शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013

शैलेन्द्र चौहान का आलेख - अंग्रेजी बनाम देशी पुस्तक

 

आज के युग में इंटरनेट सूचना प्रसार का सबसे बड़ा, लोकप्रिय और सशक्त माध्यम है। वर्तमान युग में इंटरनेट पर किसी भी सूचना को आसानी से प्राप्त करने के अवसर सुलभ हैं। नेट पर पुस्तकें, पत्रिकाएं और समाचार पत्र भी आसानी से पढ़े जा सकते हैं। माना जाता है कि नेट की वजह से आज पुस्तकों के पाठकों की संख्या कम हो गयी है लेकिन यह देखा गया है कि प्रायः प्रिंट माध्यम के पाठक और इंटरनेट के पाठक अलग-अलग होते हैं। जो लोग पुस्तक खरीद कर पढ़ने में रुचि रखते हैं उन्हें इंटरनैट पर उपलब्ध मूल्यरहित सामग्री भी अच्छी नहीं लगती और वे पुस्तक खरीदकर ही पढ़ते हैं। साथ ही लोग पुस्तकें इस लिये भी खरीदते हैं क्योंकि पुस्तकों का घर और पुस्तकालय में संकलन किया जा सकता है और जब चाहे उसे पढ़ा जा सकता है। पुस्तकों के प्रति लोगों की रुचि घटने का एक बड़ा कारण पुस्तकों का मूल्य है। इस महंगाई के दौर में किताब खरीदना पाठकों की जेब पर भारी पड़ रहा है। स्तरीय साहित्य अगर कम कीमत पर उपलब्ध हो तो पाठक इसे छोड़ना नहीं चाहते। वे श्रेष्ठ साहित्य को पढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर पाते। इसका उदहारण गत वर्ष प्रगति मैदान में आयोजित पुस्तक मेले में देखने को मिलता है। नौ दिवसीय इस मेले के अंतिम दिन शनिवार को कई प्रकाशकों ने किताबों पर भारी छूट दे दी थी, जिसके कारण खूब बिक्री हुई। कुछ स्टालों पर तो पुस्तकों की खरीद पर कपड़ों के सेल की तर्ज पर छूट दी गई। कहीं 20 व 50 रुपये में किताबों का बंडल था तो कहीं 100 रुपये चार किताबों का ऑफर। ऐसे स्टाल पर ग्राहकों की भारी भीड़ लगी थी। रीडर्स लाउंज में बैठकर लोग किताबें पढ़ रहे थे। जाहिर है कि पुस्तकों के पाठक आज भी हैं बशर्ते उचित मूल्य पर पुस्तकें उपलब्ध कराई जा सकें।

हिंदी पर अकादमिक जकड धीरे-धीरे कम होती जा रही है, वैचारिकता का आग्रह कम होता जा रहा है। इसलिए साहित्यिक मेलों, आयोजनों में हिंदी का स्पेस बढ़ रहा है, हिंदी लेखन में विविधता बढ़ रही है। आज अक्सर सुनने को आता है कि कविता के पाठक नहीं रहे और कविता का भविष्य खतरे में है । लेकिन इसके लिए कोई प्रमाण नहीं दिया जाता है। लोग मान कर चलते हैं कि पहले का युग कविता के लायक था, आज का युग विरोधी है। सच तो यह है कि पिछले पाँच सौ वर्षों से स्वयं अंग्रेजी में कविता को लेकर क्षमायाचना का भाव रहा है । दो सौ साल पहले शेली को कहना पड़ा कि कवि दुनिया के मान्यता विहीन विधायक हैं, और वे आज भी हैं । हिन्दी में खड़ी बोली का इतिहास महज सौ साल का है । एक समय था जब निराला,पंत और प्रसाद की पुस्तकें भी बहुत कम छपती और बिकती थीं । कवि सम्मेलनों की परम्परा ने अवश्य कविता को साधारण लोगों से जोड़ा पर वह भी धीरे धीरे फूहड़ हो गई।

