शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2013

विजय शिंदे का आलेख - धूमिल की कविता में आदमी

धूमिल की कविता में आदमी

डॉ. विजय शिंदे

प्रस्तावना –

सुदामा पांडे ‘धूमिल’ जी का नाम हिंदी साहित्य में सम्मान के साथ लिया जाता है। तीन ही कविता संग्रह लिखे पर सारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था और देश की स्थितियों को नापने में सफल रहें। समकालीन कविता के दौर में एक ताकतवर आवाज के नाते इनकी पहचान रही हैं। इनकी कविताओं में सहज, सरल और चोटिल भाषा के वाग्बाण हैं, जो पढ़ने और सुनने वाले को घायल करते हैं। कविताओं में संवादात्मकता है, प्रवाहात्मकता है, प्रश्नार्थकता है। कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि मानो हम ही अपने अंतर्मन से संवाद कर रहे हो। आदमी हमेशा चेहरों पर चेहरे चढाकर अपनी मूल पहचान गुम कर देता है। नकाब और नकली चेहरों के माध्यम से हमेशा समाज में अपने-आपको प्रस्तुत करता है, पर वह अपने अंतर आत्मा के आईने के सामने हमेशा नंगा रहता है। उसे अच्छी तरह से पता होता है कि मैं कौन हूं और आदमी होने के नाते मेरी औकात क्या है।

‘धूमिल’ की कई कविताओं में रह-रहकर ‘आदमी’ आ जाता है और आदमी यह शब्द ‘पुरुष’ और ‘स्त्री’ का प्रतिनिधित्व करता है। 1947 को आजादी मिली और हर एक व्यक्ति खुद को बेहतर बनाने में जूट गया। देश विभाजन के दौरान आदमीयत धर्मों के कारण दांव पर लगी थी। विभाजन के बाद दो अलग-अलग राष्ट्र हो गए पर एकता गायब हो गई, हर जगह पर आदमी आदमी को कुचलने लगा। आजादी के बाद जो सपने प्रत्येक भारतवासी ने देखे थे वह खंड़-खड़ हो गए और उस स्थिति से निराशा, दुःख, पीडा, मोहभंग, भ्रमभंग से नाराजी के शब्द फूटने लगे। इन स्थितियों में हर बार इंसानियत, मानवीयता और आदमीयत दांव पर लगी, वह चोटिल होकर तड़पने लगी तथा उसे तार-तार किया गया उसका शरीर चौराहे पर टांगा गया। धूमिल की कविता में इसी आदमी का बार-बार जिक्र हुआ है।

1. गायब चेहरे -

आबादी की दृष्टि से दुनिया का नंबर वन देश। बच्चे पैदा करने की होड़ में सबसे आगे है। अब ऐसी स्थितियां है कि कितनी भी रोक लगे बढ़ना जारी रहेगा। आदमी का हनन हो गया है और उसे चिटियां माना जाने लगा है। भीड़ में चेहरे गायब हो गए हैं। गति और व्यस्थता इतनी बढी कि भीड़ के भीतर भी हर व्यक्ति अकेलापन महसूस कर रहा है। कई झंडों तले बिखरा आदमी जुलूस तो निकाल रहा है पर प्रश्न निर्माण होता है क्यों? जुलूस से भीड़ तो बनती है पर आवाज गायब है और चेहरा भी। एक ‘चीख’ सुनते ही सारा नगर सजग होता था पर अब इंसानियत खत्म हो चुकी है। गायब, खोए चेहरे और हजारों चीखों में भी हमारे कान बहरे हो गए हैं। अतः धूमिल आवाहन कर रहे हैं कि बगल के आदमी के चेहरों को पढ़ने की कोशिश करो।

"अगर हो सके तो बगल से गुजरते हुए आदमी से कहो –

लो, यह रहा तुम्हारा चेहरा,

यह जुलूस के पीछे गिर पडा था।"

(कविता – ‘संसद से सड़क तक’)

‘लोहे का स्वाद’ कविता में इस स्थिति को और कारगर तरीके से कवि व्यक्त कर रहे हैं –

"शब्द किस तरह

कविता बनते हैं

इसे देखो

अक्षरों के बीच गिरे हुए

आदमी को पढो।"

