़ दिया, जिसके कारण उनका नाम अपर्णा पड़ा। बिना तपस्या और साधना के कुछ प्राप्त नहीं होता। आधुनिक अस्तित्ववादी दर्शन भी यह मानता है कि व्यक्तित्व निर्माण के लिए स्वप्रयत्नों एवं कर्म का महत्व है। सार प्रकृति का निश्चित, आकारयुक्त, प्रयोजनशील निष्क्रिय तत्व है किन्तु अस्तित्व (Existence) चेतना सम्पन्न, क्रियाशील एवं अनिश्चित तत्व है, जो मनुष्य में परिलक्षित होता है। सृष्टि की यह चेतना सत्ता अपने चिन्तन एवं निर्णय के लिए पूर्ण स्वतन्त्र है।कला, साहित्य, राजनीति, विज्ञान प्रत्येक विषय-क्षेत्र में मूर्धन्य स्थान प्राप्त करने के लिए साधना अनिवार्य है। संगीतज्ञ अभ्यास करता है। वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में खो जाता है। ये लौकिक दृष्टि से तप के ही नामान्तर हैं।

इस प्रकार तप लौकिक दृष्टि से साधना में मन की एकाग्रता है तो आध्यात्मिक दृष्टि से वह अग्नि है, जिसमें मन के कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ), वासनायें, कल्मषतायें जल जाती हैं तथा आत्मा का शुद्ध चैतन्य-स्वभाव प्रदीप्त हो उठता है।

-----------------------------------------------------------------

तवेण परिसुज्झई।(तप से आत्मा शुद्ध होती है)।

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: ई-बुक: दशलक्षण धर्म - लेखक : महावीर सरन जैन - अध्याय 7 - तप
ई-बुक: दशलक्षण धर्म - लेखक : महावीर सरन जैन - अध्याय 7 - तप
http://lh3.ggpht.com/-KEekY1QRp_c/UkHFOjRbiNI/AAAAAAAAWAU/ZOL0miOPYHc/image%25255B2%25255D.png?imgmax=800
http://lh3.ggpht.com/-KEekY1QRp_c/UkHFOjRbiNI/AAAAAAAAWAU/ZOL0miOPYHc/s72-c/image%25255B2%25255D.png?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2013/10/7.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2013/10/7.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content