कहते हैं कि कबीर और तुलसी आज भी लोकप्रिय हैं लेकिन आज कितने लोग तुलसीदास को काव्यप्रेम के कारण पढ़ते हैं। भक्ति भावना के अन्तर्गत धार्मिक आन्दोलनों के अंग के रूप में इन्हें अधिक प्रसार मिला। बाद में स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान मैथिलीशरणगुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी तथा दिनकर को लोकप्रियता मिली। प्रगतिशील आन्दोलन ने नागार्जुन, शील आदि को कुछ जनप्रियता दी,  लेकिन कुल मिलाकर कविता प्रेम के कारण कविता पढ़ने सुनने वाले हमेशा कम ही रहे। इसलिए आज भी यदि कविता के प्रति प्रेम कम है, तो कोई अनहोनी बात नहीं है । बहरहाल इस विषय में कवियों को गंभीरता से सोचना होगा कि ऐसा क्यों हैं आज कविता पाठकों के मन पर प्रभाव छोड़ पाने में अक्षम क्यों हो गई है? कहीं उनमें ही तो कोई कमी नहीं है?

भारत में प्रिंट मीडिया उद्योग लगातार विकास के पथ पर अग्रसर है और पिछले वित्त वर्ष की तुलना में चालू वित्त वर्ष में इसमें 6.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी इस बात का पुख्ता सबूत है। देश में पंजीकृत समाचारपत्रों की कुल संख्या 82 हजार 237 है। प्रेस की स्थिति के संबंध में जारी 55वीं वार्षिक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि भारत में प्रिंट मीडिया दिनोंदिन तरक्की कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार समाचारपत्रों के प्रकाशन के मामले में हिन्दी सभी भाषाओं पर भारी है। समाचारपत्रों के पंजीयक की ओर से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में पेश की गई रिपोर्ट में बताया गया है कि चालू वित्त वर्ष में प्रकाशित हो रहे हिन्दी समाचारपत्रों की संख्या 7,910 है। एक हजार 406 समाचारपत्रों के प्रकाशन के साथ अंग्रेजी दूसरे स्थान पर और 938 समाचारपत्रों के साथ उर्दू तीसरे स्थान पर है। गुजराती के 761, तेलुगु के 603, मराठी के 521, बांग्ला के 472, तमिल 272, ओडिया 245, कन्नड 200 और मलयालम के 192 समाचारपत्र प्रकाशित हो रहे हैं।

प्रसार संख्या के मामले में भी हिन्दी के अखबार अव्वल हैं। हिन्दी अखबारों की कुल प्रसार संख्या 15 करोड़ 54 लाख 94 हजार 770 है, जबकि अंग्रेजी के समाचारपत्रों की कुल प्रसार संख्या दो करोड़ 16 लाख 39 हजार 230 प्रतियां हैं।

वहीँ इंडियन रीडरशिप सर्वे का डाटा रिलीज हुआ है। उसके अनुसार हिंदी अखबार दैनिक जागरण लगातार पहले स्थान पर है। दैनिक जागरण की कुल पाठक संख्या 5.45 करोड़ बतायी गयी है। दूसरे नंबर है दैनिक भास्कर। दैनिक भास्कर की पाठक संख्या 3.19 करोड़ पाठकों के साथ वह देश का दूसरा सबसे बड़ा अखबार बना हुआ है। तीसरे नंबर पर हिन्दी का ही एक अखबार है - अमर उजाला। अमर उजाला के पाठकों की संख्या 2.87 करोड़ बतायी गयी है। चौथे नंबर पर भी हिन्दी का एक और अखबार दैनिक हिन्दुस्तान है। आईआरएस के आंकड़े बताते हैं कि कुल पाठक संख्या 2.67 करोड़ पहुंच गयी है। पांचवे स्थान पर मराठी दैनिक लोकमत काबिज है। लोकमत के  कुल पाठकों की संख्या 2.06 करोड़ पहुंच गयी है। छठे नंबर पर तमिल अखबार डेली थंथी के पाठकों की संख्या 2.04 करोड़ पर पहुंच गयी है। सातवें नंबर भी एक तमिल दैनिक दिनकरण है। दिनकरण के पाठकों की संख्या ताजा सर्वे के अनुसार 1.68 करोड़ है। आठवें स्थान पर पश्चिम बंगाल का बांग्ला दैनिक आनंद बाजार पत्रिका है। आनंद बाजार पत्रिका के पाठकों की संख्या 1.55 करोड़ है। नौंवे स्थान पर हिन्दी अखबार राजस्थान पत्रिका है. राजस्थान पत्रिका के कुल 1.4 करोड़ पाठक हैं। तेलुगु दैनिक इनाडु दसवें नंबर पर है। ईनाडु के पाठकों की संख्या 1.39 करोड़ है।