आजादी के बाद अमीर अमीर और गरीब गरीब होते जा रहा है। अमीर और गरीबों के बीच में गहरी खाई निर्माण हो गई है। भारत में एक साथ दो देश निवास कर रहे हैं, एक अमीर देश और एक गरीब देश। कडी मेहनत, धूप, तूफान, बारिश, संघर्ष गरीबों की जिंदगी खाने लगता है और आदमी समय से पहले अनेक तनावों के चलते बूढा होने लगता है।

"यह कौनसा प्रजातांत्रिक नुस्खा है

कि जिस उम्र में

मेरी मां का चेहरा

झुर्रियों की झोली बन गया है

उसी उम्र की मेरी पड़ोस की महिला

के चेहरे पर

मेरी प्रेमिका के चेहरे-सा

लोच है।"

(‘अकाल दर्शन’ – संसद से सड़क तक)

2. तटस्थता –

आदमी की तटस्थता और चुप्पी हमेशा घातक होती है। आप दुनिया के भीतर रहकर दुनिया से अलग और तटस्थ नहीं रह सकते हैं। आस-पास हजारों घटनाएं घटित होती है पर हम आंख मूंद कर बैठे हैं, यह स्थिति निर्जीविता दिखाती है। खैर हम अपनी मन शांति के लिए तटस्थता का जामा पहना देते हैं पर असल में ऐसी स्थितियां जिंदा लाश जैसी ही होती है। देशभक्ति, क्रांति, संघर्ष, लडाई, विरोध, एकता... आदि शब्द आम आदमी के लिए अबूझ लगते हैं। रोजमर्रा की मुश्किलों से समय ही बचा नहीं कि इस पर सोचे। छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करते-करते उसकी सारी ताकत पस्त हो रही है।

"वे इस कदर पस्त है

कि तटस्थ हैं।

और मैं सोचने लगता हूं कि इस देश में

एकता युद्ध की और दया

अकाल की पूंजी है।

क्रांति –

यहां के असंग लोगों के लिए

किसी अबोध बच्चे के –

हाथों की जूजी है।"

(‘अकाल दर्शन’ – संसद से सड़क तक)

3. समझदार लोग –

भारत में मध्यवर्ग नुकीली कीलों पर कसरत करता है। थोडा-सा भार इधर-उधर हुआ कि कीलें पैरों में धंसने की संभावनाएं होती हैं। आर्थिक स्थितियों की कमजोरी महंगा खरेदने नहीं देती और कम कीमतों वाला सुहाता नहीं, अजीब उलझन है। एक झूठ के पीछे दौड़ हमेशा जारी रहती है। अच्छा चाहिए और कम कीमत में और कीमत भी छीपी रहे ऐसी मानसिकता। रुपए दो रुपयों के लिए घंटों विवाद करना और कूतना उसकी फितरत है। समझदार लोगों की बेमतलब की समझदारी पर धूमिल आघात करते लिखते हैं –

"वसंत

मेरे उत्साहित हाथों में एक

जरूरत है

जिसके संदर्भ में समझदार लोग

चीजों को

घटी हुई दरों में कूतते हैं

और कहते हैः

सौंदर्य में स्वाद का मेल

जब नहीं मिलता

कुत्ते महुए के फूल पर

मूतते हैं।"

(‘वसंत’ – संसद से सड़क तक)

4. बोल बच्चन –

देश में नेताओं की भीड़ बढ़ चुकी हैं और हर एक आदमी भाषा के बलबूते पर सत्ता हथियाने की कोशिश कर रहा है। काम करना या बात को अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश कोई भी नहीं कर रहा है। केवल मुंह से हां-हूं कर हवा छोड़ना ही उसका कार्य हुआ है। अर्थात् बोल बच्चनों की संख्या देश में बढ़ चुकी है। भीड़ में, सड़कों पर, बहसों में आदमी हमेशा बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेता है। यह स्थिति संसद से लेकर सड़क तक देखी जा सकती है। ऐसे लोगों पर करारा व्यंग्य करते धूमिल उनकी पोल खोल देते हैं –

"जब

सड़कों में होता हूं

बहसों में होता हूं;

रह-रह चहकता हूं

लेकिन हर बार वापस घर लौटकर

कमरे के अपने एकांत में

जूते से निकाले गए पांव-सा

महकता हूं।"

(‘एकांत कथा’ – संसद से सड़क तक)

यह सड़न, बदबू की उपमा अकर्मण्य आदमी और बोल बच्चनों के लिए जोरदार थप्पड़ है।

5. चापलूसी –

कुत्ता ईमानदारी का प्रतीक है वैसे ही चापलूसों के लिए भी सही उपमान है। चंद टुकडों के लिए सारी ईमानदारी मालिक के पैरों पर झोंकना कुत्ते का धर्म है। इस धर्म का बडी ईमानदारी से चापलूस आदमी भी अनुकरण करता है। ईमानदारी बुरी चीज नहीं है पर स्वार्थ और लालच तले की ईमानदारी चापलूसी होती है। वर्तमान में ऐसे चापलूसों की संख्या बडी तादाद में हैं केवल नजर दौडाने का अवकाश चापलूस पकड़ में आ जाते हैं। ऐसे लोगों को मालिक भी खास समय के लिए पालता-पोसता है। केवल आवाज देने का अवकाश कि ऐसे लोग दौड़कर पैर चाटना शुरू कर देते हैं। बेवजह दूम हिलाने लगते हैं। ऐसे लोगों का मन कभी-कभार अपनी स्थिति से नाराज होता है, एकाध बार ही ऐसा मौका आ जाता है। नहीं तो हमेशा चापलूसी करने में मस्त रहते हैं।

"साल में सिर्फ एक बार

अपने खून से जहर मोहरा तलाशती हुई

मादा को बाहर निकालने के लिए

वह तुम्हारी जंजीरों से

शिकायत करता है

अन्यथा, पूरा का पूरा वर्ष

उसके लिए घास है

उसकी सही जगह तुम्हारे पैरों के पास है।"

(‘कुत्ता’ – संसद से सड़क तक)

6. आदमी की तलाश –

धूमिल प्रत्येक कविता के भीतर आदमी को ढूंढने की कोशिश करते हैं। उसकी सही नाप, लंबाई, चौडाई आंकने की कोशिश जारी रखते हैं पर वह हर बार कवि को चकमा देता है। कवि के लिए आदमी मानो वेताल बन गया हो जो हमेशा विक्रम को बातों में उलझाकर भाग जाता है। आदमी की हंसी-खुशी सब कुछ झूठी लगती है और उस खुशी को आंकने की कवि कोशिश भी धोका खाती है। पल-पल रंग बदलता आदमी धूमिल की पकड़ में आते-आते अगले पन्ने पर जाकर बैठता है।

"जब वह हंसता है उसका मुख

धक्का खाई हुई ‘रीम’ की तरह

उदास फैल जाता है

मेरे पास अक्सर एक आदमी आता है

और हर बार मेरी डायरी के अगले पन्ने पर

बैठ जाता है।"

(‘एक आदमी’ – संसद से सड़क तक)

7. मोहभंग -

आजादी सबके लिए खुशहाली लेकर आएगी ऐसा प्रत्येक भारतवासी का सपना था पर सपना टूटता है। टूटे बिखरे सपने से चकनाचूर लोग दुःखी और पीडित हैं। कभी-कभार यह भी कहते पाए जाते हैं कि इससे बेहतर अंग्रेजों का शासन था। आज आजादी के पहले वाली पीढी बहुत कम बची है। अतः ऐसे स्थितियों की तुलना करना थोडा मुश्किल होगा परंतु यह बात सबके लिए स्वीकार्य है कि असल आजादी का सुख आम आदमी के हिस्से नहीं है। प्रत्येक आदमी का बाप कहीं न कहीं मौजूद है और वह उसे गुलाम बनाए रखता है। सिर झुकाए हां में हां मिलाना मजबूरी बनी है। मजबूरी, शोषण के तले आज का प्रत्येक आदमी पीडादायी जिंदगी जी रहा है। स्पर्धात्मक युग की दौड़ में कौन क्या कर रहा है, किसकी क्या पीडाएं हैं, किसके आंखों में आंसू भरे हैं देखने का समय नहीं और कोई देखना भी नहीं चाहता। मन तो करता है कि आक्रोश करें, छाती पीटे पर हलक से आवाज ही बाहर नहीं निकलती। कवि के शब्दों में –