भारत के शीर्ष दस अखबारों में अंग्रेजी का एक भी अखबार शामिल नहीं है। अंग्रेजी के सबसे बड़े अखबार टाईम्स आफ इंडिया के पाठकों की संख्या 1.33 करोड़ है, जबकि दूसरे नंबर के अंग्रेजी के सबसे बड़े अखबार हिन्दुस्तान टाईम्स के पाठकों की संख्या 63.4 लाख है। हिन्दू तीसरे नंबर पर है और उसके पाठकों की संख्या 53.73 लाख है। 28.18 लाख पाठकों के साथ द टेलीग्राफ चौथे नंबर पर है। 27.68 लाख पाठकों के साथ डेक्कन क्रानिकल पांचवे नंबर पर है। छठे नंबर पर टाईम्स समूह के व्यावसायिक अखबार द इकोनामिक टाईम्स है। उसके कुल पाठकों की संख्या 19.17 लाख है। मुंबई से निकलनेवाला टैबलाइड मिड डे सातवें नंबर पर है। मिड-डे के पाठकों की संख्या 15.83 लाख है। आठवें नंबर पर द न्यू इंडियन एक्सप्रेस है जिसके पाठकों की संख्या 15.66 लाख है। मुंबई मिरर के पाठकों की संख्या 15.57 लाख है और वह नौवें नंबर पर है जबकि दसवें नंबर पर डीएनए है और उसके पाठकों की कुल संख्या 14.89 लाख है। हिंदी पर अकादमिक जकड धीरे-धीरे कम होती जा रही है, वैचारिकता का आग्रह  कम होता जा रहा है। इसलिए साहित्यिक मेलों, आयोजनों में हिंदी का स्पेस बढ़ रहा है, हिंदी लेखन में विविधता बढ़ रही है। भारतीय भाषाओं के बीच हिन्दी का विशेष महत्व है। हिन्दी के लेखक भी खासी बड़ी संख्या में हैं। हिन्दी भाषा में प्रकाशन भी बहुत होता है और हिन्दी में प्रकाशकों की संख्या भी अच्छी खासी है। हिन्दी में पत्रिकाएं बड़ी तादाद में निकलती हैं। इस दृष्टि से अन्य भाषाओं की तुलना में हिन्दी एक बहुप्रचलित भाषा है।

निश्चित रूप से हिंदी में साहित्य के पाठक कम हुए हैं । यह बात हिंदी के तमाम प्रकाशक भी मानते हैं कि कविता-कहानी-उपन्यास के पाठक कम हुए हैं । आलोचना के पाठक तो पहले ही कम थे। हिंदी के कई शीर्ष प्रकाशकों ने तो साहित्य छापना ही कम कर दिया है ।

साहित्येत्तर विषयों की किताबें धड़ाधड़ बिक रही है। कहीं आज का हिंदी साहित्यकार, कवि मध्य वर्ग का वह प्राणी भर तो नहीं जिसे जनता और जनसामान्य से कोई लेना देना नहीं इसलिए वह जन सामान्य से कोई तादात्म्य ही नहीं बिठा पा रहा है। वह ग्लोबलाईज हो गया है। व्यक्तिगत लाभ-हानि की बात भर सोच पा रहा है। उसका सोच द्विस्तरीय है। ऐसे में साहित्य के कम पढ़े जाने का रोना धोना छोड़ उसे वस्तुगत आत्मविश्लेषण अवश्य करना होगा।

संपर्क : पी-1703, जयपुरिया सनराइज ग्रीन्स, प्लाट न. 12 ए, अहिंसा खंड, इंदिरापुरम, गाज़ियाबाद - 201014

1 blogger-facebook:

  1. बड़ा सार्थक , सूचनाप़द और तथ्यों से पूर्ण लेख है , जो इस भ़म को तोड़ता है कि अंग़ेज़ी के समाचारपत्र
    ज़्यादा पढ़ें जाते हैं और इस भ़म को भी तोड़ता है कि इन्टरनेट के कारण पुस्तकों का भविष्य समाप्त
    हो गया है ।

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