"सभी दुःखी हैं

सबकी वीर्य-वाहिनी नलियां

सायकिलों से रगड-रगड कर

पिंची हुई है

दौड़ रहे हैं सब

सम जड़त्व की विषम प्रतिक्रिया

सबकी आंखें सजल

मुट्ठियां भिंची हुई है।

(‘नगर कथा’ – कल सुनना मुझे)

8. आदमी का षड़यंत्र और नकार -

जब से संसार में आदमी ने कदम रखा है तब से वह अपने जैसे ही दूसरे आदमी के विरुद्ध षड़यंत्र करते आ रहा है। एक-दूसरे के पैर खिंचना और विरोधी माहौल बनाना कोई आदमी से सीखे। हमेशा दूसरे की छाती पर पैर रखकर अपनी उंचाई बढाने की और जान बचाने की कोशिश होती है। भारतीय प्रजातंत्र में सत्ता की कुर्सी तक आदमी को मौत के घाट उतार कर ही पहुंचा जा सकता है। सत्ता केवल राजनैतिक ही नहीं तो हर जगह की कुर्सी और उसकी गर्मी आदमी को आकर्षित करती है वहां आदमीयत बाकी रहना तो नामुमकिन है।

"न कोई प्रजा है

न कोई तंत्र है

यह आदमी के खिलाफ

आदमी का खुला-सा

षड़यंत्र है।"

(सुदामा पांडे का प्रजातंत्र – एक)

स्वार्थ, अहं, घमंड़ और गुर्मी बढ़ चुकी है। हर कुर्सी वाला गुर्रा रहा है। अपनी गोटियां बिठाने के लिए और अपने लाभ के लिए आदमी होकर भी आदमी को पहचानने से इंकार कर रहा है। सत्ता की गर्मी से मस्त जिस आदमी के कारण अपनी कुर्सी बनी है उसे ही नकारता है।

"कल सुदामा पांडे मिले थे

हरहुआ बाजार में। खुश थे।

बबूल के वन में वसंत से खिले थे।

टकारते हुए बोले, यार! खूब हो

देखते हो और कतारने लगते हो,

गोया दोस्ती न हुई, चलती-फिरती उब हो

आदमी देखते हो, सूख जाते हो

पानी देखते ही गाने लगते हो।"

(सुदामा पांडे का प्रजातंत्र - एक)

9. आदमी की बेबसी और मूल्य हनन –

आजादी के बाद देशी काले अंग्रेजों ने अपना सिर ऊपर उठाया और अपने लोगों पर अत्याचार करना शुरू किया। जिसके हाथों में सत्ता, संपत्ति और अधिकार आए वह शेर हो गया और आम जनता को मेमना समझ डराने-धमकाने लगा। सामान्य आदमी के पास कोई ताकत न होने के कारण दिनों-दिन बेबस होता गया और उसकी आवाज भी गायब हो गई। उसकी भाषा गिर गई और बेबस स्थिति में उसको चेहरा छुपाने की नौबत आ गई ताकि जुल्म करने वालों से बचा जाए। पर उसको ढूंढ-ढूंढकर मारा-पीटा जा रहा है, उसका शोषण किया जा रहा है। अर्थात् आदमी हल्का होता गया।

"हल्का वह होता है,

लेकिन हर हाल में

आदमी को बचना है

गिरी हुई भाषा के खोल में

चेहरा छिपाता है

लेकिन क्या बचता है?"

(‘वसंत से बातचीत का लम्हा’ – सुदामा पांडे का प्रजातंत्र)

‘मोचीराम’ नामक एक लंबी कविता धूमिल जी ने लिखी जिसमें आदमी का सर्वांग मूल्यांकन कवि ने किया है और आदमीयत के हनन का भी जिक्र किया है। जैसे मोची के लिए फटे जूते और चप्पल एक जैसे होते हैं वैसे ही सत्ताधीशों के लिए आदमी का मूल्य जूतों से ज्यादा नहीं। वर्तमान युग में आदमीयत का मूल्य हनन हो चुका है उस पर व्यंग्यात्मक प्रकाश डालते धूमिल ‘मोचीराम’ के माध्यम से कहते हैं -

"बाबूजी सच कहूं – ‘मेरी निगाह में

न कोई छोटा है

न कोई बढा है

मेरे लिए हर आदमी एक जोडी जूता है

जो मेरे सामने

मरम्मत के लिए खडा है।"

10. किसान की दयनीयता –

हमारा देश कहने के लिए कृषि प्रधान है, कहने के लिए किसानों का देश है। किसानों के देश में सबसे ज्यादा अन्याय किसानों पर ही होता है और सबसे ज्यादा उपेक्षा भी किसानों की ही होती है। जो अनाज की उपज कर रहा है उसके लिए रोटी नहीं, शरीर सूख चुका है, आंखें भरी है और कमर झुकी हुई है। रात-दिन मेहनत करके भी उसकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं पर छोटा-सा व्यवसाय करने वाला दुकानदार भी कालाबाजारी करते हुए देश को लूटकर, घपले कर दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति कर करता है। हरित क्रांति के झूठे नारों पर प्रकाश डालते धूमिल ने देश की वास्तविक स्थिति पर करारा व्यंग्य कसा है –

"इतनी हरियाली के बावजूद

अर्जुन को नहीं मालूम उसके गालों की

हड्डी क्यों उभर आई है।

उसके बाल सफेद क्यों हो गए हैं।

लोहे की छोटी-सी दुकान में बैठा आदमी

सोना और इतने बडे खेत में खडा आदमी

मिट्टी क्यों हो गया है।"

(कविता – ‘हरित क्रांति’)

11. दलाल आदमी –

पैसे कमाने का आसान तरीका दलाली है। आजादी के बाद इनकी तादाद इतनी बढी कि गिनती करना भी मुश्किल। कोई काम नहीं एक ही धंधा दलाली, बिचौली। भाषा और चालाकी ही इनके धंधे की पूंजी है, इसके बदौलत लाखों कमाना कोई दलाल आदमी से सीखे। इनका मन करे तो परिवार के सदस्यों को भी बेच-बाचकर दलाली करने से पीछे हटेंगे नहीं। भगवान से लेकर देह बेचकर दलाली पाने की मंशा आदमी रखता है। अपने आपको उठाने के लिए आदमीयत को दांव पर लगाने का असम्मानजनक कार्य दलाल करता है। ऐसी स्थिति पर धूमिल प्रकाश डालते हैं –

"और बाबूजी! असल बात तो यह है कि

जिंदा रहने के पीछे

अगर सही तर्क नहीं है

तो रामनामी बेचकर या रंडियों की

दलाली करके रोजी कमाने में

कोई फर्क नहीं

और यहीं वह जगह है जहां हर आदमी

अपने पेशे से छूटकर

भीड़ का टमकता हुआ हिस्सा बन जाता है।"

(कविता – ‘मोचीराम’)

12. आदमी, रोटी और संसद –

धूमिल द्वारा लिखित ‘रोटी और संसद’ छोटी कविता है पर इसकी चर्चा हमेशा होती है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था में संसद कि मौनता, आंखें होकर भी अंधा होना बहुत बडी विड़बना है। देश के भीतर लूट मची है और लुटेरों को राजनीतिक सहयोग है। अर्थात् संविधान और संसदीय प्रणाली में अवैध को वैध बनाने का गोरखधंधा शुरू है – चुपचाप। काम करने वाले मेहनतकश का पसीना पानी-सा बहाया जा रहा है, उसका खून चूसा जा रहा है। पेट भरने के बाद रोटी से खेलता अमीर कवि ने हमेशा देखा और दूसरी तरफ गरीबी से पीडित घरों का आक्रोश भी। अतः धूमिल का मन विद्रोह कर उठता है –

"एक आदमी

रोटी बेलता है

एक आदमी रोटी खाता है

एक तीसरा आदमी भी है

जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है

वह सिर्फ रोटी से खेलता है

मैं पूछता हूं...

‘यह तीसरा आदमी कौन है?’

मेरे देश की संसद मौन है।"

(कविता – ‘रोटी और संसद’)

13. आदमी की साहसिकता –

कालों से और बरसों से समाज में साहित्य परिवर्तन करता आया है। साहित्य आदमी को ताकत प्रदान करता है, साहस देता है और सही रास्ता भी दिखाता है। कविता और आदमी को जोड़कर धूमिल ने कई बार देखा है और कविता आदमी को ताकत देती है इसका भी विवेचन किया है।

1.

"एक सही कविता

पहले

एक सार्थक वक्तव्य होती है।"

2.

"कविता

भाषा में

आदमी होने की

तमीज है।"

3.

"कविता घेराव में

किसी बौखलाए हुए

आदमी का संक्षिप्त एकालाप है।"

4.

"कविता

शब्दों की अदालत में

अपराधियों के कटघरे में

खडे एक निर्दोष आदमी का

हलफनामा है।"

उपर्युक्त उदाहरणों में कवि ने कविता आदमी की अभिव्यक्ति का जरिया है यह बताने की कोशिश की है। आदमी के सारे दुःख-दर्द और पीडाओं को कविता समेट लेती है तथा उन्हें समाज के सम्मुख रख न्याय की मांग करती है। अकेले आदमी को समूह और समूह को साहस में बांधने का काम भी कविता करती, इस पर प्रकाश डालते धूमिल कहते हैं –

"मेरे शब्द उसे जिंदगी के कई स्तरों पर खुद को

पुनर्रीक्षण का अवसर देते हैं,

वह बीते हुए वर्षों को एक-एक कर खोलता है।

वर्तमान को और पारदर्शी पाता है

उसके आर-पार देखता है।

और इस तरह अकेला आदमी भी

अनेक कालों और अनेक संबंधों में

एक समूह में बदल जाता है।

मेरी कविता इस तरह अकेले को

सामूहिकता देती है और समूह को साहसिकता।"

(‘कविता के द्वारा हस्तक्षेप’ – कल सुनना मुझे)

14. सजगता –

आदमी सजग रहे, जागृत रहे। उसने अपने आस-पास को आंखें खोलकर देखना चाहिए। सच और झूठ के अंतर को समझना चाहिए। दुनिया में अपना अस्तित्व कायम रखते हुए अपने आपको कभी भी कमजोर न समझे इसकी हिदायत धूमिल देते हैं। अकेली बूंद भी समुद्र का आकार ग्रहण कर सकती है, अतः बूंद के समान प्रत्येक आदमी का मूल्य है। पहाड़, समुद्र और चोटियां अपनी विशेषताओं के कारण आदमी को बौना तथा लघु कर सकते हैं पर धूमिल इन बातों से सजग रहने की सूचना दे हैं –

"और कोई आंख

छोटी नहीं है समुद्र से

यह केवल हमारी प्रतीक्षाओं का अंतर है

जो कभी

हमें लोहे और लहरों से जोड़ता है।"

(‘अंतर’ – कल सुनना मुझे)

15. ‘चीख’ और ‘चुप’ –

पूंजीवादी समाज में गरीबों का कोई विशेष महत्त्व नहीं, ऐसी आम मानसिकता गरीबों की बनती है। आत्मविश्वास की कमी के कारण कंधे और सर झुक जाता है। परंतु कवि का कहना है कि गरीब और आम आदमी अन्याय न सहे, आवाज उठाए, आक्रोश करे। समझ में आना चाहिए कि कहां चीखे और कहां चुप बैठे। ‘चीख’ और ‘चुप’ बहुत असरदार होती है और सामने वाले के गलत इरादों पर रोक लगा देती है। जरूरी है इन दो अस्त्रों का उचित और सार्थक प्रयोग हो। कवि के शब्दों में –

"जबकि मैं जानता हूं कि ‘इंकार से भरी हुई एक चीख’

और ‘एक समझदार चुप’

दोनों का मतलब एक है –

भविष्य गढ़ने में ‘चुप’ और ‘चीख’

अपनी-अपनी जगह एक ही किस्म से

अपना-अपना फर्ज अदा करते हैं।"

(कविता – ‘मोचीराम’)

16. परिवर्तन –

शिक्षा और पढाई से परिवर्तन हो सकता है इस बात को ध्यान में रखते हुए सरकार ने बच्चों की पढाई को नजरंदाज करते हुए प्रौढों को पढाने की कसरत की और ‘प्रौढ़ शिक्षा अभियान’ को सारे देश में चलाया। कुछ सफल पर ज्यादा जगहों पर कागजी खानापूर्ति। हमारे देश में किसान, मजदूर और गरीब हमेशा अज्ञानरूपी अंधेरी गुफाओं में ठोकरें खा रहे हैं। शिक्षा का लाभ उठाने से और बच्चों की पढाई पर भी विशेष ध्यान देने से परिवर्तन की आस बनती है। धूमिल ने ‘प्रौढ़ शिक्षा’ कविता में आम आदमी के अज्ञान पर आघात करते हुए अकड़ने का आवाहन किया है –

"काले तख्ते पर सफेद खडिया से

मैं तुम्हारे लिए लिखता हूं – ‘अ’

और तुम्हारा मुख

किसी अंधी गुफा के द्वार की तरह

खुल जाता है – ‘आऽऽ’

• • •

इसलिए मैं फिर कहता हूं कि "हर हाथ में

गीली मिट्टी की तरह ‘हां-हां’ मत करो

तनो

अकडो

अमरबेलि की तरह मत जिओ

जड़ पकडो

बदलो अपने आपको बदलो।"

(कविता – ‘प्रौढ़ शिक्षा’)

निष्कर्ष –

समकालीन कविता के प्रमुख आधार स्तंभ के नाते धूमिल ने बहुत बढा योगदान दिया है। उनकी कविता में राजनीति पर जबरदस्त आघात है। आजादी के बाद सालों गुजरे पर आम आदमी के जीवन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ, अतः सारा देश मोहभंग के दुःख से पीडित हुआ। इस पीडा को धूमिल ने ‘संसद से सड़क तक’, ‘कल सुनना मुझे’ और ‘सुदामा पांडे का प्रजातंत्र’ इन तीन कविता संग्रहों की कई कविताओं के माध्यम से व्यक्त किया है। उनकी कविता में पीडा और आक्रोश देखा जा सकता है। आम आदमी का आक्रोश कवि की वाणी में घुलता है और शब्द रूप धारण कर कविताओं के माध्यम से कागजों पर उतरता है। बिना किसी अलंकार, साज-सज्जा के सीधी, सरल और सपाट बयानी आदमी की पीडाओं को अभिव्यक्त करती है। धूमिल का काव्य लेखन जब चरम पर था तब ब्रेन ट्यूमर से केवल 38 वर्ष की अल्पायु में उनकी मृत्यु होती है। तीन कविता संग्रहों के बलबूते पर हिंदी साहित्य में चर्चित कवि होने का भाग्य धूमिल को प्राप्त हुआ है।

संवादात्मक और व्यंग्यात्मक शैली में लिखी धूमिल की कविताओं का केंद्र आदमी रहा है। बार-बार कविताओं को पढ़ते आर. के. लक्ष्मण का ‘कॉमन मॅन’ नजरों के सामने आकर खडा होता है। संसद और संसद को चलाने वाली राजनीतिक व्यवस्था ‘आम आदमी’ के भलाई की बात करती है पर असल में वे अपनी ही भलाई सोचते हैं। राजनीति में प्रवेश कर चुका हर एक खद्दरधारी, टोपीधारी आम आदमी के खून को चुस रहा है। वर्तमान राजनीति में राजनेताओं के चेलों की भी एक लंबी फौज तैनात हो गई है। अर्थात् संसद (राजनीति) से जुडे प्रत्येक व्यक्ति का मूलमंत्र ‘हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे’ वाला बन चुका है। चुपचाप तुम भी खाओ और मैं भी खाता हूं का धर्म बडी ईमानदारी से निभाया जा रहा है। यह व्यवस्था चूहों के समान आम आदमी के सपनों को कुतर-कुतर खा रही है। धूमिल की कविताओं में ऐसी स्थितियों के विरोध में आक्रोश है। बार-बार आवाहन कर कवि ‘आदमी’ की कमजोरियों पर उंगली रखकर चेतित करने का प्रयास कर रहा है। अर्थात् ‘आम आदमी’ के सामने धूमिल की कविता जीवन सत्य उघाड़कर रख देती है।

डॉ. विजय शिंदे

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देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद-431005 (महाराष्ट्र).

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

ईमेल – drvtshinde@gmail.com

3 blogger-facebook:

  1. शानदार आलेख के लिए आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  2. धूमिल जी के काव्य की सार्थक समीक्षा है। आभार बन्धु।

    उत्तर देंहटाएं
  3. ऐसे उघड़े हुए सत्य को पढते हुए बस कवि को नमन करने की इच्छा होती है.. और एक नि:शब्दता पसर जाती है..

    उत्तर देंहटाएं

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